Tuesday, November 23, 2010

गीता दत्त की मासूमियत भरी अदाकारी


आज नशीली , जादुभारी आवाज़ की मलिक गीता दत्त का जन्म दिन है. अगर वे आज़ ज़िंदा होतीं, तो ८० वर्ष की होती!!

गेताजी के पुण्य तिथी पर कुछ खास लिखना चाहता था, मगर अब वे सुख भरे दिन बीते रे भैय्या... वाली स्थितियों के चलते हुए नही लिख पाया.गुरुदत्त जीकी पुण्य तिथी पर भी पिछले महिने कुछ नही लिख पाया.आज भी कुछ खास नही लिख पाउंगा.

याद आया कहीं पढा हुआ कि गुरुदत्त जी नें गीता रॊय से शादी के बाद अपनी हर फ़िल्म में गाने ज़रूर गवाये, जो काफ़ी मक़्बूल भी. मगर उन्होनें मात्र गीताजी के लिये बतौर हिरोईन एक फ़िल्म भी लॊंच की थी-’गौरी’, जो बंगला भाषा में बनने वाली थी और भारतीय फ़िमों के इतिहास में सबसे पहली सिनेमास्कोप फ़िल्म थी.

अगर वह फ़िल्म बनती तो पता नहीं हम गीता दत्त के रूप में एक अभिनेत्री से भी रूबरू हो जाते. फ़िर शायद सर्वकालीन कालजयी का़गज़ के फ़ूल बन पाती , जो लगभग उसी विषय वस्तु पर थी?

गुरुदत्त एक अफ़लातून , जिनीयस क्रियेटर या सर्जक थे, और अपने दिल की आवाज़ या सनक की वजह से फ़िल्म का विषय चुनते थे, और बिना ज़्यादह सोचे समझे फ़िल्म बनाना शुरु कर देते थे. उनके मित्र और लगभग हर फ़िल्म के लेखक जनाब अब्रार अल्वी नें उन्हे खूब समझाने की कोशिश की, कि बंगाली फ़िल्म तीन चार लाख में बनती थी क्योंकि उतना ही उसका रिटर्न होता था.जबकि हिंदी फ़िल्मों पर उन दिनों भी गुरुदत्त जी चालीस पचास लाख खर्च कर देते थे.

चलिये , आज उनके जिनीयस कलाकृतियों को World Cinema में पाठ्य पुस्तकों का दर्ज़ा मिलता है, मगर मैं तो गीता जी की मादक मगर शालीन आवाज़ के साथ उनकी सादगी भरी आंखों के भाव प्रवेणता का भी कायल था, और अवश्य गुरुदत्त जी के सधे हुए निर्देशन में हम एक बढिया अभिनेत्री को अपने बीच पाते.

चलिये, आपको गीताजी के एक बहुत ही बढियां गीत का कवर वर्शन सुनाते हैं जिसे हमारे ब्लोग दुनिया की हरफ़नमौला कलाकार और कवियत्री सुश्री अल्पना वर्मा नें गाया है.

जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैने कही, बात कुछ बन ही गयी....


अल्पनाजी वैसे हर गायिका के गानेंगाती हैं, मगर मुझे उनकी आवाज़ में गीता दत्त के मासूमियत भरे स्वर नज़दीक प्रतीत होतें हैं.

वैसे चलते चलते बता दूं, कि जिस समय गौरी फ़िल्म के निर्माण की बात चल रही थी, उसके पहले गुरुदत्त जी नें Women in White’ की कथावस्तु पर राज़ फ़िल्म का निर्माण शुरु किया था जिसमें वहिदा और सुनील दत्त थे. इस फ़िल्म के १०-१२ रीलें भी बन गयी थे. मगर वह फ़िल्म भी डब्बा बंद हो गयी...

पता है उस फ़िल्म में पहली बार संगीत कौन दे रहे थे?

जी हां.. राहुल देव बर्मन!!!! (What a rare combination! RD & Gurudutt!!!!)

Sunday, November 14, 2010

इब्तदा ए इश्क में हम सारी रात जागे-



अभी अभी एक मराठी नाटक देख कर आया हूं, जिसमें एक बडा ही पावरफ़ुल डायलोग था:

If you want to close chapter, you have to hate the thing you LOVE most.

बात सीधी दिल में उतर गयी,और अब दिलीप के दिल में से दिलीप के दिल से
के फ़लक पर....

आज से दो चार साल पहले इस बात का इल्म हो गया था कि ज़िंदगी में अगर ऊपर जाना हो तो किसी की सर पर तो पांव रखना पडेगा. लेकिन मैं किसी की बडी लकीर को छोटी करने का गुनाह कर नही पाया तो अपनी ही दूसरी लकीर छोटी कर ली.

मैं बात कर रहा हूं अपने पहले पहले प्यार की... याने संगीत और गायन के अपने शौक की....

इसिलिये दो तीन साल पहले मैने भी सोच लिया कि Now its time to close chapter of Music. सो एक अंतिम प्रोग्राम कर मैने अपने एमेच्युअर शौक की इतिश्री कर ली.

और फ़िर झौंक दिया अपने आप को अपने प्रोफ़ेशन के प्यार में .( I genuinely LOVE my profession-By the way).वैसे भी एजिप्ट में प्रोजेक्ट शुरु होने से आधे से भी ज़्यादह महिना वहां कटता है.

But I could not hate that thing I LOVED most. MUSIC.

इन्ही दिनों जब पुराने घाव एक दिन हरे हो गये, और मै लिमका से अपने ग़म ग़लत कर रहा था , तो मेरे अंतर्मन मित्र ने बोला... इब्तदा ए इश्क में रोता है क्या...आगे आगे देख अब होता है क्या...

सोच कर एक दिन अपनी वाली पर आ गया.. याने एक प्रोग्राम को हां कह दिया.

अब सिर मुंडवाते ही ओले पडे. कार्यक्रम के दो दिन पहले तक तो इजिप्ट में ही साईट पर दंड बैठक लगाना पड रहे थे, तो रियाज़ का क्या होता?(यकीन मानिये ...बिन रियाज़ सब सून- गुलाम अली साहब के शब्द याद आ गये)

तभी सोचा सुएज़ से कैरो आने जाने के एक एक घंटे में ही रियाज़ की जायी. ड्राईवर भी टेंशन में आ गया, आज साहब नें उसके अरबी गाने क्यूं बंद करवा दिये, और खुद चालू हो गये ... ये इंडियन भी छः महिने चुप रहते हैं और छः महिने गाते रहते होंगे!!!

वैसे प्रोग्राम की शाम के एक दिन पहले तक हमें खुटका था,कि अल्लाह जाने क्या होगा आगे, मौला जाने क्या होगा आगे....

kuwait Airport पर Transit में दो भारतीयों नें जो नवरतन तेल चुपड रखा था कि नाक बहने लगी और गले में खराश आ गयी. मैने तो पूछ ही लिया उनसे, कि भाईसाहब क्या यहां ये तेल मुफ़्त में मिलता है
?

तो भाईयों और बहनों, दिल थाम के बैठें... हम आ रहे हैं, इतने सालों बाद स्टेज पर, और आपके पेशे खिदमत है ये सुरीला दोगाना फ़िल्म हरियाली और रास्ता का ---

इब्तदा ए इश्क में हम सारी रात जागे,
अल्लाह जाने क्या होगा आगे, मौला जाने क्या होगा आगे...


आगे क्या हुआ अब आप खुद ही चेक कर लिजिये!!!!



मुकेशजी की जगह अपुन, और लताजी की जगह अदिती दिक्षित.१६ साल की इस लडकी की आवाज़ में सुरीलापन , सोज़, और लोच है. शायद इसिलिये ज़ी टीव्ही के लिये सा रे गा मा प में सबसे कम उम्र की प्रतिभागी रही और जैसा कि मुझे बताया है पहले २० में आ गयी थी. बाद में १८ में नही आ पायी दुर्भाग्य से.

अभी काफ़ी इम्प्रूव्हमेंट करना है, खास कर आवाज़ के थ्रो और पॊवर में... चलो अगली बार सही...

और भी बहूत बहूऊऊऊत गाने गाये जी भर के, (सारी रात तो नहीं जागे!!दूसरे भी गायक गायिका थे जनाब.)

सोलो में - मुकेशजी का - ओ मेहबूबा, तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िले मकसूद....
हेमंत दा का - ना तुम हमें जानो, ना हम तुम्हे जानें..
और रफ़ी जी का - बदन पे सितारे लपेटे हुए...
और ड्युएट में - ये गीत,
- झूमता मौसम मस्त महिना..और ओ मेरी मैना...( मन्ना दा )
- दम भर जो इधर मूंह फ़ेरे ( मुकेशजी)
- आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे (रफ़ी जी)

और अंत में एक चतुर नार ( कई हज़ारों बार.. इसक चर्चा अगली बार)

Wednesday, November 10, 2010

हम जब होंगे साठ साल के., और तुम पचपन की.... कहां है दोनो?




सबसे पहले आप सभी मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें,

आज सुबह एक मित्र के बडे भाई का फोन आया, कि क्यों तुम्हारी दैनिक भास्कर में पहचान है?

मैंने पूछा काहे के लिये...

तो गुस्से में बोले कि अख़बार में लिखा है, ६० साल के वृद्ध का एक्सिडेन्ट...क्या साठ साल में कोई वृद्ध हो जाता है भला?

वैसे , बात उन्होने ठीक ही कही है. वे कहीं से भी साठ के नही लगते. अपने परिचितों को भी याद किया जो साठ के आसपास होंगे, तो वृद्ध जैसी कोई छबि नही बनती? खैर अखबार के ये क्या जानेंगे , मगर मैं भी ये सोच कर सिहर उठा कि आज से कुछ सालों बाद मुझे भी लोग वृद्ध कहेंगे ?

पत्नी नें कहा कि आजकल स्वास्थ्य की अवेयरनेस काफ़ी बढ गयी है, और ज़्यादहतर लोग फ़िट ही हैं आजकल...

संय़ोग से अभी रात को फ़िल्म कल, आज और कल देख रहा था, तो सामने अचानक ये गाना आ गया..

हम जब होंगे साठ साल के, और तुम होंगी पचपन की,
बोलो प्रीत निभाओगी ना, तब भी अपने बचपन की......

गाने में भी यही कुछ था... बुढापे में साठ साल में लकडी के सहारे चलना, आवाज़ का कंपकपाना, आंख का धूंधला हो जाना..,. आदि.

फ़िर ये भी सोचा कि एक तसवीर ये भी है, कि चालीस पचास में ही मधुमेह, रक्त चाप, हृदयरोग , आदि से हमारी पीढी रू ब रू हो रही है, और संख्या में इज़ाफ़ा होरहा है,जब कि पुराने चावल देसी घी की बघार में फ़ूले जा रहे हैं.

खैर, अब बात यह भी है, कि आज से तीस चालीस साल पहले गाये गये इस गाने की जोडी नें रील लाईफ़ के बाहर रीयल लाईफ़ में भी शादी कर ली थी, और आज रणधीर कपूर और बबिता कपूर लगभग साठ और पचपन के ही होंगे.


तो आज क्या सीन है बॊस?



पता नही कौन कहां है,मगर इतना ज़रूर है, की करीश्मा और करीना के माता पिता की यह जोडी अब साथ साथ नही है!!

है ना अजब प्रेम की गजब कहानी......




Wednesday, October 13, 2010

बेचारा झुमरू दिल - किशोर दा की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजली..


आज हरफ़नमौला कलाकार किशोर कुमार की पुण्यतिथि पर मेरे दिल की गहराई से किशोर दा को विनम्र श्रद्धांजली ...

पिछले साल किशोर दा के कॊलेज इंदौर क्रिश्चियन कॊलेज में विडियो शूट करने का प्रयास किया था,जिससे बहुत ही भिशूण स्वानंद प्राप्त हुआ था. आपमें से कई वहां गये भी होंगे.मैने उसे इस ब्लोग पर भी पोस्ट किया था.

मुझे गुजिश्ता दिनों में कई मित्रों ने गुज़ारिश की कि उसे फ़िर दिखाया जाये. आपमें से कईयों नें तो देखा भी होगा.

इसलिये आधे दायें जाओ, आधे बांयें जाओ, और बाकी मेरे साथ चलो किशोर दा के किशोर युवा दिनों की यादें ताज़ा कर लें...दिलीप के दिल से....



जीवन में कई गानें गाये अभी तक..

रफ़ी साहाब, मन्ना दा , की गले की हरकतें और मुरकियां, मुकेशजी और तलत साहब की भावनाऒं और एहसासात से भरी दर्द भरे आर्त स्वर, हेमंत दा की धीर गंभीर आवाज़ और सबसे एल्हैदा किशोर दा की खिलंदड्पूर्ण लाईव गाना.... सभी गाने की कोशिश में लगा रहा. गायकों के अमृत सुरों की च्यवनप्राश खा कर एक बात साफ़ समझ में आ गयी.

किशोर दा जीवंत रियलिटी शो के मानींद गाते थे, मानों स्टुडियो भी स्टेज ही हो.उनके अंदर का अभिनेता गाना गाते हुए उनके गले में उतर जाता था.वे गायक नहीं थे, एक सांचे में ढली डेफ़िनेशन की बात करें तो.वे गाते हुए भी अभिनय करते थे, और अभिनय भी लय और सप्त सुरों जैसे सप्त रसों की छटा दिखाते हुए.

किशोर दा की थाली में आपको हर प्रकार के व्यंजन मिलेंगे. हास्य की मीठी रबडी, व्यंग्य की रसभरी जलेबी, दर्द भरी तिखी मिर्च से भरपूर सब्ज़ी, रोमांटिक कढी़... (य़े मैं नही, अमितकुमार नें एक बार बताया था!!)



मगर पता नहीं ये मूडी कलाकार ना जाने किस आशंका से हर दम किसी गिलहरी की तरह सहमें, डरे से रहते थे.सन १९८२ में अमेरिका में डिज़्नी लेंड में मेरे माता पिता नें किशोर दा को भी लाईन में लगे देखा तो पिताजी नें पास जाकर उनके पीठ पर हलके से धौल जमाई, जैसे कि वे कॊलेज दिनों में लगाया करते थे. तो किशोर दा एकदम घबरा के गंभीरता से कहने लगे कि भई मैं किशोर नहीं हूं.मुझे माफ़ करो. तो पिताजी नें उन्हे कॊलेज के दिनों की याद दिलाई और कुछ पुराने दिन शेयर किये.हालांकि पिताजी का सीधा संपर्क नहीं था किशोर दा से उन दिनों, मगर सांस्कृतिक कार्यक्रम की वजह से एक ही स्टेज शेयर ज़रूर किया था.अनूप कुमार भी सांस्कृतिक सचिव थे वहीं. तब कहीं जाकर किशोर दा कुछ संयत हुए और फ़िर मूड में आकर उन दिनों का नोस्टाजिया शेयर किया.केंटीन वाले के उधार पांच रुपय्या बारह आना भी!!!

किशोर दा मगर हमेशा दिल से झुमरू ही रहे...कई किस्से कई संस्मरण,क्या लिखें, बस आप और गीत यहां सुनें...

उनका सबसे पहला गीत.. फ़िल्म ज़िद्दी से, सन १९४८...

Monday, September 13, 2010

यही वो जगह है, यहीं पर कभी हमने आपके सामने गाया था....



दोस्तों, कभी कभी हम अपने जीवन के ऐसे दौर से गुज़रते हैं, जब हमें खुदा हर तरफ़ से खुशियां बरसाता है, और आपका दिल बल्ले बल्ले उछल रहा होता है.

मगर , यूंही चलते चलते यादों के पुराने खंडहरों से हम गुज़रने लगते हैं, और खुशी और ग़म के समानांतर रास्ते पर जब हमारे गाडी़ हिचकोले खाती है,तो मीठी सी चुभन हो या तीखी सी ख़लिश हो, आप उसमें रमने लगते हैं, और दीदाए तर होते हैं.

पिछले दिनों, किशोर दा की जन्मदिन की खुशिया मनाईं कैरो (ईजिप्ट)में, जैसे कि रफ़ी साहब के पुण्यतिथी पर उन्हे याद किया था. रफ़ी साहब के बांद्रा स्थित घर के बरामदे में रखी हुई उनकी फ़िएट याद आये, जिसमें चाभी भी लटक रही है उस दिन से, या किशोर दा के बंगले पर गेट सेही उन्हे पेड पर चढे हुए गाना गाते हुए देखा और सुना....सभी यादें दिल में घर किये हुए है.

याद पडता है कि किशोर दा गाना गा रहे थे आशाजी का, जो दूरी के वजह से ठीक से सुनाई नही पड रहा था.. गाना था.........

यही वो जगह है ,यही वो फ़िज़ाएं, यहीं पर कभी आप हमसे मिले थे....

पता नहीं क्यों, जिस खूबसूरती से आशा जी नें गाया था वो गाना, किशोर दा किसी और मूड में दर्द के काढे़ में अपने स्वरों को उकाल उकाल कर क्या समा बना रहे थे.चौकिदार नें अंदर नहीं जाने दिया, इसका ग़म ना करते हम तो बडे से जायेंट व्हील पर बैठ कर स्वरों के उस उतार चढाव में खो गये.फ़िर अचानक बीच में गाना रोक कर किशोर दा चिल्लाकर किसे को आवाज़ देने लगे नारायण,नारायण... तो हम खिसक लिये.

तो अभे जब आशाजी की जन्मदिन की खुशियां मनाईं, तो उस दिन ये गाना रिकोर्ड कर लिया , कुछ ऐसे ही अंदाज़ में. संय़ोग ये रहा, कि इन दिनों में अल्पना जी से बातचित हुई तो उन्होने ये बताया कि अभिजीत नें भी इसे गाया है. खैर, आप भी सुनिये.

आशा जी सुनेंगी तो नाराज़ होंगी ही. पिछली नाराज़गी भारी पडी़ थी मुझे, जब इंदौर में उन्होने एक कार्यक्रम दिया था, और मैने, अखबार नईदुनिया में उसकी समीक्षा में उनके आलोचना के थी, क्योंकि उन्होने अधिकांश गीत नये लिये थे, और मेरे जैसे अनेक दीवानों को निराश किया था. इसलिये दूसरे दिन जाने से पहले उन्होनें नाराज़गी से लताडा था मुझे.(सर आंखों पर)


चलिये अब सुनिये, वही गीत और अगली बार समय रहा तो उस बात का जिक्र करूंगा, कि जब वे इंदौर आयीं थीं लताजी के नाम का पुरस्कार ग्रहण करने, और गाने का प्रोग्राम देनें से इंकार कर दिया था.और फ़िर इस खा़कसार को स्टेज पर आपातस्थिती में उतरना पडा था. आप सोच सकते हैं, कि जो पब्लिक उन्हे सुनने आये थी उसे मुझ जैसे नाचीज़ को सुनना पडा होगा तो क्या हुआ होगा!!!!(रब की मर्ज़ी)

यही वो जगह है, जहां कभी हमने आपके सामने गाया था....

Sunday, August 29, 2010

जाने कहां गये वो दिन.....मुकेशजी की पुण्यतिथी




अभी विविध भारती सुन रहा हूं और एक बेहद हृदयस्पर्शी गीत नश्र हो रहा है:

तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नही...

मन में कई सवालत उठ रहे हैं पिछले कई दिनों से, लगभग एक महिने से जब से इजिप्ट में प्रोजेक्ट शुरु हुआ है, तो भौतिक रूप से,मानसिक रूप से तसल्लीपूर्ण ज़िंदगी बसर हो रही है. जेहनी तौर पर मेरे अंदर का आर्किटेक्ट/इंजिनीयर और साथ ही एंटरप्रेन्युअर मालिक के रहमों करम से खुश है, मगर रूहानी स्तर पर मेरे अंदर का कलाकार एक दम घुटने वाली अवस्था से गुज़र रहा है.

दर असल पिछले करीब तीन चार सालों से स्टेज पर फ़ॊर्मल कार्यक्रम नही देने के कसक दिल में कई दिनों से चुभ रही है.हां, इधर उधर घर की या दोस्तों की शादी या मंगल कार्य में अपनी उपस्थिति दर्ज़ ज़रूर कराई,मगर मन अब तरस सा गया है. हर साल एक गायक, रफ़ी जी, मुकेशजी, हेमंत दा, , मन्ना दा आदि.

अब आप कहेंगे,क्यों अपने ग़म गलत कर रहे हो. तो सच कहूं,जब से ब्लोगिंग शुरु की है, कुछ सुकून भरे पल यहां बिता लेता हूं, और्र आप के सामने अपनत्व के भावना प्रबल हो जाने के कारण इतना लिखने की ज़ुर्रत कर बैठा.

अब देखिये ना. गीता दत्त जी का जन्म दिन गया पिछले महिने.मन में कुछ भाव उमडे,और उनके जीवन के कुछ यादगार लम्हों को यहां बाटना चाहा भी,मगर फ़िर समय का तकाज़ा.

और जब मेरे दिल के अज़ीज़ कलाकार रफ़ी जी की पुण्यतिथी थी,तो अपने सुएज़ केनाल पर बने अपने गेस्ट हाऊस में बैठ कर कुछ भारतीय , कुछ मिश्री साथियोंके साथ कुछ गीत गुनगुनाये भी.ब्लोग नहीं लिख सका.

फ़िर किशोरदा के जन्म दिन पर भी कैरो के एक होटल में जब गायक नें इजिप्शियन गाने के बाद मुझे देखपर आवारा हूं गाया,तो मैं भी भावाभिभूत हो गया कि ये गीत जो हम भारतीय जन मानस की रूहों तक अंदर घुस गया है,जिसने रशिया में और युरोप में भी हज़ारों दीवाने बनाये,वही गीत यहां भी अपने जलवे बिखेर रहा था.

इसलिये आज जब मैं यहां बैठा इंदौर में मुकेशजी को याद कर रहा हूं,तो इच्छा हुई तो ज़रूर थी कि कहीं कोई कार्यक्रम दिया भी जाय.मगर संभव नही हो सका, क्योंकि उसके लिये , रिहल्सल केलिये भी तो समय चाहिये. अपनी ही बनाई हुई चांदी की चारदिवारी में कैद हो गया हूं, क्योंकि मैने ही ये रास्ता चुना है.समय और गुणवता के कार्यक्रम में लगने वाले लगन और मेहनत आज संभव ही नही.

चार दिन पहले ही जगजीत सिंग जी के कार्यक्रम से लौटते हुए अनुज मित्र संजय भाई पटेल नें शिकायत करते हुए कहा कि अब एक दिन बहुत झगडा करना है.

बस,फ़िर रात को देर तलक लेप्टॊप पर मुकेश जी को सुनता रहा, आनन फ़ानन में एक उनका एक गीत मुकम्मल किया जो इजिप्ट में एक रात रिकोर्ड किया था. आशा है, मेरे दिल के इन ज़ख्मों को आप मेहसूस करेंगे, और प्रेरित करेंगे कि मैं ब्लोगिंग में फ़िर से सक्रिय होऊं.इंशा अल्लाह!!


कुछ मुकेशजी पर भी.

सात्विक चरित के मालिक मुकेशजी की सुनहरी आवाज़ में जादू था उनका मन से , रूह से पाक होना. मुझे याद है, जब मैं उनके एक गाने की रिहल्सल में मौजूद था- कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है, तो वे सुबह से ही स्टुडियो में आ गये थे, और रिहल्सल कर रहे थे.लता भी आने वाली थी, मगर उन्हे जानबूझ कर दोपहर बाद बुलाया था.मुकेशजी चाय पर चाय पीकर आपने गले की खराश को ठीक रख रहे थे, और उन्होनें तहे दिल से स्वीकार भी किया कि उनकी रेंज, गायकी , समझ, और पकड लताजी के सामने कुछ भी नहीं.



तभी जब दोपहर के बाद जब लताजी आयें, तो बस दो या तीन रिहल्सल्स के बाद लताजी टेक के लिये तैय्यार हो गयी थी.दुर्भाग्य से तब तक हम रुक नहीं पाये थे.






मगर जो भी लोग यह कहते हैं की मुकेशजी के ऊंचे पाये के गायक नही थे,तो मैं उन्हे यह अर्ज़ करना चाहूंगा ,कि वे एक सरल और आम आदमी के गायक थे, और इसलिये वे क्लिष्ट गायकी से बचते थे.अपने अनुभव से कह रहा हूं. श्रोता बिरादरी में सन २००१ में मुकेश जी पर दिये एक अनौपचारिक कार्यक्रम में मैने देखा कि जब मैने मेरा जूता है जापानी का स्थाई शुरु किया तो हॊल में उपस्थित पुरुषवर्ग, और तो और महिलावर्ग भी दबे ज़ुबान में गाना गुनगुनाने लगा. तो फ़िर मैने अंतरे पर सभी को साथ में गाने को क्या आमंत्रित किया तो मानो हॊल में सुरों का सैलाब सा आ गया,और गै़रते मेहफ़िल के मारे श्रोताओं नें खुल कर गाना शुरु किया - निकल पडे हैं खुल्ली सडक पर, अपना सीना ताने....






आज इसीलिये मुकेश जी हर उस इंसां के दिल में रूह में समा गये हैं, कि हर दर्द भरे मंज़र में हम मुकेशजी के गाये किसी गीत को गा कर उनके पथोस की इंटेसिटी को मेहसूस करके अपने अपने ग़म गलत किया कर लेते हैं.

तो आज सुनियेगा - कोई जब तुम्हारा हृदय तोड दे....


Friday, July 16, 2010

वो भूली दास्तां....लो फ़िर याद गये मदन मोहन....


फ़िर वही शाम, वही गम, वही तनहाई है.....
दिल को समझाने मदन मोहन की याद चली आयी है...............

१४ जुलाई १९७५ को ये गुणी , वर्सेटाईल और माधुर्य से भरी धुनों का शहेन्शाह हमसे बिछड गया, और तब से उसके करोडों चाहने वाले जब भी यह गीत सुनते है, या इस जैसे कई अनेक, तो हम, आप और वे उनकी याद में आंख से एक कतरा तो ज़रूर बहाते हैं.

मैं अपने बचपन में मदन जी के एक गाने से रूबरू हुआ जैसे कि मां के कोख से ही, जब मेरी मां नैना बरसे रिमझिम रिमझिम सुनती थी, जो उसका हिंदी का बेहद पसंदीदा गीत था. चूंकि वे इतना अच्छा नहीं गाती थी, वे मेरे पिताजी से हमेशा यह गाना सुनती चली आ रही थी, बिलकुल पुरुष स्वर में!!!अपने अंतिम दिनों में भी!!इसलिये मैं भी लताजी के ही गाने गा गाकर बडा हुआ.

परसों यहां मदनजी को श्रद्धांजली देने के लिये एक कार्यक्रम हुआ, जिसमें गायिका सपना नें लता जी के गाये हुए एक से एक नगमें सुनाये. मन फ़िर रम गया इन नगमों में और यादें मुझे पीछे ले गयी कुछ ८-१० सालों पहले, जब मुंबई में लताजी नें बहुत दिनों बाद एक कार्यक्रम दिया था और उसमें से कई गानें मदनजी के संगीतबद्ध किये हुए थे!!

तब एक गाना बडा ही दिल को छू गया , जो पहले भी सुनता चला आ रहा था, मगर पता नहीं क्यूं, उस दिन वह कलेजे को चीर कर रूह तक घुस गया-

वो भूली दास्तां... , लो फ़िर याद आ गयी....

अगर आपको उस दिन गाया हुआ यह गीत सुनना हो तो यूट्युब में जाकर सुन सकते हैं. मैं उसे यहां लोड नहीं कर सकूंगा , क्योंकि एम्बेड कोड नही है.

http://www.youtube.com/watch?v=a8L01-6441A&feature=related

मगर यकिन मानिये, इस गीत को खुद गानें की भी इतनी ख्वाहिश थी कि चुपके चुपके बाथरूम में गा लेता था. दोस्तों की मेहफ़िल में ये गाना गाने के कोशिश की ज़रूर , मगर सर्वकालिक महान लताजी के गाये गाने का जिगर नहीं ला पाया.

आज ज़्यादा भूमिका ना बांधते हुए एक इल्तज़ा है आप सभी अंतरंग मित्रों से, स्वर साथियों से,कि आज मेरी ये दिली ख्वाईश पूरी कर ही लेता हूं, और ये गाना रिकोर्ड करने की धृष्टता कर डालता हूं.गाने के मूड़ और जोनर के हिसाब से पुरुष स्वर में से खास गायक की तरह से गाने की कोशिश की है ( आप पहचान गये ना?).

अब जो भी गलत गाऊं, सज़ा मंज़ूर....पेशे खिदमत है.....



वस्तुतः , मैं एक एमेच्युअर गायक हूं , बिल्कुल खालिस शौकिया कलाकार.उसपर भी सिर्फ़ स्टेज पर गाता चला आया हूं.

अब जब रिकोर्डिंग करने लगा, घर में, कराओके ट्रॆक्स पर , तो रोज़ रोज़ नये प्रयोग नये आयाम खुलते जा रहे हैं, और एक ज़बर्दस्त चेलेंज सा लग रहा है.

जब आप स्टेज पर होते हैं, तो आपको एक अतिरिक्त उर्जा की, थ्रो की दरकार रहती है, और साथ में देह भाषा का भी सामंजस्य रखना पडता है, खासकर आजकर के दृष्य़ श्रव्य मिडिया के ज़माने में.फ़िर थोडा बहुत सुर इधर उधर हुआ तो भी चुपके से धक जाता है.अमित कुमार और कुछ हद तक नितिन मुकेशभी मुझसे ये कबूल कर चुके हैं,कि वे स्वर का इतना खयाल नहीं रख पाते, या ज़रूरत नहीं समझते.वहीं लताजी तो स्वर के लिये एक वायलीन का (कमल भाई) या हारमोनीयम(अनिल मोहिले) का साथ लेती हैं, और साथ में गाये हुए सुर को सुनने के लिये मोनिटर को एडजस्ट करने पर विशेष ध्यान देतीं हैं, जब भी वें स्टेज पर प्रोग्राम देतीं हैं.दरसल ये वो लोग हैं जिन्होने रिकोर्डिंग पर महारत हासिल कर ली है,जिसमें स्वर का खास ध्यान देने की पहली शर्त होती थी. क्योंकि गायक या वादक की ज़रा सी भी चूक से पूरी रिकोर्डिंग फ़िर से करनी पडती थी.आजकल इतने सारे सॊफ़्टवेयर आ गये हैं, कि मात्र कट पेस्ट से हे नहीं, सुर / पिच या लय/टेम्पो को भी कम ज़्यादा किया जा सकता है.टी सिरीज़ के स्टुडियो में हमारे एक गाने की रिकोर्डिंग के समय मैं ये देख कर या सुनकर दंग रह ग्या था कि अनुराधा पौडवाल बहुत बेसुरा गा कर चली गयी थी, और वहां के रिकोर्डिस्ट टेकनिशीयन्स बाद में स्वरों को साऊंड फ़ोर्ज पर मेनेज करते पाये गये!!

इसिलिये लताजी, मन्ना दा, रफ़ी साहब, मुकेश जी ,हेमंत दा, तलत साहब,या फ़िर भूपेन हज़ारिका,सुरेश वाडकर और बालासुब्रमन्यम... इनको जब भी अपनी मांद से निकल कर स्टेज पर गाते मैने स्वयं देखा तो उनकी लगन, डेडिकेशन और कमिटमेंट का तो मैं कायल ही हो गया.

एक छोटा सा किस्सा याद आया. सन १९८२/८३ के आसपास जब लता जी नें इंदौर में कार्यक्रम देनें का मन बनाया, तब कार्यक्रम के दिन सुबह स्टेडियम में जाकर ध्वनि व्यवस्था को चेक करने की इच्छा ज़ाहिर की. दुर्भाग्य से,शहर के एक पूर्व मंत्री नें किसी पूर्वाग्रह/विशिष्ट कारण के वजह से उनके कार्यक्रम के बहिष्कार के घोषणा कर डाली! जिस होटल में वे रुकी थी , इसके सामने काले झंडे दिखाने और टकराव की स्थिति बनाने का भी दुस्साहस कर लिया.

इसलिये आयोजकों के प्रमुख नईदुनिया दैनिक के प्रमुख संपादक श्री अभय छजलानी जे ने उनसे करबद्ध प्रार्थना की कि ऐसे माहौल में उनका जान मुनासिब नही होगा, और वे कार्यक्रम से कुछ पहले ही जाकर ध्वनि व्यवस्था चेक कर लें.

मगर वे नहीं मानी, और भारी बंदोबस्त में वे वहां गयीं. वहां उन्होने पोडियम के नीचे अपने साथ लाया हुआ छोटा सा मॊनिटर रखा, और आउटपुट को चेक किया. साथ ही इतने बडे क्रिकेट स्टेडियम में कडी धूप में दूर दूर तक लगे भोंगे ( यही तो कहा जाता था!!) भी चेक किये. दो भोंगों में गलती थी और बदलने वाले बात पर तो ध्वनि व्यवस्थापक नें कहा कि ये भोंगे तो इंदिरा गांधे तक को लगाये गये थे, तो वे्पहले तो एकदम ना्राज़ हो गयी,मगर बाद में खिलखिला कर हंस पडी,और बाकी हम सभी भी हंस पडे!!बाद में वें बोली, मुझसे एक आम आदमी की कुछ अपेक्षायें है, अच्छे गाने की, और खराब ध्वनि व्यवस्था के कारण उनके विस्श्वास ,आनंद और मेरी मेहनत पर पानी फ़िर जाता.

उस दिन के अनुभव नें मुझे बहुत कुछ सिखाया, अपने खुद के कार्यक्रम के लिये और बाद में बडे कलाकारों के लिये जिनका मेरा वास्ता बाद में तब पडा जब मैं लता मंगेशकर जी के नाम पर स्थापित पुरस्कार के आयोजन समिति का एक सदस्य म.प्र. सरकार द्वारा नामजद किया गया.तब से हर साल इस खा़कसार को यह फ़क्र हासिल हुआ कि हर किसी बडे कलाकार या संगीतकार के इंदौर आने से लेकर स्टेज के कार्यक्रम की ध्वनि व्यवस्था तक की ज़िम्मेदारी तकनीकी तौर पर सम्हाली.(एक कार्यक्रम में महेन्द्र कपूर के साथ आये मुख्य तबला वादक सुरेंद्र पा जी ने मुझे माईक चेक करते हुए गुनगुनाते हुए सुना तो वे महेंद्र कपूर से बोले कि यहां इंदौर के तो माईकवाले भी बहुत सुरीले हैं तो उन्होने हंसते हुए उनकी गलत फ़हमी दूर की, कि नहीं ये तो आयोजक ही है)

इसलिये जब मैं भी अपने स्टेज की मांद से निकल कर रिकोर्डिंग की मांद में घुसा हूं तो मुझे भी नानी याद आ रही है, जिसका जिक्र अगली बार......

एक और प्लेयर...

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