Wednesday, December 24, 2008

वो जब याद आये बहोत याद आये..हमारे लाडले गायक - मोहम्मद रफ़ी


वो जब याद आये बहोत याद आये,
ग़में ज़िंदगी के अंधेरे में हमने,
चरागे़ मोहोब्बत , जलाये बुझाये...

मोहम्मद रफ़ी..A Legend !!!

एक बेहतरीन गायक, सच्चा कलाकार,मगर उससे भी बेहतर एक कोमल हृदय का मालिक, दिलदार, और सच्चा इन्सान..

आज अगर वे जीवित होते तो पता नहीं क्या होता, मगर वे हमारे दिलों पर ज़रूर राज़ कर रहे होते. वैसे भी आज यही स्थिती है, बस दुख ये है कि वे हमारे साथ नहीं.

इसीलिये, आज के इस पावन दिवस पर हम उस ईश्वर , अल्लाहताला को ज़रूर धन्यवाद देंगे, जिसने, सन १९२४ में इस दुनिया में ये देवदूत भेजा, जिसने अपनी सुरीली ,सुमधुर और मन के अंतरंग को छू जाने वाली आवाज़ से इतने सालों से हम सुनकारों के दिलों में दिली सुकून जगाया.

क्या ठीक कहा है..

दर्दे दिल, दर्दे जिग़र, दिल में जगाया आपने......

रफ़ी जी की जन्म कुंडली

रफ़ी जी की जन्म कुंडली अभी कल ही पुणें में मुझे मिली, तो आपके लिये यहां दे रहा हूं. जिनका भी ज्योतिष का अभ्यास हो उन्हे शायद ये बडी़ सौगात होगी.अगर कोई इसका विश्लेषण कर सके और मुझे दे सके तो यहां पोस्ट कर सकूंगा.

जन्म दिवस - २४ दिसेंबर १९२४
समय - सुबह ३.३० बजे
स्थान - कोटला सुल्तानसिंह , अमृतसर, पंजाब.



रफ़ी जी पर लिख पाना और उनकी उत्तुंग करिश्माई व्यक्तित्व को शब्दों में ढा़ल पाना मेरे जैसे मर्त्य मानव के बस में नहीं.मगर इस चश्मे बद्दूर आवाज़ के साथ इतने साल जागा, सोया, गुनगुनाया,स्टेज पर गाया, खुद अनुभव किया. उनकी चिर युवा आवाज़ के स्वर सामर्थ्य की,मिठास की ,गोलाई की बेइन्तेहां नापी नही जा सकने वाली गुणवत्ता और गहराई को दूर से ही देख सकने की अपनी मजबूरी की यथार्थता सभी याद आ गयी. एव्हरेस्ट की चोटी मैनें जब नेपाल में चल रहे प्रोजेक्ट में देखी थी तो इच्छा तो हुई की उस चोटी को फ़तेह करूं. मगर कोशिश भी करूं तो संभव नहीं था. वैसे ही रफ़ी जी के गीत को गाते हुए मेहसूस हुआ. वे भारतीय फ़िल्म संगीत जगत के एव्हरेस्ट थे.

ये वह आवाज़ थी जो हमें अपनी खुद की आवाज़ लगती है.

तभी तो खुद रफ़ी जी नें क्या सही कहा है..

तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे,
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे..

उन नज़ारों की याद आयेगी
जब खयालों में मुझको लाओगे...


उनकी आवाज़ को तो Timbre या ध्वनिरूप ही यूं था कि हर नायक के चरित्र को गहराई तक अद्ययन कर पूरी तन्मयता से
अपनी आवाज़ में ढाल लेते थे. दिलीप कुमार और शम्मी कपूर की एक दूसरे से मीलों दूर व्यक्तित्व को बखूबी निभाया. जॊनी वाकर और देव आनंद दो अलग अलग ध्रुवों को एक गले में आत्मसात किया वे थे रफ़ी जी.इसीको तो हम परकाया प्रवेश की सिद्धी कह सकते हैं.

याद किजिये देव साहब के लिये दिल का भंवर करे पुकार और बाद में राजेश खन्ना के लिये गुन गुना रहे हैं भंवरे..अमिताभ के लिये ही कहां जॊन जानी जनार्दन और कहां तेरी बिंदिया रे...

जहां शम्मी कपूर के लिये मस्ती भरी उंचे सुरों में गाया हुआ आसमान से आया फ़रिश्ता गाया या आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा ,तो तब भी expressive और musical रहे और एहसान तेरा होगा मुझ पर या मेरी मुहब्बत जवां रहेगी में भी अहेसासात की सीमा पार कर गये.

दिलरुबा दिल पे तू, ये सितम किये जा में या अकेले अकेले कहां जा रहे हो मेम उनका फ़ुसफ़ुसाना ,मांग के साथ तुम्हारा में दिलीप कुमार के लिये गीत के अंत में टांगेवाले का चिल्लाना, काम की बात बता दी अरे कामेडी गाना गाके में जॊनी वाकर के ढंग से हंसना, ’लाल लाल गाल ” में रॊक एन रोल के लिये तूफ़ानी चिल्लाना वह भी सुर में, योडलिंग का गाना आग्रा रोड का सब याद आ रहा है.

एक बार हुवा यूं कि किसी फ़िल्म में राजेंद्र कुमार को लिया जाना था और फ़िल्म के चार गीत भी रेकॊर्ड कर लिये गये थे.मगर उन दिनों ज्युबिली कुमार के पास इतना काम था, और किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिये परदेस से आने में उनको ज़रा विलंब हुआ. इसलिये इस फ़िल्म के मिर्माता नें इतना रुकना उचित नहीं समझा और राजेंद्र कुमार की जगह जॊय मुखर्जी को नायक के लिये साईन कर लिया.

हर नायक की छबि, व्यक्तित्व और ढंग को उतरने वाले रफ़ी साहब को जब ये पता चला तो वे उस निर्माता के पास गये और कहा, कि चूंकि जॊय मुखर्जी को लिया है, सभी गीतों को फ़िर से रेकॊर्ड करना चाहिये.जॊय मुखर्जी की स्टाईल शम्मी कपूर से मिलती जुलती थी .संयोग से निर्माता और संगीतकार को ये बात बहुत ही उचित लगी और इसलिये उन सभी गीतों की फ़िर से रिकॊर्डिन्ग की गयी, और उन गीतों नें और फ़िल्म नें सिल्वर ज्युबिली मनाई.

जब इस का मेहनताना रफ़ी जी को निर्माता देने लगे तो उन्होने मना कर दिया. पता है उन्होने क्या कहा?

गाना मेरा पेशा है. मगर मेरे लिये पैसा नहीं पेशा अधिक महत्वपूर्ण है.

चलिये आज इतना ही सही. आज बाकी शाम उनके गीत सुनने में गुज़ारने की तमन्ना है, अगर आप इज़ाज़त दें तो.
अगले दो तीन पोस्ट में भी रफ़ी जी रहेंगे ये वादा. जो दिल में ही नहीं समा पा रहे है, वे तीन चार पोस्ट्स में क्या समायेंगे. फ़िर भी भावुक मन है.भक्तिभाव है, तो इस विराट स्वरूप के अंतर्दर्शन कर के मैं आप दोनों धन्य हों तो क्या हर्ज़ है?

हुई शाम उनका खयाल आ गया...


Friday, December 12, 2008

माने ना मेरा दिल दिवाना ,हाय रे...हाय रे संयोग..

आज ११ दिसेम्बर है.

तो हुआ करे.

नही जनाब. आज मेरे दो दोस्तों की शादी की सालगिरह है, और इसलिये इंदौर के एक प्रतिष्ठित तारांकित हॊटेल सयाजी में जब इनमें से एक मित्र नें आज शाम को शादी की वर्षगांठ पर पार्टी दी तो, दूसरा मित्र भी संयोग से वहीं मिल गया. मुझे अकेला देखकर चौंक कर पूछ बैठा कि भाई साहब, आप अकेले, भाभी जी कहां हैं?

उसका चौंकना इसलिये लाज़मी था क्योंकि संयोग से आज मेरे शादी की भी सालगिरह है, और मेरी पत्नी नेहा अभी पूणें में नूपुर बिटिया के पास है,जो स्वास्थ्य लाभ कर रही है.शादी के बाद पहली बार हम दोनों इस बार साथ साथ नहीं हैं.

जाहिर है, हम सभी मित्रों के साथ ग़म गलत (?)करनें बैठ गये. मेरा तरीका जरा अलग है. चूंकि मैं हमेशा अपनी धुन में अपने नशें में रहता हूं , मुझे किसी और नशे की ज़रूरत नहीं पड़ी आज तक, और इसीलिये फ़्रेश लाईम सोडा़ के नशें में हमने अपनी पत्नी के विरह को सेलिब्रेट किया.दोस्तों को साथ देने के लिये अब तक इतना फ़्रेश लाईम सोडा़ पी चुका हूं कि देखते ही सुरूर आ जाता है.( पैसा भी नही लगता!!)

डिसेंबर महिना है, अभी भी रातें ठंडी़ नही हुई. वर्ना अब तक हमेशा इतनी थंड़ बढ़ जाती थी कि मेरी दूसरी बिटिया मानसी की नाक हमेशा बहती रहती थी, क्योंकि उसे अक्सर सर्दी लग जाती थी. वो आज बोली,पापा , आज पहली बार मेरे जन्मदिन पर मुझे सर्दी नहीं हुई है.

ओह,तो शायद मैंने बताया नहीं कि आज संयोग से उसका भी जन्मदिवस है, और वो मेरे साथ, और पत्नी नेहा ,नूपुर के साथ.अब कोई और संयोग नही है, निश्चिंत रहिये.

नही, अभी खत्म नही हुआ है ये संयोग. ज़रा दिल थामके बैठिये और सुनिये ..

ये जो मेरे मित्र मुझे मिले थे अभी, जिनकी शादी उसी साल हुई थी, मेरे शादी वाले दिन ही हुई थी. और ये मेरे मित्र बने कश्मीर में, जब संयोग से वे भी हनीमून पर श्रीनगर पहूंचे थे और हम एक ही फ़्लाईट से श्रीनगर उतरे.

इन्दौर वालों की ये खा़सियत है, कि कहीं भी बाहर मिल जायें तो एक दम घुल मिल जायेंगे,भले ही पहली बार मिलें हों.(इन्दौर में मिलें तो यही बात हो ये ज़रूरी नही!!). तो हमने बाकी दिन साथ ही घूमने देखने का प्लान किया.

एक बडा़ शोख़ वाकया याद आया जो आज भी हमने याद किया और बहुत हंसे भी,जो आपको नज़र कर रहा हूं. अब आप से क्या पर्दा( पर्दा नहीं जब कोई खुदा से, दोस्तों से पर्दा करना क्या जब ..)

एक शाम हम खिलनमर्ग में घुडसवारी के लिये गये, तो शाम लगभग हो चुकी थी और झुरमिटी अंधियारा सा होने जा रहा था. हमने चार घोडे तय किये और दोनो कपल घोडों पर बैठ ,हौले हौले हाथों में हाथ डाले क्षितिज की तरफ़ बढने लगे.

चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो..


अलग अलग.

जरा अलग अलग को रेखांकित किजिये,क्योंकि यहां भी संयोग ने गड़्बडी़ की थी.कहीं गाना भी चल रहा था- कोइ प्यार की देखे जादुगरी , गुलफ़ाम को मिल गयी सबज़परी...

अभी हम प्यार की जादुगरी देख ही रहे थे कि अचानक हमने पाया कि गुलफ़ाम को सब्ज़परी मिलने की बजाय दोनो गुलफ़ामों के घोडे एक साथ मिल कर किसी तीसरी राह पर चल पडे़ थे, और दोनों सब्ज़परीयों के घोडे़ पीछे ही रह गये. हमने लाख कोशिशें कीं , बडा ज़ोर भी लगाया मगर वो हो न सका जिसकी हमें जुस्तजू थी. घोडे़ थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे .

बस फ़िर क्या, मैं और मेरी तनहाई, और साथ में दूसरा गुल्फ़ाम तनहा सा, सहमा सा,क्योंकि घोडे़ वाले भी पीछे कहीं ओझल हो गये थे. फ़िर उस नशीली रात में , उस ठंड में मैनें उस मित्र से कहा कि ज़रा ठंड रख, क्योंकि ये कोई फ़िल्म नही है, जो कुंभ के मेले में हम लोग बिछड जायेंगे.कोइ जतन कर के इन चलते हुए घोडों से उतरने की तरकीब निकाली जाये. जब भी हम कोई कोशिश करते,घोडे़ स्पीड़ बढा देते!!

ये भी संयोग था कि दोनो घोडे साथ साथ ही चल रहे थे, जैसे कि जय और वीरु हों, नहीं तो ये भी अलग अलग हो जाते तो कहीं मुंह दिखाने को नहीं रह जाते ( दरसल रात के अंधेरे में मुंह ही नही दिख रहा था, और कौनो दू्जी बात नाही है रे बावरों !)

अब हमारे मराठीयों में तो घोडी चढ़ के तो दुल्हन नहीं लाते, हम तो बग्गी में लाये थे. इसलिये उसे कहा की मेरे पंजाब दे पुत्तर, तूने तो अभी अभी घोड़ी चढी थी, तो तु बता कैसे उतरे.

वो क्या बोलता, रुआंसां होते हुए बोला, चढने का तो एक्सपेरियेंस है, मगर उतरने का नहीं.अच्छा हुआ कि उसने ये नहीं कहा कि नाचने वाली घोडी का ए़क्सपेरिएंस है.

अब हमारी भगवान को याद करने की फ़ोर्मेलिटी करने की बारी थी.शायद उसे भी हमारे दया आ गयी होगी, बॆकग्राउंड में गाना तो नहीं बजा,कि मेरा तो जो भी कदम है, वो तेरी राह में है, के तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाहों में है.
खरामा खरामा घोडे़ रुक गये , और पहली फ़ुर्सत में हम दोनो घुड़सवार से ज़मीनदोस्त हुए.हम बस्ती से दूर निकल आये थे, मगर इस बात का शुक्र मना रहे थे कि हमारी बेटर हाफ़ जोडी़ होटेल से दूर नहीं थीं, तो उनकी चिंता नहीं थी.

बस क्या था, हम दोनों जय और वीरु की तरह चलते चलते ये गीत याद करते करते, गुनगुनाते हुए होटल पहुचे कि-

तू कहां , ये बता, इस नशीली रात में ,
माने ना मेरा दिल दिवाना ,हाय रे...


होटल पहुंच कर सबसे पहले हमने अपने अपने डाग़ चेक किये और फिर पिल पडे़ उस घोडे़वाले पर जो हमारी राह देख रहा था.
उसकी भी हालत पतली थी, क्योंकि उसके घोड़े तो अभी भी गायब थे.

हमने तो सबसे पहले उससे जवाब तलब किया कि ऐसे कैसे घोड़े दे दिये तूने, कि हम अपनों से जुदा हो गये.

पता है उसने क्या कहा? हाय रे ,फिर वही संयोग..

मित्रों ,वे घोडे़ जय और वीरू नहीं थे, मगर वीरू और बसंती थे...


और इसलिये साथ साथ थे कि प्यार किया तो ड़रना क्या ?प्यार किया कोई चोरी नहीं की.आयी बात समझ में?

(बाद में होटल छोडने तक कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नही मिली की दो हंसो के जोडे़ को बिछड़वाने वाली उस घोडा़ घोडी़ की जोडी़ का क्या हुआ. हमारा तो हनीमून खतम हुआ, मगर शायद उनका चल रहा होगा!!)

आज इस घटना को याद करते करते हम दोनो अपनी अपनी घोडी़ पर चढ़ कर, माफ़ किजिये कार में चढ कर घर को लौटे.

अब बस , सोचा आपसे क्या छिपाऊं, तो हाले दिल बयां कर दिया.

दिल क्यों चहका रे चहका आधी रात को, बेला महका रे महका आधी रात को,

मगर अकेलेपन के एहसास में ऐसे कई गीत दरवाज़े पर दस्तक देने लगे जैसे- अकेले है चले आओ.. रफ़ी साहब , मुकेश,तलत आदि ने मेरे इर्दगिर्द जमावडा़ कर लिया और मुझे सांत्वना देने लग गये.

वही गीत,जो पहले कभी रिकोर्ड किया था, आज यहां लगा देता हूं.

तू कहां , ये बता, इस नशीली रात में ..

लगाऊं या ना लगाऊं ? चलो लगा ही देते हैं... दिल ही तो है..

Monday, December 1, 2008

बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया...


कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया....


आज अभी तक दिल ग़मगीन है, दो तीन दिनों पहले के घावों की टीस अभी तक मन से रिस रही है. जैसे जैसे और मुम्बई की घटनायें सामने आ रही है,उन अपनों के बारे में पता चल रहा है,जो पिछले दिनों में इन आतंकवाद के दानव की भेंट चढ गये.उनके साथ बिताये पलों की, क्षणों की याद जो खिलते हुए फूलों के मसलने की दास्तान बयां कर रहीं है.वे नजदीकी अपने , जो रब से ये भी पूछ पाने की स्थिती में अभी नहीं है, कि उनके साथ ही ऐसा क्यूं हुआ, जब काल नें अपने क्रूर हाथों से उनकी बगिया की महकती फ़ुलवारी को उजाड़ दिया.

किन किन की अफ़सुर्दा-दिली बयां करूं, किस किस का दर्द भरा अफ़साना सुनाऊं और जब वे बार बार सामने याद आते है, तो मन उन जाने पहचाने चेहरों की याद भुला नहीं पाता है, जो अक्सर मुम्बई प्रवास में मिलते रहते हैं, या अब भारी मन से कहें ............थे.

अब वे कभी नहीं मिलेंगे.

किसीने अपने ब्लोग पर खूब लिखा है(सौरभ कुदेशिया-http://satat-vichar-manthan.blogspot.com/2008/11/blog-post_29.html) कि मेरे परिवार के १३० लोग मरे है,मौत हो गई है मेरे घर में.

पता नहीं क्यूं ये सवालात जेहन में टकरा रहे हैं कि ये कब तक? आज एक गाना ना जाने क्यूं लबों पर बार बार आ रहा है.

चलो वह गीत आपके को भी सुना देता हूं- हवा में ठंडक बढ गयी है, फिर भी उद्वेलित विचारों की तपन , आंच दिल को जला रही है. सूखे टहनीयों के जलने से चटखने की आवाज़ें बढ गयी है.

इस गीत को बिना साजो सामान के , बिना किसी भूमिका के सुना रहा हूं. वाओलीन ,हार्मोनियम, तबला आदि की आवाज़ कमज़ोर पड़ गयी है, बंदूकों के , गोलीयों की आवाज़ के सामने.सिर्फ़ मैं, मेरी तनहाई, और सर पर पंखे की गिरघिर.. जो हृदय में शूल उत्पन्न कर रही हैं- आंसूंओं का सैलाब थमने और थामने का जतन चल रहा है कि गीत को भी दो तीन बार में रेकॊर्ड करना पडा़.

मर्द हूं तो शायद ये स्वीकार करने मे शरम आये कि ..

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया-

जो है सो है.

Wednesday, November 26, 2008

फिर मिलते हैं एक ब्रेक के बाद



तमाम कोशिशों के बाद आखिर दिल ये कह पडता है

फिर वही शाम वही ग़म ,
वही तनहाई है,
दिल को समझाने तेरी
याद चली आयी है.



फिर गिर पडे़ है हम भौतिक रूप में, और इससे पहले कि किसी की नज़रों में गिर पडे या आपकी यादों से ओझल हों, ये टाईम आउट ले रहे हैं.

फ़िल्म पडो़सन याद आयी, जिसमें आगा अपनी पत्नी से कहता है,

- जब जब जो जो होना है, तब तब सो सो होता है!

रोशन जी पर लिखा हुआ रह गया, सचिन देव बर्मन पर तीसरी कडी तैय्यार है, उसका वादा है, और बहुत सारे गीत हैं जिनका रसास्वादन करना बाकी है अभी...

फिर मिलते हैं एक ब्रेक के बाद..( मानस के अमोघ शब्द पर खुलासा किया है)

Monday, November 3, 2008

पिया तोसे नैना लागे रे...- सचिन देव बर्मन

कड़ी - २
सचिन देव बर्मन पर दूसरी कड़ी लेकर हाज़िर हूँ.

सुनकारों से आग्रह है, की अगर उन्होंने सचिन दा पर पहली कड़ी नही भेंट की हो तो कर लेंगे ,तो इस कड़ी का सन्दर्भ समझाने में ज़रा आसानी होगी.

हम बर्मन दा के पिटारे में से कई नायाब जवाहिरात चुनते है, तो इस गानें को अग्रिम पंक्ति में पाते है.

पिया तोसे नैना लागे रे...

गाईड फ़िल्म के ४ स्टॆन्झा और ८ मिनीट के इस मेरथॊन गीत को सचिन दा बिना किसी प्रील्युड से शुरु करते है(जैसा कि वे कई बार कर चुकें हैं), और स्थाई के बाद Rich Orchestra के Interludes गीत को अपनी मीठी गिरफ़्त में ले लेते हैं. साथ ही साथ शैलेन्द्र के अतिआकर्षक बोलों की जुगलबंदी सी चलती है ताल के साथ, जो धिनक धिन धिन धिनक धिन धिन पर थमती है.

The orchestral interludes in this song are rich and varied. Though these music pieces are tailor-made for a dance choreography, unlike most dance pieces they do not remain limited to a frenzy of ghungroos, tabla and sarangi/harmonium. The orchestral interludes, here, in typical SD Burman style, are uncluttered and spontaneous. However they still use a wide variety of instruments and are richly layered. Violins, Sitars, ghungroos, tabla, drums (note the lovely use of a north eastern drum in the portion before भोर की बेला सुहानी) and the flute all fit into the overall composition like pieces in a jigsaw puzzle. Strings, as with most of Dada’s songs, are used with great felicity. Note the extremely catchy short string pieces strewn all over the song. विशेषतयाः उस जगह जहां गाना मुखडे़ पर लौटता है ...

ताल में भी हमें कहीं कहीं भटियाली शैली के दर्शन होते हैं.कहीं कहीं तबला बॆक सीट ले पृष्ठ्भूमि में चला जाता है और ड्रम पर्कशन वाद्य समूह प्रभावी हो जाते है.

मगर मेरे मित्रों , ये सब बेमानी हो जाता है जब तक हम यह भी नही कबूल कर लेते कि विजय आनंद के निर्देशन में इतने अच्छे फ़िल्मांकन और वहीदा जी की बेमिसाल नृत्य अदायगी नें सचिन दा की मेहनत में चार चांद लगा दिये है.(Waheeda is Elegence & Grace Personified, indeed !!!)

फ़िल्म में इस गीत की कहानी का केंद्रबिंदु है राजू गाईड और रोज़ी के बीच पनपते रिश्तों का -नैना लागे रे!!
फ़िर समय के बीतने के संकेत होली और दिवाली के त्यौहारके पृष्ठभूमि में इन संबंधों में प्रगाढ़ता और व्यावसायिक कार्यक्रम की क्रमवार सफलता का बेहद प्रभावी चित्रण है. बड़ी शालीनता के साथ उनके बीच स्थापित होते शारीरिक और प्रेम सम्बन्ध भी खुलते हुए दिखाते है, और गीत के बोल भी ये सूचित करते है.चमकाना उस रात को जब मिलेंगे तन मन, मिलेंगे तन मन...

ज़रा पूरे गानों के बोलों पे भी बारीकी से गौर फरमाएं जनाब. और साथ ही में अनुभव करें कि
हर अंतरे में विभिन्न रंगों के और समय के रागों का मिश्रण खूबसूरती से गढा गया है.

इसीलिये ही कहा गया है, की संगीत यह स्वार्गिक सुखों के अनुभव की चीज़ है, तार्किक बुद्धिमत्ता की नहीं.

अब देखिये, गाईड फ़िल्म का वह गीत विडियो पर, और गोते लगाईये मधुर संगीत की फुआरों से सजे झरने में.

तीसरी कड़ी अगले हफ्ते ..

Sunday, November 2, 2008

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा ....

कड़ी - १
३१ अक्टूबर को पद्मश्री सचिन देव बर्मन की ३३ वीं पुण्यतिथी के दिन सारे दिन उनके गीतों को सुनता रहा, अपने मन की गहराई तक उन रचनाओं का आस्वाद लेता रहा जो हमेशा गाहे बगाहे कानों पर पड़ते तो ज़रूर थे, मगर सुकून से एक साथ
सुने नहीं गए.

उन्हे सुनने का अवसर भी बड़ा ख़ास इसलिए था, क्योंकि एक साथ जब हम उनके रचे हुए गीतों को सुनते है तो तब जाकर पता चलता है, की उनके सभी गीतों में कितनी विवि्धता थी, कितना माधुर्य था, कितनी वेदना थी.

सचिन दा निसंदेह सुरों के एक ऐसे चित्रकार थे जिन्होंने अपने हर पेंटिंग में अलग अलग विषयों पर अलग अलग रंग बिखेरे. उनके ब्रश के स्ट्रोक्स , उनका टेक्सचर , और ग्राफिक्स की विविधता उनके हर गाने में नज़र आती थी या सुनाई देती थी.

हिन्दयुग्म के आवाज़ पर सचिन दा पर एक पोस्ट लिखी तो सहजता से उनके गानों की सुरमई धुंध में मैं खोता चला गया.

मन ही नही भर रहा था. सोचा कुछ अपने यहाँ भी लिख उनको एक बार और श्रद्धांजली देकर, इज़हारे अकीदत पेश कर ,उनके संगीत से जो आज तक आनन्द लूटा है उसका कुछ क़र्ज़ तो उतार ही दूँ, भले ही अंश मात्र ही सही.

पिछले दिनों सिने संगीत को समर्पित हर एक ब्लॉग साईट पर आप पायेंगे इस महान संगीतकार पर कुछ ना कुछ लिखा हुआ , और साथ ही पायेंगे उनके ढेरों सारे गीत उनकी आवाज़ में भी. एक जगह की कमी बेहद खल रही है. श्रोता बिरादरी की जाजम इन दिनों बिछी नही किसी कारण वश. हर सू फैले दिवाली के प्रकाशमय उजियाले में इस प्रेरणा स्रोत सुरमई शमा की अनुपस्थिती ने सचिनदा के दर्द भरे गीतों से उपजी अफ़सुर्दा दिली और भी बढ़ा दी. आवाज़ दे कहां है....?

हमें कोई ग़म नही था ग़मे आशिकी से पहले ,
ना थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले...


सचिनदा के लिए काम करने के लिए बड़े बड़े गायक और गायिकाएं तरसते थे क्योंकि उनके गले की तासीर या Timbre का अचूक उपयोग वे करते थे. सेन्स्युअस गीत में आशा और गीता दत्त की आवाज़ के नैसर्गिक आउटपुट से आगे जा कर अपना एक ख़ास आउटपुट निकालने में माहिर थे. आज सजन मोहे अंग लगा ले, में मादकता का एक Undercurrent , पखावज़ की लय के मिश्रण से अद्भुत प्रभाव उत्पन्न कराते थे. वैसे ही कुछ प्रभाव उन्होंने रात अकेली है गीत में ढाला था , जिसका कान में फुसफुसानें का अलग अंदाज़ बेहद लोकप्रिय हुआ था.

भक्ति युक्त प्रेम भाव हो या संपूर्ण समर्पित अनंत आध्यात्म हो , या फिर अल्हड़ सी शोख़ सी यौवन की छुपी हुई भावाभिव्यक्ति हो , लता के पारलौकिक गले से वे रस उत्पत्ति कर हमें नवाज़ते थे ऐसी ऐसी सुरीली बंदिशों से कि हम उनके सुर सागर में डूबते तैरते बहने लगते है , और कहने लगते हैं कि कोई ना रोको दिल की उड़ान को , आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फ़िर मरने का इरादा हैं .

रफी हों या मन्ना दा, या किशोर , मुकेश , तलत अपनी अपनी जगह पर ही गाते थे उनके लिए.किसी भी गाने का मूल तत्त्व जिस पाये का होता था उसी पाये की आवाज़ वे अपने गाने के लिए लेते थे. हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए के रफी और दुखी मन मेरे के किशोर में दर्द की अभिव्यक्ति का फरक सिर्फ़ वे ही बखूबी कर सकते थे.

I am just listening to araay of his sweet and enchanting songs! What a pure , unadultrated mix of symphony & Melody !!

His music breathes of fresh born flowers, his songs are nestling places of whistling birds, tinkling bells and sobbing flutes, his orchestral creations contain both lyric and epic sweeps of design blended in such rare harmony of which only a composite genius like him is capable -- a genius who breathed music, dreamed music, lived music all his life.


उनके निधन पर दी गयी श्रद्धांजली पर कुछ अंश किशोर दा पर मेरी पिछली पोस्ट में भी आप सुन सकते हैं.

उनपर भारत सरकार नें भी सन २००६ में एक डाक टिकट निकाल कर उनका सन्मान किया था .

गायक के रूप में आराधना के गाये गीत सफल होगी तेरी आराधना पर राष्ट्रीय पुरस्कार १९७० में, और ज़िंदगी ज़िंदगी फ़िल्म में संगीत निर्देशन के लिये भी प्राप्त किया था.फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड़ भी फ़िल्म टॆक्सी ड्राईवर के लिये १९५४ में भी प्राप्त किया.

शास्त्रीय संगीत पर उनकी पकड़ भी क्या खूब थी जनाब. गाईड़ में लता के गाये गीत पिया तोसे नैना लागे रे में उनका कमाल सुनने लायक था. रूपक ताल में निबद्ध किये गये इस क्लासिकल गीत में सचिन दा के संगीत के विज़न का दर्शन होता है और भावनाओं की अभिव्यक्ति का ,Visual Feel का अहसास होता है.

इसके लिये तो लगता है मुझे एक और पोस्ट लिखना पडे़गी. (बुधवार को ज़रूर)

तलाश फ़िल्म में भी तेरे नैना तलाश करें में मन्ना डे की अप्रतिम गायकी के साथ सुरों का संयोजन और साथ में मृदंग या पखावज़ का तबले के साथ अनोखा मेल उनके सुजनशीलता की इन्तेहां थी. इन्टरल्युड़ में सरोद , सितार और बांसुरी,के साथ कहीं कहीं तार शहनाई तो कहीं कहीं ताल तरंग का भी बडे़ ही अधिकार पूर्वक उपयोग किया गया है.

यह गीत पहले बिरादरी पर जारी भी हो चुका है.

तो आपसे इजाज़त लेकर अपनी एक तमन्ना पूरी कर लूँ?

यह गाना पिछले दिनों यहाँ स्टेज पर गाया गया था . मन्ना दा को समर्पित एक पूर्ण कार्यक्रम -दिल का हाल सुने दिल वाला - में स्टेज पर प्रस्तुत गीत का विडियो देखें और सुने. गायक यहाँ नगण्य है. उसकी मस्ती का , सुरों के नादब्रम्ह का आप भी अनुभव लें.

मन्ना दा जैसे हिमालय को नापना किसी भी गायक के लिए मुमकिन नहीं ये बात तय है दोस्तों. मगर वादक कलाकारों के कौशल को सुन दाद ज़रूर दें , क्योकि सभी कलाकारों ने अपने अपने स्तर पर अपना रोल बखूबी निभाया है. एक ही की बोर्ड पर सभी वाद्य - सितार, ताल तरंग, तार शहनाई, सरोद, बांसुरी और क्या क्या. मृदंग नहीं था तो एक हाल में तबला और दूसरे पर ढोलक लेकर इफेक्ट पैदा किया है.

अगले रिलीज़ : -
कड़ी - २ - पिया तोसे नैना लागे रे ... मेराथोन गीत का सुरीला विवेचन
कड़ी - ३ - सचिन दा, गुरुदत्त,साहिर,हेमंत कुमार से जुडी एक कॉमन स्मृति विशेष (पिछले महिने की श्रद्धांजली)

Tuesday, October 28, 2008

इस दिवाली पर हार्दिक शुभकामनायें

मेरे ब्लॊग के अंतरंग मित्रों सुरीले साथियों,



आप सभी को इस दिवाली पर हार्दिक शुभकामनायें...

सुरमई अनुभूति और संवेदनशील धडकन के ताल पर आपके जीवन में सुखों की वर्षा हो.

और साथ ही भौतिक स्वरूप के सुख और समृद्धि की भी आप के और आपके परिवार में कभी कमी नहीं आये, ये जगत पिता ईश्वर से तहे दिल से प्रार्थना...


संगीत ही सभी दुखों को हर लेने का एक मात्र रामबाण इलाज है.सुरों का सानिध्य ही मन की वितुष्णा को निर्मल करने का सादा, और सीधा उपाय है.अहसासात की संवेदनशीलता ही दिल को , मन को ईश्वर के करीब ले जाती है.

सुखं हि दु:खान्यनुभूय शोभते,
घनांधकारेश्विव दीपदर्शनम्...


(मृच्छकटिकम् - शूद्रक)

घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है,
उसी प्रकार दुख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है.


आमीन..

Wednesday, October 15, 2008

किशोर कुमार के स्मृति में अनसुने पुराने गानों का कार्यक्रम

कड़ी - २

आपने वह गाना तो सुना ही होगा ,किशोर दा का.

वादा तेरा वादा , वादा तेरा वादा, वादे पे तेरे मारा गया , बंदा मैं सीधा साधा... , वादा तेरा वादा...

जी हां, मैंने आपसे वादा किया ज़रूर था , और आप भी ये गाना गा कर , एक सीधे साधे बंदे की तरह मुझे लानत तो नहीं भेज रहे होंगे, मगर खुश भी नहीं हुए होंगे.

लगभग ढ़ाई महिने पहले जब मैंने ब्लॉग का उपक्रम प्रारंभ किया था, तो ये मेरे कई प्रोजेक्टस की तरह एक था. मगर , बाद में यह मेरे दिल के करीब आता चला गया, अनजाने में, और जैसा की होता आया है, इसने नं.१ की पोजिशन प्राप्त कर ली है. साथ ही जैसा आगे होना था, प्रोजेक्ट के समय पर समाप्ति के वादे का टेंशन भी साथ साथ आने लगा.

होना यूँ था कि मैंने रफी साहब की कड़ी शुरू की थी. एक Engineer/Architect की तरह हर पोस्ट को प्लान किया, डिझाईन किया . रफ़ी साहब के अनेक रंग , अलग अलग छटा लिए गीतों का गुलदस्ता बनाते बनाते इन सभी का प्यार मुझे कब यहाँ ले आया पता ही नहीं चला .

पिछले महिने में विशेष हस्तियों के नाम पर काफ़ी कुछ लिखना चाहता था, जैसे लता जी, आशा जी, महेन्द्र कपूर , हसरत जयपुरी, आदि.

अब इस महिने विशिष्ट हस्तियां है, गुरुदत्त , फ़िर अमिताभ, अभी किशोर दा, फ़िर बेग़म अख़्तर आदि.पुराना प्रोजेक्ट तो अटक ही गया, नये भी ठीक से smoothly नहीं जा पाये. खै़र फ़िर अगले हफ्ते से वापिस अपने पहले वाले मकाम पर.

मैं आपसे कह रहा था कि किशोर कुमार के स्मृति में ता. १२ अक्तूंबर को इन्दौर के पास करीब १५-२० किमी ग्राम पिगडंबर में एक नये सुर आश्रम लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय में उनके कोई २० अनसुने, मधुर गीतों की रिकॊर्डस को पुराने रिकॊर्ड चेंजर पर बजा कर सुनवाया गया.

ये सौगात हमें दी है जाने माने ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संकलनकर्ता श्री सुमन चौरसिया नें, जिनके पास हज़ारों की तादात में अलग अलग भाषाओं में दुर्लभ संगीत रचनाओं,गानों के रिकॊर्ड्स का संग्रह है. ये संग्रहालय अभी पिछले दिनों लताजी के जन्म दिवस के पहली संध्या को ही लोकार्पित हुआ है, और हम आप जैसे शौकीन और समझू सुनकारों और कानसेनों के लिये ही ख़ास है.


इस स्वर महर्षि नें अपने सारा घर बार, जमीन जायज़ाद की आहुति इसी स्वर याग में दे कर ये अनूठा, और बेमिसाल तोहफ़ा देकर हमें उपकृत किया है.

उस दिन रेखांकित करने योग्य एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह थी, कि जैसा न्योते में कहा गया था, कार्यक्रम ठीक ३.५५ को सुमन जी नें शुरु करवा दिया. वे कह रहे थे की चाहे इतनी दूर कोई भी नहीं आये, या देर से आये, वे तो मात्र एक श्रोता को भी सुनवाना पसंद करेंगे, जो समय पर आ जायेगा.

पूरे कार्यक्रम की अवधि थी दो घण्टे से थोडा़ कम, और इन पूरे लमहों में हम जैसे स्थान और स्वयम की सुध बुध खो उन पुराने गीतों की मेलोडी में, उनके संगीतकारों के किये गये प्रयोगों में , और उसके विष्लेषण में इतना घुल मिल गये , कि होश ही नही रहा कि कब शाम ढल गयी. गांव के सुरम्य वातावरण में उस दिन वहां उपस्थित हर श्रोता डूबते सूरज की किरणों पर मन को सवार कर, किशोर कुमार के गाये एकल और दोगानों में जीवन का हर रंग ढूंढने में लग गया. खेमचंद्र प्रकाश से हेमंत कुमार नें अपने मधुर स्वरांकन से सजाये इन गीतों में गोधुली की उस पावन बेला पर घर लौटते हुए गायों के घुंगरूंओं की ताल मिल कर एक स्वर्गिक सुख का अनुभव करा रही थी.
(चित्र ’नई दुनिया ’ से साभार)

अब चलियें गीतों की लिस्ट पर नज़र डा़लें :

१. मरने की दुआएं क्यूँ मांगू - जिद्दी - खेमचंद्र प्रकाश
२. जगमग जगमग दीप - रिमझिम - खेमचंद्र
३. लहरों से पूछ लो (लता) - काफ़िला - हुस्नलाल भगतराम
४. हुस्न भी है उदास उदास - फ़रेब - अनिल विश्वास
५. भूलने वाले - गैर फिल्मी - भोलानाथ
६. आरारम,ताराराम - आवाज़ - सलिल चौधरी
७. तू चन्दा तो मैं हूँ चकोर (लता) - आगोश - रोशन
८. मैं हंसूं या रोऊँ - माँ (अप्रदर्शित फ़िल्म) - चित्र गुप्त
९. मोहे ला दे नौलखा हार (शमशाद) - नौलखा हार - भोला श्रेष्ठ
१०. चुप हो जा तेरे लिए -बंदी - हेमंत कुमार
११. ताकत के पंजे में - कहीं अँधेरा ,कहीं उजाला - ओ.पी. नय्यर
१२. पायलवाली देखना - एक राज - चित्रगुप्त
१३. दो आखें ज़नानी (आशा) - दाल में काला - सी. रामचंद्र
१४. पहली ना दूसरी - मदभरे नैन - एस.डी. बर्मन
१५. काली काली रातों - जोरू का भाई - जयदेव
१६. मेरे जीवन की रेल - महलों के ख़्वाब - एस. डी. बर्मन
१७. बंगला गीत जो इन गीतों की धुन पर पर गाये गये -राहुल देव बर्मन
- ये क्या हुआ, कैसे हुआ
- तुम बिन जाऊं कहां..
- किशोर दा की पहली पत्नी रुमा देवी के साथ गाया एक दोगाना
१८. हवाओं पे लिख दो - दो दूनी चार - हेमंत कुमार

ये अंतिम गीत उन्होने मेरे पसंद का सुनवाकर इस कार्यक्रम को विराम दिया.

मैं चाहता तो था कि इन गीतों मे से एक दो गीतों को यहां सुनवाऊं. ऐसा आग्रह भी मैने सुमन भाई ने किया भी था. उन्होने स्वीकृति भी दे दी . मगर किसी तकनीकी वजह से वे उन गीतों की रिकॊर्ड़ को टेप पर तबादला नहीं कर पानें से, वे गीत मुझ तक पहूंच नहीं पाये . सो मैं आपको मायूस करूंगा जिसका मुझे खेद है. दरसल यह पोस्ट तो १५ ता. को ही लिख कर तैयार थी और मैं राह देखकर अब पोस्ट लगा रहा हूं.

मगर रुकावट के लिये खेद है, के बाद का संगीत नहीं लगा कर, मैं आप को सुनवा रहा हूं किशोर दा की ही आवाज़ में एस.डी़.बर्मन के देहांत के बाद मे दिये गये किशोर दा द्वारा दिये गये साक्षात्कार को सुनवा रहा हूं. अगर सुमन जी दे पाये तो कल परसों में फ़िर हाज़िर हो जाऊंगा. वैसे आपकी कोई पसंद हो तो कहें..कोशिश करूंगा..






Monday, October 13, 2008

जिंदादिल और संजीदा कलाकार - किशोर कुमार

कड़ी - १

आज दिल बहुत उदास है.

ज़ाहिर है. आज 13 अक्टूबर को किशोर दा की पुण्यतिथि है, बींसवीं.


आज सुबह से ही एक बेकसी सी छाई रही. पहले जब भी कभी उदासी का आलम होता था तो किशोर दा के नगमों के साए तले आसन जमा कर बैठ जाते थे, उनके हर मूड के गीतों को सुन कर , कभी गुनगुना कर दिल का बोझ कुछ तो हलका कर लिया करते थे. मगर आज क्या करें ?

आज दिन भर वो मेरे करीब , आसपास रहे, उनका अहसास मन में और गहरा उतरता चला गया . यादों के रोलरकोस्टर पर मेरा मन बैठ उनके गानों के विश्व में , सुरों के चढाव और उतार में खो गया. कभी सुन कर, कभी गुनगुना कर किशोर दा के गीतों के महासागर में डूब गया.

किशोर दा के जिंदादिल व्यक्तित्व की बड़ी चर्चाएँ है. मगर कोई यह पूछे की वे पहले एक अच्छे गायक थे,या संगीतकार ,या
अभिनेता, या निर्देशक - तो यह भी अजीब सा सवाल हुआ. इस हरफन मौला कलाकार नें एक अवलिया संत की तरह किसी बंधन को नही स्वीकारा. फ्री स्टाईल कुश्ती के पहलवान की तरह अपने फक्कड़ अंदाज़ में वे हर आखाड़े में कूद पड़े! फ़िल्म संगीत की हर विधा में अपने सृजन की क्षुधा को शांत कराने में लगे रहे.

His genious was menifested in his genre of Inovative, Distinctive & passionate creativity ,parallel to none. His responce to Music was Sponteneous & Intuitive,yet intrepid enough to mesmerise us. His golden voice had all shades of human traits & emotional chords, echoed with pathos & malancholy.

Although, he was not a trained Singer, (He need not be ) he had an unique approach to singing - Kishorian approach!!,unlike his contempory equally genious peers, who had a perfetionist and traditional approach to rendering of songs.

A Natural player like Sachin or Lara, he could apply all his skills with his masterly strokes,at his free will, to all kind/genre of musical notes ,difficult or simple to execute.Kishor Kumar could make a song look so deceptively simple with his Sonorous Richness of Voice.

एक अच्छे गायक की पहचान के लिए, उसके गले के घुमाव, मींड , और अहसासात को , संवेदनाओं , भावनाओं को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त कराने के उसके कमाल को जानने, समझने के लिए किसी भी सुधी श्रोता को स्वयं गायक होना ज़रूरी नहीं. इसीलिये किशोर दा आम जनता की पसंद के गायक बनें.

किशोर कुमार के गले में जो खनक थी, उसके साथ गज़ब की कॉमेडी की टाईमिंग , अभिनय का अनूठा संयोग था जिसका उपयोग वे गीत में जीवंतता लाने के लिए करते थे. खासकर वे कॉमेडी गीत जिसमें संभाषण या बातचीत के सादे ढंग का उपयोग किया गया हो. कुछ इसी तरह का अनूठा गुण आशा भोंसले की आवाज़ में भी था, जिसकी वजह से उनके दोगानें भी बड़े मक़बूल हुए. (आंखों में क्या जी, हाल कैसा है जनाब का, आप यहाँ आए किस लिए, आदि)

उनकी यह जीवंतता , उनकी ये जिंदादिली , खिलन्दडपन के बावजूद वे एक संजीदा इंसान थे. मन के भीतर कहीँ गहरे में चुभ रहा वह अकेलापन , उनके दर्द भरे गीतों में उभर आता था .

एक टीस सा एहसास हमेशा के लिए अपने जिगर पर लेकर वे हमसे रुखसत हो गए.


कहीं ज़िक्र हुआ था किशोर दा से उनके सबसे ज़्यादा दिल के करीब पसंदीदा गानों के बारे में , तो उन्होंने जिन गीतों का चयन किया था वे सभी के सभी दर्द भरे गीत थे.

उनकी लिस्ट यहाँ दी जा रही है : ( Not in Order)

१. दुखी मन मेरे - सचिन देव बर्मन - फंटूश
२. जग मग जग मग करता निकला - खेमचंद्र प्रकाश - रिमझिम
३. हुस्न भी है उदास उदास - अनिल विश्वास - फ़रेब
४. चिंगारी कोई भड़के - राहुल देव बर्मन - अमर प्रेम
५. मेरे नैना सावन भादों - राहुल देव बर्मन - महबूबा
६. कोई हमदम ना रहा - किशोर कुमार - झुमरू
७. मेरे महबूब क़यामत होगी - लक्ष्मीकांत प्यारेलाल - मि. एक्स इन बोम्बे
८. कोई होता जिसको अपना - सलिल चौधरी - मेरे अपने
९. वो शाम कुछ अजीब थी - हेमंत कुमार - खामोशी
१०. बड़ी सूनी सूनी है - सचिन देव बर्मन - मिली

अभी जो गीत मैं यहाँ सुनवा रहूँ , ये मुझे बड़ा पसंद है ,

आ चल के तुझे , मैं ले के चलूँ , एक ऐसे गगन के तले,
जहाँ गम भी ना हो , आँसू भी ना हो, बस प्यार ही प्यार पले..

एक ऐसा ही जहाँ चाहते थे किशोरकुमार ...



किसी भी गायक की असली पहचान होती है ऐसे गाने से जिसमें सुरों का साथ बहुत कम लिया गया हो.
जिन रातों की भोर नहीं,
आज ऐसी ही रात आयी..

(कितना मौजूं है ये आज की रात ..........)


कल फ़िर लेकर आऊँगा एक अनूठे कार्यक्रम की रिपोर्ट लेकर, जो कल ही किशोर जी की स्मृति में आयोजित किया गया था, जिसमें जाने माने ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संकलनकर्ता श्री सुमन चौरसिया नें हमें किशोर कुमार के वे नायाब और दुर्लभ गीत सुनवाए की हम जैसे श्रोताओं के स्मृति पटल से वे अब तक मिट नही पा रहे है.

Wednesday, October 8, 2008

संगीत का आशावाद...(Optimism in Music) बनाम कानसेन/तानसेन

जोग लिखी संजय पटेल की के चिठ्ठे पर अभी अभी एक बेहद रोचक किंतु शिक्षाप्रद लेख पढ़ कर अभी अभी आया हूं(दोबारा).

श्रोता की खसलत कार्यक्रम का सत्यानाश कर देती है !

श्री संजय पटेल नें इस एक ही लेख में ’कानसेन’ और ’तानसेन’ को मुखातिब हो बड़ी ही सच्चाई और खुलूस से जो बात कही वह कहीं भी पढने को नही मिली, कम से कम मुझे तो.

आप इस लिन्क पर जा स्वयं पढ़े और फ़िर लौट के आयें यहां, थोड़ी चर्चा और करनी हो तो, क्योंकि बात बड़ी समझदारी की है. आपमें से कईयों ने तो वहां जाकर यह पोस्ट पढ़ भी लिया होगा .मैनें तो अपने आप से बिस्मिल्लाह किया है,सुधरने की इस प्रक्रिया में.
"http://joglikhisanjaypatelki.blogspot.com"

अब विस्तार से. थोडा़ समय लूंगा, माफ़ करियेगा.

उन कानसेनों के लिये जो अपने आप को बड़ा तानसेन समझते है - जो इस आत्ममुग्धता के वलय में ही रहते है,और ये निर्णय लेते हैं कि चूंकि वे अच्छे (?) गायक या वादक या कला के किसी भी माध्यम में दखल रखते हैं, इसलिये उन्हे यह अधिकार पहुंच जाता है, कि वे संगीत के अच्छे डॊक्टर हो गये है. हो भी सकते है, उनमें से कई होंगे भी , मगर तब तो उन्हे यह बात और जान लेना चाहिये कि कलाकार नें बड़ी मेहनत से अपना जो हुनर पेश किया है, उसके सकारात्मक पहलू में जा कर आप कुछ अच्छा ले सकते है, उससे कुछ पा सकते है तो क्या हर्ज़ है.मगर दुख की बात ये है, कि वह कानसेन (श्रोता) अपने साथ अपने तानसेन को भी ले जाता है,जिसका भूत उसके कान और सर पर चढ़ कर बोलता है. (कर्ण पिशाच्च ?!!).

मगर ऐसे सरस्वती पुत्रों को शायद यह अभिशाप ही है, जो मैनें अपनी संगीतयात्रा के दौरान अनुभव किया, कि इस मानसिकता के पीछे कारण होता है उनकी वह डाह या मत्सर जो इन टिप्पणीयों मे प्रतिध्वनित होता है कि भला इसकी कमीज़ मेरे कमीज़ से सफ़ेद क्यों ? कोई भी माई का लाल किसी भी गायक/गायिका की नकल शत प्रतिशत नहीं कर सकता. उनका जलाल आना तो संभव ही नही. मगर जैसा की संजय भाई के इस लेख पर की गयी एक टिप्पणी में यह बात बड़े गंभीरता से कही गयी है, कि किसी भी सूरत में लाईव्ह मेहफ़िल से बेहतर श्रवणानंद कहीं और नहीं मिल सकता. टेप या सी ड़ी में भी नहीं ,या उसी कार्यक्रम को रिकॊर्ड़ भी कर लें तो भी. क्योंकि वहां, श्रोता का कलाकार से सीधा आत्मिक संबंध जुड़ जाता है.साथ में माहौल, और श्रोता सत्संग का संयोग भी.

तभी जाकर संजय भाई के इस लेख की प्रासंगिकता और अधोरेखित होती है कि,

ईमानदार श्रोता वह है जो रहमदिल होकर कलाकार की तपस्या का मान करे और सह्र्दय होकर उसकी कला को दाद देकर उसे नवाज़े; उसका हौसला बढ़ाए.



अब बात करें उन कानसेनों की जो स्वयं तो कला के क्षेत्र के मात्र प्रबंधन या पद की वजह से जुड़े होते है,जो कला के किसी भी क्षेत्र से वास्ता नहीं रखते , मगर स्वयं को महान समीक्षक कहलाने में नही अघाते.ये उन टिप्पणीकारों की तरह है, जिन्होने कभी हाथ में बल्ला नहीं पकड़ा, कभी स्टेडियम में धूप में जाकर तपे नहीं मगर, घर में टी व्ही के सामने बैठ कर कहते है, भैया ये सचिन को इस तरह से खेलना था. वहां सचिन की जगह अगर भाईसाहब होते तो क्या गुल खिलाते उसका ज़िक्र यहां नहीं !

ऐसा नहीं की सभी ऐसे हों . इनमें कई ऐसे भी होते है, जो बेहद अच्छे श्रोता और पारखी होते है, संगीत की काफ़ी बारिकीयां उन्हे पकड़ में आती भी हैं. उनके पास संगीत से, माहौल से जुडे़ रहने से और गुणी, नामचीन कलाकारों को सुनने का अनुभव होने से यह पात्रता और इज़्ज़त हासिल हो जाती है. मगर उन्हे भी यह हक़ हासिल नहीं होता कि वे कलाकार के प्रस्तुतिकरण को हिकारत से या उनके पूर्वग्रह ,पूर्वधारणा से आकलन करें क्योकि संजय भाई नें यह भी तो लिखा है- हर दिन भट्टी जमें यह किसी भी बावर्ची (cook)के लिये संभव नहीं.

मैं तो आगे बढ कर यह वेदना भी व्यक्त करूंगा की अगर आप निर्णायक भी हैं तो क्या आपको उन कलाकारों का मखौ़ल उडा़ने का हक पहुंच जाता है? उनकी प्रतिभा या प्रस्तुति में अगर कोई ख़ामी है भी तो इसकी जगह उन्हे उचित मार्गदर्शन देकर मनोबल बढा नही सकते ? क्या आप नये इंडियन आईड़ल के गायक गायिकाओं के चयन प्रक्रिया को देख रहें है? सभी जजेस गुणी है, अपने अपने क्षेत्र के शीर्ष पर भी है. मगर उनकी प्रतिस्पर्धियों की इस तरह अप्रतिष्ठापूर्ण (Derogatory) हंसी उड़ा कर क्या अपने आप को एक अच्छा इंसान साबित कर रहें है?

एक और किस्म के श्रोता की जमात से आपको मिलवाता हूं . मेरे वे साथीगण ज़रूर समझ जायेंगे इसकी पीड़ा , जो गायक भी है.इन फ़रमाइशी श्रोताओं को हमेशा हर स्थान पर , हर मौके पर गाने की फ़रमाइश करने का रोग है.किसी भी महफ़िल में ये अचानक उग आते है, और किसी भी मेहमान को (अगर गायक हो तो) तपाक से गाना सुनाने की फ़रमाईश कर ड़ालते है.अब उस बेचारे की परेशानी तो ज़रा समझें.उसका बिना किसी सुर या ताल की संगत बिना गाना सुना सकने में हिचकिचाना लाज़मी है, (अगर वह थोड़ा बहुत भी गाना स्टेज पर गाता आया हो).संगत की अनुपस्थिती के वाजिब कारण से उसके नानुकूर करने पर ये फ़रमाइशी लाल तो पीछे ही पड़ जाते है,और दीगर भीड़ को भी साध लेते है.अरे, भाई साहब , आप तो गा ही दिजीये, यहां कौनसा स्टेज कार्यक्रम चल रहा है.अब वो नही गाता है तो ये कहते है क्या भाईसाहब, आप भी भाव खाने लगे. अरे मेरे कहने पर तो बड़े बड़े गायक गा चुके हैं, आपको तो घमंड़ हो गया है.यदि वह गा देता है, और मजमा जमता नही है तो मुंह बना कर कहते है - अभी कमजोर है, फ़लां फ़लां के सामने तो कुछ भी नही..पता नही ये लोग किसी पार्टी में अगर तेंडुलकर को भी मिलेंगे तो कहेंगे, ज़रा कवर ड्राईव मारकर तो बताईये!!

इसीलिये संजय भाई नें जिस मुद्दे पर बारीकी़ से और बेबाक़ी से रौशनी ड़ाली है, हमें उससे सबक लेना पड़ेगा .पहले अपने को, बाद में अपने इर्दगिर्द संगीतप्रेमीयों को अच्छे श्रोता से जो अपेक्षित है उसकी समझ दें.

और जो संगीतप्रेमी नहीं है, उन औरन्गज़बों से तो कुछ भी अपेक्षित नहीं किया जा सकता मगर उनसे भी भिड़ना तो पडेगा ही. अभी कुछ सालों पहले रफ़ी जी की पुण्यतिथी पर लायंस क्लब में एक कलाकार को गवाने का प्रस्ताव जब मैंने रखा था तो एक पदाधिकारी नें यह कहा था कि किसी और को ही क्यों, खुद रफ़ी जी को ही बुला लो. मैं उस समय तो चुप कर गया, मगर अब तक राह देख रहा हूं कि वे खुद उपर जाकर कब रफ़ी साहब को आमंत्रित करते हैं!!

अब उस चिठ्ठे की अगली महत्वपूर्ण बात पर गौर करें. आपका थोड़ा वक़्त और लूंगा.



जनाब मेहंदी हसन साहब के साथ गुज़रे अनुभव से हर संगीत के साधक का सर श्रद्धा से झुक जायेगा.यही नम्रता और अपने फ़न की तरफ़ मेहनत और मुसस्सल ईमानदारी का जज़बा हम सभी संगीत प्रेमी और विद्यार्थीयों को एक पाठ पढा़ जायेगा.वाह , क्या बात है!

संजय भाई को यह सौभाग्य प्राप्त है, कि अपने संगीत के शौक और संस्कृतिकर्मी होने की वजह से इन्दौर या पूरे मध्यप्रदेश में आये करीब करीब हर बड़े संगीतकार, गायक, गायिका, फ़िल्मी हस्तीयां, और संगीत की क्षेत्र में जुड़े हर कामयाब व गुमनाम साधक को उन्होनें बड़े करीब से जाना है, पहचाना है. बतौर एंकर पर्सन वाणी पर उनका प्रभुत्व तो है ही, मगर उनका शब्द लालित्य उनके मिजाज़ की तरह ही सुरीला है.इसीलिये उनसे यह आग्रह भी है, कि हम श्रोताओं के इस खा़स समूह को वो इतनी इज़्ज़त बक्षें और ऐसे ही कुछ अंतरंग और सारगर्भित अनुभव से हमें और भी नवाज़ें, ताकि नई पीढी़ को भी इन मूल्यों से रू-ब-रू करवाया जा सके.

बात मैंने भी ज़रा लंबी ही कर दी. मगर क्या करूं , जब संजय भाई ने लेख में उन पहलूओं को जब छूआ तो उस खसलत को मैंने भी महसूस किया.उपर से पिछले इतवार को कुछ ऐसा ही वाकया या अनुभव मेरे साथ भी दर पेश आया तो मैं भी लिख पडा़.(वह कल..)



चलो एक बार फिर से अच्छे श्रोता बन जाये हम दोनों..

मन्ना दा के किसी महफ़िल में तबलची की खस्लत!! हंसियेगा नही, वह भी कलाकार है.

Friday, September 26, 2008

देव आनंद - An epitome of YOUTH !!

सदाबहार अभिनेता , देव आनंद !!

एक व्यक्तिगत अनुभव.

८५ वर्ष के हुए, और चिरयौवन सेहत के धनी आज भी उतनी ही एनर्जी और उमंग के साथ फ़िल्में बनाने में लगे हुए है.

मेरा देव आनंद के साथ एक अजीब संबंध है.

हमारा परिवार एक संयुक्त परिवार था, और जब से समझने लगा ,तब से घर में देव आनंद के Fans भरे हुए थे. मेरे ताऊजी के मेरे दोनो बडे भिया लोग सुबह से देर रात तक देव आनंद के बारे में ही बाते करते थे, यहां तक बडी चाची भी .जब कॊलेज गया तो मेरा सबसे अज़ीज़ मित्र हुआ अरुण जो पागलपन और उन्माद की हद तक देव जी को चाहता था.

बचपन में जब हमारे शहर इन्दौर में प्रेम पुजारी की शूटिंग हुई तब उनसे मिला था. An epitome of youth !!

फ़िर एक बार कुछ सालों पहले मैं और मेरा मित्र अरुण बंबई गये तो आज के ही दिन हम देव साहब के घर पहुंच गये, Just took Chance.उन्ही दिनों , उनकी कोई फ़िल्म भी रिलीज़ हुई थी .आश्चर्य हुआ यह जान कर की देव साहब घर पर ही थे और कुछ मेहमान आये हुए थे.ज़ाहिर है ,दरबान ने कहा-साहब नही मिलेंगे.

मैं Lions Club International का सदस्य हूं. ऐसे ही सोचा और कह डाला -हम लायन्स क्लब से है. बस , कुछ देर बाद पूछ कर आया और खुल जा सिमसिम --

पता चला कि कोई पार्टी वार्टी नही थी देव साहब अपनी नयी फ़िल्म टाईम्स स्क्वायर के लिये कुछ अमेरिकन film crew से फ़िल्म के बारे में ही विचार विमर्श कर रहे थे.वह भी जन्म दिन के दिन!!

तो यह मेरे लिये एक सबक था जो आज तक ज़हन में बाबस्ता है - कडा परिश्रम और मेहनत का ही फ़ल है कामयाबी.WORK IS WORSHIP...

कुछ देर के लिये उनसे माफ़ी मांगते हुए देव साहब मुझ से मुखातिब हुए और फ़िर चला आधे घंटे का एक निजी बातचीत या Informal Interview कह लें,जिसमें हुई देव सहाब की १९४६ से लेकर अब तक की फ़िल्मों पर चर्चा . फ़िल्म निर्माण, अभिनय ,संगीत की हर विधा पर उनका प्रभुत्व देख समझ मै हैरान था .

मुझे यह फ़क्र हासिल हुआ था की कहीं मैने उनकी १९५० के पहले की फ़िल्म ’ खेल’ देखी थी (घिसी पिटी, मॆटिनी में).उन्हे याद था.यही नही , उन्होने और मेहरबान होकर दूसरे दिन भी मेहबूब स्टुडियो में उनकी एक और फ़िल्म की शूटिंग पर आमंत्रित किया.वहां भी गये, और तब से आज तक उन यादों को दिल की गहराई में इस्तरी कर , घडी कर सहेज कर रखा है.

उनके साथ हुई बातचीत के ब्योरे का यहां महत्व नही, महत्वपूर्ण है उनके जैसे मेहनती और दिलकश युवा इंसान से मिलना.

(चित्र नेट से साभार )

देव आनन्द की फ़िल्मी संगीत यात्रा में जिन गायकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, उनमें मुख्य है - मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार. वैसे उनके कुछ गीत तलत मेहमूद नें , हेमन्त कुमार नें और मन्ना डे ने भी गाये थे. जिसके बारे में एक अलग पोस्ट लिखूंगा.कुछ मजबूरियां है सेहत के मुताल्लिक, तो आप सहृदय हो मुआफ़ करेंगे.

चलिये आज उनके यह गीत सुनते है, जिन्हे मूलतः रफ़ी जी और किशोर दा नें गाया था.....(An Amature's karaoke )आज जब रेकॊर्डिंग की इतनी कमाल की तकनीकें मौजूद हैं ,जैसे कट पेस्ट, पिच करेक्शन , या टेम्पो करेक्शन आदि, तो यह कई साल पहले का प्रयास है. यकीन मानिये, आज सभी सुविधायें मौजूद है, मगर वह यादें और उसकी जुगाली कहां से लाऊंगा?

इसीलिये इन गीतों को सुनाना यहां ज़रूरी नही समझता. मगर क्या करें . दिल है के मानता नहीं...

अगर उचित समझें तो आगे बढें ,आप से नम्र निवेदन..

खोया खोया चांद, खुला आसमां, आंखों में सारी रात जायेगी...


फूलों के रंग से , दिल की कलम से...

वो जब याद आये..

आज २६ सेप्टेंबर है.

आज के दिन हम फ़िल्मों से जुडी दो विशिष्ट व्यक्तियों के बारे में आगे कुछ लिखेंगे.

देव आनंद ...



जिनका आज जन्म दिवस है. भगवान से उनके दीर्घ आयु के लिये प्रार्थना ........










और



हेमन्त कुमार



जिनकी आज पुण्य तिथी है. भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे.

उनपर अलग अलग लेख का इन्तेज़ार करें..







दिलीप कुमार

अभी अभी पता चला है कि जनाब दिलीप कुमार को अस्पताल में भरती किया गया है.

हम सभी उनके जल्दी अच्छे होने के खुदा से दुआ करते हैं...

सभी चित्र नेट से साभार

Tuesday, September 23, 2008

तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नज़र ना लगे.. चश्मे बद्दूर...


संगीत और भाषा में एक बात समान है, दोनों के स्वरूप बदलते रहते है. जहां जहां आदमी है वहां भाषा में जगह बदलते ही चलन और शैली बदल जाती है, और संगीत में भी यही बात है.

हिंदी फ़िल्मों के गीतों में भी यही बात लागू होती है, जहां भाषा और संगीत का एक अदभुत संगम दिखाई पडता है, और विविध प्रकार के बोल/शब्द विभिन्न अंदाज़ या शैली के रागों या सुरों के सामंजस्य से एक रंगबिरंगी कलाचित्र या मेहकता हुआ गुलदस्ता बना देते है.

आज कल दृष्य और श्राव्य माध्यम में प्रतिमा का महत्व ज़्यादा है बनिस्बत प्रतिभा के या उस गीत के भाव पक्ष या सुर लालित्य के.मगर सन १९५० के बाद के दशकों के फ़िल्मी गानों को देखने और सुनने का माध्यम मिलता था केवल फ़िल्म (जो एक या दो बार ही देखी जाती थी,और कई फ़िल्में गानों के repeat value के कारण लोकप्रिय हुई) या फ़िर आम आदमी को नसीब था रेडिओ पर बार बार सिर्फ़ सुन पाने का मौका.(रेडियोग्राम भी कुछ धनी लोगों तक ही सीमित था.)

इसीलिये गीत में उसके शब्द, भाव, सुर संयोजन आदि की महत्ता अधिक थी, और इसीलिये वे गीत शाश्वत हुए.यही बात है की मेलोडी कभी पुरानी नही होती. जैसे बालक की मुस्कान, भक्तिभाव से भरी भक्त की निगाहें, या किसी फ़ूल पर पडी सुबह की ओस हमेशा शाश्वत है, वैसे ही ये गीत.

फ़िल्मी गीतों के इस सुवर्णकाल में जहां कंटेंट का महत्व अधिक था, हमें नसीब हुए संगीतकार जैसे अनिल विश्वास, नौशाद, रोशन , सचिन देव बर्मन, सलिलदा, और शंकर जयकिशन. साथ ही हम रूबरू हुए ऐसे गीतकारों से, जिन्होने बडे ही सादगी से, हल्के फ़ुल्के बोलों के ज़रिये भावपूर्ण गीत दिये जो बरसों के बाद भी आज हमारे स्मृति में बाबस्ता है,जैसे- शैलेन्द्र , साहिर, शकील बदायुनी आदि, और हसरत जयपूरी.

जयपुर के इकबाल हुस्सैन ने राधा नाम की एक लडकी के प्रेम प्रसंग में असफ़ल होने पर बंबई की राह पकडी. अपने नाना फ़िदा हुसैन ’फ़िदा’,जो कवि नीरज की तरह शायरी पेश करते थे, की शागिर्दी में उर्दु अदब में उन्होने कदम रखा तो अपना तखल्लुस रखा हसरत जयपुरी और कभी बेस्ट कंडक्टर तो कभी सुपर सिनेमा में बुकिंग क्लर्क, तो कभी ऑपेरा हाउस के बाहर फ़ूटपाथ पर खिलौने या कपबसी बेचते हुए उन्होने अपना फ़िल्मी करियर शुरु किया.

वहीं कॅन्टीन में शंकर जयकिशन को और पृथ्वीराज कपूर को शायरी सुनाई और राज कपूर के बरसात से आगाज़ किया अपना फ़िल्मी गीतों का वह सुहाना सफ़र जिसने हमें ३५० से अधिक फ़िल्मों में २००० से भी ज़्यादा गीत दिये. जिया बेकरार है, यह सबसे पहला गीत,जिसे शंकर नें स्वरबद्ध किया, और पहला युगल गीत छोड गये बालम जिसकी धुन जयकिशन ने बनाई.

शंकर जयकिशन , राज कपूर की उनकी इस बेमिसाल जोडी में साथ थे उनके ही जैसे एक और प्रतिभावान और छायावादी कवि शैलेन्द्र!! और बनने लगे , गढ़ने लगे वे अनेक कालजयी गीत जिन्हे आज भी मन के किसी कोने में हमने सजाये रखे है.मीठे, मोहक, सीधी साधी हिंदी और उर्दु ज़ुबान में कसीदाकारी किये हुए वो गीत - जैसे की हम आपस में गुफ़्तगु ही कर रहे हों.

Friday, September 19, 2008

चश्मे बद्दूर..

हसरत जयपुरी

परसों थी सत्रह तारीख.17 सप्टेम्बर.

करीब नौ साल पहले १७ तारीख सन १९९९ को प्रसिद्ध उर्दू शायर/कवि जनाब हसरत जयपुरी इन्तेकाल फ़रमा गये, और हिंदी फ़िल्मों के गीत संगीत के इतिहास में अपना नाम सुनहरे हर्फ़ों में दर्ज़ करा गये.

उनके गीतों और जीवनी पर कुछ लिखने की तमन्ना थी , और हफ़्ते भर पहले से तैयारी भी चल रही थी.

मगर अचानक किसी कारणों से फ़िर लेट हो गये. इस बार एक दुर्घटना में पीठ और बायें हाथ पर पट्टा चढ गया.इसलिये क्षमा. अगर संभव हुआ तो कल ज़रूर कोशिश करूंगा, अगर इज़ाज़त मिली तो.

अल्लाताला ने उन्हे ज़न्नत तो ज़रूर बक्षी होगी, वे भी तो मुरीद होंगे उनके गीतों के...

हम भी उन्हे और उनके सभी गानों को याद कर अपनी श्रद्धांजली ज़रूर दें.

Monday, September 15, 2008

मुकेश और आतंकवाद !!!


मुकेश और आतंकवाद !!!

आप चौंक गये होंगे, एक अनहोनी सी बात, दूर दूर तक का कोई नाता नहीं.

मगर अभी मैं जिस हादसे से गुज़रा और उससे निकल पाया, वह भी एक बताने वाला वाकया.अपनी संगीत बिरादरी के साथ बांटने जैसी.

आप से कहा था कि आशा भोंसले के उपर कुछ लिखूंगा तो नही लिख पाया. आप भी कहते होंगे, गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया...मेरे व्यवसाय की वजह से मुझे यकायक कूच करना पडता है.इन्जिनीयरिंग के जो प्रोजेक्ट चल रहे है, उनका तकाज़ा है.

अभी किसी काम के सिलसिले में मुझे एक बेहद अल्प प्रवास पर दोहा और अबु धाबी जाना पडा. दोहा (कतर) के एयरपोर्ट के काम की वजह से, लौटते समय अबु धाबी में विमान बदलनें के लिये उतरना पडा, तो कस्टम चेकिंग की औपचारिकता चल रही थी.

हमारा जब चेकिंग चल रहा था , तो एक अरब अफ़सर मेरे पास आकर मुझे जबरन अंदर ले जाने लगा. मैनें पूछा यह क्यों? तो पता चला कि कुछ आतंकवादीयों की तलाश हो रही थी, और शायद मेरे नाक नक्श और डील डौल की वजह से मुझे भी हिरासत में ले लिया गया.

अंदर कुछ 7-8 व्यक्ति और थे हिरासत में, और सघन पूछ्ताछ चलने लगी. सबके सामान को खोल कर जांचा जाने लगा.

मेरे पास तो क्या था, कुछ ज़रूरी व्यक्तिगत सामान, और हमेशा की तरह मेरा लॆपटॊप एवम कुछ सी डी , अपने प्रोजेक्ट की और कुछ गानों की- मुकेश और मन्ना दा.

जब कुछ नही मिला तो उन्होने अपना मोर्चा सी डी की तरफ़ खोला. कहा की बता दो, अभी भी मौका है , या तो कोई एटोमिक विषय पर कुछ गलत जानकारी हो या फ़िर पोर्नोग्राफ़ी की फ़िल्में. मैने बेझिझक कहा, कुछ नही है, ये तो गानों की सीडीयां है, मुकेश और मन्ना डे पर. संयोग से , मुकेश की एक किताब भी निकल आयी, जो मै अभी पढ रहा था. वह बोला,ये तो सभी कहते है, बाहर कुछ लिखा होता है, अंदर कुछ.

यह सब देख कर उसने अपने वरिष्ठ अफ़सर को बुलाकर यह सब दिखाया.उसके nameplate पर ओमर अब्दुल्ला नाम पढ पाया मैं . उसने बडे रूखे अंदाज़ में पूछा- What Mukesh ?

मैने समझाया- कुछ मुकेश के बारे में तारीफ़ के पुल बांधे, और किताब दिखाई. उसने सीडी चेक करने का आदेश दिया.

मेरा blood pressure बढने लगा, अगले विमान से निकलना जो था . उनसे बिनती की, मगर वे टस से मस नही हुए.

संयोग से सबसे पहले उनके हाथ में लगी कुछ साल पहले रिकॊर्ड की गई मुकेश के गीत पर मेरे आवाज़ के गानों की सीडी, और पहला गीत था - सारंगा तेरी याद में.

वह सिनीयर अफ़सर बैठ गया, बडे गौर से सुनने लगा.मैने कहा- अगली सीडी लगाऊं? उसने कहा- No, continue this.

मैं गरीब ,आशा की कुछ किरण के इंतेज़ार में रुक गया. आज संगीत की सेवा का फ़ल शायद मिल जाये यह दुआ करने लगा.

फ़िर आया गीत- ये मेरा दीवानापन है..

वह भी सुना पूरा. अब मैं आश्वस्त सा हो चला था कि मुकेश या इन मेलोडी भरे गीतों पर मेरा मर मिटना मेरा दीवानापन नही है शायद. इधर समय बीत रहा था. किसी ने कहा - आंखों की पुतली का टेस्ट भी लेना बाकी है अभी. पर ओमर अब्दुल्ला था जो बेगानी शादी मे दिवाना हुए जा रहा था.

अगले गीत - सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं को सुनने के बाद वह चौंक कर उठा,समय ज़्यादा हो गया था शायद और ज्युनियर के कान में कुछ फ़ुसफ़ुसा कर निकल गया. कुछ शब्द मेरे कानों में पडे - मुकेश .. बंदा..

मैं अगले दिव्य की प्रतिक्षा में अपने आप को मज़बूत करने लगा.मगर उस ज्युनियर अफ़सर नें बडे शालीनता से कहा- You may go now!!

मैं चौंक पडा, भगवान को बार बार शुक्रिया कहा और उस अफ़सर को भी , उस फ़रिश्ते ओमर अब्दुल्ला को भी. पूछ ही बैठा - यह क्या चमत्कार है?

तो वह बोला- He said यह मुकेश का बंदा है, यह मुज़रिम(दहशतगर्द) नही हो सकता !!!इसे छोड दो....

मैं चकित था, मेरी आंखों में अश्रु उतर आये थे, कितनी बडी बात कह गया वह बंदा, और कितने बडे उपकार किये मुकेशजी नें मुझ पर!! पलकें झपका कर मै आंसू सुखाने के असफ़ल प्रयास में लग गया.

मेरी वह सभी सीडीयां प्यार से ’जप्त’ कर लीं गयीं, और मुझे छोड दिया गया. खुदा का शुक्र था कि मेरे पास लॆपटॊप में थे वे गाने.

बाद में पता चला कि जनाब ओमर अब्दुल्ला साहबनें हैदराबाद से एल.एल.बी किया था और मुकेश के दिवानों में वे भी शुमार थे!!!

आगे कुछ भी लिखने की , कहने की गुंजाईश ही नही है. मेरे मन को आपने पढ ही लिया होगा. आप के मन में उठती बातें आप लिख सकें तो मुझ पर करम और मुकेश जी पर आपके प्रेम की बानगी..

सारंगा तेरी याद में.. मुकेश ( मूल गीत नहीं )



कहने कि ज़रूरत नहीं की विमान में बैठ कर मैं यह गाने लगा..

सुहाना सफ़र ये मौसम हसीं...


Saturday, September 6, 2008

एकलव्य - सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं


गुरु पर्व
(वो जब याद आये, बहोत याद आये)

शिक्षक दिवस पर कईयों नें तो अपने अपने माड साब को याद किया होगा.अपने अपने तईं, कुछ मन से, कुछ जतन से जो यादें संजोई रखी होगी उसकी जुगाली भी की होगी.

व्यवसाय के फ़ेर में भटकने पर मजबूर दिलीप का ये दिल अंदर से कसमसा रहा है, कि कल क्यों नही कुछ लिखा. खैर, आज ही सही. हाले दिल का बयां, दिन के गुज़रने के बाद ही हो सकता है ना?अपना ब्लॊग बाद में ही सही.

तो आज आप लोग थोडा समय मेरे मन के अंतरंग को भी दे, कुछ नितांत व्यक्तिगत , स्वगत..कल से फ़िर अपने मकाम पर वापिस.

आज यहां संगीत की बात करें तो याद आते है मेरे वो गुरुजन , जिनसे मै चाहते हुए भी सीख नही पाया-

भोपाल में उस्ताद सलामत अली खां साहब, जिन्होने मुझे शास्त्रीय संगीत सिखाने का जिम्मा लिया. करीब ६ महिने सिर्फ़ सुर ही लगवाते रहे, मगर परिक्षा में डब्बा गोल होने पर अब्बा हुज़ूर नें फ़ौरन गाने पर पाबंदी लगा दी.शिक्षक दिवस पर उन्हे याद कर ,खुद आंसू बहा के उनसे मुआफ़ी मांग लेता हूं. आज कहां है वे?

इधर इंजिनीयर बनने के बाद जब एम.बी.ए. के लिये इंदौर आया तो एक राखी बहन मिली, कल्पना जो क्लासिकल संगीत की शिक्षा ले रही थी अपने गुरु और पिता श्री मामासहाब मुजुमदार जी से.(कुमार गंधर्व के मित्र).घर पर आना जाना, सुरों की खुशबू से महकती फ़िज़ा, बघार भी लगे तो पंचम और निशाद से.. मगर फ़िर वही कहानी. मामासहाब नें भी कई बार कहा. मगर अपनी ही धुन में रहे.

उन्हे भी कल याद किया.

फ़िर अनायास ही मुड गये सुगम संगीत की ओर. गाने तो बचपन से सुनते ही रहते थे, सभी के गाने, और इसीलिये ये सभी मेरे गुरु है उन्हे भी नमन..

मन्ना डे, मुहम्मद रफ़ी, मुकेश, तलत मेहमूद, हेमंत कुमार ..

इन फ़िल्मी संगीत के मूर्धन्य गायकों ने जो पंचामृत का खजाना रख छोडा है, इसे लूट रहा हूं. अनायास ही एकलव्य की भूमिका में अपने आप को पाता हूं.यहीं से तो कानसेन बने हैं, और तानसेन बनने की ख्वाईश नही..

गज़ल की दुनिया में भी सुनने को मिला मेहंदी हसन और गु़लाम अली को..उनके लिये उनकी लंबी आयु के लिये भी दुआ की.

फ़िर अपने आध्यात्मिक गुरु भी याद आये- नानासाहेब तराणेकर महाराज, और इस्लाम की रूहानी तालीम देने वाले बाबा सत्तार जी.. और मेरी मां भी .. नमन...

नाट्य शास्त्र की अल्प तालीम के लिये विजया मेहता, और चित्रकारी के लिये सच्चिदानंद नागदेवे याद आये..

उच्च संस्कार, सादे रहन सहन और वस्तुनिष्ठ विचारों के लिये और अपने अंदर समाहित इस लेखक के प्रणेता जन्मदाता महामहोपाध्याय डॊ. प्र.ना.कवठेकर को भी व्यक्तिगत रूप से साष्टांग प्रणाम किया.

अंत में whole thing is that कि मन में जो भाव उमड रहे है,उसकी अभिव्यक्ति के लिये मन्ना दा का एक गीत यहां सुनवा रहा हुं, पूर्णतः विचारों के समीप.उसे स्वीकार किजीये.. यह मूल गीत नही है.

सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं ..



सुर की सुराही तो रीती ही रह गई.

परसों आशाजी पर कुछ.

Saturday, August 30, 2008

कहीं दूर जब दिन ढल जाये- मुकेश


आनंद
यह फ़िल्म आप हम सभी के मानस में कहीं दूर तक जा बसी है. आपके संवेदनशील मन नें हृषिकेश मुखर्जी के उस फ़िल्म के दोनों चरित्र आनंद और भास्कर के कलेवर के अंदर जा कर उनके हल्के फ़ुल्के उल्हास के क्षणों की या दर्दो ग़म की अनुभूति ज़रूर की होगी.

यह गाना इस शाश्वत सत्य को भोगने की पीडा को अभिव्यक्त करता है, कि जीवन क्षण भंगुर है, एक यात्रा जिसकी शाम तय है.फ़िल्म का नायक आनंद युवावस्था में ही अनचाहे इस यात्रा के अंत में अपने आप को पाता है. उसनें भी सपनोंका एक जहां बसाया था,जिसके बारे में फ़िल्म के आरंभ में वह कहता भी है:

मैने तेरे लिये ही सात रंग के सपने चुने, सपने सुरीले सपने..

कुछ हंसते, कुछ ग़म के ये सपने लिये इस खुशमिज़ाज़ इंसान से आप हम जब रूबरू होते है तो उसके Exterior के आनंदित और उल्हास भरे व्यक्तित्व के पीछे छिपी उसके मन की वेदना से हम रूबरू होते है इस गीत के ज़रिये.मौत की भयावह सच्चाई से.

यह गीत योगेश ने लिखा है . (एक और गीत लिखा है इस फ़िल्म का- ज़िंदगी , कैसी है पहेली..) सलिल दा नें शाम के किसी राग में इसकी रचना की है, और इस जीवन के यथार्थ दिखाने वाले नगमे को मुकेश से अलावा और कौन गा सकता है भला?

अब आप इसका विडिओ देखें और मेरे साथ साथ चलें, आनंद के मन में झांकने..उसके सपनों में और ग़म में शामिल होने..




गाने के प्रारम्भ में समुंदर के क्षितिज पर अस्त होते हुए सूरज से आनंद के मन को उद्वेलित होते हुए हम पाते है, मृत्यु की आहट को वह डूबते सूरज में महसूस करता है, और उदास हो जाता है. मगर अगले क्षण ही एक बैलगाडी दिखाई है निर्देशक नें, जिसे देख नायक थोडा मुत़मईन हो जाता है, शांत हो जाता है . अपने दिल को आश्वस्त कर देता है, कि जिंदगी एक सफ़र ही तो है.

कहीं दूर जब दिन ढल जाये , सांझ की दुल्हन बदन चुराये, चुपके से आये..
मेरे खयालों के आंगन में ,कोई सपनो के दीप जलाये, दीप जलाये......


आप ज़रा यहां बोलों का चयन देखें - सांझ की दुल्हन.. मृत्यु के बारे में आज तक कही गयी एक मात्र उपमा..

नायक भी इस दुल्हन का वरण करने के लिये अपने मन को तैय्यार करता है, और जो सपने उसने पहले देखे थे , उन्हे भुला कर इस दुल्हन द्वारा सपनों के दीप जलाने का स्वागत करता है.

गाने के पहले Interlude में उसके मन का अंतर्द्वंद को ,संत्रास को पत्ते गिरते हुए पेडों के झुरमुट द्वारा और समुंदर के लहरों का मन पर आघात करता हुए विज़्युअल से, साथ ही बांसुरी के हार्मोनी और वायोलीन के समूह के उतार चढाव से हृषी दा और सलिल दा नें बखूबी निर्मित किया है.

फ़िर देखिये पहला अंतरा..

कभी युं हीं जब हुईं बोझल सांसें, भर आयी बैठे बैठे जब युं ही आंखें,
तभी मचल के, प्यार से चलके, छुए कोई मुझे पर नज़र ना आये, नज़र ना आये..


क्या कुछ समझाने की ज़रूरत है? मौत में रोमांस खोजने का यह अंदाज़ , क्या बात है..

दूसरे अंतरे के पहले के interlude में आप सुनेंगे मृत्यु की आहट, Bass Trumpets के खरज़ स्वरों के प्रयोग द्वारा. साथ ही बांसुरी की उत्सवी और विरोधाभास भरी सरगम पूरी Octave में, साथ में विज़्युअल में आनंद के पुराने प्रेम की यादें दर्शाता हुआ सूखे हुए फ़ूल का किताब मे से निकलकर प्रेम की असफ़ल परिणीती का वर्णन करता है, और साथ में नये रिश्तों का मोह भी..

तभी तो वह दूसरे अंतरे में कह उठता है-

कहीं तो ये दिल कभी मिल नही पाते, कहीं पे निकल आये जनमों के नाते,
ठनी थी उल्झन, बैरी अपना मन, अपना ही होके सहे दर्द पराये,दर्द पराये..


प्रेमिका के बिछडने की पीडा़ , साथ में नये रिश्तों के अपनत्व का अहसास, दोनॊ भाव इस अंतरे में...

फ़िर तीसरे अंतरे में-

दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे, हो गये वैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यही तो है अपने,मुझसे जुदा ना होंगे इनके ये साये.. कहीं दूर जब दिन ढल जाये.....

क्या आप बता सकेंगे यहां रचयिता तिकडी के मन के भाव क्या रहे होंगे? यह आप के लिये. और साथ में मुखडे और पहले दोनों अंतरों के कुछ अलग भाव, अर्थ अगर हैं तो आईये, सिरजने दिजिये आप के दिल से..

हां, इस गीत को पिछले एक हफ़्ते से भोग रहा हूं , सुर और अर्थ मानों दिल में गहरे पैठ गये है. इसी गाने को गाकर भी पीडा हल्की कर रहा हूं. आप भी सुनना चाहें तो यहां प्रेषित है.. सुनने का नम्रता से अनुरोध. वैसे इस बार पार्श्वसंगीत के साथ.

मैं, आप, संगीत और मुकेश !! दिलीप के दिल की आवाज़ से....

Wednesday, August 27, 2008

मानस के अमोघ शब्द


अद्वितीय गायक मुकेश चंद्र माथुर के पुण्य तिथी पर आपसे एक विनीत आग्रह . अपने एक नये ब्लोग मानस के अमोघ शब्द के बारे में थोडी सी चर्चा..

कुछ सालों पहले जब इस दुनिया में आया था तो जिंदगी के सफ़र के दौरान पाया की अपन तो श्री ४२० के राज कपूर जैसे निकल पडे थे खुल्ली सडक पे अपना सीना ताने,यह मिशन लिये की किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वासते हो तेरे दिल में प्यार,क्योंकि जीना इसीका नाम है..(कृपया profile में पढें)

मगर पाया कि सब कुछ सीखा हमनें ना सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालों, हम है अनाडी..बस चलते रहे सुनसान डगर और अनजान नगर में, यह कहते हुए कि आवारा हूं..

मगर क्या करें? दि़ये और तूफ़ान की कहानी की मानींद, दि़या तो अपनी धुन मे मगन ,आस्था के तिनके पर सवार ,मन के और समाज के अंधकार को मिटाने फ़ड्फ़डाता रहा..

मगर वह तो अपनी कहानी है.ज़माने नें कुछ ऐतबार किया , कुछ ना ऐतबार किया. हकीकत से रूबरू हो , बेआबरू हो, ग़ैरते मेहफ़िल से भी बेखबर ,कभी बाखबर चलते रहे. इंसानीयत से बडी शिद्दत से, नेक नीयत से ,भूले से मोहोब्बत कर बैठा यह दिल,नादां था बेचारा .. दिल ही तो है..

अब हमने यह तय किया कि आपकी मेहफ़िल में किस्मत आज़माकर देखेंगे, तो सोचा क्यों ना हम अपने फ़लसफ़े को भी आप के साथ शेयर करें, वह जो हमने इस जहां से पाया, तिनका तिनका जोड कर..

तो एक और ब्लोग बनाया है” मानस के अमोघ शब्द ’. मानस के याने मन के गहरे पैठ जा कर मेहसूस की गयी बातें अमोघ याने अचूक शब्दों में ..

उस ब्लोग पर पर कोशिश रहेगी कि कुछ ऐसा लिखा जा सके,जो संगीत के अलावा हो, जिस पर जीवन में सीखे मॆनेजमेंट के फ़ंडे, कुछ तकनीकी बातें, कुछ कलात्मक चित्र, कुछ सिंदबादी किस्से,और बहुत कुछ. दिलीप के दिल से पर संगीत की बातें तो चलती रहेंगी ही, जहां हर चीज़ ज़रा शऊर और तेह्ज़ीब के दायरे में रहेंगी. कभी कभी अपने दिल की आवाज़ भी सुनायेंगे .इसका मतलब यह नही की मानस के अमोघ शब्द पर कुछ ठिलवायी होगी. कहने का मतलब है, जो मन नें पाया वही लौटाने का जतन है ये, आ अब लौट चलें..

और हां, यहां लिखे हर वाक्य में एक बात जो लगभग हर जगह प्रतिध्वनित हो रही है है, वह है मुकेश की आवाज़ .जी हां, मुकेशचंद्र माथुर ... जिनकी पुण्यतिथी आज है. तो उन्हे भी याद करें , बडी शिद्दत से, बडे सूकूं से, बडी नज़ाकत से, जैसा की मुकेश जी के गानों का आलम होता था.

उन पर कोइ गीत लगाना क्या ज़रूरी है?

आप खुद ही गा लिजिये ना..हो जायेगी उनकी याद दिल से.

हर आम व्यक्ति को यह दिली सूकूं है की वह मुकेश के किसी ना किसी गीत को अपनी ज़िंदगी में कहीं ना कहीं अपने उपर भुगता हुआ, भोगा हुआ पाता है. दर्द भरे पलों की याद या खुले मन से बेबाक प्रेम अभिव्यक्ति करते हुए.जिसके होटों पे सचाई रहती है, दिल में सफ़ाई रहती है.जो कभी गर्दिश में रहा, तो कभी आसमान का तारा .

तभी मुकेश जी नें हमेशा कहा की - कोइ जब तुम्हारा हृदय तोड दे , तडपता हुआ जब कोइ छोड दे, तब तुम मेरे पास आना- मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा , आप जैसे दर्दीले गीत को सुनने वालों के लिये.

और जिसने यह सब नही मेहसूस किया है, उसकी चिन्ता मैं और आप व्यर्थ में क्यों करें? आप ने यहां तक मेरा साथ दिया है , इतने दूर यह पढने चले आये है,मेरे दिल से निकले कुछ अमोघ बोल सुनने, तभी , क्योंकी आप भी तो मेरे जैसे है..यह जो सब लिखा गया है, क्या सिर्फ़ मेरे बारे में या मेरी आपबीती या सुख दुख के क्षणों की पाती है? नही दादा, यह सब आप के ही मानस की तो अभिव्यक्ती है.

amoghkawathekar.blogspot.com या मेरे Dashboard से मानस के अमोघ शब्द पर जा सकते है. नामकरण के लिये credit संजय भाई को.गलती पर Debit मुझे मात्र !!!

तो आयें , मिल कर गा उठे -

जीना यहां , मरना यहां इसके सिवा जाना कहां ?

Monday, August 25, 2008

मन तरपत हरि दर्शन को आज..

रफ़ी - भजन रंग

जय श्री कृष्ण !!!

वास्तव में जन्माष्टमी कल थी या आज है इसका किसको खयाल.. हमारे मन की अवस्था तो यूं है - मन तरपत हरि दर्शन को आज..

आज यह गीत कृष्ण भजन है और बैजु बावरा के प्रसिद्ध भजन का रिमिक्स है,खुद रफ़ी जी नें गाया. जैसा की पिछली बार”मधुबन में ’गाने में था.गीत में वैसा ही improvisation .खुला , कृष्ण भक्ति में मगन हो कर गाया रफ़ी जी द्वारा. एक आग्रह, कृपया पुराने ओरिजीनल गाने से तुलना न करें.

मै और कुछ भी लिख पाने की स्थिती में नही हूं. अभी अभी संजय भाई के सुरपेटी ब्लॊग पर माखन मिश्री खा कर आ रहा हूं . आप भी प्रसाद ग्रहण करने वहां पधारें.www.surpeti.blogspot.com.


प्रस्तुत भजन के संदर्भ में इस के संगीतकार जनाब नौशाद सहाब खुद कहते है-

गूंजते है तेरे नगमों से अमीरों के महल,
झोपडों में भी गरीबों के तेरी आवाज़ है,

अपनी मौसीकी पे सबको फ़क्र होता है मगर,
मेरे साथी आज मौसीकी को तुझपर नाज़ है...

यह कृष्ण के लिये कहा गया है, या रफ़ी जी के लिये , अपने अपने अर्थ आप स्वयं लगांयें...

देखा जाये तो सही अर्थों में धर्म निरपेक्षता हमें फ़िल्म जगत में ही दिखाई पडती है.

स्वयं भगवान शिव द्वारा रचित राग मालकौंस पर निबद्ध इस कृष्ण भजन को मोहम्मद रफ़ी नें गाया, मोहम्मद शकील ने लिखा, और नौशाद अली ने बनाया.. क्या बात है..

मुकद्दस पाकीज़गी से बनाया गया यह गीत आप को बेखुद कर दे ,आप पर अगर कैफ़ियत तारी हो जाये तो फिर मुझसे मत पूछियेगा कि ये किसका कमाल है..

आप खुद ही तय किजिये.....



मुझ पर भी इसकी कैफ़ियत तारी हो गयी है, इसलिये - दिलीप के दिल से - भी यह भजन सुनने का आग्रह.. यानी , मेरी आवाज़ में, वैसे ही- मै, आप, और रफ़ी !!

रफ़ी जी और आप से क्षमा चाह्ते हुए..

Saturday, August 23, 2008

वृंदावन का कृष्ण कन्हैया

रफ़ी - शास्त्रीय रंग एवम भजन ..

आज कृष्ण जन्माष्टमी है, और कल भी.

तो क्यों नही आज उस नटखट , नंद गोपाल कन्हाई की याद में रफ़ी साहब की आवाज़ में कोई गीत पेश किया जाये.आज भी और कल भी. हम अभी भी रफ़ी के शास्त्रीय रंग के गानों की मेहफ़िल में है जनाब. कुछ जी नही भर रहा है.

वैसे गाने तो बहुत सारे है रफ़ी जी के, जो कृष्ण के विषय पर है,जैसे-

राधिके तूने बंसरी चुरायी, बडी देर भई नंदलाला, ना जईयो राधे छेडेंगे श्याम..

लेकिन प्रस्तुत गीत तो कालजयी है, लता के साथ गाकर अमर हुए इस गीत को राजेन्द्र कृष्ण नें लिखा(जिनके नाम में ही कृष्ण है)और हेमंत दा नें स्वरों मे पिरोया है. सन १९५७ की ’ मिस मेरी ’ फ़िल्म के लिये--

वृंदावन का कृष्ण कन्हैया , सब की आंखों का तारा,
मन ही मन क्यूं जले राधिका,मोहन तो है सब का प्यारा..


आपने देखा, ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी कैसे हल्के फ़ुल्के रोल में है. रेखा के पिता जेमिनी गणेशन और जमुना.. साथ में हमारे किशोर कुमार भी...(हास्य कलाकार मारुती या जगदीप भी ?)पूरी धमाल से भरी फ़िल्म थी. एक और बेहद सूरीला और बेजोड गीत था - सखी री सुन बोले पपीहा उस पार.. क्या संयोग था- लता और आशा की आवाज़ एक साथ.वो फिर कभी.

कहीं तो यह भी कहा गया है की ओरिजिनल गाना तमिल में था जिसे पी सुशीला और ए एम राजा नें गाया था. मगर गाने का स्वरूप खालिस उत्तर हिन्दुस्तानी लग रहा है, पूरबी रंगत लिये, हेमंत दा के जन्म स्थान वाराणसी की तरफ़ का.अतः यही ओरिजिनल है , बात खतम!

देखा जाये तो किशन कन्हैया हिन्दी फ़िल्मों के सभी गीतकारों का और संगीतकारों का आंखों का तारा थे. संपूर्ण अवतार थे वे, मगर दैहिक प्रेम की बजाय , आत्मीय प्रेम के पर्याय .An Epitome of Platonic Love !! तभी तो उन दिनों के नायक और नायिका के मन की सच्ची अनुरागी अवस्था कृष्ण और राधा के निस्पृह प्रणय की प्रेम गाथा द्वारा संदर्भित होती थी. आज कल युवाओं में वह तन मन की शुद्धता कहां? तभी तो आज कल ऐसे गीत कहां बनते है ( अपवाद स्वरूप - लगान फ़िल्म के गाने को छोडकर, जिसमें लगभग यही भाव थे)

अमूमन, जो भी भजन होते थे हिंदी फ़िल्मों में वह शास्त्रीय स्वरूप में ढाले जाते थे, और इसी विषय वस्तु के आसपास होते थे. साथ में यहां दक्षिणी फ़िल्म होने के कारण इसमें नृत्य का भी समावेश किया गया जो सोनें में सुहागा जैसा सुहाता है. सुना नही आपने, क्या खूब तबला और नाल बजी है, अलग अलग ठेके में.. और बांसुरी की मन मोहने वाली धुन..क्या समाधी तक नही ले जाती?

शब्दों पर भी ज़रा गौर करें.

रंग सलोना ऐसा जैसे छाई हो घट सावन की
एरी मैं तो हुई दिवानी, मन मोहन मन भावन की
तेरे कारण देख सांवरे छोड दिया मैनें जग सारा

(एरी मैं तो ..यहां मीरा भी उपस्थित है)



आईये और प्रेम रस में सुध बुध खो जायें..

Wednesday, August 20, 2008

कुहू कुहू बोले कोयलिया...

शास्त्रीय रंग...और रफ़ी

मोहम्मद रफ़ी जी के गाये हुए शास्त्रीय संगीत पर आधारित अनेक गानों में इस गाने का क्रम सबसे उपर लगता है. इस के बारे में ज्यादा कहने के लिये कुछ नही, वरन सुनने के लिये ,मन के सानंद आनंद से डोलने के लिये है. सिवाय इसके की यह गाना रफ़ी साहब नें स्वर कोकिला लता मंगेशकर के साथ गाया है, जिसमें एक ही गाने में चार रागों का प्रयोग किया गया है.स्थाई में राग सोहोनी है, और ३ अंतरों में है राग बहार, राग जौनपुरी, और राग यमन.

यह बंदिश सन १९५७ में स्वर्ण सुंदरी फ़िल्म के लिये आदि नारायण राव नें संगीत बद्ध की,(ताल त्रिताल). लेकिन इतने सुंदर शब्दों को कविता में किसने ढाला, यह पता नही. मेघराज नें बादरीया का श्याम श्याम मुख चूम लिया है..
वाह,वाह.जानकारों से आग्रह है कि जानकारी बढायें.

कुहू कुहू बोले कोयलिया ,
कुंज कुंज में भंवरे डोले ss,
गुन गुन बोले SS,आ SSS..(कुहू कुहू)

सज सिंगार रितु आयी बसंती,
(आलाप)
जैसे नार कोई हो रसवंती, (सरगम)
डाली डाले कलियों को तितलियां चूमें
फ़ूल फ़ूल पंखडिया खोले, अम्रत घोले, आsss.. (कुहू कुहू)

काहे ,काहे घटा में बिजली चमके,
हो सकता है, मेघराज नें बादरिया का श्याम श्याम मुख चूम लिया हो..
चोरी चोरी मन पंछी उडे, नैना जुडे आsss ..(कुहु कुहु)

(आलाप)
चंद्रिका देख छाई, पिया, चंद्रिका देख छाई..
चंदा से मिलके, मन ही मन में मुसकाई, छाई,चंद्रिका देख छाई..
शरद सुहावन मधुमन भावन, २
बिरही जनों का सुख सरसावन,
छाई छाई पूनम की छटा,घूंघट हटा, आsss (कुहू कुहू)

(आलाप)
सरस रात मन भाये प्रियतमा ,कमल कमलीनी मिले sss
सरस रात मन भाये
किरण हार दमके, जल में चांद चमके,
मन सानंद आनंद डोले २
सरगम ...

यह गाना अछ्छे अच्छे गायकों के लिये आज भी बडी चुनौती है. जगह तो दिखती है, मगर गले में नही उतरती. उतरती है तो उठती नही.

रफ़ी और लता को सलाम.

Friday, August 15, 2008

देश भक्ति के नगमें - मोहम्मद रफ़ी


रफ़ी साहब पर फ़िर से इतनी जल्दी लिखने का एक कारण है, आज़ादी की सालगिरह के दिन का महत्व. मगर जैसा की मैं कह रहा था, मैं यह सोचता हूं की उस दिन तो आप आज़ादी के तरानों की मस्ती में तो रहते ही है. क्या यह नही हो सकता की हम उसके बाद भी उस मस्ती को बरकरार रखें, नहीं तो १५ अगस्त खतम, पैसा हजम!

इसीलिये यह प्रयास. यकीन किजिये, आप को मज़ा ज़रूर आयेगा. कल के श्रीखण्ड को आज खाने जैसा !!

मैने पिछले पोस्ट में लिखा था, रफ़ीजी ने अलग अलग रंगों की छटा लिये हुए गाने गाये, जो की दूसरे गायकों को नसीब नही हुए. हर फ़न मौला थे रफ़ी साहब. जिस भी मूड का या प्रभाव का गाना हो, उनके लिये आसान था. क्योंकि, उनके गले में परवरदिगार नें वो कमाल भर दिया था , जो हर किस्म के गानों के लिये ही जैसे बनाया गया हो.चलो इसकी तसदीक भी कर लें.

विभिन्न रंगो, या मूड्स की हम जब बातें करेंगे तो हमें उनके गानों को हमें कुछ इस तरह के संवर्गों में बांटना पडेगा:

a. Soft Romantic songs कोमल रूमानी नगमें
b. Rhythemic melodious Love songs मधुर प्रेम गीत
c. Classical songs शास्त्रीय स्वरूप की बंदिशें
d. Devotional songs भजन
e. gazal गज़लें
f. Quawali कव्वाली
g. comedy कॊमेडी
h. Sad songs दर्द भरे गीत
h. philosophical songs दार्शनिक गीत
i. patriotic Songs देश भक्ति के नगमें
j. Special songs खास नगमें

(और कुछ हो तो आप बतायें)

तो पिछले पोस्ट में आपने क्लासिकल क्लासिक सुना, मधूबन में राधिका नाचे रे, जो कि एक भजन भी था. आम तौर पर भजनों को शास्त्रीय संगीत के सुरों से सजाया जाता है.जन्माष्टमी के अवसर पर एक बढियां भजन सुनवायेंगे.

आज है प्रस्तुत आज़ादी के तरानों की जुगाली..

रफ़ी जी तो इन गीतों में जान फ़ूंक देते थे. उनकी आवाज़ में जो वीर रस के ambience के लिये लगने वाली खुली और शेरदिल आवाज़ थी, साथ में ही उसमें करुणा रस का भी उतना ही समावेश था.

देशभक्ति के कई गीतों का यहां ज़िक्र करना चाहूंगा -

अब कोई गुलशन ना उजडे, कर चले हम फ़िदा, वतन पे जो फ़िदा होगा, सरफ़रोशी की तमन्ना अब , अपनी आज़ादी को हम हर्गिज़ भुला सकते नही,मेरी आवाज़ सुनों और कई..

और हां. आपमें से कुछ लोगो को याद होगा. सन १९६२ में जब चीन नें हमला किया था तो भारतवासियों का ज़ज़बा बढाने के लिये दो लघुफ़िल्में बनी थी जिसमें फ़िल्मी कलाकारों ने काम भी किया था. वो गाने भी रफ़ीजी नें ही गाये थे.याद नही आ रहे हैं. किसी के पास होंगे?

आज हम देशभक्ति के गीतों में हमेशा अव्वल रहने वाला यह गीत सुनें - वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो - शहीद (पुरानी) फ़िल्म के इस गीत को रफ़ीजी ने खान मस्तान(या मस्ताना ?) के साथ गाया है.

कल से कोशिश कर रहा था कि इसका ऒडियो क्लिप मिल जाये, क्योंकि टेप पर से MP3 में बदलने की जुगाड अभी लग नही पायी है. सारेगामा के साईट पर भी उपलब्ध नही है.

खैर ,अभी तो असल गीत के बजाय मेरे गुनगुनाये हुए एक छोटी सी क्लिप को सुनिये. साज़ो आवाज़ के साथ फिर कभी, अभी तो सिर्फ़ मैं , आप, और रफ़ीजी.

मधुबन में राधिका नाचे रे



मुहम्मद रफ़ी यह नाम जेहन में आते ही हम एक ऐसे सुरेले संगीतमयी यात्रा पर निकल पडते है, जिसके सफ़र में हम आप रूबरू होते है पहाड की तलहटी के किसी घुमावदार पगदंडी से, या किसी बडे से शीतल पानी के झरने से, कलकल बहते हुए स्रोत से, या हल्की ,मीठी सी बयार से. हम बौरा जाते है, मन रक्स करने लगता है, और दिल चाहता है की यह रूहानी सफ़र कभी भी खत्म ना हो.

रफ़ी साहब के गानों पर बहुत कुछ सोचा था, अब अभिव्यक्त करने से थोडा और रूमानी हो जाऊं तो यारों मुआफ़ कर देना.

आप सब जानकारों ने जब भी उनको सुना तो पाया होगा की इससे मीठी, इससे पाक साफ़ और चिरयौवन आवाज़ दूजी नही हुई. कोई आश्चर्य नही की अपने ज़माने में लगभग ६०-७०% गाने जो हिरो , या कॊमेडियन या किसी भी चरित्र पर फ़िल्माये जाते थे, वे आवाज़ उधार लेते थे रफ़ी की.He was epitome of Youthfullness and rightousness in the character.किसी भी आवाज़ का ultimate - या ultima थे , एकदम मुकम्मल.

क्षमा चाहूंगा, यदि स्वयं प्रभु रामचन्द्र की भी आवाज़ होगी तो ऐसी ही होगी. आदर्श आवाज़!!

उन दिनों की फ़िल्मों के जो नायक होते थे वे ज्यादहतर सभ्य , अहिंसा वादी एवं दिल के साफ़, अच्छे इंसान हुआ करते थे, तभी तो रफ़ी साहब की आवाज़ उनपर मुआफ़िक बैठती थी .

रफ़ी जी के गानों में आपको कई रंग मिलेंगे. तो आज से शुरुआत करते है उनके नायाब और कालजयी गीतो के एक रंग से-

शास्त्रीय रंग या भजन रंग

कई गानें आपको याद आयेंगे- उसकी चर्चा अगले अंक में, मगर प्रस्तुत गीत तो ’ वाह भाई वाह ’

" मधुबन में राधिका नाचे रे "


आपने आजकल कई रिमिक्स सुने होंगे, सुन ही रहे होंगे. मगर, इससे पहले भी यह नुस्खा आज़माया जा चुका है, बडे बडे स्थापित गायकों की आवाज़ में. मगर उद्देश्य था बडा ही विनीत. दरअसल, वे गाने फ़िर से रिकॊर्ड किये गये, जिन्हे बडी शोहरत मिली , जिन्हे अच्छे और लेटेस्ट तकनीक के इस्तमाल से बेहतर बनाया गया. रफ़ी, मन्ना दा, महेन्द्र कपूर आदि.

फ़िल्म कोहिनूर के लिये राग हमीर में निबद्ध किये गया यह गीत उसी श्रेणी में है, जिसमें आप पायेंगे की कहीं कहीं रफ़ी जी ने ओरिजिनल साउंड ट्रेक से अलग भी गाया है,जो सुखद है.

नौशाद साहब की कोमेंट्री भी क्या गज़ब !!

अंत में एक दिल की बात! यह गाना इस खाकसार ने ७ वर्ष की उम्र से गाना शुरु किया, (पहला गाना )इसलिये भी, रफ़ी जी पर मेरी यह ब्लोगयात्रा का आगाज़ भी इसी महान गीत से..

आपके विचारों से संबल मिलेगा, या सुधरने का मौका मिलेगा.


Wednesday, August 13, 2008

मोहम्मद रफ़ी के गाने पर रिमिक्स ?

मोहम्मद रफ़ी साहब के बारे में कुछ लिखने का वादा किया था, पूरा नही कर सका. अब पता चला कि जो लोग इस ब्लोग जगत पर अपना अमूल्य समय दे कर आप हम सब के लिये मोती चुन के लाते है, कितना परिश्रम , कितनी मशक्कत, कितना ्होमवर्क करते है, तब जा कर इतने अच्छे अच्छे पोस्ट हमें पढने एवं देखने मिलते है. श्रोता बिरादरी, सुखनसाज़, इत्यादि. सबसे पहले उनको और उनके स्रिजन को सलाम!!

इसलिये, लगता है, या तो कुछ अलग किया जाये, जो इन सब से बेहतर तो हो ही नही सकते.मगर हां, इनकी रिपोर्टिंग की जा सकती है, इन पर अपने कमेंट विस्तार से लिखे जा सकते है, या इन पर जुगाली की जा सकती है.Like playing a second fiddle ( या किसी भी अच्छी संगीत रचना के पीछे एक अचूक 7th Diminishing Note लगाना)
मगर रफ़ी जी पर तो लिखना है ही, और कंप्युटर के मॊनिटर की गड्बड कल ठीक हो जायेगी तो कल का पोस्ट तैयार है. तो कल से दो तीन दिनों की छुट्टी में रफ़ी सहाब के गानों की मस्ती में गोते लगाने के लिये तैय्यार रहें.

आपने आजकल रिमिक्स के कई गाने सुने होंगे, रफ़ी सहाब के गानों पर सुने है? खुद रफ़ी साहब की आवाज़ में ?

कल तक तो रुक जाईये जनाब!!!

’ जोग लिखि संजय पटेल की ’ पर भीमसेन का अच्छा पोस्ट आया है. (www.joglikhisanjaypatelki.blogspot.com)

Monday, August 4, 2008

किशोर दा के साथ कश्ती का खामोश सफ़र

'कश्ती का खामोश सफ़र है...' यह किशोर दा का सुधा मल्होत्रा के साथ गाया गाना आज दोपहर को उनके जन्म दिन पर सुना.रहा नही गया की पहले किशोर दा पर ही कुछ ...

यह गीत मेरे लिये एक अलग महत्व रखता है. मेरे बचपन में मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि स्वयं सुधा मलहोत्रा जी ने यह गाना भोपाल के हमीदिया कॊलेज के एक गेदरिंग में गाया था.चूंकि प्रिंसिपल उनके पिताजी ही थे, तो सुलभ ही उपलब्ध हो गयी. साथ में कोई साथी बंबई से आया था. मेह्फ़िल में जया भादुरी भी मौजुद थी.

इसलिये जब दिल की गहराई तक उतरने वाला यह गीत जब आज श्रोता बिरादरी पर नश्र हुआ (या पोस्ट हुआ)्तब पुरानी यादों ने फ़िर दस्तक दी.

बताया गया कि ्रिकॊर्डिंग के वक्त बडे संजीदा मूड में गाने के लिये किशोर दा से बडी मिन्नतें की गयी, मगर वे सिरियस नही हुए. पर जब वास्तव मे रिकॊर्डिंग शुरु हुई तो नतीजा सामने है.

आज कुछ लिखने का नही बल्कि कहने का मूड है, आज मुझे भी कुछ कहना है, तो यह गीत पेश है. अपनी दिल की आवाज़ में स्वांतः सुखाय की अवस्था में गाया है खुद ही ने, शायद आप भी दाद दें तो मेहरबानी.

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