Friday, December 12, 2008

माने ना मेरा दिल दिवाना ,हाय रे...हाय रे संयोग..

आज ११ दिसेम्बर है.

तो हुआ करे.

नही जनाब. आज मेरे दो दोस्तों की शादी की सालगिरह है, और इसलिये इंदौर के एक प्रतिष्ठित तारांकित हॊटेल सयाजी में जब इनमें से एक मित्र नें आज शाम को शादी की वर्षगांठ पर पार्टी दी तो, दूसरा मित्र भी संयोग से वहीं मिल गया. मुझे अकेला देखकर चौंक कर पूछ बैठा कि भाई साहब, आप अकेले, भाभी जी कहां हैं?

उसका चौंकना इसलिये लाज़मी था क्योंकि संयोग से आज मेरे शादी की भी सालगिरह है, और मेरी पत्नी नेहा अभी पूणें में नूपुर बिटिया के पास है,जो स्वास्थ्य लाभ कर रही है.शादी के बाद पहली बार हम दोनों इस बार साथ साथ नहीं हैं.

जाहिर है, हम सभी मित्रों के साथ ग़म गलत (?)करनें बैठ गये. मेरा तरीका जरा अलग है. चूंकि मैं हमेशा अपनी धुन में अपने नशें में रहता हूं , मुझे किसी और नशे की ज़रूरत नहीं पड़ी आज तक, और इसीलिये फ़्रेश लाईम सोडा़ के नशें में हमने अपनी पत्नी के विरह को सेलिब्रेट किया.दोस्तों को साथ देने के लिये अब तक इतना फ़्रेश लाईम सोडा़ पी चुका हूं कि देखते ही सुरूर आ जाता है.( पैसा भी नही लगता!!)

डिसेंबर महिना है, अभी भी रातें ठंडी़ नही हुई. वर्ना अब तक हमेशा इतनी थंड़ बढ़ जाती थी कि मेरी दूसरी बिटिया मानसी की नाक हमेशा बहती रहती थी, क्योंकि उसे अक्सर सर्दी लग जाती थी. वो आज बोली,पापा , आज पहली बार मेरे जन्मदिन पर मुझे सर्दी नहीं हुई है.

ओह,तो शायद मैंने बताया नहीं कि आज संयोग से उसका भी जन्मदिवस है, और वो मेरे साथ, और पत्नी नेहा ,नूपुर के साथ.अब कोई और संयोग नही है, निश्चिंत रहिये.

नही, अभी खत्म नही हुआ है ये संयोग. ज़रा दिल थामके बैठिये और सुनिये ..

ये जो मेरे मित्र मुझे मिले थे अभी, जिनकी शादी उसी साल हुई थी, मेरे शादी वाले दिन ही हुई थी. और ये मेरे मित्र बने कश्मीर में, जब संयोग से वे भी हनीमून पर श्रीनगर पहूंचे थे और हम एक ही फ़्लाईट से श्रीनगर उतरे.

इन्दौर वालों की ये खा़सियत है, कि कहीं भी बाहर मिल जायें तो एक दम घुल मिल जायेंगे,भले ही पहली बार मिलें हों.(इन्दौर में मिलें तो यही बात हो ये ज़रूरी नही!!). तो हमने बाकी दिन साथ ही घूमने देखने का प्लान किया.

एक बडा़ शोख़ वाकया याद आया जो आज भी हमने याद किया और बहुत हंसे भी,जो आपको नज़र कर रहा हूं. अब आप से क्या पर्दा( पर्दा नहीं जब कोई खुदा से, दोस्तों से पर्दा करना क्या जब ..)

एक शाम हम खिलनमर्ग में घुडसवारी के लिये गये, तो शाम लगभग हो चुकी थी और झुरमिटी अंधियारा सा होने जा रहा था. हमने चार घोडे तय किये और दोनो कपल घोडों पर बैठ ,हौले हौले हाथों में हाथ डाले क्षितिज की तरफ़ बढने लगे.

चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो..


अलग अलग.

जरा अलग अलग को रेखांकित किजिये,क्योंकि यहां भी संयोग ने गड़्बडी़ की थी.कहीं गाना भी चल रहा था- कोइ प्यार की देखे जादुगरी , गुलफ़ाम को मिल गयी सबज़परी...

अभी हम प्यार की जादुगरी देख ही रहे थे कि अचानक हमने पाया कि गुलफ़ाम को सब्ज़परी मिलने की बजाय दोनो गुलफ़ामों के घोडे एक साथ मिल कर किसी तीसरी राह पर चल पडे़ थे, और दोनों सब्ज़परीयों के घोडे़ पीछे ही रह गये. हमने लाख कोशिशें कीं , बडा ज़ोर भी लगाया मगर वो हो न सका जिसकी हमें जुस्तजू थी. घोडे़ थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे .

बस फ़िर क्या, मैं और मेरी तनहाई, और साथ में दूसरा गुल्फ़ाम तनहा सा, सहमा सा,क्योंकि घोडे़ वाले भी पीछे कहीं ओझल हो गये थे. फ़िर उस नशीली रात में , उस ठंड में मैनें उस मित्र से कहा कि ज़रा ठंड रख, क्योंकि ये कोई फ़िल्म नही है, जो कुंभ के मेले में हम लोग बिछड जायेंगे.कोइ जतन कर के इन चलते हुए घोडों से उतरने की तरकीब निकाली जाये. जब भी हम कोई कोशिश करते,घोडे़ स्पीड़ बढा देते!!

ये भी संयोग था कि दोनो घोडे साथ साथ ही चल रहे थे, जैसे कि जय और वीरु हों, नहीं तो ये भी अलग अलग हो जाते तो कहीं मुंह दिखाने को नहीं रह जाते ( दरसल रात के अंधेरे में मुंह ही नही दिख रहा था, और कौनो दू्जी बात नाही है रे बावरों !)

अब हमारे मराठीयों में तो घोडी चढ़ के तो दुल्हन नहीं लाते, हम तो बग्गी में लाये थे. इसलिये उसे कहा की मेरे पंजाब दे पुत्तर, तूने तो अभी अभी घोड़ी चढी थी, तो तु बता कैसे उतरे.

वो क्या बोलता, रुआंसां होते हुए बोला, चढने का तो एक्सपेरियेंस है, मगर उतरने का नहीं.अच्छा हुआ कि उसने ये नहीं कहा कि नाचने वाली घोडी का ए़क्सपेरिएंस है.

अब हमारी भगवान को याद करने की फ़ोर्मेलिटी करने की बारी थी.शायद उसे भी हमारे दया आ गयी होगी, बॆकग्राउंड में गाना तो नहीं बजा,कि मेरा तो जो भी कदम है, वो तेरी राह में है, के तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाहों में है.
खरामा खरामा घोडे़ रुक गये , और पहली फ़ुर्सत में हम दोनो घुड़सवार से ज़मीनदोस्त हुए.हम बस्ती से दूर निकल आये थे, मगर इस बात का शुक्र मना रहे थे कि हमारी बेटर हाफ़ जोडी़ होटेल से दूर नहीं थीं, तो उनकी चिंता नहीं थी.

बस क्या था, हम दोनों जय और वीरु की तरह चलते चलते ये गीत याद करते करते, गुनगुनाते हुए होटल पहुचे कि-

तू कहां , ये बता, इस नशीली रात में ,
माने ना मेरा दिल दिवाना ,हाय रे...


होटल पहुंच कर सबसे पहले हमने अपने अपने डाग़ चेक किये और फिर पिल पडे़ उस घोडे़वाले पर जो हमारी राह देख रहा था.
उसकी भी हालत पतली थी, क्योंकि उसके घोड़े तो अभी भी गायब थे.

हमने तो सबसे पहले उससे जवाब तलब किया कि ऐसे कैसे घोड़े दे दिये तूने, कि हम अपनों से जुदा हो गये.

पता है उसने क्या कहा? हाय रे ,फिर वही संयोग..

मित्रों ,वे घोडे़ जय और वीरू नहीं थे, मगर वीरू और बसंती थे...


और इसलिये साथ साथ थे कि प्यार किया तो ड़रना क्या ?प्यार किया कोई चोरी नहीं की.आयी बात समझ में?

(बाद में होटल छोडने तक कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नही मिली की दो हंसो के जोडे़ को बिछड़वाने वाली उस घोडा़ घोडी़ की जोडी़ का क्या हुआ. हमारा तो हनीमून खतम हुआ, मगर शायद उनका चल रहा होगा!!)

आज इस घटना को याद करते करते हम दोनो अपनी अपनी घोडी़ पर चढ़ कर, माफ़ किजिये कार में चढ कर घर को लौटे.

अब बस , सोचा आपसे क्या छिपाऊं, तो हाले दिल बयां कर दिया.

दिल क्यों चहका रे चहका आधी रात को, बेला महका रे महका आधी रात को,

मगर अकेलेपन के एहसास में ऐसे कई गीत दरवाज़े पर दस्तक देने लगे जैसे- अकेले है चले आओ.. रफ़ी साहब , मुकेश,तलत आदि ने मेरे इर्दगिर्द जमावडा़ कर लिया और मुझे सांत्वना देने लग गये.

वही गीत,जो पहले कभी रिकोर्ड किया था, आज यहां लगा देता हूं.

तू कहां , ये बता, इस नशीली रात में ..

लगाऊं या ना लगाऊं ? चलो लगा ही देते हैं... दिल ही तो है..

6 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पहले तो डबल, नहीं ट्रिपल बधाई. किस्सा सुनकर तो मज़ा आ गया. खुदा का शुक्र है कि वे आतंकवाद से पहले के दिन थे. नशे की बात पर याद आया, "नशा शराब में होता तो नाचती बोतल." अरे नशा तो खुशदिल दोस्तों की संगत का होता है और लोग समझते हैं कि शराब का है.

Anonymous said...

एक दिलफ़ैक बयानी के लिये शुक्रिया.
भाभी जी खुशकिस्मत हैं जो उन्हें आप
जेसा सुरीला,जाँबाज और बहूमुखि प्रतीभा(इंजिनियर,लेखक,कवि,गायक,संगीतकार)
का धनी धनी (राजस्थान में धनी यानी पती)मिला हे.

kunal said...

गाना याद आ गया....
तु जहा जहा रहेगा मेरा साया साथ देगा.
व्यक्तिगत जिवनयात्रा का ऐसा मनोहारी चित्र(वह भी सच्चा)
कभी कभी ही पडने को मीलता हे.

राज भाटिय़ा said...

दिलीप जी आप को शादी की साल्गिरह की बहुत बहुत बधाई, बाकी आप का लेख पढ कर ओर सुंदर सुंदर चित्र देख कर बहुत अच्छा लगा.
धन्यवाद

Anonymous said...

दिलिप के दिल में दिलिप और प्रदीप दोनो समाए हुए हौं क्या बात हे.गजब सर ग्जब.कीतनी चेतनता से आप पुराने नए सारे कलाकारो को अपनी आदर्राजलि देते रेते हें.पन्ना खोला नही कि महान लोगो के दर्शन कर जाते हे.भधाई.

Anonymous said...

इन्दोर में आज एक पोग्राम रफ़ी पर सुना . नवरंग नाम की नयी संस्ता ने किआ था. कोई मुकेश बूदेला ने गाया अकेले.आपकी भहुत याद आई.इन्दोर के रफ़ी तो सच्ची आप ही हो सक्ते हें.
कास आप उस पोग्रोम में होते .तू कहा आज वही पोग्राम से आकर सूना आपकी आवाजे में ..क्या बात हे.

सुनील करंदीकर

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