कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया....
आज अभी तक दिल ग़मगीन है, दो तीन दिनों पहले के घावों की टीस अभी तक मन से रिस रही है. जैसे जैसे और मुम्बई की घटनायें सामने आ रही है,उन अपनों के बारे में पता चल रहा है,जो पिछले दिनों में इन आतंकवाद के दानव की भेंट चढ गये.उनके साथ बिताये पलों की, क्षणों की याद जो खिलते हुए फूलों के मसलने की दास्तान बयां कर रहीं है.वे नजदीकी अपने , जो रब से ये भी पूछ पाने की स्थिती में अभी नहीं है, कि उनके साथ ही ऐसा क्यूं हुआ, जब काल नें अपने क्रूर हाथों से उनकी बगिया की महकती फ़ुलवारी को उजाड़ दिया.
किन किन की अफ़सुर्दा-दिली बयां करूं, किस किस का दर्द भरा अफ़साना सुनाऊं और जब वे बार बार सामने याद आते है, तो मन उन जाने पहचाने चेहरों की याद भुला नहीं पाता है, जो अक्सर मुम्बई प्रवास में मिलते रहते हैं, या अब भारी मन से कहें ............थे.
अब वे कभी नहीं मिलेंगे.
किसीने अपने ब्लोग पर खूब लिखा है(सौरभ कुदेशिया-http://satat-vichar-manthan.blogspot.com/2008/11/blog-post_29.html) कि मेरे परिवार के १३० लोग मरे है,मौत हो गई है मेरे घर में.
पता नहीं क्यूं ये सवालात जेहन में टकरा रहे हैं कि ये कब तक? आज एक गाना ना जाने क्यूं लबों पर बार बार आ रहा है.
चलो वह गीत आपके को भी सुना देता हूं- हवा में ठंडक बढ गयी है, फिर भी उद्वेलित विचारों की तपन , आंच दिल को जला रही है. सूखे टहनीयों के जलने से चटखने की आवाज़ें बढ गयी है.
इस गीत को बिना साजो सामान के , बिना किसी भूमिका के सुना रहा हूं. वाओलीन ,हार्मोनियम, तबला आदि की आवाज़ कमज़ोर पड़ गयी है, बंदूकों के , गोलीयों की आवाज़ के सामने.सिर्फ़ मैं, मेरी तनहाई, और सर पर पंखे की गिरघिर.. जो हृदय में शूल उत्पन्न कर रही हैं- आंसूंओं का सैलाब थमने और थामने का जतन चल रहा है कि गीत को भी दो तीन बार में रेकॊर्ड करना पडा़.
आप चौंक गये होंगे, एक अनहोनी सी बात, दूर दूर तक का कोई नाता नहीं.
मगर अभी मैं जिस हादसे से गुज़रा और उससे निकल पाया, वह भी एक बताने वाला वाकया.अपनी संगीत बिरादरी के साथ बांटने जैसी.
आप से कहा था कि आशा भोंसले के उपर कुछ लिखूंगा तो नही लिख पाया. आप भी कहते होंगे, गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया...मेरे व्यवसाय की वजह से मुझे यकायक कूच करना पडता है.इन्जिनीयरिंग के जो प्रोजेक्ट चल रहे है, उनका तकाज़ा है.
अभी किसी काम के सिलसिले में मुझे एक बेहद अल्प प्रवास पर दोहा और अबु धाबी जाना पडा. दोहा (कतर) के एयरपोर्ट के काम की वजह से, लौटते समय अबु धाबी में विमान बदलनें के लिये उतरना पडा, तो कस्टम चेकिंग की औपचारिकता चल रही थी.
हमारा जब चेकिंग चल रहा था , तो एक अरब अफ़सर मेरे पास आकर मुझे जबरन अंदर ले जाने लगा. मैनें पूछा यह क्यों? तो पता चला कि कुछ आतंकवादीयों की तलाश हो रही थी, और शायद मेरे नाक नक्श और डील डौल की वजह से मुझे भी हिरासत में ले लिया गया.
अंदर कुछ 7-8 व्यक्ति और थे हिरासत में, और सघन पूछ्ताछ चलने लगी. सबके सामान को खोल कर जांचा जाने लगा.
मेरे पास तो क्या था, कुछ ज़रूरी व्यक्तिगत सामान, और हमेशा की तरह मेरा लॆपटॊप एवम कुछ सी डी , अपने प्रोजेक्ट की और कुछ गानों की- मुकेश और मन्ना दा.
जब कुछ नही मिला तो उन्होने अपना मोर्चा सी डी की तरफ़ खोला. कहा की बता दो, अभी भी मौका है , या तो कोई एटोमिक विषय पर कुछ गलत जानकारी हो या फ़िर पोर्नोग्राफ़ी की फ़िल्में. मैने बेझिझक कहा, कुछ नही है, ये तो गानों की सीडीयां है, मुकेश और मन्ना डे पर. संयोग से , मुकेश की एक किताब भी निकल आयी, जो मै अभी पढ रहा था. वह बोला,ये तो सभी कहते है, बाहर कुछ लिखा होता है, अंदर कुछ.
यह सब देख कर उसने अपने वरिष्ठ अफ़सर को बुलाकर यह सब दिखाया.उसके nameplate पर ओमर अब्दुल्ला नाम पढ पाया मैं . उसने बडे रूखे अंदाज़ में पूछा- What Mukesh ?
मैने समझाया- कुछ मुकेश के बारे में तारीफ़ के पुल बांधे, और किताब दिखाई. उसने सीडी चेक करने का आदेश दिया.
मेरा blood pressure बढने लगा, अगले विमान से निकलना जो था . उनसे बिनती की, मगर वे टस से मस नही हुए.
संयोग से सबसे पहले उनके हाथ में लगी कुछ साल पहले रिकॊर्ड की गई मुकेश के गीत पर मेरे आवाज़ के गानों की सीडी, और पहला गीत था - सारंगा तेरी याद में.
वह सिनीयर अफ़सर बैठ गया, बडे गौर से सुनने लगा.मैने कहा- अगली सीडी लगाऊं? उसने कहा- No, continue this.
मैं गरीब ,आशा की कुछ किरण के इंतेज़ार में रुक गया. आज संगीत की सेवा का फ़ल शायद मिल जाये यह दुआ करने लगा.
फ़िर आया गीत- ये मेरा दीवानापन है..
वह भी सुना पूरा. अब मैं आश्वस्त सा हो चला था कि मुकेश या इन मेलोडी भरे गीतों पर मेरा मर मिटना मेरा दीवानापन नही है शायद. इधर समय बीत रहा था. किसी ने कहा - आंखों की पुतली का टेस्ट भी लेना बाकी है अभी. पर ओमर अब्दुल्ला था जो बेगानी शादी मे दिवाना हुए जा रहा था.
अगले गीत - सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं को सुनने के बाद वह चौंक कर उठा,समय ज़्यादा हो गया था शायद और ज्युनियर के कान में कुछ फ़ुसफ़ुसा कर निकल गया. कुछ शब्द मेरे कानों में पडे - मुकेश .. बंदा..
मैं अगले दिव्य की प्रतिक्षा में अपने आप को मज़बूत करने लगा.मगर उस ज्युनियर अफ़सर नें बडे शालीनता से कहा- You may go now!!
मैं चौंक पडा, भगवान को बार बार शुक्रिया कहा और उस अफ़सर को भी , उस फ़रिश्ते ओमर अब्दुल्ला को भी. पूछ ही बैठा - यह क्या चमत्कार है?
तो वह बोला- He said यह मुकेश का बंदा है, यह मुज़रिम(दहशतगर्द) नही हो सकता !!!इसे छोड दो....
मैं चकित था, मेरी आंखों में अश्रु उतर आये थे, कितनी बडी बात कह गया वह बंदा, और कितने बडे उपकार किये मुकेशजी नें मुझ पर!! पलकें झपका कर मै आंसू सुखाने के असफ़ल प्रयास में लग गया.
मेरी वह सभी सीडीयां प्यार से ’जप्त’ कर लीं गयीं, और मुझे छोड दिया गया. खुदा का शुक्र था कि मेरे पास लॆपटॊप में थे वे गाने.
बाद में पता चला कि जनाब ओमर अब्दुल्ला साहबनें हैदराबाद से एल.एल.बी किया था और मुकेश के दिवानों में वे भी शुमार थे!!!
आगे कुछ भी लिखने की , कहने की गुंजाईश ही नही है. मेरे मन को आपने पढ ही लिया होगा. आप के मन में उठती बातें आप लिख सकें तो मुझ पर करम और मुकेश जी पर आपके प्रेम की बानगी..
सारंगा तेरी याद में.. मुकेश ( मूल गीत नहीं )
कहने कि ज़रूरत नहीं की विमान में बैठ कर मैं यह गाने लगा..
किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है.
बहुत कुछ पाया है इस ज़िंदगी से.
संगीत,रंगकर्म,चित्रकारी,फोटोग्राफ़ी में किये अव्यावसायिक प्रयोग और व्यवसाय में वास्तुशास्त्र, इंजिनीयरींग और मॆनेजमेंट के कुछ भुगते ,कुछ आज़माये फ़ंडे.
कुछ इहलोक की कुछ परलोक की.
कुछ आत्मा की, कुछ परमात्मा की..
कुछ पायें , कुछ लौटायें..