Sunday, November 2, 2008

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा ....

कड़ी - १
३१ अक्टूबर को पद्मश्री सचिन देव बर्मन की ३३ वीं पुण्यतिथी के दिन सारे दिन उनके गीतों को सुनता रहा, अपने मन की गहराई तक उन रचनाओं का आस्वाद लेता रहा जो हमेशा गाहे बगाहे कानों पर पड़ते तो ज़रूर थे, मगर सुकून से एक साथ
सुने नहीं गए.

उन्हे सुनने का अवसर भी बड़ा ख़ास इसलिए था, क्योंकि एक साथ जब हम उनके रचे हुए गीतों को सुनते है तो तब जाकर पता चलता है, की उनके सभी गीतों में कितनी विवि्धता थी, कितना माधुर्य था, कितनी वेदना थी.

सचिन दा निसंदेह सुरों के एक ऐसे चित्रकार थे जिन्होंने अपने हर पेंटिंग में अलग अलग विषयों पर अलग अलग रंग बिखेरे. उनके ब्रश के स्ट्रोक्स , उनका टेक्सचर , और ग्राफिक्स की विविधता उनके हर गाने में नज़र आती थी या सुनाई देती थी.

हिन्दयुग्म के आवाज़ पर सचिन दा पर एक पोस्ट लिखी तो सहजता से उनके गानों की सुरमई धुंध में मैं खोता चला गया.

मन ही नही भर रहा था. सोचा कुछ अपने यहाँ भी लिख उनको एक बार और श्रद्धांजली देकर, इज़हारे अकीदत पेश कर ,उनके संगीत से जो आज तक आनन्द लूटा है उसका कुछ क़र्ज़ तो उतार ही दूँ, भले ही अंश मात्र ही सही.

पिछले दिनों सिने संगीत को समर्पित हर एक ब्लॉग साईट पर आप पायेंगे इस महान संगीतकार पर कुछ ना कुछ लिखा हुआ , और साथ ही पायेंगे उनके ढेरों सारे गीत उनकी आवाज़ में भी. एक जगह की कमी बेहद खल रही है. श्रोता बिरादरी की जाजम इन दिनों बिछी नही किसी कारण वश. हर सू फैले दिवाली के प्रकाशमय उजियाले में इस प्रेरणा स्रोत सुरमई शमा की अनुपस्थिती ने सचिनदा के दर्द भरे गीतों से उपजी अफ़सुर्दा दिली और भी बढ़ा दी. आवाज़ दे कहां है....?

हमें कोई ग़म नही था ग़मे आशिकी से पहले ,
ना थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले...


सचिनदा के लिए काम करने के लिए बड़े बड़े गायक और गायिकाएं तरसते थे क्योंकि उनके गले की तासीर या Timbre का अचूक उपयोग वे करते थे. सेन्स्युअस गीत में आशा और गीता दत्त की आवाज़ के नैसर्गिक आउटपुट से आगे जा कर अपना एक ख़ास आउटपुट निकालने में माहिर थे. आज सजन मोहे अंग लगा ले, में मादकता का एक Undercurrent , पखावज़ की लय के मिश्रण से अद्भुत प्रभाव उत्पन्न कराते थे. वैसे ही कुछ प्रभाव उन्होंने रात अकेली है गीत में ढाला था , जिसका कान में फुसफुसानें का अलग अंदाज़ बेहद लोकप्रिय हुआ था.

भक्ति युक्त प्रेम भाव हो या संपूर्ण समर्पित अनंत आध्यात्म हो , या फिर अल्हड़ सी शोख़ सी यौवन की छुपी हुई भावाभिव्यक्ति हो , लता के पारलौकिक गले से वे रस उत्पत्ति कर हमें नवाज़ते थे ऐसी ऐसी सुरीली बंदिशों से कि हम उनके सुर सागर में डूबते तैरते बहने लगते है , और कहने लगते हैं कि कोई ना रोको दिल की उड़ान को , आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फ़िर मरने का इरादा हैं .

रफी हों या मन्ना दा, या किशोर , मुकेश , तलत अपनी अपनी जगह पर ही गाते थे उनके लिए.किसी भी गाने का मूल तत्त्व जिस पाये का होता था उसी पाये की आवाज़ वे अपने गाने के लिए लेते थे. हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए के रफी और दुखी मन मेरे के किशोर में दर्द की अभिव्यक्ति का फरक सिर्फ़ वे ही बखूबी कर सकते थे.

I am just listening to araay of his sweet and enchanting songs! What a pure , unadultrated mix of symphony & Melody !!

His music breathes of fresh born flowers, his songs are nestling places of whistling birds, tinkling bells and sobbing flutes, his orchestral creations contain both lyric and epic sweeps of design blended in such rare harmony of which only a composite genius like him is capable -- a genius who breathed music, dreamed music, lived music all his life.


उनके निधन पर दी गयी श्रद्धांजली पर कुछ अंश किशोर दा पर मेरी पिछली पोस्ट में भी आप सुन सकते हैं.

उनपर भारत सरकार नें भी सन २००६ में एक डाक टिकट निकाल कर उनका सन्मान किया था .

गायक के रूप में आराधना के गाये गीत सफल होगी तेरी आराधना पर राष्ट्रीय पुरस्कार १९७० में, और ज़िंदगी ज़िंदगी फ़िल्म में संगीत निर्देशन के लिये भी प्राप्त किया था.फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड़ भी फ़िल्म टॆक्सी ड्राईवर के लिये १९५४ में भी प्राप्त किया.

शास्त्रीय संगीत पर उनकी पकड़ भी क्या खूब थी जनाब. गाईड़ में लता के गाये गीत पिया तोसे नैना लागे रे में उनका कमाल सुनने लायक था. रूपक ताल में निबद्ध किये गये इस क्लासिकल गीत में सचिन दा के संगीत के विज़न का दर्शन होता है और भावनाओं की अभिव्यक्ति का ,Visual Feel का अहसास होता है.

इसके लिये तो लगता है मुझे एक और पोस्ट लिखना पडे़गी. (बुधवार को ज़रूर)

तलाश फ़िल्म में भी तेरे नैना तलाश करें में मन्ना डे की अप्रतिम गायकी के साथ सुरों का संयोजन और साथ में मृदंग या पखावज़ का तबले के साथ अनोखा मेल उनके सुजनशीलता की इन्तेहां थी. इन्टरल्युड़ में सरोद , सितार और बांसुरी,के साथ कहीं कहीं तार शहनाई तो कहीं कहीं ताल तरंग का भी बडे़ ही अधिकार पूर्वक उपयोग किया गया है.

यह गीत पहले बिरादरी पर जारी भी हो चुका है.

तो आपसे इजाज़त लेकर अपनी एक तमन्ना पूरी कर लूँ?

यह गाना पिछले दिनों यहाँ स्टेज पर गाया गया था . मन्ना दा को समर्पित एक पूर्ण कार्यक्रम -दिल का हाल सुने दिल वाला - में स्टेज पर प्रस्तुत गीत का विडियो देखें और सुने. गायक यहाँ नगण्य है. उसकी मस्ती का , सुरों के नादब्रम्ह का आप भी अनुभव लें.

मन्ना दा जैसे हिमालय को नापना किसी भी गायक के लिए मुमकिन नहीं ये बात तय है दोस्तों. मगर वादक कलाकारों के कौशल को सुन दाद ज़रूर दें , क्योकि सभी कलाकारों ने अपने अपने स्तर पर अपना रोल बखूबी निभाया है. एक ही की बोर्ड पर सभी वाद्य - सितार, ताल तरंग, तार शहनाई, सरोद, बांसुरी और क्या क्या. मृदंग नहीं था तो एक हाल में तबला और दूसरे पर ढोलक लेकर इफेक्ट पैदा किया है.

अगले रिलीज़ : -
कड़ी - २ - पिया तोसे नैना लागे रे ... मेराथोन गीत का सुरीला विवेचन
कड़ी - ३ - सचिन दा, गुरुदत्त,साहिर,हेमंत कुमार से जुडी एक कॉमन स्मृति विशेष (पिछले महिने की श्रद्धांजली)

7 comments:

सागर नाहर said...

बहुत सुन्दर.. सच्ची श्रद्धान्जली।
दिलीप भाई की आवाज में गीत तेरे नैना भी बहुत अच्छा लगा। आपकी आवाज में और भी बढ़िया गीतों का इंतजार है।

चतुर सुजान said...

ऐसा प्रतीत होता है कि आप अपने बारे में काफ़ी आत्म मुग्ध हैं

kadva said...

accompanists are extremely great

दिलीप कवठेकर said...

शायद चतुर सुजान ठीक कह रहें है. आत्ममुग्धता अच्छी नहीं.

कोशिश की कि कुछ लिखूं , फिर लगा कुछ गाऊँ , फ़िर लगा जो गाया उसकी जुगाली करुँ. अतः यह आखरी बार विडियो लगाया, तो भी आपने पकड़ लिया. याने दिलीप के दिल ने जो चाहा वह किया.

चलो , अब नहीं लगायेंगे साहब , लिखना तो जारी रखें?

आत्ममुग्ध said...

दिलीप जी , ये ज़ुल्म ना करें तो अच्छा.

लगता नहीं कि यहां कोई आत्ममुग्धता की कोई बात है.चतुर सुजान जी , कहीं कोई गलती हो रही है. लेखक नें गायक का नाम तक नहीं लिखा.

सचिन बर्मन के बारे में इतना अच्छा लिखा वह नज़र नहीं आया, और आप एक अच्छे लेखक और गायक को दुखी कर दिया.

आप इतनी सारी ब्लाग देखे तो हर कोई लिख रहा . अपने कविता, अपने विचार ,अपने जीवन की घटना, तो ये भी सही.

लगे रहो दिलीप भाई , पुरे कार्यक्रम को भी दिखाए तो खुशी होगी.

Aarohi said...

आपका लेख अच्छा लगा.अंग्रेजी में भी खूब लिखते है. दूसरी कड़ी कब लगायेंगे, आज बुधवार है.

गाना बड़ा कठीण है गाने के लिए. आपण बेहद अच्छा निभाया है. साथ में बैठे भी झूम रहे हैं तो हम क्या?

हमें इंतज़ार रहेगा कब आप नया गीत सुनाते है या लगाते है.

आपके साथ कौन है? प्रियाणी ?

kunal said...

आपको गाते देखना जैसे कीसी सदचीताअनंद में रह्ने वाले सूफी से मीलना हे.कमेंटरी करनेवाले जो व्य्क्ती आपके साथ बेठे हे थोडी हडबडी मे लगतेहे.कोईखास भूमीका नही बना पाए वेआपके इतने प्यारे गीतकी.अगला गित जरुरसे लगाना और कमेट्री के बीणा.just clicked the older post after reading your indepth review on piya tose nainaa lage re.what a masterpiece work you have done.pleasure to visit your blog.it's sad that I do not have the skill to write a blog...just a music lover keen to listen and read.compliments.

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