Thursday, January 29, 2009

चैन से हमको कभी, आपने जीने ना दिया... ओ.पी.नय्यर ..



रिधम किंग - ओ.पी. नैय्यर ,
कडी़ - १
-

कल उनकी पुण्य तिथी थी, २८ जनवरी को. अभी अभी दो साल ही तो हुए उन्हे हमसे बिछडे़.

फ़िल्मी संगीत की सुरीली दुनिया में कई संगीतकार हुए, जिन्होने अपनी अपनी प्रतिभा के बल पर हम संगीत प्रेमीयों को दिये नायाब खज़ानों की शक्ल में अलग अलग रागों में, emotions और संवेदना लिये हुए ढाई तीन मिनीट के गीत. जिनमें आप पाते है उस गाने का थीम या बेसिक खयाल, उसकी फ़िल्म में पूर्वपीठिका या वर्तमान स्वरूप, ज़ज़बात, मूड्स,मुख्त़सर से भावपूर्ण बोल जो गीतकार या शायर के जीनीयस मन की गहराई से निकले हैं, नवरसों को अपनी गिरफ़्त में लिये स्वरावली, गायक या गायिका का मेलोडी से भरपूर सुरीला अंदाज़, और सबसे महत्वपूर्ण उस संगीतकार के अपने SIGNATURE!!!

निसंदेह इतने सारे संगीतकारों में अपना अपना एक जुदा स्वर संयोजन होता है, जो अच्छे सुनकार बखूबी पहचान लेते है.ऐसी संगीतकारो की फ़ेरहिस्त में ओंकार प्रसाद नैय्यर का नाम शीर्ष पर है.

आपने सुना ही होगा उनकी रचनाओं में एक स्थाई भाव है हर गीत की रिदम. शास्त्रीय संगीत की कोई तालीम नही होने के बावजूद, उनकी पकड़ चलत वाले रिदम के गानों पर कितनी थी ये बताना नही पडेगा.इसीलिये उन्हे फ़िल्म इंडस्ट्री में रिदम किंग कहा जाता है.

पंजाब की नदियों के धारों सी अठखेलियां करती हुई ढो़लक की खींचती खींचती थाप,
(सुभानल्ला हसीं चेहरा, लेके पहला पहला प्यार, आईये मेहरबान,वो हसीन दर्द दे दो जिसे मैं गले लगा लूं...)

या तांगे में बैठ कर घोडों की टापों की लयकारी ,
(पिया पिया पिया मोरा जिया पुकारे, मांग के साथ तुम्हारा, ज़रा हौले हौले चलो मेरे साजना..)

या पाश्चात्य बीट्स से तली हुई हौले हौले आंच पर सीकी हुई ताल
(जाईये आप कहां जायेंगे,बंदा परवर थाम लो जिगर, मैं प्यार का राही हूं,ए दिल है मुश्किल जीना यहां....)

आपको नैय्यर साहब के हर गीत में मिल जायेगी. साथ में सारंगी की मींड भरी फ़ुहार, या क्लेरोनेट और म्य़ुट ट्रम्पेट की जुगलबंदी या सितार और फ़्ल्युट की बिजलियां एक जगह हो जायें तो नैय्यर की जादूगरी का कमाल आकार ले्ता था और हिस्ट्री बन जाती थी.(दीवाना हुआ बादल..)

क्या आपको सुनकर आश्चर्य नही होगा, कि सुबह की ओस की बूंदों के स्वर लिये गीत - आपके हसीन रूख पर में जहां पाश्चात्य संयोजन के लिये पियानो का उपयोग किया गया है, इंटरल्युड और अंतरे के संगम पर पृष्ठभूमि में कहीं पीछे आपको सारंगी का हलका हलका कंटिन्युटी नोट मिलता है, जो कमाल का है!!! ( ज़रा कान लगा कर सुनिये )

फ़्ल्युट का स्थाई स्वर तो है ही!!!

रफ़ी साह्ब के हसीन गलें से निकले इस नायाब मधुर गीत में आपको हर जगह बला की कशिश और शोखियां मिलेंगी और शबाब की बिजलीयों का अंडर करंट स्वरों की सुकून भरी तरन्नुम में आप यूं नहायेंगे जैसे कि सुबह सुबह किसी कुनकुने झरने से स्नान कर के आ रहे हों...


आज इस कडी़ में मैं एक अजीब सा संयोग बताना चाहूंगा जो दो साल पहले १६ जनवरी को उनकी जन्मतिथी पर घटा था.

मैं उस दिन मुंबई में था काम के सिलसिले में, और साथ ही मेरे बडे़ भाई साहब सुरेंद्र भैया के लडके अंकित को हिंदुजा अस्पताल में भरती किया गया था ब्रेन सर्जरी के लिये.सर्जरी के दूसरे दिन सुबह मैं और मेरे भैय्या अस्पताल के बाहर के किसी अच्छे रेस्टोरेंट में नाश्ता करने गये.

साथ ही के टेबल पर दो ६० के लगभग की उम्र के व्यक्ति बैठे थे और चर्चा का विषय था - ऒ पी नैय्यर . उन्होने बातों ही बातों में बताया कि उस दिन नैय्यर साहब का जन्म दिन था और वे बाद में उनसे मिलने उनके घर जा रहे थे.(वे हर साल जाते थे).

मैंने उत्सुकतावश कहा कि मैं भी जाना चाहूंगा, अगर उन्हे ऐतराज़ ना हो. उन्होने हर्ष से स्वीकार किया और हम निकले उनके नये ठिकाने थाना में , जहां वे विरार के बाद रहने आये थे.

दिल की धड़कनों को जब्त करते हुए जब हम उस घर की सीढी़ से उपर चढने लगा तो फ़िज़ा में संगीत की स्वर अणु बिखरे होने सा आभास मुझे होने लगा. ( य़े मेरा दिवानापन है, या मुहब्बत का सुरूर, कोई ना पहचाने तो है ये उसकी नज़रों का कसूर)

मैं रास्ते भर में लोकल में और फ़िर रिक्शा में उनके गीतों को गुनगुनाता आ रहा था, और नैय्यरमय हो गया था तब तक.

लेकिन खुदा को ये मंज़ूर नहीं था कि मेरा उनसे मिलने का सपना सच हो.वहां, जिनके घर में सबटेनेंट बन कर वो रह रहे थे उस युवा महिला में हमसे कहा कि वे अब किसीसे भी नहीं मिलते, और खासकर उनके जन्म दिन पर. इसलिये वे तारापोर के आदिवासी इलाके में सुबह से ही निकल गये है, जहां वे एक होमियोपेथी का क्लिनीक सा चलाते थे.

बडे ही मायूसी से उनके दर से हम निकल पडे़. जाते जाते उनके कमरे की खुली खिडकी में से उस रूम को देखा- कहीं कोई संगीत का साज़ या फ़िल्मी दुनिया से जुडी कोई यादगार ट्रोफ़ी या चित्र नदारद थे, सिर्फ़ टेबल पर पडी थी उनकी एक टोपी - जैसे के ज्वेल थीफ़ में देव आनंद नें पहनी थी.

उस टोपी को खामोशी भरा सलाम करते मैं सीढी उतर गया - ये गाते गाते -

चैन से हमको कभी, आपने जीने ना दिया...
ज़हर भी चाहा अगर पीना तो पीनी ना दिया....

बस दो हफ़्तों बाद अचानक ये खबर से सामना हुआ-

प्रख्यात संगीतकार ओ.का निधन............

18 comments:

Anonymous said...

आपके लीखने और गाने मे जो मस्ति है तो कभी कभी खस कर ये पोस्ट पढ़ते हुए लगा कि काश आपको ओपी के संगीत निर्देशन में गाने का मोका मिलता तो ? क्या अदभुत घटना होती वह. वैसे बताइये तो यदि आपको गाने का मोका मिलता तो रफ़ी का कोनसा गीत आप ओपी के डायरेक्सन में गाना चहाते

sk

Udan Tashtari said...

ओपी साहब की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए एक बेहतरीन आलेख. आभार.

दिलीप कवठेकर said...

ये मेरा सपना तो था ही.

वैसे मैंने फ़िल्म काश्मीर की कली का ये गीत कई बार गाया है- रफ़ीजी का मस्ती भरा अंदाज़ अपने शीर्ष पर है यहां, जिसे शम्मी कपूर नें अपनी मस्तानी रवानी में अभिनीत भी किया है पर्दे पर-

ये चांद सा रोशन चेहरा,ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा..

मगर मौका मिले तो मैं ये गीत गाना चाहूंगा जो All Time दर्द भरे गीतों की फ़ेरहिस्त में काफ़ी अगले क्रम में मैं रखता हूं -

ये दुनिया उसीकी, ज़माना उसीका,
मुहब्बत में जो हो गया किसीका..

कोशिश करूं इसे ट्रॆक पर सुनाने की?

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने ..गाने भी बहुत बढ़िया लगे ..आपकी आवाज़ में सुनना अच्छा लगेगा
ये दुनिया उसीकी, ज़माना उसीका,
मुहब्बत में जो हो गया किसीका..

इन्तजार है इस गीत का आपकी आवाज़ में ..

मैथिली गुप्त said...

कठवेकर साहब, ये दुनियां उसी की ज़माना उसी का तो मेरा बेहद पसंददीदा गीत है, हम आपके ट्रेक की प्रतीक्षा करेंगे.

Anonymous said...

दिलीपजी
दुआ कुबूल कीजिये.
आप दिल को तसल्ली देने का पुण्य बटोर रहे हे जनाब.मुझिकल लीखना क्या होता हे ये आपके ब्लाग पर आकर महसूस होता है.मेरी जुबान मराठी होने से यहा वर्तनि की गलति हो रही हे कुपया माफ़ करे.
पूरे ब्लाग पर घूम आई.सबसे अच्छी बात वह लगी जीसमे लोगो ने कमेंट में कहा है कि दिलीप जी के सुर सीर्षक सेऐसा बाग तैयार होगा चाहिये की जिसमे सीर्फ़ आपकी आवाझ हो.आज बसत पचंमी हे सरस्वती को सुर का नेवेध्य लगाइये न.

नंदिनी कुलकर्णी,लोकमान्य नगर,इन्दूर

Old Monk said...

Superb job once again. What appropriate selection of words, anecdores and choice of mood elevating music pieces.
One small request.
In addition to the originals that you incorporate, pl also include some selected songs IN YR OWN VOICE.
Very few people are blessed with the duel gift of words and voice. You being the chosen one, should (or MUST) make the best use of this unique talent.
We now look forward, to at least one piece/blog, in yr voice.
Gaye Chale Ja.

अल्पना वर्मा said...

Dilip ji..aap ka sansmaran padha..

'chain se hum ko kabhi 'ka track mere paas hai--kuchh din pahle ,main ne yah geet record kiya tha..aap ko bhej deti hun..agar chahen to..

अल्पना वर्मा said...

'karaoke track '-chain se hum ko kabhi--agar chahen to bhejun?

Anonymous said...

missed two things on your sweet blog:
suraiya's photo on your side bar (death anniversary 31st jan)
some great post on vasant which has great releation with music,words and no doubt our great dilip jee.

expecting you at vibhavari's show on 31stjan at davv hall....what a great performance it was by the simple and cool singer.she hi-jacked show from everyone i.e.the musicians,co-singers and the commentry.missed you a lot.
sk

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सुंदर गीत, सुंदर संस्मरण. आप वाकई नसीब वाले हो! गानों का इंतज़ार रहेगा.

anitakumar said...

wow- Dilip Sahab your styleof presentation is excellent...all songs that you have mentioned are eevergreen songs, har dil ki dhadhkan

महावीर said...

बहुत ही प्रभावशाली लेख है। नैयर जी के इस संस्मरण को पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे अपने युवा काल में पहुंच गया। एक ऐसा संगीतकार जिसने लता जी के बिना भी अपनी कला के बल पर लोगों के दिलों पर राज किया। धूम मच गई थी उनके संगीत की!

Harshad Jangla said...

दिलीपभाई
फ़िर एक बार आपने साबित कर दिया की आपके पास माहितियोंका खजाना है, आपकी कलम में वो खूबियाँ है जो बहुत कम लोगों के पास मिलती है, आपकी शब्दावली सशक्त है | अब बात रही आपकी आवाज़ की तो यह तो आपको रफी साब का वह कश्मीर की कली वाला गीत सुनवाना ही पडेगा साब |
अत्यंत रसप्रद लेख |
दिलसे धन्यवाद |
-हर्षद जांगला
एटलांटा , युएसए

Science Bloggers Association of India said...

ओ पी नैयर साहब पर मैंने हिन्दी में पहली बार कोई लेख पढा। पढ कर उनके जीवन के विविध पहलुओं काज्ञान हुआ, आभार।

डुबेजी said...

wah dilip ji aap ko bahut bahut badhai itne shandar blog ke liye . mein sangeet ka diwana hoon aur apke blog ka bhi ho gaya.

Anonymous said...

16 COMMENTS ON ONE POST ! IS IS NOT AMAZING....DIL KEHTA HAI ..SAANCH KO AANCH NAHI...I WOULD LIKE TO CALL YOU DILIP MUSIC ENCYCLOPEDIAWALE...SALUTATIONS
SK

anitakumar said...

्जो गाना मैं सुनना चाहती थी वो तो यहीं था, इसे सुनवाने के लिए धन्यवाद्। वैसे सभी गाने मेरे मनपसंद गाने हैं क्या सुनु और क्या छोड़ूं?

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