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आज स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जन्म दिन है, और मन बडा ही गुले गुलज़ार हो रहा है, बौरा रहा है, क्या सुनूं, क्या सुनाऊं, कुछ भी समझ नहीं आ रहा है.
अभी कल ही जन्मदिन पूर्व संध्या को हमारे मित्र सुमन चौरसिया नें यहां प्रेस क्लब में लता जी का जन्म दिन मनाया और केक काटी. प्रसिद्ध संगीत समिक्षक अजातशत्रु भी मौजूद थे, और इस अवसर पर कुछ ऐसे संगीत के दिवानों का भी सन्मान किया गया जिन्होनें पिछले कई वर्षों से संगीत की किसी ना किसी तरह से सेवा की है, साहित्य या पत्रकारिता के ज़रिये.
हमारे सभी के लाडले भाई यूनुस खान का भी सन्मान किया गया. उनकी मधुर वाणी अभी तक तो विविध भारती पर सुनते ही आये थे , मगर उनका भावप्रवीण चेहरा और उसपर Highly Infectious मधुर मुस्कान के तो हम दिवाने ही हो गये.
मुझे आज याद आयी आज से कुछ सालों पहले का वह वाकया जब मैं अनायास ही , अनजाने में ही लता जी से रूबरू हुआ था, पहले फोन पर ,बाद में उनके समक्ष ही.
मौका था सात आठ साल पहले लताजी का वह यादगार कार्यक्रम जो उन्होने मुंबई के अंधेरी स्पोर्ट्स कोम्प्लेक्स के मैदान पर बडे सालों के बाद दिया था.
मैं उन दिनों इंदौर में एक N R I परिवार श्री अजित माहेश्वरी के बंगले का इंटिरीयर डेज़ाईनिंग कर रहा था. आंतरिक साजसज्जा के साथ हम आध्यात्म में साथ साथ रुचि रखने के कारण इतने घुल मिल गये कि जैसे एक ही परिवार हो गये थे.
उनकी छोटी बहन उन दिनों इंदौर आयी थी जिनके पति श्री प्रमोद झंवर मुंबई में बॊंबे होस्पिटल में जाने माने डॊक्टर थे.विषेश बात ये थी कि वे लताजी के निजी चिकित्सक भी थे. तो इसिलिये जब उन दोनों को मेरा संगीत में रुचि मालूम पडी तो उन्होने मुझे मुंबई आमंत्रित किया उस कार्यक्रम के लिये , जिनके स्पेशल वी आई पी पासेस उनके पास जो थे.
नेकी और पूछ पूछ ? मैं तुरंत ही उस दिन सुबह की फ़्लाईट से मुंबई पहुंचा और झंवर दंपत्ती के ब्रीच केंडी के नज़दीक घर में जा पहुंचा.
नाष्ता वैगेरे निपटा कर ज्यों ही मैं मुंबई के अपने कार्य निपटाने के लिये तैय्यार हुआ तो एक फोन आया, जिसपर मराठी के प्रसिद्ध संगीतकार अनिल मोहिले थे, जिन्होने डॊ. साहब से बात करवाने के लिये कहा और कहा कि स्वयं लता दीदी बात करना चाह रही थी.
मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ अपने इस भाग्य पर. मैं भागते हुए डों साहब को बुलाने गया. वे चूंकि बाथरूम से आ ही रहे थे मैं मोहिले जी को दो मीनीट रुकने के लिये वापिस फोन पर जा पहुंचा.
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बात यूं हुई थी कि चूंकि लताजी का उसी दिन शाम को कार्यक्रम था, पिछले दो या तीन दिनों से उनकी रिहल्सल्स लीला पेंटा होटल में ही चल रही थी. मगर किसी कारणवश लता जी संतुष्ट नहीं थी, या तो अपने पर्फ़ोर्मेंस की वजह से , या फ़िर वाद्य वृंद के संयोजन से. इसलिये उन्हे एसिडीटी हो गयी और बाद में दस्त जैसे लग गये थे.
काम के प्रति उनकी कमिटमेंट, क्वालिटी और संपूर्णता की जिद तो मैं उनमें सन १९८३ में ही देख चुका था जब वें पहली बार इंदौर आयीं थी अपने कार्यक्रम देने के लिये.(वह भी एक अलग सा अनुभव था जो बाद में बाटूंगा आपके साथ)जिस लता मंगेशकर के गाने के हम इतने दिवाने हैं,( एकदम पागलपन की हद तक ) वह स्वयं अपने आउटपुट के प्रति सजग और चिंतित कितनी हैं ये पता चला.
बाद में डॊ. साहब नें खुद फोन ले लिया और लता जी को आश्वस्त करते हुए उन्हे कुछ गोलीयां लिख दी, और शाम को कार्यक्रम में थोडा पहले आकर पर्सनली देखनें का भी आश्वासन दिया.
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शाम को जब हम सभी साथ साथ कार्यक्रम की वेन्यु पर पहुंचे तो लताजी राह ही देख रही थी. एक अलग सा कमरा था जहां उन्होने करीब एक घंटे पहले अपने आप को बंद कर लिया था, ताकि कार्यक्रम पर मन एकाग्र कर सकें.डा. साहब के साथ लताजी के समक्ष जा कर खडे हो गये.
लताजी का पहनावा याने लगा कि साक्षात किसी देवी के मंदिर में आकर हम दर्शन के लिये खडे हो गये हैं. स्वच्छ सफ़ेद साडी केसरिया बॊर्डर के साथ, लंबे बाल, और थोडा म्लान , क्लांत सा चेहरा, पेट की खराबी की वजह से.
उनकी बातें हुई. मेरा मात्र परिचय कराया गया कि इंदौर से हैं, तो लताजी मुस्कुरा दी.मैं ठगा सा खडा ही रह गया, और ये भी नही सूझा कि उन्हे नमस्ते ही कर दूं , या फ़िर चरण छूकर अपनी तहे दिल के अंदर छिपी श्रद्धा को किसी माध्यम से प्रकट कर दूं. बस हम बाहर आ गये.....
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और मैं तब से बाहर ही खडा हूं आज तक, लता जी के बंद किये द्वार के बाहर, उनकी मुसकान और मधुर आवाज़ की लुटिया लिये, बस सुन रहा हूं तो उनके हर वो गीत, जिसमें उन्होनें आनंद , खुशियां, दर्द, रंजो ग़म , अल्हडता, रोमांस , स्नेह , मां का दुलार, पत्नी का समर्पण , सभी अपने स्वरों की चासनी में डुबो कर हमें डुबा दिया उस संगीत के सागर में.
चलिये अब मैं आपको आज सुनवाता हूं उनका संगीतबद्ध किया हुआ एक बेहद ही मधुर गीत - ऐरणी चा देवा तुला ठिनगी ठिनगी वाहु दे,आभाळागत माया तुझी आम्हावरी राहू दे..
मराठी फ़िल्म साधी माणसं के लिये लताजी नें आनंदघन नाम से जिन ५ फ़िल्मों में संगीत दिया था उसमें से एक ये है.
जिन्होने इसे नहीं सुना हो, वो उनके सुरों की समझ, वाद्यों का वाजिब प्रयोग, और मेलोडी का भरपूर उपयोग..
प्रील्युड में एक अलग से रिदम से आरंभ होकर पार्ष्व में लोहे को कूटते हुए घन की आवाज़, और साअथ ही इंटरल्युड में सुमधुर मुरली के स्वर. पता नहीं , क्या क्या साईड रिदम के वाद्यों का प्रयोग किया गया है.(कोई बता सके तो आभारी रहूंगा)
क्या आपको यह गीत संगीत से समाधि तक नहीं ले जा रहा?