Tuesday, September 29, 2009

लता मंगेशकर - संगीत से समाधि तक



आज स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जन्म दिन है, और मन बडा ही गुले गुलज़ार हो रहा है, बौरा रहा है, क्या सुनूं, क्या सुनाऊं, कुछ भी समझ नहीं आ रहा है.

अभी कल ही जन्मदिन पूर्व संध्या को हमारे मित्र सुमन चौरसिया नें यहां प्रेस क्लब में लता जी का जन्म दिन मनाया और केक काटी. प्रसिद्ध संगीत समिक्षक अजातशत्रु भी मौजूद थे, और इस अवसर पर कुछ ऐसे संगीत के दिवानों का भी सन्मान किया गया जिन्होनें पिछले कई वर्षों से संगीत की किसी ना किसी तरह से सेवा की है, साहित्य या पत्रकारिता के ज़रिये.

हमारे सभी के लाडले भाई यूनुस खान का भी सन्मान किया गया. उनकी मधुर वाणी अभी तक तो विविध भारती पर सुनते ही आये थे , मगर उनका भावप्रवीण चेहरा और उसपर Highly Infectious मधुर मुस्कान के तो हम दिवाने ही हो गये.

मुझे आज याद आयी आज से कुछ सालों पहले का वह वाकया जब मैं अनायास ही , अनजाने में ही लता जी से रूबरू हुआ था, पहले फोन पर ,बाद में उनके समक्ष ही.

मौका था सात आठ साल पहले लताजी का वह यादगार कार्यक्रम जो उन्होने मुंबई के अंधेरी स्पोर्ट्स कोम्प्लेक्स के मैदान पर बडे सालों के बाद दिया था.

मैं उन दिनों इंदौर में एक N R I परिवार श्री अजित माहेश्वरी के बंगले का इंटिरीयर डेज़ाईनिंग कर रहा था. आंतरिक साजसज्जा के साथ हम आध्यात्म में साथ साथ रुचि रखने के कारण इतने घुल मिल गये कि जैसे एक ही परिवार हो गये थे.

उनकी छोटी बहन उन दिनों इंदौर आयी थी जिनके पति श्री प्रमोद झंवर मुंबई में बॊंबे होस्पिटल में जाने माने डॊक्टर थे.विषेश बात ये थी कि वे लताजी के निजी चिकित्सक भी थे. तो इसिलिये जब उन दोनों को मेरा संगीत में रुचि मालूम पडी तो उन्होने मुझे मुंबई आमंत्रित किया उस कार्यक्रम के लिये , जिनके स्पेशल वी आई पी पासेस उनके पास जो थे.

नेकी और पूछ पूछ ? मैं तुरंत ही उस दिन सुबह की फ़्लाईट से मुंबई पहुंचा और झंवर दंपत्ती के ब्रीच केंडी के नज़दीक घर में जा पहुंचा.

नाष्ता वैगेरे निपटा कर ज्यों ही मैं मुंबई के अपने कार्य निपटाने के लिये तैय्यार हुआ तो एक फोन आया, जिसपर मराठी के प्रसिद्ध संगीतकार अनिल मोहिले थे, जिन्होने डॊ. साहब से बात करवाने के लिये कहा और कहा कि स्वयं लता दीदी बात करना चाह रही थी.

मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ अपने इस भाग्य पर. मैं भागते हुए डों साहब को बुलाने गया. वे चूंकि बाथरूम से आ ही रहे थे मैं मोहिले जी को दो मीनीट रुकने के लिये वापिस फोन पर जा पहुंचा.

जैसे ही मैने चोंगा उठा कर हेलो कहा, उधर तब तब एक चिरपरिचित आवाज़ नें फ़ोन ले लिया था. संसार की सबसे मधुर आवाज़, स्वर , उस तरफ़ था, और अनजाने में मुझको डॊ.साहब समझ कर उन्होने बात करना शुरु कर दिया.मुझे तो बस एकदम लकवा सा ही मार गया था, जो मैं मूर्तिवत हो कर उस अमृत स्वर गंगा की पावन स्वर धारा का रसपान करने लगा.

बात यूं हुई थी कि चूंकि लताजी का उसी दिन शाम को कार्यक्रम था, पिछले दो या तीन दिनों से उनकी रिहल्सल्स लीला पेंटा होटल में ही चल रही थी. मगर किसी कारणवश लता जी संतुष्ट नहीं थी, या तो अपने पर्फ़ोर्मेंस की वजह से , या फ़िर वाद्य वृंद के संयोजन से. इसलिये उन्हे एसिडीटी हो गयी और बाद में दस्त जैसे लग गये थे.

काम के प्रति उनकी कमिटमेंट, क्वालिटी और संपूर्णता की जिद तो मैं उनमें सन १९८३ में ही देख चुका था जब वें पहली बार इंदौर आयीं थी अपने कार्यक्रम देने के लिये.(वह भी एक अलग सा अनुभव था जो बाद में बाटूंगा आपके साथ)जिस लता मंगेशकर के गाने के हम इतने दिवाने हैं,( एकदम पागलपन की हद तक ) वह स्वयं अपने आउटपुट के प्रति सजग और चिंतित कितनी हैं ये पता चला.

बाद में डॊ. साहब नें खुद फोन ले लिया और लता जी को आश्वस्त करते हुए उन्हे कुछ गोलीयां लिख दी, और शाम को कार्यक्रम में थोडा पहले आकर पर्सनली देखनें का भी आश्वासन दिया.


शाम को जब हम सभी साथ साथ कार्यक्रम की वेन्यु पर पहुंचे तो लताजी राह ही देख रही थी. एक अलग सा कमरा था जहां उन्होने करीब एक घंटे पहले अपने आप को बंद कर लिया था, ताकि कार्यक्रम पर मन एकाग्र कर सकें.डा. साहब के साथ लताजी के समक्ष जा कर खडे हो गये.

लताजी का पहनावा याने लगा कि साक्षात किसी देवी के मंदिर में आकर हम दर्शन के लिये खडे हो गये हैं. स्वच्छ सफ़ेद साडी केसरिया बॊर्डर के साथ, लंबे बाल, और थोडा म्लान , क्लांत सा चेहरा, पेट की खराबी की वजह से.

उनकी बातें हुई. मेरा मात्र परिचय कराया गया कि इंदौर से हैं, तो लताजी मुस्कुरा दी.मैं ठगा सा खडा ही रह गया, और ये भी नही सूझा कि उन्हे नमस्ते ही कर दूं , या फ़िर चरण छूकर अपनी तहे दिल के अंदर छिपी श्रद्धा को किसी माध्यम से प्रकट कर दूं. बस हम बाहर आ गये.....



और मैं तब से बाहर ही खडा हूं आज तक, लता जी के बंद किये द्वार के बाहर, उनकी मुसकान और मधुर आवाज़ की लुटिया लिये, बस सुन रहा हूं तो उनके हर वो गीत, जिसमें उन्होनें आनंद , खुशियां, दर्द, रंजो ग़म , अल्हडता, रोमांस , स्नेह , मां का दुलार, पत्नी का समर्पण , सभी अपने स्वरों की चासनी में डुबो कर हमें डुबा दिया उस संगीत के सागर में.

चलिये अब मैं आपको आज सुनवाता हूं उनका संगीतबद्ध किया हुआ एक बेहद ही मधुर गीत - ऐरणी चा देवा तुला ठिनगी ठिनगी वाहु दे,आभाळागत माया तुझी आम्हावरी राहू दे..
मराठी फ़िल्म साधी माणसं के लिये लताजी नें आनंदघन नाम से जिन ५ फ़िल्मों में संगीत दिया था उसमें से एक ये है.



जिन्होने इसे नहीं सुना हो, वो उनके सुरों की समझ, वाद्यों का वाजिब प्रयोग, और मेलोडी का भरपूर उपयोग..

प्रील्युड में एक अलग से रिदम से आरंभ होकर पार्ष्व में लोहे को कूटते हुए घन की आवाज़, और साअथ ही इंटरल्युड में सुमधुर मुरली के स्वर. पता नहीं , क्या क्या साईड रिदम के वाद्यों का प्रयोग किया गया है.(कोई बता सके तो आभारी रहूंगा)


क्या आपको यह गीत संगीत से समाधि तक नहीं ले जा रहा?

14 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा संस्मरण रहा.

लता जी के गीतों के बारे में कहने की योग्यता हममें नहीं, बस, इतना जानते हैं कि उनसा कोई नहीं.

जन्म दिन की लता जी को बहुत शुभकामनाएँ.

साधवी said...

यह आलेख पढ़कर सोच रही हूँ कि आप कितने भाग्यशाली हैं.

वाणी गीत said...

भाव विभोर करने जैसा ही रहा यह
संस्मरण भी ...!!

ताऊ रामपुरिया said...

लता जी को तो बस नमन करने की ही सदा इच्छा रहती है. उनका तो नाम सुनते ही कानों मे मिश्री घुल जाती है.

भाई यूनुस खान से भी मुलाकात हुई, वो तो ऐसे लगे जैसे वर्षों की पहचान हो. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

अल्पना वर्मा said...

lata ji meri bhi bahut pasandida kalaakar hain...
chahat hai ki kabhi unko sakshaat samne dekhun--ya koi live show unka dekhne ko mile...
aap bahut lucky hain ...jo unse seedha baat bhi hui...
abhaar in sansmaran ko share karne ke liye-..Lata ji ke liye hamesha hi shubhkamanyen hain ..ek baar phir se--जन्म दिन की लता जी को बहुत शुभकामनाएँ

kshama said...

Maine na jane kitnee baar is sansmaran ko padha..samajhme nahee aya ki, apnee aradhy daivatke bareme kya tippnee dun...aapne dil khush kar diya...zindagee me ekhee armaan hai, inke saath kabhee kewal 2 mint mulqaat ho...huee to thee, lekin besakhta unhen charan sparsh karne ke alawa mai bhi nishabd ho gayee...aapse rashq ho raha hai...!

"bikhare sitare'pe aapkee tippaneeka tahe dilse shukriya..haan! dharavahik, chahe kitnahee tez raftar chale, kishten to hotee hee hain..!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आगामी वर्ष खुशियाँ लेकर आये ..
सालगिरह की मुबारकबादी
अरे वाह ..क्या चुनकर एक नायाब गीत सुनवाया है आपने ..
आनंदघन ने आनद की रस वर्षा कर दी :)
दीदी जी की ८० वीं सालगिरह उन्हें ढेरों खुशियाँ दें ये मेरी dil से निकली दुआ है
वे गातीं रहें और हम बस सुनते रहें ..
और एक बाट, डाक्टर प्रमोद झवर जी मेरी बड़ी मौसी जी विधावती पण्डित के पुत्र सामान थे
और मासीबा का अंतिम समय में उन्हींने इलाज भी किया था -- सच ये दुनिया कितनी नन्ही सी है
जहां पग पग पर परिचित लोग मिलते रहते हैं


सादर, स - स्नेह,
- लावण्या

डॉ .अनुराग said...

आप वाकई किस्मत वाले है .पर आप इसके हक़दार भी है ......कहते है कुदरत कुछ लोगो पर मेहरबान रहती है ....लता जी उनमे से एक है ...आजकल उन्ही के गाने सुन रहा हूँ....एक दो की फरमाइश युनुस भाई से की है

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही लाजवाब पोस्ट. शुभकामनाएं.

रामराम.

Harkirat Haqeer said...

और मैं तब से बाहर ही खडा हूं आज तक, लता जी के बंद किये द्वार के बाहर, उनकी मुसकान और मधुर आवाज़ की लुटिया लिये, बस सुन रहा हूं तो उनके हर वो गीत, जिसमें उन्होनें आनंद , खुशियां, दर्द, रंजो ग़म , अल्हडता, रोमांस , स्नेह , मां का दुलार, पत्नी का समर्पण , सभी अपने स्वरों की चासनी में डुबो कर हमें डुबा दिया उस संगीत के सागर में.

लता जी के लिए आपकी श्रधा देख नतमस्तक हूँ ....

मौन कर दिया आपने .... !!

Vijay Kumar Sappatti said...

dilip ji

namaskar
aapke lekho ko padhta hoon to mujhe Raju Bhartan ki yaad aa jati hai , jo ki apne samya ke bahut acche critic rahe hai ..

aapki ye post hamesha ki tarah lajawab hai .. main kya kahun , lata didi ke baare me kuch bhi kahna suraj ko diya dikhlana hai ..

choonki main nagpur se hoon aur marathi sangeet me bahut ruchi rakhta hoon .. kuch din pahle main kolhapur gaya tha , whahan ek sangeet mandli me lata ke marathi geeto ki baat chali to maine bahut se gaane ki churcha ki , jisme , disla ka bai disla , aur mehandi che paana war , aur nisarg raja aur , mee raat talki ityadi gaano ka jikr hua , aapke video ne usi ki yaad dilwa di..

bahut acchi post ke liye shubkaamanaye aur badhai ..

regards,

vijay

pls read my 100th post .
www.poemsofvijay.blogspot.com

प्रकाश गोविन्द said...

आपकी हर पोस्ट मेरे लिए संग्रहणीय है !

लता दीदी के बारे में क्या कहूँ .....
बस यही कि
आप बहुत भाग्यवान हैं !

आपके संस्मरण को पढ़कर ह्रदय पुलकित हो उठा !
आपको हार्दिक शुभ कामनाएं
आज की आवाज

Mrs. Asha Joglekar said...

Lata taee baddal ch tumach sansmaran ekdam chan wachoon chhan watal. Airaneechya dewa tar maz lahanpana pasoonch priy gan.

संजय पटेल... said...

आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग्स की सैर कर रहा हूँ तो अनायास आपके यहाँ आना हुआ. ये जो मराठी गीत आपने लगाया है दिलीप भाई हमारे भारतीय ग्रामीण परिवेश की भोली और खरी तस्वीर पेश करता है. जैसे हमारे गाँव थे वैसी ही हमारी तस्वीरें.पहनावा,अभिनय,चेहरे और गीत-संगीत सबकुछ ....इन गीतों की सामने हमने अपने आपको कितना बनावटी कर लिया. थोड़ा जा जान गए...पण्डित हो जाते हैं...भूल जाते हैं कि यह सब हमारे साथ थोड़े ही घटा है ..सब हमारा सुना सुनाया है...पहले चेहरों पर कैसी करिश्माई नेकी बरसती थी. जयश्री गडकर गंगा जैसी पवित्र नज़र आ रहीं हैं इस गीत में. संगीतरचना में घन पर पड़ती हथौड़ी या दीगर औज़ार का कैसा सुरीला और टाइमिंग लिया हुआ नाद उठता है ...टिन्न्न.कया बात है...काश हम उसी भोलेपन पर लौट आएं...सच कहता हूँ ऐसा हो गया तो ख़ुदा भी दुआएं देगा हमें.

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