Friday, October 9, 2009

ए चौदहवी के चांद - सुहानी रात ढल चुकी है,, ना जाने तुम कब आओगे?



पिछला हफ़्ता बडा़ ही हट के गया.

याने पिछले हफ़्ते एक शब्द चांद बार बार कानों पर पडा़, क्योंकि बात साफ़ है.

पिछले हफ़्ते शरद पुर्णिमा की मदहोश रात थी.

सुनते आये हैं, कि इस रात को चंद्रमा से अमृत बरसता है. लगता है सही है, क्योंकि, पिछले कई सालों से बिना नागा, इस रात को संगीत के अमृत स्वर कानों में पडते रहते हैं. वातावरण में मस्ती, सुरीली तरन्नुम का आलम तारी रहता है.फ़िर रात को परमानंद की प्राप्ति - याने केशर पिस्ता युक्त गाढा दूध. बस और क्या चाहिये.

बस १ ता. से माहौल शुरु हो गया था. मैं जिस लायंस क्लब से जुडा हुआ हूं उसके तत्वावधान में शरद पूनम की संगीत रजनी हर साल की तरह से संपन्न हुई. इस दिन खास कर , पूणें से प्रसिद्ध पियानो एकोर्डियन के वादक श्री अनिल गोडे पधारे थे, जिन्होने अपने सुरीले साज से, और अपने हुनर के कमाल से इस बेजोड और बजाने में क्लिष्ट साज़ पर इतने पुराने गीत सुनाये कि बस मस्त कर दिया. अनिल जी हेमंत दा, तलत मेहमूद्जी,किशोर दा आदि के साथ देश विदेश में बजा चुकें हैं. पिछले साल पुना में मिले थे जब सुदेश भोंसले के साथ भी बजाया था.

मात्र एकोर्डियन और ढोलक,कांगो पर बजाये हुए मधुर गानों की बानगी तो लीजिये -

चांद सा रोशन चेहरा, सुहानी रात ढल चुकी , फ़ूलों के रंग से,डम डम डिग डिगा, रमैय्या वस्ता वैय्या , और भी कई.

एक और खुशनुमा बात यह थी कि मेरे अनुज - मित्र संजय (श्री संजय पटेल) भी इस कार्यक्रम में आये थे. अमूमन ऐसी संगीत रजनीयों में संजय जी का संगीत पर समृद्ध एंकरिंग और मेरे स्वर का भी संयोग जमा करता था पहले कई बार, मगर एक दो सालों से दोनों की व्यस्तता से ये ग्रह युति हो नहीं पा रही थी.इस दिन कुछ मित्रों नें छेड दिया, फ़िर हम दोनों भी औपचारिता को दूर कर, कुछ कुछ गा बैठे.

फ़िर लगभग हर दिन कोई ना कोई कार्यक्रम था ही. मगर दुख ये रहा कि शरद पोर्णिमा की रात को इंदौर में बारीश की वजह से चांद नहीं दिख पाया, और जैसा कि हमारे यहां परंपरानुसार रात को चांद को नैवेद्य नहीं चढाया जा सका.(प्रस्तुत चित्र में दूध और पूजा का पात्र - जिसमें ऐरावत का आकार बनाया गया है चावल से, और इस दूध के बर्तन को चांदी की तलवार रख कर चंद्रमा की चांदनी में रखा जाता है.

इसिलिये चांद, चंद्रमा, चंदा आदि शब्दों को लिये हुए गीतों की धूमधाम रही इन दिनों.

एक बडा ही अहम गीत मेरे ज़ेहन में गूंज रहा था इन दिनों, जिसने अपने सहज सरल संगीत स्वर संयोजन और रफ़ी साहब के अमृत भरे केशर पिस्ता युक्त दूध की मानिंद मीठे, सुरीले स्वर के कारण मेरे मन में, दिल में जगह बना ली थी, और दिन रात के अधिकतर क्षणों में मेरे होटों पर आ रहा था. सोचा था कि इन दिनों कहीं गा ही दूं तो मन की ये मस्ती प्रकट में मेनिफ़ेस्ट हो जाये. मगर मौका नहीं आया.है

अचानक किसी मित्र नें भेजा हुआ एक कराओके ट्रॆक मिल गया जो बाज़ार में मिल रहे ट्रेक से बेहतर था, तो बैठ गया रिकोर्डिंग पर, और कर डाली दिल की भडास पूरी.

मगर एक बात पर एकदम दिल झूम गया , वह ये कि, साथ में इसी राग से मिलता जुलता एक और सुरीला और मीठा गीत भी होटों पर कॆट्वाक करने लगा- सुहानी रात ढल चुकी , ना जाने तुम कब आओगे-.

तो बस एकदम इसी गाने के तीसरे अंतरे के वाद्य संयोजन के बेकग्राऊंड में इस गीत का अंतरा भी गाकर देखा. तो संयोग यूं बना कि यह प्रयोग भी उम्दा जम गया.

बस क्या था. सोचा , इसे आपके साथ भी शेयर करूं, आखिर दिलीप के दिल से जो भी स्वर निकलेंगे, आह या वाह, आप तो हमसफ़र हैं ही. तो बस सुनिये इस बार यह गीत...चौदहवी का चांद हो, या आफ़ताब हो.... और सुहानी रात ढल चुकी का मिक्स.(इसे रिमिक्स ना कहिये, क्योंकि उसमें ना जाने क्या क्या किया जाता है- जिसका ज़िक्र फ़िर कभी)




एक और आश्चर्यजनक संयोग ये रहा है कि अभी दो दिन बाद हमारे श्रद्धेय कलाकार , बेजोड निर्देशक गुरुदत्त जी की पुण्यतिथी है (१० अक्तूबर १९६४). जिस फ़िल्म के लिये ये टाईटल गीत बनाया गया था उस फ़िल्म के निर्माता भी गुरुदत्त ही थे.चूंकि यह फ़िल्म मुस्लिम परिवेश में फ़िल्माई गयी थी, गुरुदत्त जी नें इस फ़िल्म के निर्देशन के लिये जनाब मोहम्मद सादिक़ को ज़िम्मेदारी सौंपी. वे वो दिन थे जब अपने ज़माने की सबसे बडी प्रयोगात्मक फ़िल्म कागज़ के फूल की असफ़लता से गुरुदत्त जी काफ़ी निराश थे.

मगर हुआ यूं कि इस फ़िल्म नें सफ़लता के ऐसे झंडॆ गाडे कि कहा जाता था कि १०० फ़िल्मों के बराबर बिज़नेस किया, और गुरुदत्त को दिवाला होते होते बचा लिया.(उनका स्टुडियो भी बिकत बिकते बच गया)

हालांकि वे इसके पहले एस डी बर्मन दा और ओ पी नय्यर के साथ काम कर चुके थे, ये एक आश्चर्यजनक बात थी कि मुस्लिम परिवेश के लिये होते हुए भी उन्होने रवि जैसे संगीतकार को साईन किया बतौर संगीतकार, जिन्होने इस फ़िल्म के संगीत के साथ पूरा न्याय किया.(इसका कारण थे अबरार अल्वी, मगर मज़ेदार बात यहा भी ये है कि भले ही उनने गुरुदत्त जी की इतनी सारी फ़िल्मों में कहानीयां लिखी, मगर इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी सागर उस्मानी नें!!)

आपने अगर ये फ़िल्म देखी होगी तो आप ज़रूर गुरुदत्त जी के डिटेल्स , लखनौ की तेहज़ीब , परिधान , नपे तुले डिफ़ाईन किये हुए चरित्र और उनके मेनरीझ्म की बारिकी में गये होंगे और दाद देने को जी चाहता होगा आपका.हालांकि निर्देशन मोहम्मद सादिक का था , इस फ़िल्म में गुरुदत्त का ही स्टांप था. और तो और सभी गाने शत प्रतिशत गुरुदत्त जी नें ही फ़िल्माये थे, जो उनके फ़ोटोग्राफ़र श्री वी के मूर्ती नें कबूल की थी.

तो अब देखिये भी उस इम्मोर्टल , कालजयी गीत का विडियो भी, जिसमें वहीदा जी का मूर्तिमंत सौंदर्य, अलसायी हुई लाल डोरे लिये आंखें, गुरुदत्तजी का सुकून भरे दिल से उस खूबसूरती की तारीफ़ में रोमांटिक अंदाज़ में इस गीत को गाना, और साथ में खुद मोहम्मद रफ़ी साहब की शहद से भी मीठी, सुरीली, और सात्विक स्वर एक ऐसा आलम तारी कर देते हैं कि पाकीज़गी से भरे इस हुस्न का ये नशा बिन पिये ही आपके रूह में कब दाखिल होकर आपको मदमस्त कर देता है, इसका होश भी आपको नहीं रहता.

(बिना शादी शुदा मित्र गण मुआफ़ करेंगे, क्योंकि उन्हे पता ही नहीं है कि अभी क्या बाकी है उनकी ज़िंदगी में, और शादी शुदा मित्र भी मुआफ़ करेंगे, कि दर्दे दिल छेड दिया गया है, और आप को नोस्टाल्जिया के गहरे समंदर में डुबा दिया गया है. अगर तैर कर ऊपर आ सकते हो तो आ जाईये, और डूबना हो तो मेरे साथ हो लिजिये......)



गुरुदत्त जी और इस गाने के बारे में एक रोचक संस्मरण बताये बगैर नहीं रह सकता, जिससे आप हंस पडेंगे - मगर यह पोस्ट काफ़ी लंबी हो गये है. मेनेजमेंट का खिलाडी हूं इसलिये सभी मिठाईयां एक साथ नहीं परोसूंगा.

तो दस तारीख को फ़िर पधारें गुरुदत्तजी की पुण्यतिथी के दिन , तो यह भी आपके साथ शेयर करूंगा.

शब्बा खैर!!

7 comments:

Udan Tashtari said...

जबरदस्त रहा..दस तारीख को फिर इन्तजार रहेगा.

"अर्श" said...

बचपन में जब चित्रहार और रंगोली देखता था तो इस गाने का इंतज़ार हमेशा किया करता था , अगर कहूँ के यह गीत मेरे साथ बड़ा हुआ संगीत में तो गलत ना होगा... इस गाने के बोल म्यूजिक सब कुछ तो है और सबसे बड़ी बात है अदाकारी , फरीदा जी जीतनी खुबसूरत इसमें लगी है शायद ही कसी और गाने मैंने देखा है.. कुछ भी कह पाने में समर्थ नहीं हूँ इस गाने के लिए ...बहुत बहुत बधाई और आभार आपका दिलीप जी


अर्श

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लगा आज , कागज के फ़ुल फ़िल्म तो बहुत अच्छी थी, लेकिन चली क्यो नही पता नही, चलिये १० का इंतजार रहेगा.
धन्यवाद

अल्पना वर्मा said...

चौदंवी का चाँद फिल्म देखि नहीं न ही कहानी मालूम है गाना भी अभी तक देखा नहीं सुना ज़रूर है..अभी आप ने क्लिप दी है लेकिन इस समय ठीक से देख नहीं पार रही ..बेशक गुरुदत्त और वहीदा जी जोड़ी बहुत खूबसूरत थी.
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खीर को चित्र में देख कर याद आया हम भी इंडिया में शरद पूर्णिमा को ऐसे खीर बाहर रखा करते थे...
इस खीर का रंग देख कर तो लग रहा है बहुत स्वादिष्ट बनी होगी...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सुहानी रात ढल चुकी है,, ना जाने तुम कब आओगे...यह अमर गानों में से एक है, मेरी पसंद के गानों में से एक भी.

Manish Kumar said...

आपकी आवाज़ में इन गीतों को सुनना बेहद सुकूनभरा रहा।

अल्पना वर्मा said...

वाह !अभी सुने दोनों गीत और गीत देखा भी..
दिलीप जी आप ने दोनों ही गीत बहुत ही सुन्दर gaye हैं.
'चौदहवीं का चाँद हो ' के बाद 'सुहानी रात ' गीत ..एक दम उसी ट्रेक पर..समा बांध गया.
आवाज़ में इफेक्ट लाइव जैसे हैं.ट्रेक अच्छा है.
शुक्रिया.

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