Saturday, October 10, 2009

गुरुदत्त - एक संस्मरण -चौदहवीं का चांद


समय अभाव के कारण, पिछली पोस्ट थोडी देर से नश्र हुई, फ़िर एक दम संयोग से गुरुदत्त जी का स्मरण दिन आ गया. दोनों पोस्ट मिक्स हुई और बडी हो गयी. इसलिये उनका एक संस्मरण अब लिख रहा हूं, ११ ता. को , इसलिये क्षमा करें.

आपनें पिछली पोस्ट पढी ही होगी.( चौदहवीं का चांद हो) उस गीत पर एक और बात बतानी थी, मगर उसके पृष्ठभूमी के साथ, जो आशा है आप पसंद करें. इसे मैने स्व. गुरुदत्त की सगी बहन श्रीमती ललिता लाज़मी से बातचीत के दौरान सुना था.

किस्सा यूं है--


कुछ साल पहले इंदौर में हर साल होने वाले लता मंगेशकर पुरस्कार समारोह के आयोजन समिति के सदस्य होने के नाते मुझे मुंबई जाना पडा प्रसिद्ध संगीत निर्देशक श्री भुपेन हज़ारिका जी से मिलने . उन्हे मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उस साल के लता मंगेशकर पुरस्कार से नवाज़ा गया था. यह अवार्ड सन १९८३ से हर साल बारी बारी से एक गायक/गायिका और संगीत निर्देशक को दिया जाता है. इसमें पुरस्कृत कलाकार को अवार्ड की औपचारिकता के बाद अपना पर्फ़ोर्मेंस भी देना पडता है.सो, भुपेन दा से अनुरोध करना था कि वे अपने कुछ गीत गायें . अतः , यह ज़रूरी था कि उनके साथ कार्यक्रम की रूपरेखा और साज़िंदों की बातचीत तय हो जाये.

उन दिनों वे मुंबई में थे और स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे.उनकी आंखों का ऒपरेशन हुआ था, और वे प्रसिद्ध महिला निर्देशक सुश्री कल्पना लाज़मी के घर में रुके हुए थे. फ़ोन पर किसी महिला से बात हुई, जिसने खुद भुपेन दा से पूछ कर शाम को छः बजे का समय तय किया.

जब मैं वहां पहुंचा, तो एक अधेड , शालीन महिला नें दरवाज़ा खोला, और बडे आदर के साथ मुझे ड्राईंगरूम में बिठाया. कहा कि अभी अभी दवाई डाली है आंख में ,इसलिये आधा पौन घंटा रुकना पडेगा आपको. मैं मिलकर ही जाना चाहता था इसलिये वहां रखे हुए एक पुराने फ़िल्मफ़ेयर को लेकर पढने लगा.(संयोग से उस पर गुरुदत्तजी का चित्र था)

वह विदुषी देवी सी प्रतीत होने वाली महिला बाद में मेरे साथ ही बैठ गयी और हम ओकेज़नली एक दूसरे की तरफ़ देखते और वे स्नेहवश मुस्कान से मेरा स्वागत करती.हम कुछ बोल नहीं रहे थे.

फ़्लेट्नुमा वह घर बडे ही एथनीक स्टाईल में जमाया गया था( जैसे चमार की नज़र जूते पर ही पदती है, मेरी नज़र आंतरिक साजसज्जा पर पडी थी). मैने कौतुहुलवश उनसे पूछ ही लिया कि इस फ़्लेट का ईंटिरीयर डिज़ाईन किसनें किया है. वे हंस पडी, और उन्होने कहा मैंनें ही किया है. मैं कल्पना की मां हूं, ललिता लाज़मी.

मेरे दिमाग में एक दम सौ हेलोजन के बल्ब जल पडे़. अरे , ये तो वहीं है, ललिता आज़मी जो स्वर्गीय गुरुदत्त जी की बहन हैं!!और मैं पिछले आधा घंटे से यहां बेजान वस्तुओं में अपना दिमाग खपा रहा हूं.

मैं फ़िर सम्हल के बैठ गया, जैसे कि किसी मंदिर में देवी के समक्ष गर्भगृह में बैठा था.सौम्य, शांत और सरल व्यक्तित्व से जब रूबरू हुआ तो मन में याद आयी इसाक मुजावर द्वारा गुरुदत्त जी पर लिखी हुई वो पंक्तियां , जिसमें बताया गया था कि गुरुदत्त कितने अशांत, रेस्टलेस, अल्पसंतुष्ट कलाकार थे, और यहां बैठी उनकी बहन शांत सौम्य!!

मैं पूछ बैठा उनसे गुरुदत्त जी के चरित्र के इस आयाम से. वे मुस्काई, और सम्हल के बैठ गयी, गोया Interview दे रही हैं. मैने उन्हे सहज किया और सुनने लगा उनकी मीठी निर्झर वाणी से उनके संस्मरण..

भाई अशांत और रेस्टलेस ज़रूर थे क्योंकि वे पर्फ़ेक्शनिस्ट थे, इसलिये हमेशा असंतुष्ट और सेंसेटिव रहते थे अपने Creation के संदर्भ में. मगर मोटे तौर पर वे तकनीशियनों से ज़्यादह अपेक्षा रखते थे पर्फ़ेक्शन की,एक्टर्स की बनिस्बत. उनके केमेरामेन श्री मूर्ती से तो उनकी हर शॊट में झडप हुआ करती थी, और गरमा गरम वाद विवाद भी हो जाते थे.मगर कलाकारों से थोडे नर्मी से पेश आते थे. मगर जब बात खुद के acting की होती थी तो भी कम संतुष्ट होते थे. फ़िल्म प्यासा के एक सीन में उन्हे मज़ा ही नहीं आ रहा था, और दोपहर से चल रहा उनके अभिनय वाला शॊट ओ के ही नहीं कर रहे थे. सभी नें उनसे कहा कि आप थकें है, तो पॆक अप कर लेतें है, मगर वे मान ही नहीं रहे थे. रात को दस बजे कहीं जा कर माने कि अब कल सुबह करेंगे, और आश्चर्य की बात है, दूसरे दिन सुबह एक ही टेक में शोट ओ के हो गया.

वे बडे सेंसेटिव और संवेदनशील मन के कलाकार थे , और उन दिनों गीता दत्त और वहीदाजी के कारण वे बडे तनाव में रहते थे. फ़िर वे मुस्कुराके बोली , भाई का वहीदा जी से कुछ ऐसा वैसा रोमांटिक नाता नहीं था, जैसा कि अमूमन कहा जाता है.वैसे वहीदा जी उनके जीवन में बहार बन के ज़रूर आई.

वहीदा जी भी जब भी शोट देती थी तो संयोग ये होता था कि वे एक शॊट के बाद दूसरे रीटेक में ठीक नहीं करती थी और बाद में तीसरे शोट में फ़िर ठीक हो जाता था, तो इस alternative Shots के OK होने का राज़ नही समझ पाते थे भाई, और मज़ाक में वे वहीदा जी की खिंचाई भी कर दिया करते थे.

जिस दिन रात को उनका निधन हुआ, उसके कुछ दिन पहले ही उनसे फ़ोन पर बातें हुई थी, जब भाई बडे खुश थे और वे बता रहे थी कि उन्होने अभी अभी एक नयी फ़िल्म शुरु की थी बंगला भाषा में जिसका नाम रखा था गौरी, जिसमें गीता दत्त अभिनय करने वाली थीं और एक सीन भी पिछले दिनों शूट कर लिया गया था. गीता दत्त की सृजन धर्मिता की और बिगडे हुए वैवाहिक रिश्तों को बचाने के खातिर यह कदम उठाया था उन्होने.

उस मनहूस रात को वहीदा जी मद्रास(चेन्नई)में थी और मुझसे और कल्पना से रात को ही फ़ोन पर इधर उधर की बातें भी की थी.फ़िर देर रात(अल सुबह) अब्रार अल्वी का फ़ोन आया तो वह मनहूस खबर हमें मिली.

वातावरण में स्वाभाविक रूप से गंभीरता आ गयी थी. तब तक कमरे में से भूपेन दा का मेसेज आ गया था कि आप बेडरूम में ही आ जायें, तो बेहतर होगा. मैंने इस मोनोलॊग या एकतरफ़ा संभाषण को विराम देने के लिये या विषयांतर करने के लिहाज़ से कहा- आपको उनकी कौनसी फ़िल्म पसंद आयी, और कौन सा गान जिसका पिक्चराईज़ेशन आपके लिहाज़ से बढिया था.

वे बोली प्यासा और कागज़ के फ़ूल तो ALL TIME GREAT हैं , और गाने में वक्त ने किया क्या हसीं सितम का फ़िल्मीकरण तो लाजवाब है.
(इसके बारे में मैंने अपनी एक पोस्ट -गुरुदत्त - एक अशांत अधूरा कलाकार - संगीत को समर्पित एक प्रसिद्ध ब्लोग आवाज़ में पिछले साल ज़िक्र किया था जिसका लिंक है-

http://podcast.hindyugm.com/2008/10/remembering-gurudutt-genius-film-maker.html
मेरे ब्लोग पर भी आप गुरुदत्त पर चटका लगा कर देख सकतें हैं....

और दूसरा गाना था - चौदहवीं का चांद हो , या आफ़ताब हो...

इस गीत का ज़िक्र आते ही उनकी बुझी हुई आंखों में जैसे फ़िर चमक आ गयी, और वे इस गीत के बारे में बताने लगीं.

उन दिनों कलर फ़िल्मों का ज़माना आ गया था, और गुरुदत्त जी भी चाहते थे कि ये फ़िल्म भी कलर में बनें. मगर एक्विपमेंट्स आने में देरी के कारण, और डिस्ट्रिब्युटर्स की जल्दी के कारण उन्होने फ़िल्म Black & White में ही पुउर्ण की और ये गीत भी.साथ में फ़िल्म को सेंसर से भी पास करवा लिया.

मगर फ़िर उन्हे क्या सूझा, उन्होने इस गीत को फ़िर से शूट करनी की ठानी, वह भी कलर में, क्योंकि तब तक एक्विपमेन्ट आ गये थे.ये तय किया गया कि फ़्रेम से फ़्रेम, शोट से शोट कॊपी कर के वैसे ही फ़िर से शूट किया जायेगा, चूंकि पहले के B&W रशेस तो बढियां ही थे.

खैर, जैसा कि प्लान किया गया था, वहीदाजी को बुलाया गया, और शूटिंग बढिया तरीके से संपन्न हुई.चूंकि फ़िल्मी करण रंगीन था, बडे बडे आर्क लाईट्स,करीब रखे गये, जिसकी वजह से वहीदा जी का स्किन झुलसने लगा. तो बडी मुश्किल से आईस पॆक रख कर शूटिंग संपन्न की गयी.तो उनकी आंखे भी इसीलिये लाल हो गयी थी.फ़िल्म को फ़िर से सेंसर बोर्ड को भेज दिया गया.

मगर सभी तब भौंचक्के रह गये जब उन्हे मालूम पडा सेंसरबोर्ड नें फ़िल्म को पास करने को मना कर दिया क्योंकि उन्होने इस गीत को बडा ही हॊट (HOT) बताया!!!! भाई नें उन्हे समझाने की कोशिश की कि सब कुछ तो वही था एक कलर के सिवा. तो पता है, उन्होने क्या जवाब दिया?

कहा, वहीदा जी की आंखे बडी लाल हो रही हैं, और इस बात को उन्होने Sensual and Suggestive करार कर दिया!!

भाई उस दिन बडे हंसे थे.खैर फ़िल्म तो पास हो गयी, मगर ललिताजी नें कहा कि अगर वे सेंसर बोर्ड के सदस्य आज जीवित होंगे और आज की फ़िल्में देखेंगे तो तुरंत ही प्राण छोड़ देंगे!!!

चूंकि बात नार्मल हो चुकी थी मैं उस साश्वी के सानिध्य से उठकर भूपेन दा के कमरे में चला गया.

(इन संस्मरणों को याद करना याने पुरानी यादों की जुगाली करना. जिनके लिये ये कलाकार , उनकी कला और उनका कला के प्रति योगदान और समर्पण का थोदा बहुत भी महत्व है उसे यूं लगता है कि कुछ क्षण हमनें भी टाईम मशीन में जाकर उनके साथ बिता लिये हैं. यही तो हमारे लिये elixir है, च्यवनप्राश है!!!- क्या आप सहमत हैं?

चौदहवीं का चांद और सुहानी रात का जो मि़क्स और You Tube Video का लिंक पिछली पोस्ट पर डाला था वह चला नहीं था किसी के लिये. अतः फ़िर से लगा रहा हूं.



http://www.youtube.com/watch?v=tKlrQ4TMxTc

7 comments:

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

गुरुदत्त के गीतों के बारे में सस्मरण प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद

शरद कोकास said...

ऐसा लगा जैसे उनही दिनो मे पहुंच गये है कितना अच्छा लगता है उन चीज़ो और लोगो के बारे मे पढ़ना जिनसे हम जेहनी तौर पर जुड़े है ।

अल्पना वर्मा said...

बहुत ही achchha लगा आप का यह sansmaran.
बड़े ही suruchipurn tareeke से लिखते हैं आप.
आप की awaaz में यह गीत behad खूबसूरत बन पड़ा है..original गीत के jaisa sunaayee दे रहा है.


[आप की यह post 3 दिन poorv की post की हुई hai..ऐसा feed में दिखा रही है..]

डॉ .अनुराग said...

ये भी हैरानी की बात है के गुरुदत ने अपना शुरूआती करियर थ्रिलर फिल्मो से शुरू किया था .....ओर वे भी मुझे आज दिलचस्प लगती है ......अपने मन की आवाज को बहार परदे पे लाने की हिम्मत उन्होंने कई बरस बाद की.....कही पढ़ रहा था की प्यासा में दिलीप साहब ने इसलिए काम करने को मना किया ...की उन्हें लगता था के ये देवदास का ही एक रूप है....वैसे आज लगता है प्यासा का विजय जैसे गुरुदत के लिए ही बना था ...अमर हो गया .....साहिर का लिखा "जिन्हें नाज है हिंद पर" भी सेंसर बोर्ड ने अटका दिया था ओर कई चेंज करने के बाद पास किया था ..

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अगली पिछले दिनों लिखीं
आपकी कई पोस्ट पढीं दिलीप भाई
और आपका गाया गीत भी सुना
...........
दीपावली का तोहफा मिल गया हमें तो !!:)
बहुत खूब गाया है
........और ललिता लाज़मी जी एक उम्दा चित्रकार भी थीं आप जानते होंगें
भूपेन दा और कल्पना लाज़मी अकसर ,
पापा जी के घर आया करते थे ..
ललिता जी से मुलाक़ात भी बढिया लगी
दीपावली में शांति का सन्देश फैले यही कामना है
आपके परिवार के लिए मंगल कामना
सस्नेह,
- लावण्या

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

ललिता जी से मुलाक़ात! पढ़कर अच्छा लगा. गुरुदत्त के बारे में क्या कहूं, छोटे मुंह बड़ी बात हो जायेगी.
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

क्रिएटिव मंच said...

गुरुदत्त के बारे में सस्मरण
प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद

सुख, समृद्धि और शान्ति का आगमन हो
जीवन प्रकाश से आलोकित हो !

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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए
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