Wednesday, October 21, 2009

किशोर दा के कॊलेज जीवन के संस्मरण!- ये दिल ना होता बेचारा,कदम ना होते आवारा-




आपको शायद याद ही होगा कि हमारे हर दिल अज़ीज़ गायक शेहंशाह जनाब रफ़ी साहब की पुण्यतिथी ३१ जुलाई को मैने श्रद्धांजली के तौर पर एक विडीयो बनाया था --नाचे मन मोरा मगन तिकता धिगी धिगी....
(http://dilipkawathekar.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html)

वह तो एक संयोग था, मगर इस बार हमारे लाडले , मस्ताने ,बहु आयामी, हर हुन्नरी (ऒल राउंडर) कलाकार , गायक किशोर दा की पुण्य तिथी थी १३ अक्टूबर को,जिस दिन इस दिल दिवाने नें किशोर दा की याद में एक और बार एक विडीयो बनाया.

संभव है कि बहुत ही कम लोगों को ये पता होगा कि किशोरदा नें अपनी कॊलेज की पढाई इंदौर में पूरी की. वे यहां के प्रसिद्ध सौ से अधिक साल पुराने महाविद्यालय " इंदौर क्रिश्चियन कॊलेज "में एडमिशन लिया था और इस महाविद्यालय में सन १९४६ से लेकर १९४८ तक तीन सालों में पढाई के अलावा और कई गतिविधियां की.

उन्होने अपने भाई अनूप कुमार के साथ कॊलेज युनियन , होस्टल युनियन में सक्रिय कार्य किया. कॊलेज पत्रिका में लेखन, प्रोफ़ेसरों के साथ मस्ती, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लिया. उन्होंने कई नाटक मंचित किये और संगीत की मेहफ़िलें सजाई.

जैसा कि अपनी पिछली पोस्ट में लिख चुका हूं, मैं उनके जन्म स्थान खंडवा नहीं जा सका, इसलिये जा पहुंचा उनकी गुरुकुल की पावन स्थली में, और वहांकी फ़िज़ा में घुली किशोर दा की सुरमई यादें, कण कण में से झांकती किशोर दा के मधुर , मज़ाहिया व्यक्तित्व की छबि को दिल में उतारता चला गया. और हमेशा अब तो आप सभी हम सफ़र सुरीले मित्रों का भी खयाल था ही, इसलिये अपना छोटा केमेरा भी ले गया.


इसलिये , आज पेश है, वहां की कुछ झलकीयां, याने कॊलेज परिसर,जहां उन्होने अपने जीवन के हसीन पलों को जिया......
वह फ़ूटबॊल गाउंड,जहां वे और अनूप कुमार फ़ूटबाल मेच खेला करते थे......
होस्टल का वह कमरा नं. ४ , जिसमें कभी उनका रैनबसेरा हुआ करता था,जहां उन्होने अपने जीवन के रंगीन सपने देखे....
वह ब्रॊंसन हॊल जहां उन्होने अपने नाटक खेले, मस्ती भरे गीत गाये,और अपनी गायन एवम अभिनय प्रतिभा को निखारा....
वह इमली का पेड़, जहां उन्होने कई धुनों का सृजन किया जिन्हे हमने बाद में उनकी फ़िल्मों में सुना....
वह केंटीन जहां उनके पांच रुपये बारह आने अभी तक बकाया है....
उनकी क्लास रूम जहां उनकी अंग्रेज़ी के टीचर से झडपें हुआ करती थी....
वह दुध जलेबी की सुबह के नाश्ते की दुकान, जो उन्हे उनके घर की , खंडवा की याद दिलाती थी.



मैं उनके चित्र यहां प्रस्तुत करता हूं, और साथ में पेशे खिदमत है, दिलीप के दिल से इज़हारे अकीदत के तौर पर एक Audio Visual Tribute जिसे देख कर सुनकर आप आनंदित होंगे, और उन लोगों को भी सुकून हासिल होगा जो किशोर दा को इंतेहां मुहब्बत करते हैं और इबादत करते हैं.इसमें आप क्रिश्चियन कॊलेज के परिसर,ब्रोंसन हॊल जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे,क्लास रूम, होस्टल का परिसर और कमरा नं ४,वह इमली का पेड़ जहां जाकर मैं भी एक गीत गाकर आया, जैसे कि किशोर दा के मंदिर में जाकर आरती गा रहा हूं.


वह इमली का पेड़, जिसके नीचे बैठ कर किशोर दा अलग अलग धुनों का सृजन किया करते थे.यही वह जगह है, जहां उन्होनें प्रसिद्ध गीत " मैं हूं झुम झुम खुम झुम झुमरू..." की धुन बनाई थी, और अपने दोस्तों को सुनाई थी.




ये चित्र ब्रोन्सन हाल का है जहां किशोर दा के कार्यक्रम हुए . अगला चित्र उस स्टेज पर रखे हुए डायस टेबल का है, जिसके पीछे छुपकर किशोर दा गाते थे. सुना है, कि तब वे बडे ही शर्मीले स्वभाव के थे , और जब भी उनको गाना गाने को कहा जाता , वे घबरा जाते थे.फ़िर दोस्तों ने ये शगुफ़ा किया कि उन्होने इसके पीछे छिपकर गाना गाया, और उनके मित्रों में से एक नें सामने होंठ हिला कर गाने का अभिनय किया(फ़िल्म पडोसन का पार्श्व गायन याद है!!)

बाद में एक बार लद्दाख में सुनील दत्त जी के साथ अजंता आर्ट्स के तले सीमा पर जवानों के मनोरंजन के एक कार्यक्रम में जब किशोर दा को गाने के लिये कहा गया, तो पता नहीं क्यों, वे फ़िर से झिझकने लगे, और गाने से मना करने लगे. बडी मुश्किल से सुनीलजी नें उन्हे पर्दे के पीछे से गाने के लिये मनाया, और ऐन वक्त पर, पूर्व योजना के अनुसार गाने के बीच में पर्दा उठा दिया!!!


जिस होस्टल में वे रहे वहां के चित्र - गलियारा और कमरा नं ४.







आपको फ़िल्म चलती का नाम गाडी का ये गीत तो याद ही होगा - पांच रुपैय्या बारह आना.....
जी हां जनाब, ये जुमला उनके छात्र जीवन से ही जुडा हुआ है. किस्सा हुआ यूं था कि इसी कॊलेज के कॆंन्टीन में किशोर दा के पांच रुपैय्या बारह आने बाकी थे जो अभी तक बकाया हैं!!(चित्र केंटीन वाले का)

मैने इस फ़िल्म को बनाने में काफ़ी जद्दोजेहेद भी की क्योंकि मैं एक एमेच्युअर हूं और इसे एडिट करने और ऒडियो मिक्स करने में दो चार दिन लग गये.इसलिये, आप मुझे क्षमा करेंगे, अगर कुछ ग़लती हुई हो तो.



जिनके कंप्युटर पर स्पीड की वजह से ये फ़िल्म नहीं चल रही हो, उनके लिये ही ये सभी चित्र भी लगाये गये हैं. साथ में दिलीप के दिल से ये गीत भी सुन सकते हैं- ये दिल ना होता बेचारा...

14 comments:

शरद कोकास said...

यह तो सारे स्मारक हैं । क्या कभी ऐसा होगा कि इन्हे महत्वपूर्ण स्मारक मानकर इनको संरक्षित रखने की व्यवस्था की जाये ?

दिलीप कवठेकर said...

आप सही फ़रमाते हैं.

इन्हे संरक्षित रखने के लिये कोई व्यवस्था नही हो पायेगी. सुना है, इसे तोड कर यहां शॊपिंग कॊम्प्लेक्स बनाने की योजना है कॊलेज प्रबंधन की.

लताजी इन्डौर में ही जन्मी हैं, मगर उनके जन्म स्थान के संरक्षण के लिये लिये पिछले कई सालों से कोशिश हो रही है, मगर शासन कुछ नहीं कर रहा, और प्रेमीयों के पास क्या है?

किशोर दा के जन्म स्थान के संरक्षण के बारे में कोशिशे चल रही थीं.

Vivek Rastogi said...

किशोर दा के बारे में अनूठी जानकारी।

seema gupta said...

किशोर दा के बारे में इतने विस्तार से रोचक जानकारी का आभार
regards

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत विस्तृत जानकारी दि आपने. अब सरकारों का हाल तो आप जानते ही हैं और फ़िर आपके शहर की राजनिती? तो मशाअल्लाह..जो ना करादे वो कम है.

रामराम.

अल्पना वर्मा said...

हरदिल अजीज़ किशोर जी के बारे में बहुत ही विस्तार से जानकारी दी है .
उनके कॉलेज के चित्र और सम्बंधित प्रमाण पत्र /पत्र आदि देखे.आप ने सब कुछ सहेज कर जो इतनी बढ़िया विडियो बनाई है ,उस में आप की मेहनत दिखाई दे रही है.पहली बार बनायी है इसलिए २-३ दिन लगे हैं आगे कम समय लगेगा.
-आप ने गीत 'ये दिल न होता'बहुत ही अच्छा गाया है.लगता है जैसे मूल गीत सुन रही हूँ.
बहुत ध्यान से सुनो तो ही अंतर मालूम चल पाता है.बधाई!

डॉ .अनुराग said...

ये तो बुकमार्क करने जैसी पोस्ट है जी......बेमिसाल

Old Monk said...

Excellent job Dilip. The planning, the effort, the concept, the desire to take us down the memory lane, the obvious passion are all extremely creditworthy.
The video has come up so well that it is a treasure to be preserved as a collector's item.
We all have been admiring yr musical prowess for long, but now we are also witnessing the other creative sides of yr personality.
Chuk De Dilip. Wish you many more decades of such fascinating gems.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लेख, इस लेख को तो आप विकि पिडिया पर डाल दे लाखो करोडो को पढने को मिलेगा, बहुत मेहनत से तेयार किया आप ने.
धन्यवाद

Manish Kumar said...

Bahut achcha laga kishore da ke college jeevan ke bare mein jankar aur aapke dwara kheenche in chitron ko dekhkar

काजल कुमार Kajal Kumar said...

किशोर कुमार के बारे में पढ़कर अच्छा लगा. काफी कुछ नया-नया व अंतरंग सा. धन्यवाद.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

दिलीपजी,
पहली बार आया आपके ब्लोग पर और आना सफल रहा। किशोर कुमार का जबरदस्त फैन हूं तो ज्यादा मज़ा आया। आपकी जानकारी ने मन भा लिया। मुझे पता है कि खन्डवा में जहां वे पैदा हुए, और अंतिम संस्कार हुआ, वहां कोई देखरेख नहीं है। दुख पहुंचता है यह सब देख सुन कर....

Nirmla Kapila said...

किशोर दा के बारे म्e ीस्तार से जान कर बहुत खुशी हुई बहुत बहुत धन्यवाद्

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

दिपील भाई , इतनी भक्ति से ,
आपके और हमारे हरदिल अज़ीज़
किशोर दा की याद की ,
ये जानकार अच्छा लगा -
गीत सुनकर ,
मेरा मन very happy है
और "पांच रुपैय्या बारा आना " का राज़
पुरानी कैंटीन से जुडा है
ये सुनकर मुस्कुरा रही हूँ :)
किशोर दा तो वाकई , कमाल हैं :-))

स स्नेह,


-- लावण्या

Blog Widget by LinkWithin