Sunday, May 23, 2010

अद्बुत , अद्भुत और अद्भुत ... मुकुल शिवपुत्र - कुमार जी गंधर्व के पुत्र.



अभी कल ही दोपहर को इंदौर पहूंचा. पिछले दिनों काम के सिलसिले में इजिप्ट में था, कैरो और सुएज़ में जहां की मानव निर्मित बडी नहर प्रसिद्ध है.

इन दो दिनों में बहुत कुछ हुआ.परसों रास्ते में अबु धाबी में दो तीन घंटे रुकना था, क्योंकि डायरेक्ट फ़्लाईट नहीं थी. तो सोचा अल्पनाजी से बात कर ली जाये. फोन नं था तो बात कर ली.

यूं तो अब तक उनके सुनहरे , हर फ़न में माहिर बहु आयामी व्यक्तित्व से परिचय हुआ था उनकी कविताओं से, उनके मधुर गायन से, उनके पहेलियों के व्यापक ग्यान से... और इस बार रूबरू बात करने का मौका मिला. अच्छा लगा.उन्होने भी पहली बार किसी भी ब्लोगर से बात की.(हमने लगभग चार पांच दोगाने (ड्युएट्स) एक साथ गाये हैं, पर नेट पर अलग अलग रिकोर्ड कर ये काम किया था.

एक बात लिखना चाहूंगा.. बहुत कम ही ऐसा होता है, हम सभी सिर्फ़ नेट पर मिले हैं, मगर लगता है, कि सभी के दिल मिल जाते हैं और वसुधैव कुटुम्बकम की तर्ज़ पर हम सभी एक परिवार के सदस्य हो जाते हैं. अल्पनाजी से सिर्फ़ मेल से खतो खिताबत हो जाती थी, मार उस रात को ११ बजे उनसे बात करने के बाद, एक बहन की तरह उन्होने मुझसे पूछ लिया कि खाना खाया क्या. मन भीग गया. धन्यवाद अल्पना जी.

इन्दौर आया तो पता चला कि महान गायक , सुरसाधक, लोकगीतों के प्रयोगधर्मी श्री कुमार जी गंधर्व की याद में उसी शाम को शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम होने वाला था, और गायक थे स्वयं कुमारजी के बडे सुपुत्र श्री मुकुल शिवपुत्र जो अपने दम पर खुद एक बेहद ही उम्दा ,ऊंचे पाये के कसे हुए गायक हैं.शायद आपमें से काफ़ी लोग उनके बारे में जानते भी होंगे.

मुकुल शिवपुत्र एक यायावरी, फ़कीरी , फ़क्कड तबियत के मालिक हैं, और पिछले कई सालों से गुमनामी की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं. कभी बीच बीच में खबर मिलती थी कि किसी मंदिर में कई दिनों से बिना खाये पिये बैठे हुए पाये गये.कई संगीत प्रेमियों नें उनकी मदत करने की भी कोशिश की, मगर उनका मिजाज़ नहीं बदला है.

इसलिये जब ये पता चला कि २० सालों बाद इन्दौर में उनका कार्यक्रम हो रहा है, तो मैं बडा रोमांचित हुआ कि वाकई आज सुरों की मेहफ़िल सजेगी.पुरानी यादें भी कुछ ताज़ा हो आयी जब कई सालों पहले उनसे कुमारजी के घर में, या मामासाह्ब मुज़ुमदार जी के घर मुलाकात हुआ करती थी.तब भी सनकी तो थे ही वे.

शाम को ताऊ का फ़ोन आया. कहने लगे क्या आप जाओगे कार्यक्रम में, क्योंकि आज ही रतजगा करके आये हो. मैं उन्हे बधाईयां देने की सोच ही र्हा था.फ़िर उन्होने कहा कि किसी वजह से वे जा नहीं पायेंगे, मगर क्या मैं उस कार्यक्रम की रिकोर्डिंग कर सकता हूं? मैंने कहा कि मैं भला ताऊ के आदेश का पालन नहीं करने की हिमाकत कर सकता हूं? फ़िर उन्होने साथ ही ये भी जोड दिया कि अल्पना जी को भी पता चला है और उन्होने भी अनुरोध किया है.



बस और क्या था. नेकी और पूछ पूछ ..अद्भुत , एक ही शब्द है. वहां पीछे बैठे एक श्रोता नें टिप्पणी की.. मुकुल साक्षात भगवान हैं, और क्या कहूं..यहां संगीत ईश्वर से एकाकार हो गया.

मुकुलजी को सर माथे पर बिठाया श्रोताओं ने जो इस बात से सिद्ध हुआ कि इंदौर में कल ४४ डिग्री का तापमान था, और सनक के लिये मशहूर मुकुलजी नें हॊल के पंखे बंद करवा दिये!पसीने में तर बतर प्रशंसकों ने इस सुर साधक को बडी तन्मयता और भावनाओं के सैलाब में डूब कर सुना!













तो सुनिये इतने बडे कार्यक्रम की एक बानगी स्वरूप छोटी क्लिपींग साथ में दे रहा हूं. डूब जाईये उस मस्ती में, उन रूहानी स्वरगंगा की मधुर लहरीयों में.



आप और मुकुल शिवपुत्र...






राग नट बिहाग में प्रस्तुत है मध्यलय तीन ताल में निबद्ध रचना झन झन झन झन पायल बाजे .. जो कुमारजी के घराने की विशेषता लिये हुए है..(और कोई गीत याद आया?)


Saturday, May 1, 2010

सुर देवता मन्ना दा को जन्मदिन पर आदरांजली...




कडी १


ये बात तो पक्की है, कि इतने दिनों गायब होने के बाद जब फ़िर से आपके संम्मुख आया हूं तो मुआफ़ी तो मांगना ज़रूरी है.

कितनी बार आपसे वादे किये, अपने आप से कसमें खायी,ब्लोग जगत के मेरे सुरीले परिवार से प्यार और वफ़ा का वास्ता भी दिया, मगर फ़िर वही ढाक के तीन पात.

चलिये मान लेते हैं कि -

कसमें वादें प्यार वफ़ा सब,बातें हैं बातों का क्या?
कोई किसी का नहीं ये झूटे , नाते हैं नातों का क्या?....

मगर क्या करें, दिल है के मानता नहीं, और आज मन्ना दा के जन्म दिन के पावन पर्व पर फ़िर हाज़िर हूं.

मन्ना दा तो हम सभी के , आपके, मेरे हर दिल अज़ीज़ गायक है ही, मेरे लिये तो वे मेरे सुर देवता भी हैं, आराध्य भी हैं.बचपन से जब समझ आयी तो अपने आपको रफ़ी साहब और मन्ना दा का मुरीद पाया. हीरो जो मन में बसे थे वे थे शम्मी कपूर और मेहमूद, तो ये मुहब्बत तो होनी ही थी.

मगर जब जब भी गानों के चयन की बात होती थी तो मन्ना दा के गीतों को गाने मे बडा चेलेंज लगता था.

रफ़ी साहब और मन्ना दा एक ही पाये के गुणी गायक हैं. स्वर में माधुर्य, गोलाई, मींड, लोच, हरकतें और सुरों पर गज़ब की पकड!! और स्वरों की रेंज तो बस लाजवाब, अतुलनीय.

रफ़ी साहब को तो अल्लाहताला नें हम से छीन ही लिया है, लेकिन उसी खुदा पाक का लाख लाख शुक्र है कि उसनें मन्ना दा को भरी पूरी ज़िंदगी बक्षी है, और आज ईश्वर की कृपा से वे ९०-९१ साल की उम्र में भी संगीत की सेवा कर रहे हैं.
(अभी सुना था कि उन्होनें पिछली शनिवार को लखनऊ में कार्यक्रम दिया था- सलाम !!)

मैं खुशनसीब हूं कि मालिक के फ़दल से मुझे हिंदुस्तान के कई नामचीन संगीतकार और गायक से मुलाकात का अवसर मिला. लेकिन मन्ना दा से रूबरू मिलने का एक छोटा मार मुख्तसर सा मौका मिला था करीब बीस बाईस साल पहले, जब वे इंदौर पधारे थे प्रतिष्ठित लता मंगेशकर पुरस्कार को प्राप्त करनें. मगर जल्दबाज़ी मे कुछ गुफ़्तगू नहीं हो पायी. पांच छः साल पहले उदयपुर में ज़रूर मिला था, कार्यक्रम के बेक स्टेज पर , मगर कार्यक्रम की उधेडबुन में ज़्यादह बात नहीं कर पाया. हां , दो साल पहले, १ मई को, मेरे किसी मित्र किशन का कलकत्ता से फोन आया, कि क्या मन्ना दा से बात करना चाहोगे?उसके पास उन्का फ़ोन नं आया था.

मैंने कहा नेकी और पूछ पूछ? तुरंतो मैने उसके दिये हुए फ़ोन नं पर बात की . संयोग से मन्ना दा ने स्वयं फोन उठाया.

मैं इतना बल्ले बल्ले हुआ जा रहा था, कि विशेष कुछ बातें हो नहीं पायी, बस दादा बोलते रहे, और मैं सुनता रहा, कि अब भी वो कैसे गा रहें है, और किस तरह से आज की फ़िल्मी दुनिया का संगीत उनको रास नहीं आता.

मैं शर्मा शर्मी में बोल नहीं पाया था कि मैं उनके गानों को गाता हूं, और वे समझे कि मैं कोई कार्यक्रम करने वाली संस्था से जुडा हूं, और उनका प्रोग्राम करवाना चाहता हूं.

फ़िर मुझे उनसे कहना पडा कि मैं उनका ज़बरदस्त फ़ॆन हूं, और उनके गानें गाता हूं, तो वो हंस पडे. कहने लगे कि तुम ज़रूर रफ़ी साहब के गाने गाते रहे होगे, और साथ साथ में मेरे भी गाने भी गाते होगे.उनका कहना था जो वाकई में सही भी है, कि हम अमूमन देखते हैं, कि कोई रफ़ी साह्ब को गा रहा है, कोई मुकेशजी, हेमंत दा, तलत मेहमूद जी को. मगर Exclusively मन्ना दा को गाने वाला नहीं मिला.

मैने कहा कि वैसे तो मैं सभी गायकों को गाता हूं, और amateur या शौकिया गायक हूं तो ज़रा नाराज़ ही हो गये. फ़िर भी उनसे कहा कि पिछले दिनों मैने उनके गानों पर आधारित एक कार्यक्रम दिया था (Exclusive Manna Dey only), तो बोले, ऐसा तो कभी सुना नहीं कि सिर्फ़ उनके थीम पर कोई कार्यक्रम हुआ हो .

तो मैंने सोचा कि अपने उस कार्यक्रम की सी डी उनको भिजवा दूं, तो उनसे पता लिया, और विनम्र प्रार्थना की कि समय मिला तो वे सुनें. तो वे बडे बच्चे जैसे भाव से बोले, कि भाई मेरे पास प्लेयर नहीं है.(शायद सही ही नही होगा कलकत्ता के घर में , क्योंकि वे तो ज़्यादहतर बंगलोर में ही रहते हैं, या फ़िर मुझसे बचने के लिये कहा हो!)

बरह हाल मैने तो सीडी अपने मित्र किशन के साथ भेज दी थी . अब सुना या नहीं ये उन्हे ही या फ़िर भगवान को ही पता.

मित्रों , उस कार्यक्रम का टाईटल था दिल का हाल सुने दिलवाला और उसमें से कुछ गानें , मैने यहां आपको सुनवाये थे और दिखवाये भी थे---




तू प्यार का सागर है,

सुर ना सजे,

तेरे नैना तलाश करें,

किसने चिलमन से मारा,

तू है मेरा प्रेम देवता..
.




तो आज मुझे इज़ाज़त दें कि आज उसी कार्यक्रम में से आपको दो गाने और सुनवाऊं, जिससे मन्ना दा के विलक्षण रेंज और विपरीत मूडस को बखूबी निभाने की अद्भुत प्रतिभा परिलक्षित होगी. साथ में आप लुत्फ़ उठायें कार्यक्रम के सूत्रधार संजय भाई (पटेल) के लाजवाब और श्रेष्ठ निवेदन का, जिससे एक perfect ambience बन जाता है, और श्रोता उस सुर के समंदर में डूबता उतरता जाता है.इसिलिए, गाने से पहले उनका निवेदन भी आपके समक्ष है.

कसमें वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या-

नैराश्य और वैराग्य की पृष्टभूमि में गाया यह गीत, एक ठहरे हुए पानी से भरे पोखर के किनारे हमें ले जाता है, और हम जीवन की इस सच्चाई से रूबरू होते हैं.




साथ में और सुनिये एक दोगाना, जिसमें मेरा साथ प्रियाणी वाणी नें दिया है, जो दो साल पहले की Star Voice Of India की finalist थी.

प्रस्तुत कार्यक्रम में मैने मन्ना दा के विभिन्न मूड्स और पहलू के गीत सुनाये, जिसमें रोमांटिक,हास्य,क्लासिकल और दर्द भरे गीत तो थे ही, मगर ये गीत भी लिया, कई सुनकार श्रोताओं के विरोध के बावजूद, क्योंकि, उदयपुर में मन्ना दा नें खुद कहा था कि मैं हर तरह के गानें गा सकता हूं और ये गीत उन्हे बहुत ही पसंद है!

ये दो गाना है ---

ओ मेरी मैना, तू मान ले मेरा कहना,

जिसे महमूद और मुमताज़ पर फ़िल्माया गया था.आप स्वयम देखें, कि ये वही मन्ना दा का गीत है, जिन्होने कसमें वादे प्यार वफ़ा सब और पूछो ना कैसे मैने जैसे लाजवाब गीत गाये.और इस डांस गीत में वह रवानी, थ्रो, और मस्ती भरा आलम किस खूबी से आया है मन्ना दा नें.

वैसे इस सब में मेरा तो कोई कमाल नहीं है, कमाल है मन्ना दा के लिये मेरी भक्ति का है.

Tuesday, March 16, 2010

साहिर की अंतरंग की पीडा़ का क्रंदन- जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है..




साहिर लुधियानवी


कडी़ २

पिछली पोस्ट पर आपकी टिप्पणियों के लिये शुक्रिया अदा करता हूं, क्योंकि वह पोस्ट काफ़ी समय बाद लिखी गयी थी,और लगा था कि आप मुझे भूल गये होंगे. (ऐसे ये हक है आपको, मेरे बात और है, मैने तो मुहब्बत की है).

मेरे मित्र OLD MONK नें फ़रमाया कि उन्हे व्यक्तिगत कारणों से आज क्यूं हमसे पर्दा है कव्वाली ज़्यादा माफ़िक लगी औरतों के लिये. तो उनसे गुज़ारिश है कि वे समय निकालकर अपने विचारों से इस बात की पुष्टि ज़रूर करेंगे ताकि उस अलग से एक पोस्ट पर डाला जा सके.वैसे ये बेहतरीन कव्वाली दिलीप के दिल के भी करीब है.

आज हम एक दूसरे गीत के बारे में बात करना चाहेंगे जिसका ज़िक्र पिछली पोस्ट में भी किया था---

जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है...





डॊ, अनुराग जी नें अपनी टिप्पणी में सही लिखा है कि यह रचना भारत की उस समय की वर्तमान परिस्थिति को बखूबी परिलक्षित करती थी ,और पं नेहरू की भी आंख की किरकिरी थी, जिसके बारे में साहिर नें अपनी तीखी कलम से सही खाका खींचा था.

वैसे फ़िल्म प्यासा में आप हम नें देखा, सुना और उसके बेहतर चित्रीकरण , केमरा संचालन , प्रकाश संयोजन का कमाल देखा (दादा साहेब फ़ालके पुरस्कार २००९ के विजेता फ़ोटोग्राफ़र श्री मूर्ती की कलाकारी के बदौलत). लेकिन इमानदारी से कहूं तो गुरुदत्त के कौशलपूर्ण निर्देशन और भावपूर्ण अभिनय की साथ मिलने से बेहतर हुए एक क्लासिक फ़िल्म की इस क्लासिक रचना का असली श्रेय साहिर को दिया जाये या गुरुदात को ये मैं तय नहीं कर पाऊंगा. ये आप ही तय किजिये.

अधिकतर ,प्यासा के आसपास फ़िल्मी दुनिया में यह चलन शुरु हो चुका था कि पहले एक अच्छी, रसीली, कर्णप्रिय तर्ज़ बना ली जाती थी और उसके अनुरूप गीतकार से फ़िल्म की सिच्युएशन के हिसाब से गीत लिखवा लिया जाता था.एस डी बर्मन साहब को कमोबेश इसका श्रेय दिया जा सकता है, और प्यासा में भी कुछ गीतों के संदर्भ में यही हुआ भी था.

मगर आपको ये जानकार कौतुहूल होगा और आश्चर्य कि प्यासा फ़िल्म का जब इंतेखा़ब किया गया था तो नायक विजय एक चित्रकार था, शायर नहीं.फ़िल्म की नायिका (माला सिन्हा) एक अमीरज़ादी थी जो चित्रकार के पेंटिंग्स की प्रदर्शनी करा कर उसे इस्तेमाल करती थी , सोसाईटी में अपने वजूद और वका़र का लोहा मनवाने के लिये.गुलाबो का तो कहीं पता ही नहीं था!!

फ़िल्म के लेखक अब्रार अल्वी जिनका अभी अभी इंतेकाल हुआ है, इस फ़िल्म के लेखक थे, और गुरुदत्त के फ़िल्म कंपनी में मुलाजिम भी. मगर जब गुरुदत्तजी नें साहिर नें लिखी हुई गज़लों की किताब परछाईयां पढी तो वे इस कदर दिवाने हुए उसमें लिखे गीतों को अपनी फ़िल्म प्यासा में शामिल करने के लिये बेचैन हो गये. यहां तक कि उन्होने नायक विजय के पात्र ही चित्रकार से शायर में बदल डाला!!






इस गज़ल संग्रह में से गीतों को लेने का मतलब था सचिन दा के लिये एक बडी चुनौती, क्योंकि भले ही मोटे तौर पर शब्दों को मीटर में लिखा गया होगा, मगर भावाभिव्यक्ति और नज़रिये को सही और पैने तौर पर रखने के लिये कहीं कहीं शायरी को तवज्जो दी गयी तरन्नुम की जगह.

वैसे सर जो तेरा चकराये/हो लाख मुसीबत रस्ते पर/हम आपकी आंखों में.. आदि गीत धुन बनवाने के बाद लिखे गये.मगर बाकी गीतों का इतिहास अलग है.

इसलिये आप देखिये एक गाना था - तंग आ चुके हैं कशमकशे ज़िंदगी से हम - जिसे मुशायरे में पढने की वजह से सिर्फ़ गुनगुना कर गवाया गया रफ़ी साहब से.( बाद में यही गीत आशा भोंसले नें फ़िल्म लाईट हाऊस के लिये एन दत्ता के संगीत निर्देशन में गाया था). आप सुनियेगा इस गीत को तो आप वाकई रफ़ी साहब के काय हो जायेंगे, कि बिना किसी सुर या ताल के कितना मधुर और मेलोडी की चासनी में दर्द को डुबा कर गाया है रफ़ी साहब नें.

दूसरा गीत है जाने वो कैसे लोग थे जिनसे... जो परछाईयां में से ही लिया गया, जिसके धुन बाद में बनाई गयी.गुरुदत्त और साहिर अड गये थे इस गाने को रफ़ी जी से गवांने के लिये , मगर मानना पडे़गा सचिन दा की संगीत की सोच और पकड़ की, कि उन्होने इस गीत को हेमंत दा से ही गवाया. यही बात बाद में गुरुदत्त/साहिर/सचिनदा के बीच की कशमकश और खाई की सबब बनीं(कडी ४ या ५ में )

और सबसे महत्व पूर्ण गीत था जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है?

क्या आप मानेंगे कि इस गीत की लय, शब्दों का मेनेजमेंट, एकदम अलग नहीं है? पायल की छन छन पर घुंगरू की आवाज़, तबले की धन धन पर तबले की आवाज़,खांसी की ठन ठन पर खांसी की और सिक्कों की झंकार पर साऊंड बाईटस के द्वारा साहिर की मनचाही नाटकीयता रचायी गयी.

अल्पना जी नें भी अपनी टिप्पणी में सही लिखा है कि साहिर की संवेदनशीलता ,साफ़गोई और तीखे चुभन लिये शब्दों के पीछे उनके व्यक्तिगत जीवन के अनुभव ही ज़िम्मेदार थे.

ज़रा ध्यान दें...

ये फ़ूलों के गजरे , ये पींको के छीटें,
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख़ फ़िकरे,
ये ढ़लके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है? कहां है, कहां है , कहां है?

यकीन मानिये, जब साहिर नें ये बोल लिखे थे तो उसके सामने कोई सिच्युएशन नहीं थी. सिर्फ़ एक कविमन, या शायर के ज़ज़बातों की , पेथोस की अभिव्यक्ति थी या मन की पीडा का क्रंदन था.गुरुदत्त भी तो थे एक मासूम, ज़ज़बाती और संवेदनशील मन के मालिक.इसी वजह से ये क्रंदन सीधे उनके दिल के अंदर उतर गया.उन्हे ये लगने लगा कि साहिर के अंतरंग की इस पीडा़, इस झटपटाहट को चित्र रूप देकर रीयल लाईफ़ से रील लाईफ़ में लाकर उसे डिफ़ाईन किया जाये , सिनेमा के दर्शकों के लिये परिभाषित किया जाये.शायद इसी तरह से , इस तरह की रचना को प्यासा में डाल कर इस फ़िल्म को काव्यात्मक ऊंचाई पर ले जाया जा सके.


इसलिये उन्होंने अब्रार अल्वी को समन किया और कहा कि कुछ भी हो जाये, कुछ ऐसी सिच्युएशन पैदा करो ताकि इस फ़िल्म में रचना प्रभावी तरीके से फ़िल्माई जा सके.

तो देखिये साहिर द्वारा लिखे गये इन अमर अश’आर के लिये अब्रार अल्वी नें कैसी सिच्युएशन लिखी और महान गुरुदत्त नें अपनी कलात्मक और क्रियेटिव कौशल से उसके साथ कैसा न्याय किया.और सचिनदा की धुन पर रफ़ी साहब की दर्द में सोखी हुई पुरनूर आवाज़! कंबख्त , क्या कोंबिनेशन है जनाब!



क्या इससे बेहतर कोई और सिच्युएशन या पिक्चराएज़ेशन का इंतेखाब किया जा सकता है?

(अगली कडी में कैसे गुरुदत्त को इस गाने के लिये सिच्युएशन मिली .... कडी ३ में , बस इंतेज़ार करें, क्योंकि बडी पोस्ट से परहेज कर रहा हूं)

Wednesday, March 10, 2010

औरत नें जनम दिया मर्दों को.. साहिर की चुभती हुई रचना..


साहिर

कडी १


दो दिनों पहले ८ मार्च को अज़ीम शायर साहिर लुध्यानवी का जन्म दिन था. वह भी विश्व महिला दिवस के दिन!! क्या ये एक महज़ संयोग माना जाये या इसके पीछे विधाता का कोई डिज़ाईन है, कोई बडा़ मंतव्य है?

शायद हां. आप साहिर के अश’आर सुनें ,पढे़, तो उसमें आपको नारी के लिये एक जुनून की हद के पार जाती हुई संवेदनायें मिलेंगी. अहसासात के इस गहराते मंज़र की बानगी आपको उनके कई फ़िल्मी गीतों में मिलेगी, जिसमें कमोबेश किसी औरत की दिल की हकी़कतबयानी की गयी हो.


औरत नें जनम दिया मर्दों को एक ऐसा ही गीत है.




ज़िंदगी के इस नंगी सच्चाई को कितनी पीडा़ और ज़ल्लत के साथ उतारा है शब्दों में, और साथ में कमज़र्फ़ मर्दों की मानसिकता SICKNESS की सीमा तक बयां कर जाती है.साहिर वैसे तो मुला’इम और गुलाबी रूमानी गज़लें और गीत भी लिखतें है, मगर इस गीत में उन्होने जो दिल खराश और खारदार लफ़्ज़ों को पिरोया है वह किसी भी हाजी दिलसोज़ इंसां को पिघलाने का माद्दा रखतें हैं.साफ़गोई और तीखे चुभन लिये इन कठोर शब्दों से आप में से किसी के जिगर को अगर चाक नहीं किया हो तो मुलाहिज़ा फ़रमायें...

साहिर नें सब कुछ लिख दिया है फ़िल्म साधना के इस गीत में, मैं बहुत ही अदना मुलाज़िम हूं आप जैसे इल्मदानों और कदरदानों का. इसे विस्तार करना मेरे बस की बात नहीं....हां , एन दत्ता नें भी अपने नफ़ीज़ तर्ज़ से इस गाने के साथ इंसाफ़ किया है.(याद है इसी फ़िल्म की कव्वाली - आज क्यूं हम से पर्दा है?)





यूं नहीं कि साहिर के इस अजा’ईबखाने में इस तरह के और असलाह हथियार नहीं है.

याद किजिये फ़िल्म प्यासा का वह कालजयी गीत ...

ये कूचे , ये नीलाम घर दिलकशीं के,
ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के,
कहां है कहां है मुहाफ़िज़ खुदी के,
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है?


बडी पोस्ट नहीं चाहता इसलिये अगले तीन दिनों में वादा कि इस बार इस गीत को लिखने की साहिर की मानसिकता,गुरुदत्त का जुनून और ,प्यासा फ़िल्म में चित्रिकरण की पार्श्वभूमि, सभी विस्तार से लिखूंगा....

Monday, January 18, 2010

है दुनिया उसीकी,ज़माना उसीका... ओ पी नय्यर और रफ़ी का दर्द में डूबा हुआ एक कालजयी गीत



आज लगभग एक महिना होने आया, आपसे मुखातिब नहीं हो पाया.

पिताजी की तबियत के कारण, काम में थोडा पिछड गया था. मूड भी नहीं बन पा रहा था. गोया कोई बडा़ उपन्यास लिखना था,जो मूड बना रहा था.

इन दिनों, रफ़ी साहब का जन्म दिन चला गया २४ दिसंबर को. मैं संयोग से एक दिन पहले मुंबई में था, तो किसी से मिलने शाम को बांद्रा में था, तो पता चला, रफ़ी साहब का पुराना घर वहीं करीब था. बस, दिल नें चाहा और मैं निकल पडा.

मगर वहां चूंकि रेडियो मिर्ची FM की टीम आयी हुई थी, अंदर जाना संभव नहीं हो पाया, क्योंकि वह कोई किसी फ़िल्म का प्रीमीयर नहीं था जो भागम भाग में चला जाता. बस सोचा बाद में सुकून से दिली सुकूं पाने के लिये फ़िर आऊंगा. बस नीचे रखी हुई उनकी फ़ियेट ज़रूर देखी, जिसमें चाबी लगी हुई थी, और वही छल्ला जो रफ़ी साहब जेब में रखते थे, जब भी वे शौक से खुद गाडी चलाते थे. ऊपर जाना फ़िर कभी ....

फ़िर महेंद्र कपूर जी का भी जन्म दिन चला गया, ९ जनवरी को. उनके साथ बिताये कुछ लमहे याद किये और उनके गाये हुए गीत सुने और गुनगुनाये.

अब परसों स्व. ओ पी नय्यर साहब का जन्म दिन था. दो साल पहले इसी दिन उनसे मिलने जा पहुंचा था उनसे मिलने, मगर मिल नहीं पाया क्योंकि वे कहीं विरार गये थे आदिवासीयों में डाक्टरी करने. कुछ दिन बाद उनके निधन की खबर आयी, तो दिल को धक्का पहुंचा कि दुर्भाग्य रहा था मेरा.

खैर, रफ़ी जी और नय्यर साहब की जोडी तो सबसे ज़्यादह मकबूल हुई. करीब १५० से अधिक गानें उन्होने रफ़ी जी से गवाये. फ़िर महेंद्र कपूर जी से. किशोरदा, मुकेशजी ,हेमंतदा,मन्ना दा तो कम ही गा पाये उनकी बनाई तर्ज़ों पर. और तो और सरदार मलिक की तरह नय्यर साहब नें भी राज कपूर के लियी रफ़ी साहब को गवाया.


रफ़ी साहब को हमेशा यही मलाल रहा कि वे हमेशा हर हीरो या नायक के चरित्र, मेनरिझ्म और अदायगी की तरह से अपनी आवाज़ को बदल लेते थे, जबकि उन्हे लता जी की यह बात बडी़ ही अच्छी लगती थी लता जी नें कभी भी अपनी आवाज़ को नहीं बदला. लताजी के अनबन के बाद जब उनकी फ़िर से लता जी के साथ दिल जमाई हुई, तो उन्होने नय्यर साहब को यह बात बताई थी. नय्यर साहब बहुत हंसे थे, और उन्होने कहा था कि आप जिसे अपनी कमज़ोरी मान रहे हैं , वह तो आपकी खा़सियत है, जो दूसरे गायक कलाकारों को संभव नहीं है.

नय्यर साहब नें कई गानों की धुन बनाईं, ठसक के साथ पंजाबी ठेके पर , ढोलक की दुडकी चाल पर .चेलो, क्लेरिनेट और सॆक्सोफ़ोन जैसे पाश्चात्य वाद्यों से लेकर सारंगी , सितार ,और बांसुरी जैसे खालिस देसी वाद्यों का भरपूर उपयोग किया. मस्त ,रंगीन रोमांटिक गानों पर महारत रखनें वाले नय्यर साहब कभी कभी दर्द भरे गानों का भी सृजन बखूबी किया करते थे .

मेरी पसंद के दो महानतम दर्द भरे गानों की फ़ेहरिस्त में आपके दो गानें है:

चैन से हमको कभी .. और

है दुनिया उसीकी, ज़माना उसीका......



जी हां , फ़िल्म कश्मीर की कली का यह गीत दर्द के एहसासात की इंतेहां बयान करता है. रफ़ी साहब के भीगे हुए स्वरों में एस एच बिहारी नें लिखे हुए भावपूर्ण अश’आर, नय्यर साहब की पेथोस से भरी तर्ज़ में जब हमारे कानों में पडते हैं ,तो ज़माने भर के मुहब्बत करने वाले प्रेमीयों के टूटे दिलों के साथ आपके संवेदनशील दिल के तार अपने आप जुड जाते हैं, और आप उसी भाव में दर्द के उस सागर में डूबने उतरने लगते हैं. साथ में प्रस्तुत सॆक्सोफ़ोन की प्रील्युड और इंटरल्युड में सोलो रेंडरिंग आपके कलेजे को चीर डालती है, और भावनाओं से लहु लुहान हो कर शम्मी कपूर, रफ़ी जी, नयार साहब और आप एकजीव हो जाते हैं
.

कौन नहीं चाहेगा इस तडप को , मेहबूब की बेवफ़ाई को जीना, भोगना?

चलिये, आपको यह गीत सुनवा देतें है. इसके विडियो को मिक्सिंग के लिये उपलब्ध कराने के लिये अल्पना जी का धन्यवाद. आप भी यह प्रयास देखें , सुनें, और पसंद आये तो दाद दिजीये. जिन्हे संगीत और रिकोर्डिंग में दिलचस्पी हो, उन्हे बता देना उचित होगा, कि यह असंभव ही है, कि किसी भी गाने का कराओके उस्के ओरिजिनल साऊंडट्रॆक से हूबहू मॆच करे. प्रस्तुत गाने की विडियो क्लिपिंग में मूल गाने को कराओके ट्रेक के साथ पहले सोफ़्ट्वेयर की मदत से कोशिश करके मिलाया, स्स्वर, ताल और लिप्स मूव्हमेंट में, फ़िर उसपर गीत रिकोर्ड किया और मिक्स किया. ऐसे प्रयोग करने सें जो दिली सुकून मिलता है, वह आप जैसे कलाकार या कवियों को पता ही है.

(आज फ़िल्मी जगत के प्रथम सिंगिंग सुपरस्टार के एल सहगल साहब की भी पुण्यतिथी है. रात को उनके गानों की समाधि में बैठूंगा)





ओडियो प्लेयर भी लगाया है, जिन्हे विडियो स्ट्रीमिंग में परेशानी आती है, उनके लिये. बाकि विडियो के लिये प्ले का बटन दबाने के बाद pause करने से थोडे देर बाद बिना रुके देख सुन सकने में आसानी होगी.

Sunday, December 20, 2009

राज कपूर और शैलेंद्र... दोस्त दोस्त ना रहा...


मैं पिछले दो महिनों से इस दिन के लिये इंतेज़ार कर रहा था. यह दिन था १४ दिसंबर, जिस दिन हमारे हर दिल अज़ीज़ , फ़िल्म जगत के सबसे बडे , सर्व श्रेष्ठ शोमन राज कपूर का जन्म दिन था, और भावुक हृदय के , मानव संवेदनाओं को अचूक शब्दों और पद्य में ढालने वाले फ़िल्मी गानों के सर्व श्रेष्ठ गीतकार शैलेंद्र की पुण्य़तिथी थी.

मगर संयोग से मेरे पिताजी को दिल के दौरे की वजह से अस्पताल भर्ती करना पडा और इसलिये मैं उस दिन पोस्ट लिखने से चूक गया. खैर कोई बात नहीं. पिताजी अच्छे हो कर घर आ गये हैं तो आप भी तो घर वाले ही हैं, अब लिख देतें हैं.

राज कपूर एक बेहतरीन फ़िल्म निर्माता , निर्देशक एवं अभिनेता थे ये हर व्यक्ति जानता ही है.मगर वे एक बेहद संवेदनशील व्यक्तित्व के इंसान थे, जिसमें ह्युमन पेथोस, मानवीय मूल्यों और करुणा के आकलन का जजबा था. साथ ही में वे एक आला दर्ज़े के संगीत मर्मग्य भी थी. मैं तो ये भी कहूंगा कि वे एक बेहतरीन संगीतकार भी थे, और उनके फ़िल्म के हर फ़्रेम के हर प्लॊट के, हर सिच्युएशन के मूड्स को वे स्वरों की भाषा में डिफ़ाईन करना या अविष्कृत करना जानते थे.

दोस्त दोस्त ना रहा...


ये गीत मुझे कई कारणों से बहुत ही दिल के करीब लगता है. मेलोडी के बादशाह संगीतकार शंकर जयकिशन के संगीत में निबद्ध इस गीत में मित्र और पत्नी के लिये नायक के भग्न हृदय के कातर विचारों को बहुत ही असरदार तरीके से भाव प्रवीण बोलों में पिरोया है कविश्रेष्ठ शैलेंद्रजी नें और उन संवेदनाओं को ,उस चुभन को भीगे हुए स्वरों में अनुनादित किया है मुकेशजी नें , जिसके कारण यह गीत एक कालजयी गीत बन गया है.

मगर अगर आपने फ़िल्म देखी हो, तो ये भी कहना पडेगा कि राज जी नें वाकई में इस गीत में अपना दिल और उसके इमोशन्स उंडेल कर रख दिये हैं. आप देखिये , ये गाना पिक्चराईज़ करना बहुत ही मुश्किल होना चाहिये था. दर्शक से खुद राज जी गीत के माध्यम से रू ब रू होते हैं, अपने नज़रिये से, अपने दिल के ज़ख्मों को बयान करते हुए.


मगर साथ में गीत के दोनों इंटरल्युडस में आप देखते हैं विज़्युअल्स का कोलाज़ , पहले राजेंद्र कुमार के चेहरे के भावों के एक्स्प्रेशन पर फ़्लेशबेक के स्मृतिचित्रों से, और बाद में वैजयंतीमाला के, जिससे उनके नज़रिये में होते हुए बदल तक को राज जी नें कमाल के एडिटिंग से दर्शाया है.


साथ में पार्श्व में शंकर जयकिशन जी के उद्वेलित करने वाले पियानो के स्ट्रिंग नोट्स, मानो आपके दिल पर हथौडे से वार कर रहे हों , और काऊंट्रा मेलोडी के साथ प्रयुक्त किये हुए वायलीन के आरी के तरह रूह को चीरते हुए स्वर, इस गीत को अमर बना देती है.

कहा जाता है,कि ये गीत शैलेंद्रजी नें भारत चीन की दोस्ती के और युद्ध के संदर्भ में लिखा था.ये भी कहा जाता है कि तीसरी कसम को बनाने के लिये जब शैलेंद्र ने ठानी तो राज कपूर नें उनको मना किया था. फ़िर इस फ़िल्म के बनने में भी राज कपूर नें लगभग असहयोग ही किया. तो सही माने में इस गीत के बोल सार्थक हुए और एक दोस्त जान से चला गया.

उधर कोई ये भी कहता है कि ये बात गलत है, क्यों कि इस फ़िल्म के लेखक फ़णीश्वर नाथ रेणु , जिनकी किताब पर यह फ़िल्म बनीं थी, नें अपने संस्मरणों में कभी ये ज़िक्र नहीं किया कि ऐसी कोई बात थी.

ज़्यादह नहीं लिखता हूं, आपको ये फ़िल्म की क्लिप दिखाता हूं, मगर एक छोटी सी गुस्ताखी के साथ, कि ये भी मेरी स्वरांजली ही है, दिलीप के दिल से....

Friday, December 4, 2009

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे


सचिन्द्र देव बर्मन, ये नाम मेरी पिछली पोस्ट पर चमक रहा था. अब भी मेरे मन में घुला घुला सा, गुनगुनाया सा नाच रहा है. कुछ भी लिख दूं, उनके लिये अधूरा सा लगता है.

और तो और, जब उनकी धुनों पर रचे गये गीत जब मैं गुनगुनाता हूं, तो वे खुद मुझमें परकाया प्रवेश से कर जाते है ,और मैं अपने गले से निकलती हुई इठलाती हुई स्वर लहरियां सुन कर,उनकी बंदिशों की मुरकीयों और हरकतों की बारीकी से और रिदम की लयकारी से अभिभूत हो कर, ना जाने किस संसार में पहुंच जाता हूं.फ़िर भी अधूरा पाता हूं अपने आप को. उनकी ये अद्भुत स्वररचना का क्षितिज़ दिखता भर है,पार जाना असंभव है.

आज इतने दिनों बाद मैं आपसे मुखातिब हूं , फ़िर भी सचिन दा की बनाई गयी धुनों के मोह जाल में अभी भी गिरफ़्तार हूं,इसलिये एक और पोस्ट पेशे खिदमत...


सचिन दा फ़िल्मों के चयन को लेकर बेहद चूज़ी थे. वे सिर्फ़ उन्ही के लिये संगीत देते थे जिन्हे संगीत की समझ थी.
गायक के चुनाव करते हुए भी वे उतने ही चूज़ी होते थे. सुना है, जिस दिन उनकी रेकॊर्डिन्ग होती थी, वे सुबह गायक से फोन से बात करते थे और बातचीत के दौरान पता लगा लेते थे कि उस दिन उस गायक या गायिका के स्वर की क्या गुणवत्ता है.एक बार किशोर दा के किसी पुराने नटखट गाने को सुबह कहीं रेडियो पर सुना, और एकदम फ़ोन घुमा दिया- किशोर, आज की रिकोर्डिंग में मुझे छिछोरा पन नहीं चलेगा... किशोर दा सोचते ही रह गये कि जितनी संजीदगी से उन्होने उस दर्द भरे गीत की रिहल्सल की थी, उसमें छिछोरापन कहां से दिख गया दादा को!!

संगीत के कंपोज़िशन के साथ ही वाद्यों के ओर्केस्ट्राइज़ेशन की भी बारीकीयां उन्हे पता थी.एक दिन किसी कारणवश एक की जगह दो वायोलीन वादक रिकॊर्डिन्ग में बजा रहे थे, तो दादा नें कंट्रोल केबिन से साज़ों के हुजूम में से यह बात पकड़ ली.उन्होने कहा, मैं एक ही वायोलीन का इफ़ेक्ट चाहता हूं.

वे इस बात को मानते थे, और अपने बेटे राहुल को भी उन्होने यह बात बडे़ गंभीरता से समझाई थी कि हमेशा कुछ नया सृजन किया करो, ताकि लोगों में यह आतुरता बनी रहे, कि अब क्या. जब तीसरी मंज़िल फ़िल्म के लिये पंचम ने सभी गीत लगभग वेस्टर्न स्टाईल से दिये तो दादा बेहद खुश हुए. वे धोती कुर्ता ज़रूर पहनते थे मगर मन से बडे आधुनिक या मोडर्न थे.


पंचम से वे बेहद प्यार करते थे. एक दिन जब वे कहीं टहल रहे थे तो बच्चों के किसी समूह में से एक ने कहा- देखो, वे आर डी बर्मन के पिताजी जा रहे हैं. वे उस दिन बडे खुश होकर सब को पान खिलाने लगे (वे जब खुश होते थे तो सब को पान खिलाया करते थे)

किसी कारणवश प्यासा के समय उनकी बातचीत लता से बंद हो गयी थी. तो उन्होने आशा से गाने गवाये, मगर बाद में पंचम की वजह से छोटे नवाब की रिकोर्डिंग के समय वह रूठना खत्म हुआ.

सचिन दा से समय तक गीत पहले लिखे जाते थे, बाद में धुन बनाई जाती थी. दादा इतने नैसर्गिक कम्पोज़र थे कि मिनटों में धुन बना लेते थे, और इसीलियी उन्होने यह प्रथा पहली बार डाली कि पहले धुन बनेगी बाद में उसपर बोल बिठाये जायेंगे. साहिर, मजरूह और शैलेंद्र के साथ उनके कई गीत बनें, मगर देव आनंद नें नीरज, हसरत और पं. नरेन्द्र शर्मा से भी कई गीत लिखवाये जो हिन्दी में साहित्यिक वज़न रखते थे. पं. नरेन्द्र शर्मा से तो वे बडे़ खुश रहते थे क्योंकि वे भी मिनटों में कोई भी गीत रच लेते थे, वह भी बहर में, और विषय से बाबस्ता.

प्यासा फ़िल्म में गुरुदत्त नें उनसे एक गीत बिना किसी साज़ के भी बनवाया और रफ़ी से गवाया था. (तंग आ चुके है कश्मकशे जिंदगी से हम- जो बाद में फ़िल्म लाईट हाऊस में एन.दत्ता के निर्देशन में आशा नें भी गाया). साहिर की एक काव्य संग्रह 'परछाईयां' से उन्होने कुछ चुनिंदा रचनायें चुनी और सचिन दा से धुन बनवाई. जैसे जिन्हे -नाज़ है हिन्द पर वो कहां है, जाने वो कैसे लोग थे - फ़िल्म के बाकी गानो में आपको सचिन दा के अंदाज़ के गानें मिले होंगे- सर जो तेरा चकराये, हम आप की आंखों में आदि. मगर आपनें भी सुन ही लिया है, कि दूसरे गीत कितने अलग ढंग से संगीत बद्ध किये दादा नें.

यह फ़िल्म उनके गुरुदत्त और सचिन दा के जोडी़ का एक काव्यात्मक ऊंचाई प्राप्त करने वाला कमाल ही था, जो प्यासा के बाद दादा और साहिर के मनमुटाव के बाद टूट गया. सचिन दा का बोलबाला तब इतना बढ़ गया था कि गुरुदत्त को कागज़ के फ़ूल फ़िल्म के समय दोनों में से जब एक को चुनना पडा़ तो उन्होने दादा को ही चुना.(अबरार अल्वी अब नहीं रहे, उन्होने ये किस्सा कहीं बताया था, तो किसी और मौके पर वह भी सुना देंगे)

उनके गीतों में जो लोकगीतों की महक थी वह उत्तर पूर्व भारत के भटियाली, सारी और धमैल आदि ट्रेडिशन से उपजी थी. उनकी आवाज़ पतली ज़रूर थी मगर दमदार और एक विशिष्ट ठसके वाले लहजे की वजह से पृष्ठभूमि में गाये जाने वाले गीतों के लिये बड़ी सराही गयी.

आज फ़िर इच्छा हो रही है कि उनकी आवाज़ में भी एक गीत गाऊं -

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे...




'बड़ी सूनी सूनी सी है, ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी ' इस गीत के रिकॊर्डिंग के दो दिन बाद ही वे हमें छोड़ कर चले गये और गाने के बोल सार्थक कर गये.
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