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Saturday, May 1, 2010

सुर देवता मन्ना दा को जन्मदिन पर आदरांजली...




कडी १


ये बात तो पक्की है, कि इतने दिनों गायब होने के बाद जब फ़िर से आपके संम्मुख आया हूं तो मुआफ़ी तो मांगना ज़रूरी है.

कितनी बार आपसे वादे किये, अपने आप से कसमें खायी,ब्लोग जगत के मेरे सुरीले परिवार से प्यार और वफ़ा का वास्ता भी दिया, मगर फ़िर वही ढाक के तीन पात.

चलिये मान लेते हैं कि -

कसमें वादें प्यार वफ़ा सब,बातें हैं बातों का क्या?
कोई किसी का नहीं ये झूटे , नाते हैं नातों का क्या?....

मगर क्या करें, दिल है के मानता नहीं, और आज मन्ना दा के जन्म दिन के पावन पर्व पर फ़िर हाज़िर हूं.

मन्ना दा तो हम सभी के , आपके, मेरे हर दिल अज़ीज़ गायक है ही, मेरे लिये तो वे मेरे सुर देवता भी हैं, आराध्य भी हैं.बचपन से जब समझ आयी तो अपने आपको रफ़ी साहब और मन्ना दा का मुरीद पाया. हीरो जो मन में बसे थे वे थे शम्मी कपूर और मेहमूद, तो ये मुहब्बत तो होनी ही थी.

मगर जब जब भी गानों के चयन की बात होती थी तो मन्ना दा के गीतों को गाने मे बडा चेलेंज लगता था.

रफ़ी साहब और मन्ना दा एक ही पाये के गुणी गायक हैं. स्वर में माधुर्य, गोलाई, मींड, लोच, हरकतें और सुरों पर गज़ब की पकड!! और स्वरों की रेंज तो बस लाजवाब, अतुलनीय.

रफ़ी साहब को तो अल्लाहताला नें हम से छीन ही लिया है, लेकिन उसी खुदा पाक का लाख लाख शुक्र है कि उसनें मन्ना दा को भरी पूरी ज़िंदगी बक्षी है, और आज ईश्वर की कृपा से वे ९०-९१ साल की उम्र में भी संगीत की सेवा कर रहे हैं.
(अभी सुना था कि उन्होनें पिछली शनिवार को लखनऊ में कार्यक्रम दिया था- सलाम !!)

मैं खुशनसीब हूं कि मालिक के फ़दल से मुझे हिंदुस्तान के कई नामचीन संगीतकार और गायक से मुलाकात का अवसर मिला. लेकिन मन्ना दा से रूबरू मिलने का एक छोटा मार मुख्तसर सा मौका मिला था करीब बीस बाईस साल पहले, जब वे इंदौर पधारे थे प्रतिष्ठित लता मंगेशकर पुरस्कार को प्राप्त करनें. मगर जल्दबाज़ी मे कुछ गुफ़्तगू नहीं हो पायी. पांच छः साल पहले उदयपुर में ज़रूर मिला था, कार्यक्रम के बेक स्टेज पर , मगर कार्यक्रम की उधेडबुन में ज़्यादह बात नहीं कर पाया. हां , दो साल पहले, १ मई को, मेरे किसी मित्र किशन का कलकत्ता से फोन आया, कि क्या मन्ना दा से बात करना चाहोगे?उसके पास उन्का फ़ोन नं आया था.

मैंने कहा नेकी और पूछ पूछ? तुरंतो मैने उसके दिये हुए फ़ोन नं पर बात की . संयोग से मन्ना दा ने स्वयं फोन उठाया.

मैं इतना बल्ले बल्ले हुआ जा रहा था, कि विशेष कुछ बातें हो नहीं पायी, बस दादा बोलते रहे, और मैं सुनता रहा, कि अब भी वो कैसे गा रहें है, और किस तरह से आज की फ़िल्मी दुनिया का संगीत उनको रास नहीं आता.

मैं शर्मा शर्मी में बोल नहीं पाया था कि मैं उनके गानों को गाता हूं, और वे समझे कि मैं कोई कार्यक्रम करने वाली संस्था से जुडा हूं, और उनका प्रोग्राम करवाना चाहता हूं.

फ़िर मुझे उनसे कहना पडा कि मैं उनका ज़बरदस्त फ़ॆन हूं, और उनके गानें गाता हूं, तो वो हंस पडे. कहने लगे कि तुम ज़रूर रफ़ी साहब के गाने गाते रहे होगे, और साथ साथ में मेरे भी गाने भी गाते होगे.उनका कहना था जो वाकई में सही भी है, कि हम अमूमन देखते हैं, कि कोई रफ़ी साह्ब को गा रहा है, कोई मुकेशजी, हेमंत दा, तलत मेहमूद जी को. मगर Exclusively मन्ना दा को गाने वाला नहीं मिला.

मैने कहा कि वैसे तो मैं सभी गायकों को गाता हूं, और amateur या शौकिया गायक हूं तो ज़रा नाराज़ ही हो गये. फ़िर भी उनसे कहा कि पिछले दिनों मैने उनके गानों पर आधारित एक कार्यक्रम दिया था (Exclusive Manna Dey only), तो बोले, ऐसा तो कभी सुना नहीं कि सिर्फ़ उनके थीम पर कोई कार्यक्रम हुआ हो .

तो मैंने सोचा कि अपने उस कार्यक्रम की सी डी उनको भिजवा दूं, तो उनसे पता लिया, और विनम्र प्रार्थना की कि समय मिला तो वे सुनें. तो वे बडे बच्चे जैसे भाव से बोले, कि भाई मेरे पास प्लेयर नहीं है.(शायद सही ही नही होगा कलकत्ता के घर में , क्योंकि वे तो ज़्यादहतर बंगलोर में ही रहते हैं, या फ़िर मुझसे बचने के लिये कहा हो!)

बरह हाल मैने तो सीडी अपने मित्र किशन के साथ भेज दी थी . अब सुना या नहीं ये उन्हे ही या फ़िर भगवान को ही पता.

मित्रों , उस कार्यक्रम का टाईटल था दिल का हाल सुने दिलवाला और उसमें से कुछ गानें , मैने यहां आपको सुनवाये थे और दिखवाये भी थे---




तू प्यार का सागर है,

सुर ना सजे,

तेरे नैना तलाश करें,

किसने चिलमन से मारा,

तू है मेरा प्रेम देवता..
.




तो आज मुझे इज़ाज़त दें कि आज उसी कार्यक्रम में से आपको दो गाने और सुनवाऊं, जिससे मन्ना दा के विलक्षण रेंज और विपरीत मूडस को बखूबी निभाने की अद्भुत प्रतिभा परिलक्षित होगी. साथ में आप लुत्फ़ उठायें कार्यक्रम के सूत्रधार संजय भाई (पटेल) के लाजवाब और श्रेष्ठ निवेदन का, जिससे एक perfect ambience बन जाता है, और श्रोता उस सुर के समंदर में डूबता उतरता जाता है.इसिलिए, गाने से पहले उनका निवेदन भी आपके समक्ष है.

कसमें वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या-

नैराश्य और वैराग्य की पृष्टभूमि में गाया यह गीत, एक ठहरे हुए पानी से भरे पोखर के किनारे हमें ले जाता है, और हम जीवन की इस सच्चाई से रूबरू होते हैं.




साथ में और सुनिये एक दोगाना, जिसमें मेरा साथ प्रियाणी वाणी नें दिया है, जो दो साल पहले की Star Voice Of India की finalist थी.

प्रस्तुत कार्यक्रम में मैने मन्ना दा के विभिन्न मूड्स और पहलू के गीत सुनाये, जिसमें रोमांटिक,हास्य,क्लासिकल और दर्द भरे गीत तो थे ही, मगर ये गीत भी लिया, कई सुनकार श्रोताओं के विरोध के बावजूद, क्योंकि, उदयपुर में मन्ना दा नें खुद कहा था कि मैं हर तरह के गानें गा सकता हूं और ये गीत उन्हे बहुत ही पसंद है!

ये दो गाना है ---

ओ मेरी मैना, तू मान ले मेरा कहना,

जिसे महमूद और मुमताज़ पर फ़िल्माया गया था.आप स्वयम देखें, कि ये वही मन्ना दा का गीत है, जिन्होने कसमें वादे प्यार वफ़ा सब और पूछो ना कैसे मैने जैसे लाजवाब गीत गाये.और इस डांस गीत में वह रवानी, थ्रो, और मस्ती भरा आलम किस खूबी से आया है मन्ना दा नें.

वैसे इस सब में मेरा तो कोई कमाल नहीं है, कमाल है मन्ना दा के लिये मेरी भक्ति का है.

Saturday, July 25, 2009

कॊमेडी के बडे नवाब - मेहमूद

Mehmood is Dead….

आज से पांच साल पहले एक दिन सुबह हमेशा की तरह ऒफ़िस में मेल चेक करने रेडफ़मेल खोला ही था तो एक केप्शन नें ध्यान खींचा.. और दिल एकदम से बैठ गया.

मेहमूद … 

mehmood2

ये नाम मेरे लिये मात्र कोंमेडीयन या फ़िल्मी एक्टर नहीं था, मगर एक पूरा व्यक्तित्व , जीवन जीने का संपूर्ण  फलसफ़ा था. ना मालूम बचपन में कब से, महमूद मेरे दिल के कोनें में एक किरायेदार की तरह रहने लग गया थ, और हर दिन हर महिने किराये के बतौर मेरे मन की खुली खिडकीयों से झांक कर मुझे खुशीयोंकी सौगात दे जाता.

बस दो ही कलाकार थे जो मेरे रोल मोडेल की तरह मेरे केरेक्टर में घुस गये थे, एक शम्मी कपूर और दूसरे मेहमूद. (य़ादहै –धडकने लगता है मेरा   दिल –फ़िल्म दिल तेरा दिवाना )

उनकी हर फ़िल्म देखना मेरे लिये एक इबादत होती थी, एक कर्मकांड. जब वे अकेले या शोभा खोटे/मुमताज़ के साथ किसी कोमेडी सीन में या रोमांटिक सीन में आते थे तो सेंस ऒफ़ ह्युमर , टाईमिंग और पंचेस की अदायगी को बडी ही बारीकी से ध्यान देता था मैं, और अनजाने में आत्मसात कर लेता. बाद में किसी भी कोमेडी नाटक या एकांकी में जब मैं किसी कॊमॆडी चरित्र को निभाता था तब,अनायास ही, बिना इरादातन, मेहमूद भाईजान मेरे  नाटक के चरित्र में काया प्रवेश कर देते थे और मुझे आसानी से भाव दिलवा जाते थे.

ये नहीं कि मैं उनकी शॊर्टकमिंग्स या कमीयों से अवगत नहीं था, या उनके द्विअर्थी संवादों और कभी कभी फ़ूहड हास्य की कलाबाज़ीयों से इत्तेफ़ाक रखता था. हास्य को वे कभी हास्यास्पद श्रेणी तक खींच जाते थे.मगर , एक प्रेमी की तरह मुझे उनमें अच्छाईयां ही दिखती थी.

औलाद , प्यार किये जा, पडोसन, गुमनाम, साधु और शैतान , वारिस, ज़िंदगी आदि बाद की फ़िल्मों तक वह कोमेडी के बेताज बादशाह थे . क्या ही संयोग था कि उनने सबसे पहले बतौर विलन से अपनी उपथिती दर्ज़ कराई, १९५३ की फ़िल्म सी आई डी में जो मैने मेटीनी में बार बार देखी थी. बाद में प्यासा में भी विलन थे. काफ़ी दिनों बाद शायद मेरे अपने में फ़िर से विलन बने थे.

मुझे याद है, कि मैंने स्कूल में सिर्फ़ उनके ही गाने याद किये- गोरी तोरी बांकी हाय हाय हाय,  और दुनिया बनाने वाले सुन ले मेरी कहानी , जो कभी भी हमारे केमिस्ट्री के सर को बोरीयत होती थी तो मुझे पकड के क्लास के सामने खडा करवा के गवाते थे.

फ़िर चला दौर मजाहिया भूमिकाओं का छोटे नवाब,दिल तेरा दिवाना, ससुराल, बेटी बेटे , ज़िंदगी भूत बंगला,जोहर मेहमूद इन गोआ ,आदि, जिसमें उन्होने नायक या सहनायक के महत्व पूर्ण रोल किये.…
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बाद में उनके ऊपर फ़िल्माया गया एक गीत मैंने इतनी बार इतनी बार गाया इन ३० सालों में कि शायद २००० बार से अधिक. हर प्रोग्राम में, फ़ंक्शन में या पार्टी में मुझसे यही गवाने की ज़िद लगी रहती थी, जो मैं अपने मित्र योगेंद्र सिंग कीमती के साथ गाता था, बाकायदा एक्टिंग के साथ!!!

वे वो दिन थे  जब पुरुष ड्युएट्स को अक्सर गाया नहीं जाता था  , मगर हमने हमारी एमेच्योर्स संगीत समूह –मेच्युअर एमेच्यर्स में ये गाना बहुत  गाया,जिसमें हम जैसे इन्जिनीयर्स, डोक्टर्स, ज्वेलर्स, और ऎडवर्टाईज़मेंट क्षेत्र के लडके और लडकीयां थीं और बडे ठसकेसे   बिना पारिश्रमिक लिये  कार्यक्रम किया करते थे.(ताउ,अब तो  याद आया?)

एक चतुर नार , करके सिंगार….


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ये चित्र प्रारंभिक दिनोंका  है. 

(ये गीत गा गा कर इतना बोर हो गया था कि मैने ये कसम ही ले ली है, कि अब कभी नही गाऊंगा. और तो और, मन्ना डॆ पर दिये कार्यक्रम में भी लोगोंके आग्रह के बावजूद मैने ये गीत नहीं गाया. 

हां, ये ज़रूर है, कि मैने फ़िल्म प्यार किये जा का वह गीत उस गंभीर गीत संध्या में गाया था जिसमॆं अधिकतर गाने  शास्त्रीय रंग के थे. क्योंकि जब उसके एक साल पहले मैं मन्ना दा से उदयपुर में मिला था तो उन्होने भी इस गीत की पसंदगी को कबूल किया था.

मगर आज मैं वह गीत सुनवाता हूं या दिखवाता हूं जो इसी कार्यक्रम में मैने गाया था, जो मना दा नें मेहमूद के लिये फ़िल्म भूत बंगला के लिये गाया था:

आओ ट्विस्ट करे….


मेरे सामने एक युवा लडके और लड़की ने मन्ना डे जी से पूछा था कि क्या आपने सिर्फ़ क्लासिकल गीत ही गाये हैं, आज तक, क्या कोई डांस नंबर? तो मन्ना दा नें हंसकर कहा , बहुत गाये हैं, और चलो आज शाम के प्रोग्राम में भी ले लेते हैं. और यही गीत  गाया था उन्होने.

यहां का़बिले गौ़र है, कि मेहमूद स्वयं कोमेडियन के अलावा एक अच्छे भावप्रवीण अदाकार थे ही और साथ में एक आला दर्जे के डांसर भी थे.

प्यार किये जा से याद आया उस फ़िल्म का वह मशहूर कोमेडी सीन, जिसमें मेहमूद ओमप्रकाश को भूतों वाले कहानी सुनाते है, और ओम प्रकाश की घिग्घी बंध जाती है.

आप देखिये, कि क्या कोमेडी की टाईमिंग है, और पूरे सवा चार मिनीट के ब्लोक में सिर्फ़ तीन ही कट्स या सीन है. ओमप्रकाश के चेहरे के बदलते भाव और मेहमूद के संवादों की अदायगी मॆं कहीं भी बेताला या बेसुरा नही हुआ है यह सीन, एक सुरीले और ठेके वाले गाने की तरह!! मेहमूद के अदाकारी में मुद्राऒ कीअऔर ओमप्रकाश के चेहरे पर बदलते भावों की जुगलबंदी का कितना बढिय सिंक्रोनाईज़ेशन है, जो बहुत कम कोमेडी सीन में दिखाई देता है. इसलिये यह कालातीत सीन शायद फ़िल्मी इतिहास में ऒल टाईम बेस्ट कॊमेडी सीन है, मेरी समझ से.


आज मेहमूद को श्रद्धांजली देने के लिये भरे दिल से उदास होकर आंसू बहाऊं या यही सीन देख देख कर गम हल्का करूं , आप ही बतायॆं……
परसो गीता  दत्त पर एक और पोस्ट लिखनें का मन बना ही लिया था ,मगर समय अभाव के कारण टल गया. गुरुदत्तजी  के साथ के कूछ अंतरंग क्षणों को  भी याद करते.मगर वह अब फ़िर कभी …

और अगर समय हो  तो ये  भी देखते जाईये ….

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