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Wednesday, October 13, 2010

बेचारा झुमरू दिल - किशोर दा की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजली..


आज हरफ़नमौला कलाकार किशोर कुमार की पुण्यतिथि पर मेरे दिल की गहराई से किशोर दा को विनम्र श्रद्धांजली ...

पिछले साल किशोर दा के कॊलेज इंदौर क्रिश्चियन कॊलेज में विडियो शूट करने का प्रयास किया था,जिससे बहुत ही भिशूण स्वानंद प्राप्त हुआ था. आपमें से कई वहां गये भी होंगे.मैने उसे इस ब्लोग पर भी पोस्ट किया था.

मुझे गुजिश्ता दिनों में कई मित्रों ने गुज़ारिश की कि उसे फ़िर दिखाया जाये. आपमें से कईयों नें तो देखा भी होगा.

इसलिये आधे दायें जाओ, आधे बांयें जाओ, और बाकी मेरे साथ चलो किशोर दा के किशोर युवा दिनों की यादें ताज़ा कर लें...दिलीप के दिल से....



जीवन में कई गानें गाये अभी तक..

रफ़ी साहाब, मन्ना दा , की गले की हरकतें और मुरकियां, मुकेशजी और तलत साहब की भावनाऒं और एहसासात से भरी दर्द भरे आर्त स्वर, हेमंत दा की धीर गंभीर आवाज़ और सबसे एल्हैदा किशोर दा की खिलंदड्पूर्ण लाईव गाना.... सभी गाने की कोशिश में लगा रहा. गायकों के अमृत सुरों की च्यवनप्राश खा कर एक बात साफ़ समझ में आ गयी.

किशोर दा जीवंत रियलिटी शो के मानींद गाते थे, मानों स्टुडियो भी स्टेज ही हो.उनके अंदर का अभिनेता गाना गाते हुए उनके गले में उतर जाता था.वे गायक नहीं थे, एक सांचे में ढली डेफ़िनेशन की बात करें तो.वे गाते हुए भी अभिनय करते थे, और अभिनय भी लय और सप्त सुरों जैसे सप्त रसों की छटा दिखाते हुए.

किशोर दा की थाली में आपको हर प्रकार के व्यंजन मिलेंगे. हास्य की मीठी रबडी, व्यंग्य की रसभरी जलेबी, दर्द भरी तिखी मिर्च से भरपूर सब्ज़ी, रोमांटिक कढी़... (य़े मैं नही, अमितकुमार नें एक बार बताया था!!)



मगर पता नहीं ये मूडी कलाकार ना जाने किस आशंका से हर दम किसी गिलहरी की तरह सहमें, डरे से रहते थे.सन १९८२ में अमेरिका में डिज़्नी लेंड में मेरे माता पिता नें किशोर दा को भी लाईन में लगे देखा तो पिताजी नें पास जाकर उनके पीठ पर हलके से धौल जमाई, जैसे कि वे कॊलेज दिनों में लगाया करते थे. तो किशोर दा एकदम घबरा के गंभीरता से कहने लगे कि भई मैं किशोर नहीं हूं.मुझे माफ़ करो. तो पिताजी नें उन्हे कॊलेज के दिनों की याद दिलाई और कुछ पुराने दिन शेयर किये.हालांकि पिताजी का सीधा संपर्क नहीं था किशोर दा से उन दिनों, मगर सांस्कृतिक कार्यक्रम की वजह से एक ही स्टेज शेयर ज़रूर किया था.अनूप कुमार भी सांस्कृतिक सचिव थे वहीं. तब कहीं जाकर किशोर दा कुछ संयत हुए और फ़िर मूड में आकर उन दिनों का नोस्टाजिया शेयर किया.केंटीन वाले के उधार पांच रुपय्या बारह आना भी!!!

किशोर दा मगर हमेशा दिल से झुमरू ही रहे...कई किस्से कई संस्मरण,क्या लिखें, बस आप और गीत यहां सुनें...

उनका सबसे पहला गीत.. फ़िल्म ज़िद्दी से, सन १९४८...

Monday, September 13, 2010

यही वो जगह है, यहीं पर कभी हमने आपके सामने गाया था....



दोस्तों, कभी कभी हम अपने जीवन के ऐसे दौर से गुज़रते हैं, जब हमें खुदा हर तरफ़ से खुशियां बरसाता है, और आपका दिल बल्ले बल्ले उछल रहा होता है.

मगर , यूंही चलते चलते यादों के पुराने खंडहरों से हम गुज़रने लगते हैं, और खुशी और ग़म के समानांतर रास्ते पर जब हमारे गाडी़ हिचकोले खाती है,तो मीठी सी चुभन हो या तीखी सी ख़लिश हो, आप उसमें रमने लगते हैं, और दीदाए तर होते हैं.

पिछले दिनों, किशोर दा की जन्मदिन की खुशिया मनाईं कैरो (ईजिप्ट)में, जैसे कि रफ़ी साहब के पुण्यतिथी पर उन्हे याद किया था. रफ़ी साहब के बांद्रा स्थित घर के बरामदे में रखी हुई उनकी फ़िएट याद आये, जिसमें चाभी भी लटक रही है उस दिन से, या किशोर दा के बंगले पर गेट सेही उन्हे पेड पर चढे हुए गाना गाते हुए देखा और सुना....सभी यादें दिल में घर किये हुए है.

याद पडता है कि किशोर दा गाना गा रहे थे आशाजी का, जो दूरी के वजह से ठीक से सुनाई नही पड रहा था.. गाना था.........

यही वो जगह है ,यही वो फ़िज़ाएं, यहीं पर कभी आप हमसे मिले थे....

पता नहीं क्यों, जिस खूबसूरती से आशा जी नें गाया था वो गाना, किशोर दा किसी और मूड में दर्द के काढे़ में अपने स्वरों को उकाल उकाल कर क्या समा बना रहे थे.चौकिदार नें अंदर नहीं जाने दिया, इसका ग़म ना करते हम तो बडे से जायेंट व्हील पर बैठ कर स्वरों के उस उतार चढाव में खो गये.फ़िर अचानक बीच में गाना रोक कर किशोर दा चिल्लाकर किसे को आवाज़ देने लगे नारायण,नारायण... तो हम खिसक लिये.

तो अभे जब आशाजी की जन्मदिन की खुशियां मनाईं, तो उस दिन ये गाना रिकोर्ड कर लिया , कुछ ऐसे ही अंदाज़ में. संय़ोग ये रहा, कि इन दिनों में अल्पना जी से बातचित हुई तो उन्होने ये बताया कि अभिजीत नें भी इसे गाया है. खैर, आप भी सुनिये.

आशा जी सुनेंगी तो नाराज़ होंगी ही. पिछली नाराज़गी भारी पडी़ थी मुझे, जब इंदौर में उन्होने एक कार्यक्रम दिया था, और मैने, अखबार नईदुनिया में उसकी समीक्षा में उनके आलोचना के थी, क्योंकि उन्होने अधिकांश गीत नये लिये थे, और मेरे जैसे अनेक दीवानों को निराश किया था. इसलिये दूसरे दिन जाने से पहले उन्होनें नाराज़गी से लताडा था मुझे.(सर आंखों पर)


चलिये अब सुनिये, वही गीत और अगली बार समय रहा तो उस बात का जिक्र करूंगा, कि जब वे इंदौर आयीं थीं लताजी के नाम का पुरस्कार ग्रहण करने, और गाने का प्रोग्राम देनें से इंकार कर दिया था.और फ़िर इस खा़कसार को स्टेज पर आपातस्थिती में उतरना पडा था. आप सोच सकते हैं, कि जो पब्लिक उन्हे सुनने आये थी उसे मुझ जैसे नाचीज़ को सुनना पडा होगा तो क्या हुआ होगा!!!!(रब की मर्ज़ी)

यही वो जगह है, जहां कभी हमने आपके सामने गाया था....

Wednesday, October 21, 2009

किशोर दा के कॊलेज जीवन के संस्मरण!- ये दिल ना होता बेचारा,कदम ना होते आवारा-




आपको शायद याद ही होगा कि हमारे हर दिल अज़ीज़ गायक शेहंशाह जनाब रफ़ी साहब की पुण्यतिथी ३१ जुलाई को मैने श्रद्धांजली के तौर पर एक विडीयो बनाया था --नाचे मन मोरा मगन तिकता धिगी धिगी....
(http://dilipkawathekar.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html)

वह तो एक संयोग था, मगर इस बार हमारे लाडले , मस्ताने ,बहु आयामी, हर हुन्नरी (ऒल राउंडर) कलाकार , गायक किशोर दा की पुण्य तिथी थी १३ अक्टूबर को,जिस दिन इस दिल दिवाने नें किशोर दा की याद में एक और बार एक विडीयो बनाया.

संभव है कि बहुत ही कम लोगों को ये पता होगा कि किशोरदा नें अपनी कॊलेज की पढाई इंदौर में पूरी की. वे यहां के प्रसिद्ध सौ से अधिक साल पुराने महाविद्यालय " इंदौर क्रिश्चियन कॊलेज "में एडमिशन लिया था और इस महाविद्यालय में सन १९४६ से लेकर १९४८ तक तीन सालों में पढाई के अलावा और कई गतिविधियां की.

उन्होने अपने भाई अनूप कुमार के साथ कॊलेज युनियन , होस्टल युनियन में सक्रिय कार्य किया. कॊलेज पत्रिका में लेखन, प्रोफ़ेसरों के साथ मस्ती, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लिया. उन्होंने कई नाटक मंचित किये और संगीत की मेहफ़िलें सजाई.

जैसा कि अपनी पिछली पोस्ट में लिख चुका हूं, मैं उनके जन्म स्थान खंडवा नहीं जा सका, इसलिये जा पहुंचा उनकी गुरुकुल की पावन स्थली में, और वहांकी फ़िज़ा में घुली किशोर दा की सुरमई यादें, कण कण में से झांकती किशोर दा के मधुर , मज़ाहिया व्यक्तित्व की छबि को दिल में उतारता चला गया. और हमेशा अब तो आप सभी हम सफ़र सुरीले मित्रों का भी खयाल था ही, इसलिये अपना छोटा केमेरा भी ले गया.


इसलिये , आज पेश है, वहां की कुछ झलकीयां, याने कॊलेज परिसर,जहां उन्होने अपने जीवन के हसीन पलों को जिया......
वह फ़ूटबॊल गाउंड,जहां वे और अनूप कुमार फ़ूटबाल मेच खेला करते थे......
होस्टल का वह कमरा नं. ४ , जिसमें कभी उनका रैनबसेरा हुआ करता था,जहां उन्होने अपने जीवन के रंगीन सपने देखे....
वह ब्रॊंसन हॊल जहां उन्होने अपने नाटक खेले, मस्ती भरे गीत गाये,और अपनी गायन एवम अभिनय प्रतिभा को निखारा....
वह इमली का पेड़, जहां उन्होने कई धुनों का सृजन किया जिन्हे हमने बाद में उनकी फ़िल्मों में सुना....
वह केंटीन जहां उनके पांच रुपये बारह आने अभी तक बकाया है....
उनकी क्लास रूम जहां उनकी अंग्रेज़ी के टीचर से झडपें हुआ करती थी....
वह दुध जलेबी की सुबह के नाश्ते की दुकान, जो उन्हे उनके घर की , खंडवा की याद दिलाती थी.



मैं उनके चित्र यहां प्रस्तुत करता हूं, और साथ में पेशे खिदमत है, दिलीप के दिल से इज़हारे अकीदत के तौर पर एक Audio Visual Tribute जिसे देख कर सुनकर आप आनंदित होंगे, और उन लोगों को भी सुकून हासिल होगा जो किशोर दा को इंतेहां मुहब्बत करते हैं और इबादत करते हैं.इसमें आप क्रिश्चियन कॊलेज के परिसर,ब्रोंसन हॊल जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे,क्लास रूम, होस्टल का परिसर और कमरा नं ४,वह इमली का पेड़ जहां जाकर मैं भी एक गीत गाकर आया, जैसे कि किशोर दा के मंदिर में जाकर आरती गा रहा हूं.


वह इमली का पेड़, जिसके नीचे बैठ कर किशोर दा अलग अलग धुनों का सृजन किया करते थे.यही वह जगह है, जहां उन्होनें प्रसिद्ध गीत " मैं हूं झुम झुम खुम झुम झुमरू..." की धुन बनाई थी, और अपने दोस्तों को सुनाई थी.




ये चित्र ब्रोन्सन हाल का है जहां किशोर दा के कार्यक्रम हुए . अगला चित्र उस स्टेज पर रखे हुए डायस टेबल का है, जिसके पीछे छुपकर किशोर दा गाते थे. सुना है, कि तब वे बडे ही शर्मीले स्वभाव के थे , और जब भी उनको गाना गाने को कहा जाता , वे घबरा जाते थे.फ़िर दोस्तों ने ये शगुफ़ा किया कि उन्होने इसके पीछे छिपकर गाना गाया, और उनके मित्रों में से एक नें सामने होंठ हिला कर गाने का अभिनय किया(फ़िल्म पडोसन का पार्श्व गायन याद है!!)

बाद में एक बार लद्दाख में सुनील दत्त जी के साथ अजंता आर्ट्स के तले सीमा पर जवानों के मनोरंजन के एक कार्यक्रम में जब किशोर दा को गाने के लिये कहा गया, तो पता नहीं क्यों, वे फ़िर से झिझकने लगे, और गाने से मना करने लगे. बडी मुश्किल से सुनीलजी नें उन्हे पर्दे के पीछे से गाने के लिये मनाया, और ऐन वक्त पर, पूर्व योजना के अनुसार गाने के बीच में पर्दा उठा दिया!!!


जिस होस्टल में वे रहे वहां के चित्र - गलियारा और कमरा नं ४.







आपको फ़िल्म चलती का नाम गाडी का ये गीत तो याद ही होगा - पांच रुपैय्या बारह आना.....
जी हां जनाब, ये जुमला उनके छात्र जीवन से ही जुडा हुआ है. किस्सा हुआ यूं था कि इसी कॊलेज के कॆंन्टीन में किशोर दा के पांच रुपैय्या बारह आने बाकी थे जो अभी तक बकाया हैं!!(चित्र केंटीन वाले का)

मैने इस फ़िल्म को बनाने में काफ़ी जद्दोजेहेद भी की क्योंकि मैं एक एमेच्युअर हूं और इसे एडिट करने और ऒडियो मिक्स करने में दो चार दिन लग गये.इसलिये, आप मुझे क्षमा करेंगे, अगर कुछ ग़लती हुई हो तो.



जिनके कंप्युटर पर स्पीड की वजह से ये फ़िल्म नहीं चल रही हो, उनके लिये ही ये सभी चित्र भी लगाये गये हैं. साथ में दिलीप के दिल से ये गीत भी सुन सकते हैं- ये दिल ना होता बेचारा...

Friday, October 16, 2009

किशोर दा के साथ- कश्ती का खा़मोश सफ़र -



अभी परसों ही हमारे लाडले , मस्ताने ,ऒल राउंडर कलाकार , गायक किशोर दा की पुण्य तिथी थी. १३ अक्टूबर १९८७ को वे हमको दर्द भरा अफ़साना सुना कर हमेशा के लिये इस ज़िंदगी के सुहाने सफ़र को खत्म कर के कहीं दूर चले गये. दूर गगन के इस राही नें, इस मुसाफ़िर नें हमें अपने खुशनुमा व्यक्तित्व से हंसाया और दुखी मन के स्वरों द्वारा रुलाया.

किशोर दा का जन्म खंडवा में हुआ था. खंडवा याने हमारे शहर इंदौर से ढाई घंटे के रास्ते पर एक छोटा सा कस्बा, जहां किशोर दा का बचपन गुज़रा. आपको सभी को पता ही है, कि वे अपने जन्मस्थान से कितनी मुहब्बत करते थे, कि उन्होनें यह वसीयत भी कर रखी थी कि उनका अंतिम संस्कार खंडवा में ही किया जाये.

इस बार मैंने सोचा था कि उनके जन्मस्थान खंडवा जाऊं , जहां उनके जन्म दिन और पुण्यतिथी पर उत्सव सा माहौल होता है. सारे देश के कोने कोने से किशोर दा के दीवाने यहां आते हैं ,उनके पैतृक घर और समाधि स्थल को बडे भक्तिभाव से विज़िट करते हैं. वहां स्थानीय लायंस क्लब द्वारा एक कार्यक्रम भी रखा था, जिसमें मुझे भी किशोरदा के गीत गानें का आमंत्रण था. मगर किसी कारणवश वह निरस्त हो गया.

तो मैने सोचा कि हमेशा की तरह आज मैं फ़िर उसी जगह जाऊं जहां की पावन ज़मीं पर किशोर दा के कदम पडे थे, जिस फ़िज़ां में उनकी गायी हुई स्वरलहरीयां अभी भी अठखेलियां करती होंगी.

इसलिये मैं जा पहुंचा इंदौर के उस महाविद्यालय में जहां किशोर दा नें अपने कोलेज जीवन के तीन साल गुज़ारे.

हां, मैं बात कर रहा हूं इंदौर क्रिश्चियन कॊलेज की.

वहां की झलकीयां मैं दिवाली के बाद कुछ चित्रों और विडियो के ज़रिये पेश करूंगा.एक Audio Visual Tribute जिसे देख कर सुनकर आप आनंदित होंगे, और उन लोगों को भी सुकून हासिल होगा जो किशोर दा को इंतेहां मुहब्बत करते हैं और इबादत करते हैं.


रात को हमेशा की तरह , अपने स्टडी में बैठ कर मैने किशोर दा के पुराने दर्द भरे नगमें गाये, वो नगमें जो मैं खंडवा में गाने वाला था.

इसी बीच, जैसा कि आपको पिछले साल बताया था, किशोरदा का एक गीत मेरे ज़ेहन में बहुत गहरे बैठा हुआ है, जो मेरे किशोर वय में हुए एक मीठी याद की वजह से है.

गीत है कश्ती का खा़मोश सफ़र है, शाम भी है , तनहाई भी, दूर किनारे पर बजती है, लहरों की शहनाई भी...
आज मुझे कुछ कहना है, आज मुझे कुछ कहना है.

यह गीत किशोर दा नें सुधा मल्होत्रा के साथ गाया था, जिसमें दिलों के कोमल एहसासातों की अभिव्यक्ति बडी ही शालीन ढंग से की गयी है, जो आज की पीढी के लिये एक आश्चर्य या शगुफ़ा हो सकता है.

यह गीत मेरे किशोर वय में भोपाल में मैंने हमीदिया कॊलेज के स्टेज पर सुना था, जहां मेरे पिताजी प्रोफ़ेसर थे, और श्री मल्होत्रा थे प्रिंसिपल ,जो सुधा मल्होत्रा के पिताजी थे.तो गॆदरींग में यह गीत सुधाजी नें गाया था, और चाहा था कि कोई स्थानीय गायक उनके साथ वह गीत गाये. किसी नें मेरा नाम भी सुझाया था, मगर सुधा जी नें मुझे देख कर हंस कर बोला, अरे तुम तो अभी छोटे हो!! तुम रहने दो.

बस , आज यह गीत गा ही देता हूं, अब तो बडा हो ही गया हूं. मगर फ़िर मैंने हमारे ब्लोग जगत की प्रसिद्ध कवियत्री, गायिका, फ़ोटोग्राफ़र, पर्यटन विषेशग्य, सुश्री अल्पना वर्मा से अनुरोध किया कि इस दोगाने को मेरे साथ गायें , जो उन्होने सहर्ष स्वीकार किया और उपकृत किया. वे भी किशोर दा की तरह हर हुनर में विषेश कमाल रखतीं है!!!

इस गाने की विषेशता ये है, कि इसमें कोई कराओके का ट्रेक इस्तेमाल नहीं किया है, मगर मूल पार्श्व वाद्यों को मिक्स करनें का प्रयत्न किया गया है.आशा है आपको पसंद आयेगा.

आपको साथ ही में धनतेरस की शुभ कामनाये. आपको यह वर्ष धन और समृद्धी की वर्षा लेकर आये. साथ ही किशोर दा नें जैसे कहा है कहा है- आपको संतोषधन मिले, आनंद धन मिले यही कामना.(जैसा कि इस गीत को गाकर मुझे मिला)

दिवाली के बाद फिर मिलता हूं अपनी रिपोर्ट के साथ.... ब्रेक के बाद!!!

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Friday, August 21, 2009

रफ़ी साहब और किशोरदा - प्यार का मौसम....





जैसे ये जो सावन का महिना चल रहा था, उसमें पवन के सोर करने के अलावा अन्य विशिष्ट रेखांकित करने जैसी बात ये है कि इस अगस्त में कई त्योहारों नें हमारे धार्मिक परिवेश में ,हमारी दिनचर्या को भक्तिरस और उल्ल्हास के रौनक भरे क्ष्णों से नवाज़ा है.जैसे रक्षा बंधन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी , और राष्ट्रिय पर्व स्वाधिनता दिवस आदि.

मगर उसी प्रकार , ये महिना हमारे फ़िल्मी संगीत की सुरीली दुनिया में भी अहम स्थान रखता है. इसकी बानगी तो जाते जाते ३१ जुलाई ही दे गया जब कि हमारे हरदिल अज़ीज़ मोहम्मद रफ़ी जिअसे फ़नकार को हमसे जुदा किया, जब सावन के बादल भी वर्षा के बूंदों की जगह खून के आंसू रोया होगा. वैसे ही २७ अगस्त भी पास ही आने वाला है, जब हमारे लाडले रूहानी गायक मुकेश भी हमसे हमेशा के लिये रुख्सत हो गये.कल २१ अगस्त के मनहूस सोमवार को २००६ में उनकी सुरमई शहनाई हमेशा के लिये खामोश हो गयी थी.

हां, ये ज़रूर हुआ कि हरफ़नमौला कलाकार गायक किशोर कुमार को हमे ४ अगस्त को उनके जन्म दिन पर भी याद कर रंजो गम के इस मेले में कुछ रौनक लगाई.अभी अभी गुलज़ार जी नें भी अपने जन्मदिन पर अपनी बगिया के फ़ूलों से बहार खिलाई थी.

इसलिये आप पायेंगे, कि राष्ट्रिय पर्व की तरह हम सभी फ़िल्मी गीतों के शौकीन इन कलाकारों को इन दिनों शिद्दत से याद करते है, उन्हे अपनी भावनांजली पेश करते है, और फ़िर एक बार उनसे मुहब्बत की लौ को टिमटिमाये रखते हैं.

३१ जुलाई के आस पास हर जगह रफ़ी साहब को याद किया गया, और ४ अगस्त के आपपास किशोरदा को. एक कार्यक्रम में मैने ज़रूर शिरकत की थी , मगर बतौर गायक के नहीं, मगर स्पेशलिस्ट एंकर की तरह.(जाने माने एंकरपर्सन या उदघोषक श्री संजय पटेल किसी कारणवश उसमें नहीं जा सके तो मुझे बोला गया. मगर विकेट के आगे खेलनेकी आदत होने की जगह विकेट के पीछे कीपर बनने का खास अनुभव नही था).

मेरे एक करीबी शिष्य बनाम मित्र चिंतन बाकीवाला (K For Kishor- 2nd Runner Up) तो उस दिन खंडवा में गौरी कुंज में पूरा दिन बिताया जहां किशोर दा रहते थे और उत्सवी माहौल में शाम को विनोद राठोड के साथ गीतों की प्रस्तुति दी.


चिंतन तो पूर्णतयः किशोरमय हो गया है. बातचीत का लेहजा, ट्रेट्स,देह भंगिमा, देह भाषा आदि किशोरमयी हो गयी है. आकहिर क्यों ना हो, नागेश कूकनूर नें किशोर दा की जीवनी पर एक फ़िल्म घोषित की है, जिसमें वह किशोर दा का रोल निभायेगा. .पूरा खंडवा उन दिनों फ़ेस्टिवल मूड में रंग गया था.मध्य प्रदेश सरकार नें भी किशोर सन्मान पुरस्कार मय एक लाख की राशि से इस साल गुलशन बावरा को सन्मानित किया(मगर दुखद निधन की वजह से उस कार्यक्रम का क्या हुआ यह पता नहीं चला).

वैसे पिछले साल यह पुरस्कार मनोज कुमार को दिया गया. अब ये तो भगवान ही जानते हैं कि किशोर दा और मनोजकुमार में क्या साम्य है, क्योंकि पता चला था मुंबई में हुई निर्णायकों की बैठक में हमारे गुणी निर्णायक सिर्फ़ समोसा खा कर चले गये थे, सही कर.

अब मुकेश जी पर कार्यक्रमों की गहमा गहमी चल ही रही है इंदौर में.आज भी एक कार्यक्रम था , और पूरे हफ़्ते दो या तीन और हैं. हम तो बस अंधेरे कमरे में , लेपटोप की धीमी रोशनी में यही गाये जा रहे हैं कि

हमे क्या जो हर सू ,उजाले हुए हैं....
के हम तो अंधेरों के पाले हुए है...
(रफ़ी साहब )

दरसल कुछ साल पहले तक , श्री संजय पटेल अपने धुन के दीवाने इन सभी महान हस्तीयों को किसी ना किसी बहाने श्रोता बिरादरी के जाजम पर याद कर लेते थे, और खाकसार को भी ( ऐसा ही कुछ लिखा जाता है दोस्तों!!)ये फ़क्र हासिल हुआ था कि इन फ़नकारों को अपने तहे दिल से इज़हार ए अकीदत अपने सुरों के माध्यम से पेश कर सकूं. इन दिनों यह सब अब एक ख्वाब सा ही रह गया है. संजय भाई नें किसी वृहद मकसद से इन कार्यक्रमों से दूरी बना ली है(खुदा करे ये क्षणिक हो), और अपने राम के तो काम के कारण आराम के लाले पडे हुए है. सोचा था कि रफ़ी साहब के लिये इतना कुछ है लिखने को कि हर रोज़ भी लिखूं तो मुकेश जी की पुण्यतिथी तक लिख सकता हूं. हमारे एक साथी सुनील करंदीकर जी नें तो प्यार भरा फ़तवा ही निकाल लिया है , कि उनपर कुछ लिखूं.किशोर दा पर कार्यक्रम में भी कुछ बोला ही था, मगर यहां भी आपकी जाजम पर कुछ नही लिख सका.अभी गुलज़ार के जन्म दिवस पर भी कुछ मन बना था, मगर टांय टांय फ़िस्स!!

हां , ये ज़रूर किया है, कि एक गीत रिकोर्ड किया है, जो एक साथ रफ़ी जी और किशोर दा को मेरी स्वरांजली होगी.(मदन मोहन जी के समय पर भी आप सभी मित्रों का ये आग्रह था ही कि उनपर भी कुछ गा कर ही सुनवाया जाता. मगर लेट लतीफ़ी के कारण ये अब बाद में.

तुम बिन जाओं कहां...
के दुनिया में आके , कुछ ना फ़िर, चाहा कभी, तुमको चाह के....

अब इस गीत को अलग अलग रफ़ी जी नेम और किशोर दा नें गाया, और आप सुनेंगे तो फ़रक मेहसूस होगा अदायगी में, गले के टिंबर में, और हरकतों , मुरकीयों में.

रफ़ी जी की शहद भरी साफ़ आवाज़ में रोमांस का ज़ज़्बा , और जवानी की मस्ती का नूर झलकता है, और राहुलदेव नें धुन में गोलाईयां की जगह बनाई है.वहीं किशोरदा की आवाज़ में इस गीत में एक पहाडी़पन परिलक्षित होता है, जिसमें गंभीरता और मेच्युरिटी के साथ साथ खडे सुरों का मिश्रण राहुलदेव नें बखूबी किया है, और हरकतों की जगह योडेलिंग के खूबसूरत फ़ाल्स नोट्स को बोया है, और सुरीली फ़सल काटी है.(उनका किशोर प्रेम जगजाहिर था).रफ़ी जी की मीठी आवाज़ में बास के साथ रेझो़नेंस था तो किशोरदा की आवाज़ में ट्रेबल के साथ नासिका की खनक भी थी.(मोटे तौर पर लता और आशा की आवाज़ के टिंबर से अनुभव करें)


मैंने कोशिश की है, कि एक ही गाने में दोनों के वर्शन गाकर सुनाऊं, मात्र एक विनम्रता के साथ किये गये प्रयोग की तौर पर- क्योंकि इस बात का कोई प्रमाणपत्र नही चाहिये कि दोनों की आवाज़ को कॊपी किया है,क्योंकि कॊपी से अधिक महत्वपूर्ण है उनकी सुरों को रेंडर करने की स्टाईल, और अपने अपने जोनर की खूबियों को गाने में ज़ज़बातों के साथ इंटरप्रेट करना.

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वैसे जानकारों को ये बता दूं कि योडलिंग को सबसे पहले रफ़ी साहब नें गाया था. उनके एक या दो गीत मैं अगली बार पेश करूंगा, क्योंकि वे मेरे पास केसेट में है.कहीं ये भी बताया जाता है, कि दक्षिण अफ़्रीका में गये अनूप कुमार नें यह सुना था और आकर अपने भाई को सुनाया था. कुछ भी हो, योडलिंग के लिये किशोर दा ही श्रेष्ठ हैं.

यहा ये विवेचन या तुलनात्मक विष्लेषण इस लिये नहीं किया जा रहा है, कि इन दों में से किसी को श्रेष्ठ ठहराया जाये. बस हम तो तथ्यागत वस्तुपरक शास्त्रार्थ कर रहें है, क्योंकि हमें तो दोनों की अज़ीज़ है, प्यारे हैं. ये गीत उन दिनों का हैं जब किशोरदा के नाम का परचम अपनी दूसरी इनिंग में अर्श पर फ़हरा रहा था, और रफ़ी जी को सीमित गाने मिलने लगे थे.

वैसे रफ़ी जी या मन्ना दा की तरह किशोरदा शास्त्रीय संगीत में निपुण नहीं थे, मगर एक नैसर्गिक गायक थे. इसीलिये बरसों बाद अमितकुमार को उन्होनें शास्त्रीय संगीत के लिये मन्ना दा के पास भेजा था.खुद किशोर दा रफ़ी जी की स्वार्गिक आवाज़ के दीवाने थे. एक बार जब उनसे मिलने का मौका मिला था, तब होटल के रूम में टेप पर वे रफ़ी जी का ही गीत सुन रहे थे. - मन रे तू काहे ना धीर धरे....

बाद में कहीं उन्होनें यह गीत गाया भी था.

रफ़ी जी के ज़नाज़े के समय किशोर दा घंटो उनके पार्थिव देह के पास पैरों पर बैठे हुए देखे गये थे.लोगों की मन में अपनी अपनी स्वार्थगत कारणों द्वारा उपजे मत्सर के कारण यह गलत धारणा बनी थी कि दोनों में मनमुटाव था, जबकि वे एक दूसरे की बेहद इज़्ज़त किया करते थे. एक बार रफ़ी जी को किसी नें यह ज़रूर पूछा था कि क्या आपको के इस जलवे से मन में कोई मलाल है? तो उन्होनें हंसते हुए कहा था कि उनपर खुदा की नेमत है, वह बरकरार रहे. अपना अपना वक्त है.

मात्र एक बार उनमें किसी छोटी बात प्यार भरी तकरार ज़रूर हुई थी. रफ़ी साहब अक्सर किशोर कुमार को किशोर दादा कहते थे, जबकि किशोर दा ये सुनकर मन ही मन में चिढते थे कि रफ़ी तो उनसे उम्र में बडे हैं मगर फ़िर भी क्यों दादा कह कर बुलाते हैं.एक दिन बातों हीं बातों में उन्होने हल्के फ़ुल्के अंदाज़ में रफ़ी जी से अपनी शिकायत दर्ज़ कर ही दी. तो रफ़ी साहब नें बडे ही मासूमियत से ये कहा कि चूंकि बंगाली में दादा कहने का रिवाज़ है, इसलिये वे ऐसा कह रहे थे. बाद में दोनों खूब हंसे...

ये मासूमियत, ये खूलूस, ये स्नेह भरे प्यार के बंधन के दर्शन क्या आज की पीढी के गायकों में देखे जा सकतें हैं? गलाकाट प्रतिस्पर्धा नें उन भावनाओं को, संवेदनाओं को दरकिनारा कर दिया है, जो रफ़ी और किशोर नाम के उन सच्चे कलाकारों में कूट कूट कर भरे हुए थे.

काश, वे दोनों आज भी होते????????

Sunday, January 18, 2009

मेरी कहानी भूलने वाले, तेरा जहां आबाद रहे.., नौशाद और रफ़ी - अद्वितीय जुगलबंदी


कड़ी नं. २
नौशाद और रफ़ी

नौशाद और रफ़ी जी के अद्वितीय जुगलबंदी का जलवा जो मेला फ़िल्म के गीत से दुनिया के नोटीस में आया वह दुलारी फ़िल्म के गाने - सुहानी रात ढ़ल गई , ना जाने तुम कब आओगे? के बाद और परवान चढा़ और मोहम्मद रफ़ी का नाम हर फ़िल्मी गीत सुनने वाले की ज़ुबान पर चढ़ गया.

मैंने पिछली कडी़ में लिखा था कि जब सहगल के साथ रफ़ी जी नें गाया तो हर गायक की तरह रफ़ी जी पर भी उनकी गायन शैली का प्रभाव पडा़. या यूं कहें, उस समय का गाने का तौर तरीका या स्टाईल ही सहगल की शैली पर आधारित था.मगर रफ़ी साहब के गले का मूल Timbre या स्वर स्वरूप मीठास लिये साफ़ सुथरा था.उन्हे सहगल के धीर गंभीर खरज की आवाज़ जैसा बनाने के लिये बडा़ प्रयत्न करना पडता था. ये नौशाद ही थे जिनने रफ़ी की रेंज और तार सप्तक में(याने ऊपर के ऒक्टेव में)पूरी एनर्जी लेवल से गा पाने की क्षमता का आकलन किया और उसका उपयोग एक अलग शैली विकसित कर हम जैसे संगीत प्रेमीयों पर अहसान किया. बाद में इसी तरह लता जी नें भी नूरजहां या सुरैया की शैली से बाहर निकल कर स्वयं की साफ़ और मीठास भरी गायक शैली की पहचान बनाई. मैं यहां ये नहीं कहना चाहूंगा कि सहगल या नूरजहां की शैली में कोई खराबी या गलती नहीं थी, मगर फ़िल्मों की पेस या चाल की तरह गानों में भी लय, स्पीड बढी़, और उस नये वातावरण में रफ़ी की आवाज़ नें उस गॆप को बखूबी भरा.


इस बात पर नौशाद जी नें ये संस्मरण बताया था , कि रफ़ी जी भी खरज या लोवर ऒक्टेव में ही गीत गाते थे तो फ़िल्म दीदार के गानों की रिकोडिन्ग के दिनों में नौशाद नें रफ़ी से जब ये कहा की तुम्हारा आवाज़ खरज में यूं म्लान लगता है, जैसे की गला दबा रखा है. ज़रा खुल के गाओ, और गांभीर्य का पुट जरा हलका करो, ताकि जवां और अपरिपक्व नायक के नये चरित्र का प्रोजेक्शन हो सके.

रफ़ीजी को बात जंच गई.मगर उन्होनें नौशाद साहब से ही कहा कि आप ही कोई ऐसी धुन बनायें तो मैं उसे गाने की कोशिश कर सकूंगा.

तो उस कालजयी गाने की धुन नें जन्म लिया -

मेरी कहानी भूलने वाले, तेरा जहां आबाद रहे..

जब ये धुन नौशाद नें रफ़ी को सुनाई, तो पहली बार तो वे सुन कर एकदम अवाक ही रह गये, क्योंकि उससे पहले दिल्लगी, अनमोल घडी़ , मेला आदि फ़िल्मों की धुनों से ये तर्ज़ एकदम अफ़लातून ही थी.फ़िर भी रफ़ी ने ये चेलेंज सर आंखों पर लेकर रात दिन मेहनत की. कई बार नौशाद जी को फ़िर पूछा कि यहां समझ नही आ रहा है, कृपया फ़िर से बतायें. उस नई शैली के गीत को इस तरह कई बार मांजा गया, क्योंकि उस समय नौशाद नें वहां वहां थोडा़ मुरकी में या स्वरों के उतार चढाव में बदलाव किया जिससे रफ़ी जी के गले की तरलता की , लचीलेपन के अनोखे गुण से गीत के माधुर्य में मेलोडी़ में अद्भुत रसोत्पादन हो सके.साथ साथ वे रफ़ी जी के आत्मविश्वास को भी बढा़वा देते रहे.

आखिर एक दिन आया और रफ़ी जी नें कहा मैं तैयार हूं और आनन फ़ानन में दो तीन ट्रायल में ही गाना रेकोर्ड़ कर डाला!!
संयोग से इस फ़िल्म के नायक युसुफ़ दिलीप कुमार , निर्देशक नितिन बोस भी इस ध्वनिमुद्रण के समय एच एम वी के फ़्लोरा फ़ाउंटन के स्टुडियो में हाज़िर थे. जब रफ़ी रिकोर्डिंग खत्म कर रूम से बाहर आये तो दोनों नें रफ़ी जी को कस के गले लगा लिया, और कहने लगे कि ये गाना हिट होने से कोई भी नहीं रोक सकेगा.

उन दिनों गाना फ़िल्म के लिये ध्वनि मुद्रित तो होता ही था जो फ़िल्म के ओरिजिनल साउंड़ ट्रेक के हिसाब से बनाया जाता था, जिसमें तीन स्टॆन्झा होते थे .मगर साथ में 78 rpm की डिस्क जिसे हम रिकोर्ड कहते थे,के लिये भी अलग ट्रॆक रिकोर्ड होता था, क्योंकि सीमित जगह की वजह से अमूमन दो ही स्टॆंन्झा उसमें आ पाते थे. इसीलिये आप को मालूम ही होगा कि रेडियो पर या अधिक जगह पर वही संस्करण बाज़ार में सुना जाता था. बाद में जब लॊंन्ग प्लेयिंग रिकोर्ड का उद्भव हुआ तो वहां हम लोगों के लिये ओरिजिनल साउंड़ ट्रेक उपलब्ध होनें लगा.

तो उस समय उर्जावान गानें की आपाधापी में रिकोर्डिस्ट जी एन जोशी बोले, कि अभी समय है, अगर रफ़ी जी थक नहीं गये हों तो दूसरा वर्शन भी आज ही कर लें? रफ़ी जी नें तपाक से हां भर ली, और दूसरा वर्शन भी आनन फ़ानन में मुद्रित हो गया. तो जोशी जी जिन्होने इससे पहले कई गायकों को रिकोर्ड किया था ,नौशाद साहब से बोले- नौशादसहाब, ये नौजवान गायक तो निराला ही है, कोहिनूर से भी ज़्यादा चमक पैदा करेगा, इंडस्ट्री में खूब कामयाबी हासिल करेगा. नौशाद बोले- इंशाल्लाह !!!

चलो , सुनते है- मेरी कहानी ..



आपने सुना और देखा- स्थाई में रफ़ी जी खरज में पंचम तक और अंतरे में तार सप्तक में भी पंचम तक चले जाते है !! क्या बात है, किस अजब , गज़ब रेंज का मुजहिरा किया है जनाब . मगर ये भी मानना पडेगा कि अभिनय के सम्राट दिलीप कुमार इस गाने के उत्तुंग स्वरों को अभिनय के साथ मिलान नहीं कर पाये...(क्या आप सहमत है?)

(चलो आगे बढें या तीसरी कडी ? नही मेरे फ़र्मा रवा..आगे चलिये!)

और फ़िर क्या था, ऐसे खुली आवाज़ वाले गानों का चलन बढने लगा और उस शैली का विकास हुआ जिसमें खुले स्वर के साथ True Notes का उपयोग कलात्मक मुरकियों और संवेदनशील भावना से भीगे स्वरों का अभिर्भाव हिंदी फ़िल्मों के हुआ , जो अब तक चलता आ रहा है. (बाद में किशोर कुमार नें True notes के साथ साथ False notes की सुरमई संमिश्रण की शैली विकसित की जिसका वृहद रूप आज के गायकों की गायन शैली में दिखता है- इसका जिक्र बाद में जब हम किशोर और रफ़ी के स्वरों का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे, अगले किसी पोस्ट में)

रफ़ी जी नौशाद साहब नें की हौसला अफ़ज़ाई को कभी भूल नही पाये, और उनके स्वभाव में भी ये बर्ताव रच बस गया, जो बाद में कई स्थान पर हमें देखने को मिला. नौ्शाद साहब हमेशा उनके गॊड फ़ादर रहे.जब रफ़ी जी की बिटिया की शादी का न्योता देनें रफ़ी नौशाद जी के यहां पहुंचे तो कहा आपको आना है, निकाह का इंतेज़ाम और पार्टी ताजमहल होटल पर रखी है, तो नौशाद जी नें उन्हे कहा - कि अपनी बिटिया नें अपना बचपन अपने घर में गुज़ारा है, जहां लाखों यादें और भावनांयें उस वास्तु के साथ बाबस्ता हैं , तो मेरा सुझाव है कि आप शादी तो अपने घर से ही करिये, भले ही वह छोटी जगह है.वही हुआ , शादी उनके घर में (रफ़ी विला) ही हुई.

बकौल नौशाद के - एक साल बाद, जब रफ़ी नाम का ये सूरज अर्श पर स्थापित हो गया था, तो बैजु बावरा फ़िल्म के एक गानें के बारे में एक विशेष प्रभावित करने वाला संस्मरण सुनिये.

इस फ़िल्म में छोटा बैजु और उसके पिताजी रास्ते पर से साचो तेरो नाम नाम गाते गाते तानसेन की हवेली के सामने से जाने का प्रसंग था.इस गीत के लिये बैजु बावरा के पिता की आवाज़ के लिये मैने रफ़ी का चयन किया, और बैजु की बालक आवाज़ के लिये एक गुणी और तैयार बच्चे का चयन किया, जिसका इस तरह का प्ले बॆक देने का पहला ही अवसर था.ज़ाहिर है, वह रफ़ी जी के सामने कभी बिचकने या डरने लगा तो कभी घबराकर अटकने लगा. तो रफ़ी जी नें उस प्रतिभावान बालक को प्रेम से पुचकार कर गले से लयाया और उसका आत्मविश्वास जागृत किया.ये भी कहा कि बेटा घबराने की कोई बात नहीं है, तुम जब तक बोलोगे या संतुष्ट होगे , हम लोग गाते रहेंगे. बडी मेहनत के बाद वह गीत तैय्यार हुआ और बेहद अच्छा बना.

पता है वह बालक कौन था- आज का प्रसिद्ध गायक, और संगीतकर हृदयनाथ मंगेशकर...!!!


जानकारी - साभार स्वयं नौशाद..
रफ़ी जी पर कडी़ और आगे भी- सी रामचन्द्र, महेंद्र कपूर , चित्रगुप्त , ओ पी नय्यर , जिन्हे हम इस जनवरी में याद कर रहे हैं जन्म दिन या बरसी पर, उनके साथ रफ़ी के गीतों को और उनके साथ यादों की जुगाली करेंगे - हम लोग...

Wednesday, October 15, 2008

किशोर कुमार के स्मृति में अनसुने पुराने गानों का कार्यक्रम

कड़ी - २

आपने वह गाना तो सुना ही होगा ,किशोर दा का.

वादा तेरा वादा , वादा तेरा वादा, वादे पे तेरे मारा गया , बंदा मैं सीधा साधा... , वादा तेरा वादा...

जी हां, मैंने आपसे वादा किया ज़रूर था , और आप भी ये गाना गा कर , एक सीधे साधे बंदे की तरह मुझे लानत तो नहीं भेज रहे होंगे, मगर खुश भी नहीं हुए होंगे.

लगभग ढ़ाई महिने पहले जब मैंने ब्लॉग का उपक्रम प्रारंभ किया था, तो ये मेरे कई प्रोजेक्टस की तरह एक था. मगर , बाद में यह मेरे दिल के करीब आता चला गया, अनजाने में, और जैसा की होता आया है, इसने नं.१ की पोजिशन प्राप्त कर ली है. साथ ही जैसा आगे होना था, प्रोजेक्ट के समय पर समाप्ति के वादे का टेंशन भी साथ साथ आने लगा.

होना यूँ था कि मैंने रफी साहब की कड़ी शुरू की थी. एक Engineer/Architect की तरह हर पोस्ट को प्लान किया, डिझाईन किया . रफ़ी साहब के अनेक रंग , अलग अलग छटा लिए गीतों का गुलदस्ता बनाते बनाते इन सभी का प्यार मुझे कब यहाँ ले आया पता ही नहीं चला .

पिछले महिने में विशेष हस्तियों के नाम पर काफ़ी कुछ लिखना चाहता था, जैसे लता जी, आशा जी, महेन्द्र कपूर , हसरत जयपुरी, आदि.

अब इस महिने विशिष्ट हस्तियां है, गुरुदत्त , फ़िर अमिताभ, अभी किशोर दा, फ़िर बेग़म अख़्तर आदि.पुराना प्रोजेक्ट तो अटक ही गया, नये भी ठीक से smoothly नहीं जा पाये. खै़र फ़िर अगले हफ्ते से वापिस अपने पहले वाले मकाम पर.

मैं आपसे कह रहा था कि किशोर कुमार के स्मृति में ता. १२ अक्तूंबर को इन्दौर के पास करीब १५-२० किमी ग्राम पिगडंबर में एक नये सुर आश्रम लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय में उनके कोई २० अनसुने, मधुर गीतों की रिकॊर्डस को पुराने रिकॊर्ड चेंजर पर बजा कर सुनवाया गया.

ये सौगात हमें दी है जाने माने ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संकलनकर्ता श्री सुमन चौरसिया नें, जिनके पास हज़ारों की तादात में अलग अलग भाषाओं में दुर्लभ संगीत रचनाओं,गानों के रिकॊर्ड्स का संग्रह है. ये संग्रहालय अभी पिछले दिनों लताजी के जन्म दिवस के पहली संध्या को ही लोकार्पित हुआ है, और हम आप जैसे शौकीन और समझू सुनकारों और कानसेनों के लिये ही ख़ास है.


इस स्वर महर्षि नें अपने सारा घर बार, जमीन जायज़ाद की आहुति इसी स्वर याग में दे कर ये अनूठा, और बेमिसाल तोहफ़ा देकर हमें उपकृत किया है.

उस दिन रेखांकित करने योग्य एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह थी, कि जैसा न्योते में कहा गया था, कार्यक्रम ठीक ३.५५ को सुमन जी नें शुरु करवा दिया. वे कह रहे थे की चाहे इतनी दूर कोई भी नहीं आये, या देर से आये, वे तो मात्र एक श्रोता को भी सुनवाना पसंद करेंगे, जो समय पर आ जायेगा.

पूरे कार्यक्रम की अवधि थी दो घण्टे से थोडा़ कम, और इन पूरे लमहों में हम जैसे स्थान और स्वयम की सुध बुध खो उन पुराने गीतों की मेलोडी में, उनके संगीतकारों के किये गये प्रयोगों में , और उसके विष्लेषण में इतना घुल मिल गये , कि होश ही नही रहा कि कब शाम ढल गयी. गांव के सुरम्य वातावरण में उस दिन वहां उपस्थित हर श्रोता डूबते सूरज की किरणों पर मन को सवार कर, किशोर कुमार के गाये एकल और दोगानों में जीवन का हर रंग ढूंढने में लग गया. खेमचंद्र प्रकाश से हेमंत कुमार नें अपने मधुर स्वरांकन से सजाये इन गीतों में गोधुली की उस पावन बेला पर घर लौटते हुए गायों के घुंगरूंओं की ताल मिल कर एक स्वर्गिक सुख का अनुभव करा रही थी.
(चित्र ’नई दुनिया ’ से साभार)

अब चलियें गीतों की लिस्ट पर नज़र डा़लें :

१. मरने की दुआएं क्यूँ मांगू - जिद्दी - खेमचंद्र प्रकाश
२. जगमग जगमग दीप - रिमझिम - खेमचंद्र
३. लहरों से पूछ लो (लता) - काफ़िला - हुस्नलाल भगतराम
४. हुस्न भी है उदास उदास - फ़रेब - अनिल विश्वास
५. भूलने वाले - गैर फिल्मी - भोलानाथ
६. आरारम,ताराराम - आवाज़ - सलिल चौधरी
७. तू चन्दा तो मैं हूँ चकोर (लता) - आगोश - रोशन
८. मैं हंसूं या रोऊँ - माँ (अप्रदर्शित फ़िल्म) - चित्र गुप्त
९. मोहे ला दे नौलखा हार (शमशाद) - नौलखा हार - भोला श्रेष्ठ
१०. चुप हो जा तेरे लिए -बंदी - हेमंत कुमार
११. ताकत के पंजे में - कहीं अँधेरा ,कहीं उजाला - ओ.पी. नय्यर
१२. पायलवाली देखना - एक राज - चित्रगुप्त
१३. दो आखें ज़नानी (आशा) - दाल में काला - सी. रामचंद्र
१४. पहली ना दूसरी - मदभरे नैन - एस.डी. बर्मन
१५. काली काली रातों - जोरू का भाई - जयदेव
१६. मेरे जीवन की रेल - महलों के ख़्वाब - एस. डी. बर्मन
१७. बंगला गीत जो इन गीतों की धुन पर पर गाये गये -राहुल देव बर्मन
- ये क्या हुआ, कैसे हुआ
- तुम बिन जाऊं कहां..
- किशोर दा की पहली पत्नी रुमा देवी के साथ गाया एक दोगाना
१८. हवाओं पे लिख दो - दो दूनी चार - हेमंत कुमार

ये अंतिम गीत उन्होने मेरे पसंद का सुनवाकर इस कार्यक्रम को विराम दिया.

मैं चाहता तो था कि इन गीतों मे से एक दो गीतों को यहां सुनवाऊं. ऐसा आग्रह भी मैने सुमन भाई ने किया भी था. उन्होने स्वीकृति भी दे दी . मगर किसी तकनीकी वजह से वे उन गीतों की रिकॊर्ड़ को टेप पर तबादला नहीं कर पानें से, वे गीत मुझ तक पहूंच नहीं पाये . सो मैं आपको मायूस करूंगा जिसका मुझे खेद है. दरसल यह पोस्ट तो १५ ता. को ही लिख कर तैयार थी और मैं राह देखकर अब पोस्ट लगा रहा हूं.

मगर रुकावट के लिये खेद है, के बाद का संगीत नहीं लगा कर, मैं आप को सुनवा रहा हूं किशोर दा की ही आवाज़ में एस.डी़.बर्मन के देहांत के बाद मे दिये गये किशोर दा द्वारा दिये गये साक्षात्कार को सुनवा रहा हूं. अगर सुमन जी दे पाये तो कल परसों में फ़िर हाज़िर हो जाऊंगा. वैसे आपकी कोई पसंद हो तो कहें..कोशिश करूंगा..






Monday, October 13, 2008

जिंदादिल और संजीदा कलाकार - किशोर कुमार

कड़ी - १

आज दिल बहुत उदास है.

ज़ाहिर है. आज 13 अक्टूबर को किशोर दा की पुण्यतिथि है, बींसवीं.


आज सुबह से ही एक बेकसी सी छाई रही. पहले जब भी कभी उदासी का आलम होता था तो किशोर दा के नगमों के साए तले आसन जमा कर बैठ जाते थे, उनके हर मूड के गीतों को सुन कर , कभी गुनगुना कर दिल का बोझ कुछ तो हलका कर लिया करते थे. मगर आज क्या करें ?

आज दिन भर वो मेरे करीब , आसपास रहे, उनका अहसास मन में और गहरा उतरता चला गया . यादों के रोलरकोस्टर पर मेरा मन बैठ उनके गानों के विश्व में , सुरों के चढाव और उतार में खो गया. कभी सुन कर, कभी गुनगुना कर किशोर दा के गीतों के महासागर में डूब गया.

किशोर दा के जिंदादिल व्यक्तित्व की बड़ी चर्चाएँ है. मगर कोई यह पूछे की वे पहले एक अच्छे गायक थे,या संगीतकार ,या
अभिनेता, या निर्देशक - तो यह भी अजीब सा सवाल हुआ. इस हरफन मौला कलाकार नें एक अवलिया संत की तरह किसी बंधन को नही स्वीकारा. फ्री स्टाईल कुश्ती के पहलवान की तरह अपने फक्कड़ अंदाज़ में वे हर आखाड़े में कूद पड़े! फ़िल्म संगीत की हर विधा में अपने सृजन की क्षुधा को शांत कराने में लगे रहे.

His genious was menifested in his genre of Inovative, Distinctive & passionate creativity ,parallel to none. His responce to Music was Sponteneous & Intuitive,yet intrepid enough to mesmerise us. His golden voice had all shades of human traits & emotional chords, echoed with pathos & malancholy.

Although, he was not a trained Singer, (He need not be ) he had an unique approach to singing - Kishorian approach!!,unlike his contempory equally genious peers, who had a perfetionist and traditional approach to rendering of songs.

A Natural player like Sachin or Lara, he could apply all his skills with his masterly strokes,at his free will, to all kind/genre of musical notes ,difficult or simple to execute.Kishor Kumar could make a song look so deceptively simple with his Sonorous Richness of Voice.

एक अच्छे गायक की पहचान के लिए, उसके गले के घुमाव, मींड , और अहसासात को , संवेदनाओं , भावनाओं को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त कराने के उसके कमाल को जानने, समझने के लिए किसी भी सुधी श्रोता को स्वयं गायक होना ज़रूरी नहीं. इसीलिये किशोर दा आम जनता की पसंद के गायक बनें.

किशोर कुमार के गले में जो खनक थी, उसके साथ गज़ब की कॉमेडी की टाईमिंग , अभिनय का अनूठा संयोग था जिसका उपयोग वे गीत में जीवंतता लाने के लिए करते थे. खासकर वे कॉमेडी गीत जिसमें संभाषण या बातचीत के सादे ढंग का उपयोग किया गया हो. कुछ इसी तरह का अनूठा गुण आशा भोंसले की आवाज़ में भी था, जिसकी वजह से उनके दोगानें भी बड़े मक़बूल हुए. (आंखों में क्या जी, हाल कैसा है जनाब का, आप यहाँ आए किस लिए, आदि)

उनकी यह जीवंतता , उनकी ये जिंदादिली , खिलन्दडपन के बावजूद वे एक संजीदा इंसान थे. मन के भीतर कहीँ गहरे में चुभ रहा वह अकेलापन , उनके दर्द भरे गीतों में उभर आता था .

एक टीस सा एहसास हमेशा के लिए अपने जिगर पर लेकर वे हमसे रुखसत हो गए.


कहीं ज़िक्र हुआ था किशोर दा से उनके सबसे ज़्यादा दिल के करीब पसंदीदा गानों के बारे में , तो उन्होंने जिन गीतों का चयन किया था वे सभी के सभी दर्द भरे गीत थे.

उनकी लिस्ट यहाँ दी जा रही है : ( Not in Order)

१. दुखी मन मेरे - सचिन देव बर्मन - फंटूश
२. जग मग जग मग करता निकला - खेमचंद्र प्रकाश - रिमझिम
३. हुस्न भी है उदास उदास - अनिल विश्वास - फ़रेब
४. चिंगारी कोई भड़के - राहुल देव बर्मन - अमर प्रेम
५. मेरे नैना सावन भादों - राहुल देव बर्मन - महबूबा
६. कोई हमदम ना रहा - किशोर कुमार - झुमरू
७. मेरे महबूब क़यामत होगी - लक्ष्मीकांत प्यारेलाल - मि. एक्स इन बोम्बे
८. कोई होता जिसको अपना - सलिल चौधरी - मेरे अपने
९. वो शाम कुछ अजीब थी - हेमंत कुमार - खामोशी
१०. बड़ी सूनी सूनी है - सचिन देव बर्मन - मिली

अभी जो गीत मैं यहाँ सुनवा रहूँ , ये मुझे बड़ा पसंद है ,

आ चल के तुझे , मैं ले के चलूँ , एक ऐसे गगन के तले,
जहाँ गम भी ना हो , आँसू भी ना हो, बस प्यार ही प्यार पले..

एक ऐसा ही जहाँ चाहते थे किशोरकुमार ...



किसी भी गायक की असली पहचान होती है ऐसे गाने से जिसमें सुरों का साथ बहुत कम लिया गया हो.
जिन रातों की भोर नहीं,
आज ऐसी ही रात आयी..

(कितना मौजूं है ये आज की रात ..........)


कल फ़िर लेकर आऊँगा एक अनूठे कार्यक्रम की रिपोर्ट लेकर, जो कल ही किशोर जी की स्मृति में आयोजित किया गया था, जिसमें जाने माने ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संकलनकर्ता श्री सुमन चौरसिया नें हमें किशोर कुमार के वे नायाब और दुर्लभ गीत सुनवाए की हम जैसे श्रोताओं के स्मृति पटल से वे अब तक मिट नही पा रहे है.

Monday, August 4, 2008

किशोर दा के साथ कश्ती का खामोश सफ़र

'कश्ती का खामोश सफ़र है...' यह किशोर दा का सुधा मल्होत्रा के साथ गाया गाना आज दोपहर को उनके जन्म दिन पर सुना.रहा नही गया की पहले किशोर दा पर ही कुछ ...

यह गीत मेरे लिये एक अलग महत्व रखता है. मेरे बचपन में मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि स्वयं सुधा मलहोत्रा जी ने यह गाना भोपाल के हमीदिया कॊलेज के एक गेदरिंग में गाया था.चूंकि प्रिंसिपल उनके पिताजी ही थे, तो सुलभ ही उपलब्ध हो गयी. साथ में कोई साथी बंबई से आया था. मेह्फ़िल में जया भादुरी भी मौजुद थी.

इसलिये जब दिल की गहराई तक उतरने वाला यह गीत जब आज श्रोता बिरादरी पर नश्र हुआ (या पोस्ट हुआ)्तब पुरानी यादों ने फ़िर दस्तक दी.

बताया गया कि ्रिकॊर्डिंग के वक्त बडे संजीदा मूड में गाने के लिये किशोर दा से बडी मिन्नतें की गयी, मगर वे सिरियस नही हुए. पर जब वास्तव मे रिकॊर्डिंग शुरु हुई तो नतीजा सामने है.

आज कुछ लिखने का नही बल्कि कहने का मूड है, आज मुझे भी कुछ कहना है, तो यह गीत पेश है. अपनी दिल की आवाज़ में स्वांतः सुखाय की अवस्था में गाया है खुद ही ने, शायद आप भी दाद दें तो मेहरबानी.

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