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Tuesday, July 6, 2010

आओ ट्विस्ट करें- पंचम दा की विस्फ़ोटक धुनों पर....श्रद्धांजली

RDX of Rahul Dev Burman


आज तो बस मैने ठान ही ली है, कि आज एक पोस्ट ज़रूर हो जाये.

दर असल इतने दिनों में व्यस्तता का तो आलम था ही, मगर लेपटॊप खराब हो जाना, फ़िर इजिप्ट के दो तीन चक्कर और काम की अधिकता, बस ब्लोग से दूर ही रहा.

वैसे बात ये भी है कि मैं कोई लेखक तो हूं नहीं, जो स्वयंस्फ़ूर्त ही कुछ लिख दूं. दिल में जो मेहसूस करता हूं वही कलम पर या कीबोर्ड पर उतर जाता है, और दिलीप के दिल से पोस्ट का सृजन हो जाता है.

मगर इस बार दिल तो किवाडों के अंदर ही बंद रहा , और दिमाग के खेल चलते रहे. मसलन इजिप्ट में कंपनी खोलना, प्रोजेक्ट का श्रीगणेश करना आदि आदि.

तो आज सोचा कि आज तो बस लिख ही दें, जो भी मन में आता है.

दर असल इन दिनों फ़िल्मी संगीत से जुडी कई हस्तियां याद आई , उनके जन्म दिन या पुण्यतिथी पर.

तलत साहब याद आये, उनके इन्दौर में हुए कार्यक्रम की एंकरिंग की थी तो उनसे हुई अंतरंगता, राज कपूर साहब से निजी मुलाकातें, फ़िल्म बॊबी के लिये दिये गये गाने की अनौपचारिक ऒडिशन, राहुल देव बर्मन से होटल ताजमहल के क्रिस्टल हॊल में फ़िल्म अपना देश के प्रीमीयर पार्टी पर राजेश खन्ना के साथ की गयी उनकी मस्ती... ,बचपन की इन यादों ने दिल पर दस्तक दी, और परदेश में मन को दिले सुकून दे गयी ये यादें.


राहुल देव बर्मन तो बडे ही अफ़लातून संगीतकार थे.मेहमूद नें सही ही फ़रमाया था. वे उन दिनों ही इतना फ़्युचरिस्टिक संगीत का, धुनों का सृजन करते थे .वे हमेशा नई नई परकशन्स वाद्यों पर, स्वरों के विभिन्न आयामों पर यूं प्रयोग किया करते थे कि मेहमूद ने आज से चालीस साल पहले कहा था, कि शायद पंचम नाम का तारा बॊलीवूड के संगीत के आकाश में ज़रा जल्दी ही उग गया है. ज़रा दस बीस साल ठहर जाओ, वह धूमकेतु की तरह आकाश पे छा जायेगा.

उनका कहना सच ही हुआ, उन्ही दिनों में वह सुरों के आकाश पे छा गया था, अपनी निराली मगर मधुर धुनों से. मगर आज चालीस साल बाद ज़रा गौर करें , कि पिछले दस पंद्रह सालों में जितने भी रिमिक्स बनें है, उनमें अधिकाष पंचम दा की धुनों पर ही हैं.Is not it?

उनकी प्रयोगधर्मिता के तो हमें कायल होना ही पडेगा.गाने के अंदर ही स्केल चेंज का फ़ंडा पहली बार आपने ही दिया. अलग अलग तरह के ताल वाद्य और ठेके उन्होने गानों में उपयोग किये, जैसे कि मादल इत्यादि. अभी पिछली बार के दुबई टूर में मैंने एक साईड रिथम का अरेबीयन वाद्य खरीदा था, जो मारकस और रेसो रेसो का ही युगल स्वरूप था, जो अरेबियन संगीत के तालवाद्यों में से एक है. यू ट्युब पर राहुलदेव की एक पुरानी रिकोर्डिन्ग के विडियो में वह वाद्य प्रयोग किया गया दिखा!!

मगर काश वे आज जिंदा होते, तो क्या आज की पीढी के संगीतकारों से कहीं उन्नीस बैठते? शायद हां... क्योंकि वे शायद मेलोडी के साथ कंप्रोमाईज़ नहीं कर पाते,जो अधिकतर नये संगीतकार कर रहें हैं. यूं नही कि आज की पीढी के ये सृजनकार गुणी या टेलेंटेड नहीं है, मगर समय की कमी, नयी पीढी की अल्प स्मृति या रिदमिक ताल की तात्कालिक श्रवणीयता के बहाने जो भी परोसा जा रहा है, वह मेलोडी तो नही है.( अपवादों को छोडकर)

चलो , आपको उन्ही का एक गीत सुनवातें हैं, जो सन १९६५ के आसपास रचा गया था, मेहमूद के ही फ़िल्म भूत बंगला के लिये, जिसमें पंचम दा का भी कॊमिक रोल था.


गीत है आओ ट्विस्ट करें, क्या खुला मौसम....


इस गीत को मना दा नें क्या खूबसूरत गाया है. क्या एनर्जी और सुरों का पावरयोगा है ये गीत!!! आपको बता दूं, फ़िल्म में इस गानें से एकदम पहले अमीन सायनी साहब नें तनुजा का गीत पेश किया था , (लताजी की मधुर आवाज़ में) जो मेलोडी, माधुर्य से भरे भारतीय संगीत शैली का था, और उसके एकदम बाद यह पाश्चात्य शैली का ट्विस्ट सोंग, बिल्कुल विपरीत जोनर का... ये सिर्फ़ पंचम दा ही कर सकते थे.


ये गाना मन्ना दा को समर्पित कार्यक्रम दिल का हाल सुने दिल वाला .. से लिया गया है, और इस गाने को मैने भी फ़िल्म उपकार के धीर गंभीर गीत कसमें वाद प्यार वफ़ा के एकदम बाद गाया था, और कोशिश की कि उसमें में से कुछ उर्जा, कुछ पावर को मैं भी अपने गले में डाल सकूं. (मन्नादा से उदयपुर में शो के दौरान निजी मुलाकात में मैने पूछा था कि आप तो क्लासिकल आधारित गानों के लिये जाने जाते हैं,मगर फ़ास्ट गानों में आपको कौनसा गीत पसंद है? तो उन्होने कहा कि ये गीत उनके दिल के करीब है.कुछ लडके और लडकीयां जो वहां मौजूद थी वे दंग रह गये जब बाद में मन्नादा नें
उतनी ही जोश, तडक भडक और नफ़ासत के साथ यह फ़ास्ट गीत गाया.)मैं भी ज़रा ज़्यादा ही झूम लिया था इस गाने में.....!!!!!!

संजय भाई नें सही कहा है अपने एंकरींग में, इस गाने की पृष्ठभूमी बनाते हुए, कि आजकल हमें नये फ़्युज़न के नाम पर जो भी सुनाया जा रहा है, यही काम पंचम दा नें बरसों पहले किया और मधुरता को बरकरार रखते हुए!!! और चाहे कुछ भी हो जाये, पुराना संगीत कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा.आप उनके बात से सेहमत ज़रूर होंगे.

Saturday, May 1, 2010

सुर देवता मन्ना दा को जन्मदिन पर आदरांजली...




कडी १


ये बात तो पक्की है, कि इतने दिनों गायब होने के बाद जब फ़िर से आपके संम्मुख आया हूं तो मुआफ़ी तो मांगना ज़रूरी है.

कितनी बार आपसे वादे किये, अपने आप से कसमें खायी,ब्लोग जगत के मेरे सुरीले परिवार से प्यार और वफ़ा का वास्ता भी दिया, मगर फ़िर वही ढाक के तीन पात.

चलिये मान लेते हैं कि -

कसमें वादें प्यार वफ़ा सब,बातें हैं बातों का क्या?
कोई किसी का नहीं ये झूटे , नाते हैं नातों का क्या?....

मगर क्या करें, दिल है के मानता नहीं, और आज मन्ना दा के जन्म दिन के पावन पर्व पर फ़िर हाज़िर हूं.

मन्ना दा तो हम सभी के , आपके, मेरे हर दिल अज़ीज़ गायक है ही, मेरे लिये तो वे मेरे सुर देवता भी हैं, आराध्य भी हैं.बचपन से जब समझ आयी तो अपने आपको रफ़ी साहब और मन्ना दा का मुरीद पाया. हीरो जो मन में बसे थे वे थे शम्मी कपूर और मेहमूद, तो ये मुहब्बत तो होनी ही थी.

मगर जब जब भी गानों के चयन की बात होती थी तो मन्ना दा के गीतों को गाने मे बडा चेलेंज लगता था.

रफ़ी साहब और मन्ना दा एक ही पाये के गुणी गायक हैं. स्वर में माधुर्य, गोलाई, मींड, लोच, हरकतें और सुरों पर गज़ब की पकड!! और स्वरों की रेंज तो बस लाजवाब, अतुलनीय.

रफ़ी साहब को तो अल्लाहताला नें हम से छीन ही लिया है, लेकिन उसी खुदा पाक का लाख लाख शुक्र है कि उसनें मन्ना दा को भरी पूरी ज़िंदगी बक्षी है, और आज ईश्वर की कृपा से वे ९०-९१ साल की उम्र में भी संगीत की सेवा कर रहे हैं.
(अभी सुना था कि उन्होनें पिछली शनिवार को लखनऊ में कार्यक्रम दिया था- सलाम !!)

मैं खुशनसीब हूं कि मालिक के फ़दल से मुझे हिंदुस्तान के कई नामचीन संगीतकार और गायक से मुलाकात का अवसर मिला. लेकिन मन्ना दा से रूबरू मिलने का एक छोटा मार मुख्तसर सा मौका मिला था करीब बीस बाईस साल पहले, जब वे इंदौर पधारे थे प्रतिष्ठित लता मंगेशकर पुरस्कार को प्राप्त करनें. मगर जल्दबाज़ी मे कुछ गुफ़्तगू नहीं हो पायी. पांच छः साल पहले उदयपुर में ज़रूर मिला था, कार्यक्रम के बेक स्टेज पर , मगर कार्यक्रम की उधेडबुन में ज़्यादह बात नहीं कर पाया. हां , दो साल पहले, १ मई को, मेरे किसी मित्र किशन का कलकत्ता से फोन आया, कि क्या मन्ना दा से बात करना चाहोगे?उसके पास उन्का फ़ोन नं आया था.

मैंने कहा नेकी और पूछ पूछ? तुरंतो मैने उसके दिये हुए फ़ोन नं पर बात की . संयोग से मन्ना दा ने स्वयं फोन उठाया.

मैं इतना बल्ले बल्ले हुआ जा रहा था, कि विशेष कुछ बातें हो नहीं पायी, बस दादा बोलते रहे, और मैं सुनता रहा, कि अब भी वो कैसे गा रहें है, और किस तरह से आज की फ़िल्मी दुनिया का संगीत उनको रास नहीं आता.

मैं शर्मा शर्मी में बोल नहीं पाया था कि मैं उनके गानों को गाता हूं, और वे समझे कि मैं कोई कार्यक्रम करने वाली संस्था से जुडा हूं, और उनका प्रोग्राम करवाना चाहता हूं.

फ़िर मुझे उनसे कहना पडा कि मैं उनका ज़बरदस्त फ़ॆन हूं, और उनके गानें गाता हूं, तो वो हंस पडे. कहने लगे कि तुम ज़रूर रफ़ी साहब के गाने गाते रहे होगे, और साथ साथ में मेरे भी गाने भी गाते होगे.उनका कहना था जो वाकई में सही भी है, कि हम अमूमन देखते हैं, कि कोई रफ़ी साह्ब को गा रहा है, कोई मुकेशजी, हेमंत दा, तलत मेहमूद जी को. मगर Exclusively मन्ना दा को गाने वाला नहीं मिला.

मैने कहा कि वैसे तो मैं सभी गायकों को गाता हूं, और amateur या शौकिया गायक हूं तो ज़रा नाराज़ ही हो गये. फ़िर भी उनसे कहा कि पिछले दिनों मैने उनके गानों पर आधारित एक कार्यक्रम दिया था (Exclusive Manna Dey only), तो बोले, ऐसा तो कभी सुना नहीं कि सिर्फ़ उनके थीम पर कोई कार्यक्रम हुआ हो .

तो मैंने सोचा कि अपने उस कार्यक्रम की सी डी उनको भिजवा दूं, तो उनसे पता लिया, और विनम्र प्रार्थना की कि समय मिला तो वे सुनें. तो वे बडे बच्चे जैसे भाव से बोले, कि भाई मेरे पास प्लेयर नहीं है.(शायद सही ही नही होगा कलकत्ता के घर में , क्योंकि वे तो ज़्यादहतर बंगलोर में ही रहते हैं, या फ़िर मुझसे बचने के लिये कहा हो!)

बरह हाल मैने तो सीडी अपने मित्र किशन के साथ भेज दी थी . अब सुना या नहीं ये उन्हे ही या फ़िर भगवान को ही पता.

मित्रों , उस कार्यक्रम का टाईटल था दिल का हाल सुने दिलवाला और उसमें से कुछ गानें , मैने यहां आपको सुनवाये थे और दिखवाये भी थे---




तू प्यार का सागर है,

सुर ना सजे,

तेरे नैना तलाश करें,

किसने चिलमन से मारा,

तू है मेरा प्रेम देवता..
.




तो आज मुझे इज़ाज़त दें कि आज उसी कार्यक्रम में से आपको दो गाने और सुनवाऊं, जिससे मन्ना दा के विलक्षण रेंज और विपरीत मूडस को बखूबी निभाने की अद्भुत प्रतिभा परिलक्षित होगी. साथ में आप लुत्फ़ उठायें कार्यक्रम के सूत्रधार संजय भाई (पटेल) के लाजवाब और श्रेष्ठ निवेदन का, जिससे एक perfect ambience बन जाता है, और श्रोता उस सुर के समंदर में डूबता उतरता जाता है.इसिलिए, गाने से पहले उनका निवेदन भी आपके समक्ष है.

कसमें वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या-

नैराश्य और वैराग्य की पृष्टभूमि में गाया यह गीत, एक ठहरे हुए पानी से भरे पोखर के किनारे हमें ले जाता है, और हम जीवन की इस सच्चाई से रूबरू होते हैं.




साथ में और सुनिये एक दोगाना, जिसमें मेरा साथ प्रियाणी वाणी नें दिया है, जो दो साल पहले की Star Voice Of India की finalist थी.

प्रस्तुत कार्यक्रम में मैने मन्ना दा के विभिन्न मूड्स और पहलू के गीत सुनाये, जिसमें रोमांटिक,हास्य,क्लासिकल और दर्द भरे गीत तो थे ही, मगर ये गीत भी लिया, कई सुनकार श्रोताओं के विरोध के बावजूद, क्योंकि, उदयपुर में मन्ना दा नें खुद कहा था कि मैं हर तरह के गानें गा सकता हूं और ये गीत उन्हे बहुत ही पसंद है!

ये दो गाना है ---

ओ मेरी मैना, तू मान ले मेरा कहना,

जिसे महमूद और मुमताज़ पर फ़िल्माया गया था.आप स्वयम देखें, कि ये वही मन्ना दा का गीत है, जिन्होने कसमें वादे प्यार वफ़ा सब और पूछो ना कैसे मैने जैसे लाजवाब गीत गाये.और इस डांस गीत में वह रवानी, थ्रो, और मस्ती भरा आलम किस खूबी से आया है मन्ना दा नें.

वैसे इस सब में मेरा तो कोई कमाल नहीं है, कमाल है मन्ना दा के लिये मेरी भक्ति का है.

Tuesday, November 3, 2009

सचिन दा और मन्ना दा की जुगलबंदी - कव्वाली - किसनें चिलमन से मारा...


सचिन देव बर्मन एक ऐसा नाम है, जो हम जैसे सुरमई संगीत के दीवानों के दिल में अंदर तक जा बसा है. मेरा दावा है कि अगर आप और हम से यह पूछा जाये कि आप को सचिन दा के संगीतबद्ध किये गये गानों में किस मूड़ के, या किस Genre के गीत सबसे ज़्यादा पसंद है, तो आप कहेंगे, कि ऐसी को विधा नही होगी, या ऐसी कोई सिने संगीत की जगह नही होगी जिस में सचिन दा के मेलोड़ी भरे गाने नहीं हों.

आप उनकी किसी भी धुन को लें. शास्त्रीय, लोक गीत, पाश्चात्य संगीत की चाशनी में डूबे हुए गाने. ठहरी हुई या तेज़ चलन की बंदिशें. संवेदनशील मन में कुदेरे गये दर्द भरे नग्में, या हास्य की टाईमिंग लिये संवाद करते हुए हल्के फ़ुल्के फ़ुलझडी़यांनुमा गीत. जहां उनके समकालीन गुणी संगीतकारों नें अपने अपने धुनों की एक पहचान बना ली थी, सचिन दा हमेशा हर धुन में कोई ना कोई नवीनता देने के लिये पूरी मेहनत करते थे.उनकी हर धुन सिर्फ़ सुनाती ही नहीं थी, मगर उस भाव को दर्शाती थी. याने आप सिर्फ़ धुन सुन कर उस गीत के परिदृश्य का इंतेखाब कर सकते हैं आसानी से.


उनके बारे में सही ही कहा है, देव आनंद नें (जिन्होने अपने लगभग हर फ़िल्म में - बाज़ी से प्रेम पुजारी तक सचिन दा का ही संगीत लिया था)- He was One of the Most Cultured & and Sophisticated Music Director,I have ever encountered !

किशोर कुमार को एक अलग अंदाज़ में गवाने का श्रेय भी दादा को ही जाता है. उन्होंनें देव आनंद के लिये किशोर कुमार की आवाज़ को जो प्रयोग किया वह इतिहास बन गया. बाद में राजेश खन्ना के लिये भी किशोर की आवाज़ लेकर किशोर को दूसरी इनिंग में नया जीवन दिया, जिसके बाद किशोर नें कभी भी पीछे मुड़ कर नही देखा.

उसके बावजूद, सचिन दा ने देव आनंद के लिये हमेशा ही किशोर से नहीं गवाया, बल्कि रफ़ी साहब से भी गवाया, जैसे जैसे भी गाने की ज़रूरत होती थी. तीन देवियां में - ऐसे तो ना देखो, और अरे यार मेरी तुम भी हो गज़ब, तेरे घर के सामने में तू कहां , ये बता और छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा,गाईड़ में तेरे मेरे सपने और गाता रहे मेरा दिल, आदि.


अभी फ़िल्मी संगीत के आकाश पर विद्यमान एक महान , सर्वश्रेष्ठ गायक मन्ना डे साहब को दादासाहेब फ़ालके पुरस्कार से नवाज़ा गया. मन था कि उन पर भी कुछ लिखूं. मगर आज मन ये हो रहा है कि दिलीप के दिल से स्ट्रेट ड्राईव्ह मारूं और आपको आगे कुछ भी अधिक लिखने की बजाय, अपने एक खास कार्यक्रम - दिल का हाल सुने दिल वाला में से एक कव्वाली सुनाऊं, जिसे मन्ना दा नें अपने हरफ़न मौला स्वर में गाया है, और संगीत दिया है सचिन दा नें.
सचिन दा नें कव्वालीयां कम ही कंपोज़ की हैं, मगर यहां अपने आपमें कव्वाली और कोमेडी का बढियां ब्लेंडिंग किया है. बाकी रही बात मन्नादा के बारे में , तो हमारे हर दिल अज़ीज़ प्रसिद्ध उदघोषक , एंकर और मेरे अनुज मित्र श्री संजय पटेल से ही सुनें , जिनकी रसभरी वाणी में भी उनकी लेखनी की तरह सरस्वती का निवास है:


किसने चिलमन से मारा......

Wednesday, June 24, 2009

उस्ताद अली अकबर खां – विनम्र श्रद्धांजली

Akbar पिछले दिनों संगीत के इस जाजम पर कुछ नही लिख पाया. यही कहूंगा कि संगीत पर लिखना या किसी बात पर भी अपनी राय देना तभी संभव है, जब आप मन से उसमे रमे हुए हो.  यह ब्लोग मैं अपने दिल की कलम से लिखता हूं, और पिछले दिनों उसकी स्याही जैसे सूख ही गयी थी.

खैर, २० जून को विश्व संगीत दिवस था, और Father’s Day भी. पता नही ये दिन कौन तय करता है, और एक ही दिन ये दो दो खास विधायें… गज़ब……

खैर, दुख की यह बात है कि प्रख्यात सरोद वादक पद्मभूषण, पद्मविभूषण उस्ताद अली अकबर खां साहब इन्तेकाल फ़रमा गये. जैसे कि पं.रविशंकर का नाम सितार का पर्यायवाची है, वैसे ही आपका नाम सरोद से. क्या ही संयोग है कि आपके पिता संगीत के भीष्म पितामह उस्ताद अलाउद्दिन खां साहब से आपने तीन वर्ष की उम्र से ही संगीत सीखना शुरु किया और अपने गुरु भाईयों पं.रविशंकर, बांसुरी वादक पन्नालाल घोष,हरिशंकर चौरसिया , तबला वाद्क निखिल घोष ,  और बहन अन्नपूर्णा देवी की तरह संगीत की दुनिया में शीर्ष स्थान पाया.आपके शिष्यों में सुरीले संगीतकार जयदेव जी का भी नाम है.

भगवान उनकी आत्मा को शांती प्रदान करे .

vlcsnap-220979  मन्ना दा के गानों पर हुए  “ दिल का हाल सुने दिल वाला “ कार्यक्रम के बारे में मैने अपने पिछले पोस्ट  में लिखा था और आपको उस प्रोग्राम के प्रारंभ का गीत – तू प्यार का सागर है – सुनवाया था. तो आज प्रस्तुत है, उसके आगे की कडी –सिलसिलेवार क्रम से.

जैसा कि आप को विदित है, ये कार्यक्रम इंदौर में हुआ था संगीत को समर्पित एक मुख्त़लिफ़ सी संस्था “श्रोता बिरादरी “ के बेनर तले. बिना कोई बडे़ बडे़ तामझा़म किये हुए इस संस्था ने जमीन से जुड कर सच्चे संगीत प्रेमी के लिये अपनी सेवायें दी है, बिल्कुल बिना किसी परिश्रम के.पता है ,प्रस्तुत कार्यक्रम में किसी भी कलाकार नें एक भी पैसा पारिश्रमिक नही लिया है और ना ही कार्यक्रम का कोई शुल्क रखा गया था.

तो आज से हम उस कार्यक्रम को आपके सामने एक एक कडी़ के रूप में  प्रस्तुत करेंगे और आप को सुरों की इस दावत में अगर मज़ा आया तो हमें खुशी होगी.

यकीन मानिये, यहां आपको किसी व्यावसायिक प्रोग्राम की तरह लटके झटके या हंगामा नही मिलेगा. ये श्रोता वाकई में संगीत के सही पारखी और शौकिन है, और समाज के हर तबके से आते है.
                       vlcsnap-270064                          
कार्यक्रम की शुरुआत हमने एक भजन से की , और फ़िर हमारे रिवाज के अनुसार कार्यक्रम के सूत्रधार श्री संजय पटेल नें  मन्ना दा को सशरीर हमारे बीच में आहूत किया, उनके स्वयं के उद्गार और मूल गीत लेकर. इसमें किसी को कोई संशय नही है, (गायक को तो कतई नही) कि यहां जो भी सुनवाया जायेगा वह इन मूर्धन्य गायको के गुणों और जलाल के सामने कुछ भी नही. फ़िर भी हम उन्हे याद करें और दिली सुकून पायें यही कोशिश.

भय भंजना , वंदना सुन हमारी.



इसके बाद गीतकार प्रदीप के वाणी से मन्ना दा के बारे में सुनिये  और उनका लिखा हुआ बेहद लोकप्रिय हुअ ये गीत

उपर गगन विशाल, नीचे गहरा पाताल ….


और बाद में पूरा गीत अलग से.



अगली कडी़ में मन्ना दा के गाये गीतों के अलग अलग रंगों से वाकिफ़ करायेंगे …. 

Thursday, May 28, 2009

दिल का हाल सुने दिल वाला.. मन्ना दा के गीतों पर कार्यक्रम

मेरे आवाज़ की दुनिया के मित्रों,

आज तक आप मेरे साथ यहां तक आये, संगीत के सुरों के शीतल बयार में हमने अपनी दिल की प्यास बुझायी उन सदाबहार हिंदी फ़िल्मी गीतों से. साथ ही आप हमखयाल हुए उन गीतों से जुडे हुए सृजनकार स्वर ऋषियों की जीवनी से, मेथडोलोजी और अलग अलग विधाओंके पहलुओं से. हम रू ब रू हुए कई गायक और गायिका कलाकारों से , जिनके अथक परिश्रम से हम पा पाये ऐसे नायाब गीत जिन्हे हमने अपने सुरीले जीवन का एक हिस्सा बना रखा है.

जीवन की आपाधापी में, विशेषकर इन दिनों जब मैं अपने इजिप्ट के प्रोजेक्ट के सिलसिले में काफ़ी बाहर हूं, और आप सभी की मुझसे जो अपेक्षायें है, (यदि हैं),जो मैं पूरा नहीं कर पा रहा हूं. वैसे अपने इस प्रोजेक्ट के केस में सृजन की पराकाष्ठा को छू रहा हूं, फ़िर भी इन गीतों का सहारा मिल ही जाता है, कभी बीच में ड्राईंग बनाते बनाते हुए कुछ सुरीला सुन लिया, और दिली सूकून हासिल कर लिया.

मगर अब ये ब्लोग जगत भी दिली सूकून देने लग गया है. मन भागता रहता है पोस्ट करने को. मगर हालात होती है उस बल्लेबाज़ की तरह जो आऊट ओफ़ फ़ोर्म रहता है. कुछ भी लिख पाना समयाभाव की वजह से और वो भी लिखने पढने लायक,बडी़ ही टेडी़ खीर है.Hats Off to all those fellow Bloggers who manage this Herculean Task!! Indeed !!!

तो जैसा कि आपको पिछली बार लिखा था , मैं आज से वह शृंखला शुरु करने की अनुमती लेना चाहता हूं जिसमें मैं बीच बीच में अपने प्रोग्राम की विडियो या ऒडियो क्लिपिंग दिखाऊंगा. कार्यक्रम का नाम था दिल का हाल सुने दिल वाला - जिसमें मन्ना डे के गीतों को पेश किया गया था.

कुछ दो तीन सालों पहले हुए ये कार्यक्रम हुआ था इंदौर में, जो मेरे एक स्वनामधन्य मित्र की प्रयोगधर्मी संस्था श्रोता बिरादरी के बेनर तले हुआ था, जिसके सदस्य होते हैं वे सभी श्रोता जो अच्छे और सुरीले संगीत की गहरी पकड रखते हैं विशेष कर पुरानी फ़िल्मों का संगीत . ये समाज के सभी तबकों से चुन चुन कर स्वयं मेनिफ़ेस्ट होते है और इनके सामने सोच समझ कर ही गाया जा सकता है. ना कोई फ़ीस ना कोई सदस्यता की फ़ोर्मेलीटी, बस महिने के किसी एक शनिवार को शाम को ठीक छः बज कर पचपन मिनीट पर पुराने संगीत पर कोई अनोखे फ़ोर्मेट में, किसी अनोखी थीम पर मात्र देड घण्टे का प्रोग्राम होता था.कभी दुर्लभ गानों के रिकोर्ड या केसेट को सुनवाया जाता था,तो कभी किसी गायक गायिका या संगीतकार की जन्मदिन या पुण्यतिथी पर उसके चुने हुए गीत गाये जाते थे मधुर स्वरों के गायक और गायिकाओं से.

अमूमन सभी कार्यक्रमों की एंकरींग का ज़िम्मा वहन करते थे हमारे प्रदेश के प्रख्यात संस्कृतिकर्मी मेरे अनुज मित्र श्री संजय पटेल , जो अपनी वरेण्य वाणी के सन्मोहन से सभी श्रोताओं के दिलों को एक सूत्र में पिरोने का महत कार्य बखूबी किया करते थे, (अब भी करते है). हर गीत से पहले उसकी पृष्ठभूमी को , उसकी तकनीकी बारिकीयों को यूं पेश करते थे कि श्रोता उस गीत के रंग में खुद ब खुद रंग जाता था कि कलाकार का काम आसान हो जाता था.

साथ ही साथ ,उनके स्पष्ट ,धीर गंभीर आवाज़ का जादू श्रोताओं के साथ खुद कार्यक्रम पेश करने वाले कलाकारों पर भी खूब तारी होता था, और उनके हौसला अफ़ज़ाई की वजह से कलाकार अपने हुनर को कमाल की हद तक जाकर पर्फ़ेक्शनिस्ट की तरह पेश करता था.और क्या चाहिये एक सफ़ल और मुकम्मल प्रोग्राम के लिये.कई सालों से हम दोनों स्टेज पर एक साथ अपने अपने हुनर की सुरभी बिखेरते आ रहे है, और इंशा अल्लाह , आगे भी करते रहेंगे.

इस कार्यक्रम में सभी गीत गाने का सौभाग्य मुझे मिला था और मेरा साथ युगल गीतॊम के लिये दिया था सुश्री शीला वर्मा, और सुश्री प्रियाणी वाणी.

कार्यक्रम का प्रारंभ किया एक भक्ति गीत से -

तू प्यार का सागर है...

जो फ़िल्म सीमा के लिये शैलेंद्र जी ने सरल भावपूर्ण शब्दों मे लिखा है, और संगीत बद्ध किया है शंकर जयकिशन जी नें.

सुनिये और आनंद लिजिये...

Friday, May 8, 2009

शंकर जयकिशन, रफ़ी और मन्ना डे…

अभी आपने पिछली कडी में पढा़ था प्रसिद्ध संगीतकार जोडी के शंकर के जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में …

अभागे शंकर -(कृपया यहां पढे..)

हमारे एक टिप्पणीकार नें यह लिखा था कि इसमें से एक घटना को उन्होने किसी साप्ताहिक में पढी थी. वे सही हैं. जो भी हम यहां लिखते हैं, कहीं ना कहीं से हमे मालूम पडता ही है. चूंकि ये वस्तुस्थिती है, कि ये सम्भव नही कि हर घटना आपके सामने ही घटी हो. मित्रों, वैसे भी गायक , संगीत और गीत के बोलों के अलावा कुछ भी तो ORIGINAL नहीं.
आज हम कुछ और छोटी छोटी स्मृतियों के बारे में यहां ज़िक्र करेंगे. कुछ कहीं पढी हुई कुछ मित्रों द्वारा बताई गई:

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मोटे तौर पर ये बात बताई जाती है कि पहले कुछ सालों को छोडकर शंकर और जयकिशन नें हमेशा अलग अलग फ़िल्मों में संगीत दिया(भले ही नाम जोडी का दिया गया हो), जबकि दूसरे संगीतकार जोडी अपना काम यूं बांटते थे कि धुन एक बनाता था और अरेंजिंग दूसरा.(LP). और एक आश्चर्य की बात ओर मालूम पडी जिसे चेक करना पडेगा कि शंकर के लिये हमेशा हसरत जयपुरी लिखते थे और जयकिशन के लिये शैलेन्द्र!!!   ( जानकार बतायें कि क्या ये उनस भी १७१ फ़िल्मों के बारे में सही है , जिसके लिये इस जोडी नें संगीत दिया?)

पता है, सबसे पहला गीत जो शंकर नें रिकोर्ड किया वह था फ़िल्म बरसात में रफ़ी की आवाज़ में एकमात्र गाना – मैं ज़िंदगी में हर दम रोता ही रहा हूं…शंकर और बाकी सभी इस बात पर एकमत हुए थे कि ये गाना रफ़ी जी ही गायेंगे.मगर उन्हे ये डर था कि रफ़ी जी व्यस्तता के रहते हुए, उन जैसे नये संगीतकार जोडी के लिये गायेंगे या नही. मगर रफ़ी जी नें कोई शर्त नही रखी और ये गीत और बाकी सभी गीत बडे ही मकबूल हुए. बाद में तो इस जोडी नें रफ़ी  जी के साथ  अनगिनत हिट गानें दिये.  २१६ एकल गीत,११६ युगल गीत,९ मिश्र गीत = कुल ३४१ गीत.( लक्ष्मीकांत प्यारेलाल – ३६९)

कई सालों बाद जब फ़िल्म ब्रम्हचारी के लिये जयकिशन नें उनसे एक गीत दिल के झरोके में तुझको बिठा कर..के लिये एक अजीब फ़रमाईश की. उन्होने रफ़ी जी को आग्रह किया कि इस गीत का स्थाई (याने पहली लाईन) बिना सांस लिये लगातार गाये.(शंकर महादेवन का Breathless गाना याद है?) 

रफ़ी जी नें उनकी ये बात मानी और आप खुद सुनें कि पहली लाईन बिना सांस लिये गायी गयी है.रिकोर्डिंग के बाद हंसते हंसते  रफ़ी जी बोले, भाई याद है,आपके लिये मैंनें सबसे पहला गीत गाया था. अब आप मुझे यूं गवाते रहे अगला गाना गाने के लिये मैं ज़िन्दा ही नही रहूंगा और फ़िर लोग कहेंगे रफ़ी नें आपके लिये अपना अंतिम गीत गाया !!!

वैसे शंकर जयकिशन नये नये प्रयोग करते थे मगर रफ़ी जी भी कभी कभी मस्ती में आ कर कुछ अलग करते थे.फ़िल्म तुमसे अच्छा कौन है का गाना किस को प्यार करूं , कैसे प्यार करूं . तो गाना रिकोर्ड होने के बाद रिकोर्डिंग रूम से बाहर आ कर रफ़ीजी शंकर से बोले – इस गाने की रिकोर्डिंग एक और बार करते हैं. किसी को कूछ समझ नही आया.

मगर बाद में रफ़ीजी  नें कहा कि स्टुडियो में कुछ खूबसूरत लडकियों को बुलाया जाये और शर्त ये रहेगी कि उन से एक भी उनकी तरफ़ नहीं देखेंगी (Cheer girls of IPL?!!!!)

बस फ़िर क्या था. आनन फ़ानन में यूं जमाया गया, और गाने की रिकोर्डिंग फ़िर से कीग यी जिसमें रफ़ी जी नें उन सुंदरीयों की तरफ़ देखकर हाथों से मुद्रायें बनाते हुए पूरा गीत गाया जिसमें वह प्रभाव और आवाज़ में वह बिंदासपन कैसे झलका है ये आपने सुना ही है.

वैसे ही मिज़ाज़ के शौकीन शंकर नें फ़िल्म जंगली के गाने ऐयईय्या सूकू सूकू .. गाने मॆं ये बोल गाये है, फ़िल्म संगम के गाने दोस्त दोस्त ना रहा में पियानो बजाया है.

मैं इस बात से हमेशा  दुखी रहा   कि शंकर और लताजी के बीच में अनबन हो गयी थी(जयकिशन के साथ नहीं-याद है वे हसीं गीत – ओ मेरे शाहे खूबा…, तुम मुझे यूं…, तुम्हे याद करते करते ..) 

वैसे किशोर कुमार के साथ काफ़ी कम गीत  बनाये है इस जॊडीनें…

img0501(रिकोर्डिंग के समय)

अपने अंतिम दिनों मॆं जयकिशनकी मृत्यु के बाद शंकर के पास बहुत फ़िल्में नही आयी मगर वे LIVE concert  करते रहे, मगर इंडस्ट्री  में उनका वजन कम ही हो गया.

मुझे याद है ८० के दशक का वो वाकया, कि जब मैं एक बार मुंबई से इंदौर के लिये फ़्रंटियर मेल  मॆं चढा था (रतलाम तक), तो द्वितीय वर्ग के रिज़र्वेशन कोच में मैने एक musicians का ग्रूप देखा जिनके पास सभी instruments थे. इसमें से एक साथी मेरे पहचान का था जो इंदौर का था जिसनें मेरे साथ स्टेज पर कभी बजाया था .और साथ ही में आजके प्रसिद्ध संगीतकार की जोडी जतिन ललित  में से जतिन थे(शो अरेंजर के रूप में !!)

मुझे फ़िर ये भी बताया गया   कि इसी ट्रेन में खुद शंकर जी और शारदा भी जा रही थे, और तीसरे दिन  उनका दिल्ली में शो तथा बात ही बात में जतिन से पता चला कि इन सभी वादकों के समूह का रिज़र्वेशन तक नही हुआ था, सिर्फ़ टिकट थे. साथ में इन्हे जो बूक करके लाया था उसनें जतिन को  कोई एडवांस भी नही दिया था . जाहिर है ये बात मालूम होते ही अधिकतर वादक पसर गये, और उतरने की बातें करने लगे. जतिन  नें काफ़ी समझाया कि शंकर जी की इज़्ज़त दांव पर लगी है.मगर वे टस से मस नही हुए.

तब  मेरे युवा संवेदन मन को बडी ठेस पहुंची थी ये देख कर कि बंबई  में पैसे के आगे कोई भी बडा नाम  या हस्तीन हीचल ती जिसकी आप इतनी इज़्ज़त करते हैं .

इस बीच जतिन शंकर जी को बताने पहुंचे जो प्रथम वर्ग के केबिन में, तो मैं भी साथ हो  लिया , सोचा था कि मेरे फ़ेवराईट म्युज़िक डायरेक्टर से मुलाकात होगी. मगर अफ़सोस कि शंकर के  ये बात सुन यूं होश उडे के वे गश खाकर गिर ही पडे(उन्हे ब्लड प्रेशर का प्राब्लेम था ) शारदा नें  और हम ने बडी कोशिशों से उन्हे सम्हाला, और दवाई दे कर उन्हे सेटल किया. यहां तक कि ट्रेन रुकवाने की  नौबत आ गयी थी .

इसी बीच सूरत आ गया और देखते ही देखते सारे Musicians अपने अपने वाद्य लेकर उतर गये,और ग्रुप में रह गये सिर्फ़ जतिन और मेरा इंदौर का साथी.फ़िर क्या था. मैने मेरी बर्थ   ललित के साथ शेयर की, और वह दिल्ली निकल गया.मेरा साथी मेरे साथ इंदौर आया, और कुछ musicians दिल्ली ले गया, और सुना है, कि वहां कुछ और को साथ में लेकर शो हुआ था .आज जब भी वह वाकया याद आता है,तो दुख  होता है,कि  इस बंबई फ़िल्म ईंडस्ट्री में सभी चढते सूरज को सलाम करते है और जब ये सूरज़ ढलता है, तब उसे गर्त में धकेल दिया जाता है. जो व्यक्ति हमारे मनमें एक हीरो की तरह उसके साथ यूं बदसलूक दिल को चोट पहुंचाता है.(ऐसा ही वाकया बाद में  मेरे सामने महान संगीतकार जयदेव के साथ भी हुआ )
आज मैं यहां संगीतकार शंकर जयकिशन की एक सुंदर रचना को सुनाता हूं अपने ही  आवाज़ में. गीत है फ़िल्म दिल एक मंदिर का ….MV5BMTM2NjQ1Nzg2N15BMl5BanBnXkFtZTcwNDkyNjAzMQ@@__V1__SX96_SY140_

याद ना जाये ,बीते दिनों की…. 



इसे मूलतः रफ़ीजी नें गाया है, मगर यहां केरीओके (Karaaoke) की ट्रेक पर मैने गया है.मैं यहां अपने सुरीले साथियो को  बता दूं कि मैं मूलतः स्टेज का कलाकार हूं और ये घर पर ही amateurish Recording की गयी है.  गलती हो तो सुधी जन माफ़ करेंगें, और पसंद आया तो हौसला अफ़ज़ाई करें.इस माध्यम को भी उपयोग में ला कर देखें.

वैसे ये गीत मेरे दिल के  बहुत करीब है. वो इसलिये कि शंकर जयकिशन नें इस गीत में जैसे मेलोडी ठूस ठूस के भर दी है.मगर साथ में मन के अंदर  दर्द के धीरे धीरे हो रहे रिसाव को भी सुरों के माध्यम से बखूबी उभारा है. ऊपर से महागायक रफ़ी साहब के  एहसास भरे भीगे  स्वर .. ऊफ़्फ़ , आपकी और हमारी तो जान ही ले ली है.

और हां, जब दर्द भरे गीतों की जब बयार चली ही है,  तो याद आ गयी वो दिल की पीडा को बखूबी अभिव्यक्त करने वाली आवाज़  - मुकेश जी की ……..
और उनकी सरल , पाक साफ़ आवाज़ में , दिल की गहराई को  छू जाने वाला फ़िल्म यहुदी का ये गीत जिसकी  धुन में शंकर जयकिशनजी नें दुख की इंतेहा का जो आलम तारी किया है, वह दिल से भुलाये नही भूलता.वैसे इस गाने के लिये शैलेंद्र जी को फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड से  नवाज़ा जा चुका है.

200px-Yahudi
ये मेरा  दिवानापन है….



ये गीत मेरे किसी स्टेज कार्यक्रम का है, इसलिये ओडिटोरीयम   का प्रभाव आया है.
मन्ना डे - 

इस १ मई को इस महान गायक नें अपना ९० वां जन्म दिन मनाया. 


चाह कर ही उनके बारे  में प्लान करने के बावजूद पोस्ट नही लिख पाया. फ़िर भी इस लेट लतिफ़ नें vlcsnap-223198१ठान लिया है, कि अगली पोस्ट को छोड कर  मन्ना दा पर कुछ कडीयां लिखूंगा. और साथ ही में आप ही लोगों के आग्रह पर मन्ना दा के गीतों पर किये गये अपने एक स्टेज कार्यक्रम दिल का हाल सुने दिल वाला की क्रमवार गीत शृंखला का (विडियो) पेश करूंगा.

अगली पोस्ट नज़र है  मखमली आवाज़ के  शहेंशाह तलत मेहमूद पर जिनकी ९ मई को ११ वीं पुण्य तिथी है.तो एक दो गाने उनके भी …( ता.१० को )

Wednesday, February 11, 2009

हीरे मोती जडे़ गहनों जैसे फ़िल्मी गीतों के बोल- NO EXPIRY DATE !! पं. नरेंद्र शर्मा- पुण्यतिथी-

चित्र- साभार सुश्री लावण्याजी

अभी अभी कहीं ये बहस चल रही थी कि फ़िल्मी गीतों में गीतकार का क्या योगदान होता है.
बेशक , हम जो भी गाने आज सुनते है, उनमें से अधिकांश में बोल तो सिर्फ़ सुरों को बांधने के लिये ही है. और तो और, जैसा कि स्वयं लताजी नें अभी अभी किसी इंटरव्यु में क्या सच कहा था - कि आजकल तो गाने रिदम की बेस पर ही बनते है, और सुर तो उस ताल को चाल को बांधने के लिये ही होते है.तो फ़िर शब्दों की तो बिसात ही क्या.तभी तो इन गानों को लंबी आयु नसीब नहीं होती,और इन गानों की ए़क्सपायरी डेट बहुत ही कम होती है.

मगर हम जब फ़िल्मी गीतों का वह गरिमामयी इतिहास देखते हैं तो पाते हैं कि चालीस पचास दशक में गाने में बोल, सुर और ताल ये सभी घटक समान तौर पर महत्वपूर्ण होते थे, जिसमें गीतों के भावपक्ष का , साहित्यिक गहराई, या अदबी वज़्न का गीत के पोप्युलर होने में संपूर्ण योगदान होता था.तभी तो उन दिनों के गाने अभी तक सुने जा रहे हैं और उनकी एक्सपायरी डेट कभी भी खत्म नहीं होती!!!

पंडित नरेंद्र शर्मा उसी कालखंड के गुणी गीतकार थे, जिन्होने विशुद्ध हिंदी शब्दों में अपने हर गीत गूंथे , जो आज तक हमारे जेहन में बाबस्ता है, स्थाई रूप से अंकित हैं.

आपको तो पता ही है, कि पचास के दशक के प्रारंभ में जो भी गानें लिखे जाते थे वे मुख्यतः अदबी उर्दु के लफ़्ज़ों से गढे जाते थे जिसमें भावनाओं और संवेदनाओं को, अहसासात को बखूबी सुरों में पिरोया जाता था, और बनते थे वे कालजयी गीत जिन्हे आज भी आप हम सुन ही रहे हैं. ( साहिर, मजरूह, कैफ़ी आज़मी, शकील आदि)साथ ही में,भोजपुरी , अवधी आदि क्षेत्रिय बोलीयों में भी कहीं कहीं गीत बनाये गये.

मगर मात्र शुद्ध साहित्यिक हिंदी शब्दों पर बनाये हुए गीतों के लिये हम याद करते है शैलेन्द्र, प्रदीप, भरत व्यास ,नीरज और पं. नरेंद्र शर्मा.

सन १९५१ में फ़िल्म अफ़सर में सचिनदा के संगीत निर्देशन में पांच गीत आपने लिखे थे-

नैन दीवाने, इक नहीं माने..
मनमोर हुआ मतवाला..
गुन गुन गुन बोले रे ..
परदेसी रे जाते जाते...
प्रीत का नाता जोड़ने वाले..

याद है वह लताजी का गाया गैर फ़िल्मी गीत- जो समर में हो गये अमर, मैं उनकी याद में..

या विविध भारती के उदघाटन पर मन्ना डे द्वारा गाया गीत, जिसे अनिल विश्वास नें संगीत्बद्ध किया था- नाच रे मयूरा...

फ़िल्म फिर भी का ये गीत जो बेहद प्रसिद्ध हुआ, और मुझे भी गाने के लिये प्रेरणा देता रहा वह है-

क्यूँ प्याला छलकता है :
क्यूँ दीपक जलता है
दोनों के मन में कहीं अनहोनी विकलता है
क्यूँ प्याला छलकता है पत्थर में फूल खिला
दिल को एक ख़्वाब मिला
क्यूँ टूट गए दोनों इसका ना जवाब मिला
दिल नींद से उठ उठ कर
क्यूँ आँखें मलता है.. हैं राख की रेखाएँ लिखती है चिंगारी
हैं कहते मौत जिसे जीने की तैयारी
जीवन फिर भी जीवनजीने को मचलता है॥

मगर पंडितजी के लिखे हुए दो गीतों का खास ज़िक्र करना चाहूंगा, जिसनें उन्हे और इन गीतों को अमर कर दिया है-
वे है ज्योति कलश छलके, और लौ लगाती गीत गाती.

लताजी स्वयं ये बात मन से कबूल करती हैं कि पंडितजी में उन्हे उनके पिता के दर्शन होते थे, तभी तो वे उन्हे पापा कह कर बुलाती थी.

सँगीत : स्व. श्री सुधीर फडके
स्वर: लता मँगेशकर
कविता: स्व.पँ.नरेन्द्र शर्मा
फिल्म: भाभी की चूडियाँ
नायिका: स्व. मीना कुमारी

सुधीर फडके द्वारा कई गीतों को मराठी में स्वरबद्ध किया गया है, मगर हिंदी में उन्होने ये एक अनमोल भेंट दी है .

तो चलें -सुरों की आमराई में बैठ कर मीनाकुमारी के जीवंत और ओस से पावन , कोमल भावाभिव्यक्ति से भरे अभिनय की लता मंगेशकर के अलौकिक , उतनी ही पावन आवाज़ में गाई गई इन संगीत रचनाओं की जुगलबंदी का आनंद आप और हम लें, और यहीं पिघल कर इस स्वर गंगा में एकरूप हो जायें.........

ज्योति कलश छलके ,ज्योति कलश छलके..
हुए गुलाबी , लाल सुनहले,रंग दल बादल के...
ज्योति कलश छलके...

घर आनंद वन उपवन उपवन,
करती ज्योति अमृत के सिंचन,
मंगल घट ढ़लके,२
ज्योति कलश छलके...

अंबर कुंकुम कण बरसाये ,
फ़ूल पखुरिया पर मुसकाये,
बिंदु तुही न जलके,२
ज्योति कलश छलके...

पाट पाट बिरवा हरियाला,
धरती का मुख हुआ उजाला,
सच सपने कल के,२
ज्योति कलश छलके...

उषा नें आंचल फ़ैलाया,
फ़ैली सुख की शीतल छाया,
नीचे आंचल के,२
ज्योति कलश छलके...

ज्योति यशोदा धरती गैय्या ,
नील गगन गोपाल कन्हैय्या ,
श्यामल छबि छलके,२
ज्योति कलश छलके...





दूसरा गीत है -
लौ लगाती गीत गाती,
दीप हूँ मैँ, प्रीत बाती
नयनोँ की कामना,
प्राणोँ की भावना.
पूजा की ज्योति बन कर,
चरणोँ मेँ मुस्कुराती
आशा की पाँखुरी,
श्वासोँ की बाँसुरी ,
थाली ह्र्दय की ले,
नित आरती सजाती
कुमकुम प्रसाद है,
प्रभू धन्यवाद है
हर घर में हर सुहागन,
मँगल रहे मनाती

देखा, छोटी बहर में क्या कमाल के बोल चुन चुन कर बिठायें है, जैसे कि किसी मिनीयेचर पेंटिन्ग में स्वर्ण और चांदी के रंगो से बारिक कलाकारी की गई हो!!


एक छोटी सी पहेली पूछ रहा हूं.

सन १९५७ ने पं. नरेन्द्र शर्मा नें एक नाम सुझाया था जो आज भी बेहद लोकप्रिय है?

Thursday, February 5, 2009

तू है मेरा प्रेम देवता, रफ़ी , मन्ना डे और नैय्यर

कडी़ - २
जब हम ओ पी नैय्यर के गानें सुनते हैं तो ये बात तो निर्विवाद सत्य है ही कि उनकी संगीत शैली, धुनों का Dynamics,सुरों के कोर्ड्स की विविधता, लय की मस्तानी चाल आदि अन्य संगीतकारों से एकदम हट के थी.साथ ही , हिंदुस्तानी तथा पाश्चात्य वाद्यों के माकूल उपयोग की विविधता भी आम चलन से अलग थी.

जैसे कि क्लेरिनेट के दो अलग अलग नोट्स या मोटी पतली आवाज़ का बांसुरी के साथ प्रयोग, सारंगी और सितार का फ़डकता पीस देकर मादकता की हद तक ले जाने का प्रयास, वातावरण की निर्मिती के लिये संतूर का आलाप के साथ ब्लेंडिंग, ढोलक और वन टू वन टू रिधम का अनूठा संगम, स्थाई/अंतरे और इंटरल्युड का गजब का मिक्सिंग, अपने आप में दीवाना बनाने के लिये काफ़ी था.

मगर साथ ही, उनकी शास्त्रीय रागदारी पर नियंत्रण भी हमें कई गीतों में नज़र आता है. हालांकि ऐसे गाने कम ही थे, और वे खुद ये बात कबूल करते थे कि उनकी शास्त्रीय संगीत की कोई विधिवत तालीम नहीं हुई थी.बावजूद इसके, उनकी गीतों में कहींभी कोई कमी नही रह जाती थी.

इसीलिये जब कल्पना फ़िल्म के लिये एक महत्वपूर्ण गाने का इंतेखा़ब किया गया तो कई जानकारों की भौंहें उठ गई थी कि देखें क्या गुल खिलाते है नय्यर साहब.त्रावणकोर बहनों के भरत नाट्यम की शानदार शास्त्रीय नृत्य शैली को दर्शाने के लिये इस गीत की ज़रूरत मेहसूस की गई -

तू है मेरा प्रेम देवता....

बिलाशक, रफ़ी जी तो नैय्यर साहब की पहली चाइस थे ही, क्योंकि आप देखेंगे कि फ़िल्म दो उस्ताद में राज कपूर के लिये भी वे मुकेश जी की जगह रफ़ी जी की आवाज़ के लिये अड़ गये थे (एरिरा राका राका का बाका,तू लडकी मैं लडका..).

तो साथ में दूसरे स्वर के लिये निसंदेह मन्ना दा का चयन तो होना ही था.तो फ़िर बनी वह कालजयी संगीत कृति इसको बनाने के लिये नैय्यर साहब नें भी बहुत मेहनत की.

बताते हैं कि रफ़ी साहब जब भी किसी गाने की रिकॊर्ड़ करने स्टुडियो पहूंचते थे तो तो अक्सर वे अपने पास एक इत्र के कुप्पी रखते थे और वहां मौजूद सभी व्यक्तियोंको खुशबू से तर बतर कर देते थे, गोया उनके मदहोश कर देने वाली आवाज़ से कोई कमी रह जाती हो.मगर उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.शायद इस गाने की गंभीरता को भी दोनों गायक बखूबी समझ रहे थे, तो इसीलिये काफ़ी रियाज़ के और तालीम के बाद ये गाना रिकॊर्ड किया गया.रिकोर्डिंग से पहले रफ़ी साहब साज़िंदों को कितना सन्मान देते थे वह इस बात से पता लगता था फ़ाईनल टेक से पहले वे स्वयं वाद्यवृंद समूह के पास जा कर सभी को बडी़ विनम्रता से कहते थे कि ज़रा सम्हाल लेना !!

ओ पी नय्यर की समस्या कुछ और भी थी. आवाज़ की गोलाई, रियाज़, सुरों पर पकड़ ,आदि सभी विधाओं में ये दोनो गायक कहीं भी एक दूसरे से कमतर नहीं थे. मगर उन दोनों की आवाज़ में जो अलग अलग कण था , अंदाज़े बयां या Timbre था उसके अनुरूप ही बंदिशें , ताने, या आलाप का सुर संयोजन होना ज़रूरी था, क्योंकि दोनों की पूर्ण क्षमता का और व्यक्तिगत खूबीयों का इज़हार प्रस्तुत गाने में होना लाज़मी था.

बखुदा , कितना मुश्किल , कठिण काम था जो नय्यर साहब नें आत्म विश्वास और हिम्मत से अंजाम दिया कि दोनों गायकों के सहित सभी उपस्थित जानकारों ने उनको खूब सराहा.

इस बात की कठिनता मैंने भी तब महसूस की जब पिछले दिनों जब मन्ना दा पर आधारित कार्यक्रम - दिल का हाल सुने दिल वाला - में मुझे इस गाने को पेश करने का मौका मिला. संयोग और सौभाग्य कहिये, इस कार्यक्रम में सिर्फ़ मैं ही गायक था, स्वाभाविक था कि दोनों गायकों के बोल मुझे ही गाने थे.

चलिये आज मैं एक आत्म अनूभूति या अंतरंग के अनुभव को ईमानदारी से आपके साथ बांटना चाहूंगा, जब मैंने इस गीत के लिये इन दोनो दिग्गज गायकों की गायन शैली को गहनता से समझने की कोशिश की.वैसे इन दोनों को अलग अलग गीतों के ज़रिये कई बार गाया था, मगर शास्त्रीय रंगों से तरबतर इस अनूठे मगर बेहद क्लिष्ट या कठिण इस गीत में दोनो के साथ न्याय करना मेरे जैसे की औकात के बाहर थी.


वैसे उन दिनों भारतीय फ़िल्म संगीत के आकाश पर जो सुरीले सितारे चमक रहे थे, उनकी आवाज़ में और अदायगी में फ़र्क हुआ करता था. मुकेश की नासिकोत्पन्न दर्द भरी आवाज़ से हेमंत कुमार की बेस लिये हुए हमिंग आवाज़ हो या किशोर कुमार की कडक और खनक लिये हुए आवाज़ से तलत मेहमूद की कोमल और लर्जिश भरी मखमली आवाज़ हो,एक पृथक पहचान लिये हुए ध्वनिरूप आपके मानस के सामने आ जाता है.मगर उस अनुपात में रफ़ी और मन्ना डे की आवाज़ में फ़र्क होने के बावजूद काफ़ी समानता भी थी.

इसलिये अपने सीमित स्वरविवेक से मैने ये पाया कि जहां मन्ना दा की धीर गंभीर आवाज़ में माधुर्य और स्वरों की गोलाई का और हरकतों का उनके अनोखी स्टाईल में उपयोग किया , वहां रफ़ी जी ने पाक निर्मल , जवां (Youthful) और सधी हुई मीठी सी आवाज़ में सीधे सच्चे तानों के सुर लगाये, और इस बात की बानगी दी कि गायकी की रेंज में और मेलोडी भरी अदायगी में शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत भी कितनी आसानी से गाया जा सकता है.पर्दे पर दोनों नायिकाओं में से कोई भी जीता हो,मगर इस गाने में भारतीय फ़िल्म जगत के दो महानतम गायक संपूर्ण रूप से जीत के भागीदार बनें.

तो मेरे संगीत के सुरीले सफ़र के साथियों, जैसा कि आपका आग्रह था, कि मैं इस संगीत गोष्ठी में अपनी आवाज़ में भी कुछ प्रस्तुत करूं तो आपको मसर्रत हासिल होगी.तो दिलीप के दिल के साथ अब ये दिलीप के सुरों से ये गीत सुनाता हूं.

अब इस प ध नि सा के बाद के आंठवें सुर को पेश करते हुए बिस्मिल्लाह करता हूं. इस कार्यक्रम में मेरे साथ सूत्रधार हैं, मेरे अज़ीज़ और अज़ीम फ़नकार श्री संजय पटेल जिन्होने एंकर की विधा को नये आयाम दिये.

(गाने में एक बात आप नोट करें - चूंकि इससे पहले एकदम अलग पृष्ठभूमी का और स्टाईल का गीत - आओ ट्वीस्ट करें गाया था. इसलिये, इस शास्त्रीय स्वरों से भरपूर गीत के लिये स्वरों को मन में उतारने के लिये थोडा़ समय लिया. दूसरा, इस गीत की मुश्किल बंदिश की वजह से इसे मात्र एक अंतरा गा कर समाप्त करने की योजना थी, मगर ऐन समय पर गीत के उस सत्चिदानंद स्वर समाधी का हल्का सा एह्सास होने की वजह से गीत को पूरा गाया गया.

आंठवा सुर..



अगले कडीं में - ओ पी नय्यर, रफ़ी, और गुरुदत्त ...

Sunday, November 2, 2008

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा ....

कड़ी - १
३१ अक्टूबर को पद्मश्री सचिन देव बर्मन की ३३ वीं पुण्यतिथी के दिन सारे दिन उनके गीतों को सुनता रहा, अपने मन की गहराई तक उन रचनाओं का आस्वाद लेता रहा जो हमेशा गाहे बगाहे कानों पर पड़ते तो ज़रूर थे, मगर सुकून से एक साथ
सुने नहीं गए.

उन्हे सुनने का अवसर भी बड़ा ख़ास इसलिए था, क्योंकि एक साथ जब हम उनके रचे हुए गीतों को सुनते है तो तब जाकर पता चलता है, की उनके सभी गीतों में कितनी विवि्धता थी, कितना माधुर्य था, कितनी वेदना थी.

सचिन दा निसंदेह सुरों के एक ऐसे चित्रकार थे जिन्होंने अपने हर पेंटिंग में अलग अलग विषयों पर अलग अलग रंग बिखेरे. उनके ब्रश के स्ट्रोक्स , उनका टेक्सचर , और ग्राफिक्स की विविधता उनके हर गाने में नज़र आती थी या सुनाई देती थी.

हिन्दयुग्म के आवाज़ पर सचिन दा पर एक पोस्ट लिखी तो सहजता से उनके गानों की सुरमई धुंध में मैं खोता चला गया.

मन ही नही भर रहा था. सोचा कुछ अपने यहाँ भी लिख उनको एक बार और श्रद्धांजली देकर, इज़हारे अकीदत पेश कर ,उनके संगीत से जो आज तक आनन्द लूटा है उसका कुछ क़र्ज़ तो उतार ही दूँ, भले ही अंश मात्र ही सही.

पिछले दिनों सिने संगीत को समर्पित हर एक ब्लॉग साईट पर आप पायेंगे इस महान संगीतकार पर कुछ ना कुछ लिखा हुआ , और साथ ही पायेंगे उनके ढेरों सारे गीत उनकी आवाज़ में भी. एक जगह की कमी बेहद खल रही है. श्रोता बिरादरी की जाजम इन दिनों बिछी नही किसी कारण वश. हर सू फैले दिवाली के प्रकाशमय उजियाले में इस प्रेरणा स्रोत सुरमई शमा की अनुपस्थिती ने सचिनदा के दर्द भरे गीतों से उपजी अफ़सुर्दा दिली और भी बढ़ा दी. आवाज़ दे कहां है....?

हमें कोई ग़म नही था ग़मे आशिकी से पहले ,
ना थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले...


सचिनदा के लिए काम करने के लिए बड़े बड़े गायक और गायिकाएं तरसते थे क्योंकि उनके गले की तासीर या Timbre का अचूक उपयोग वे करते थे. सेन्स्युअस गीत में आशा और गीता दत्त की आवाज़ के नैसर्गिक आउटपुट से आगे जा कर अपना एक ख़ास आउटपुट निकालने में माहिर थे. आज सजन मोहे अंग लगा ले, में मादकता का एक Undercurrent , पखावज़ की लय के मिश्रण से अद्भुत प्रभाव उत्पन्न कराते थे. वैसे ही कुछ प्रभाव उन्होंने रात अकेली है गीत में ढाला था , जिसका कान में फुसफुसानें का अलग अंदाज़ बेहद लोकप्रिय हुआ था.

भक्ति युक्त प्रेम भाव हो या संपूर्ण समर्पित अनंत आध्यात्म हो , या फिर अल्हड़ सी शोख़ सी यौवन की छुपी हुई भावाभिव्यक्ति हो , लता के पारलौकिक गले से वे रस उत्पत्ति कर हमें नवाज़ते थे ऐसी ऐसी सुरीली बंदिशों से कि हम उनके सुर सागर में डूबते तैरते बहने लगते है , और कहने लगते हैं कि कोई ना रोको दिल की उड़ान को , आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फ़िर मरने का इरादा हैं .

रफी हों या मन्ना दा, या किशोर , मुकेश , तलत अपनी अपनी जगह पर ही गाते थे उनके लिए.किसी भी गाने का मूल तत्त्व जिस पाये का होता था उसी पाये की आवाज़ वे अपने गाने के लिए लेते थे. हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए के रफी और दुखी मन मेरे के किशोर में दर्द की अभिव्यक्ति का फरक सिर्फ़ वे ही बखूबी कर सकते थे.

I am just listening to araay of his sweet and enchanting songs! What a pure , unadultrated mix of symphony & Melody !!

His music breathes of fresh born flowers, his songs are nestling places of whistling birds, tinkling bells and sobbing flutes, his orchestral creations contain both lyric and epic sweeps of design blended in such rare harmony of which only a composite genius like him is capable -- a genius who breathed music, dreamed music, lived music all his life.


उनके निधन पर दी गयी श्रद्धांजली पर कुछ अंश किशोर दा पर मेरी पिछली पोस्ट में भी आप सुन सकते हैं.

उनपर भारत सरकार नें भी सन २००६ में एक डाक टिकट निकाल कर उनका सन्मान किया था .

गायक के रूप में आराधना के गाये गीत सफल होगी तेरी आराधना पर राष्ट्रीय पुरस्कार १९७० में, और ज़िंदगी ज़िंदगी फ़िल्म में संगीत निर्देशन के लिये भी प्राप्त किया था.फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड़ भी फ़िल्म टॆक्सी ड्राईवर के लिये १९५४ में भी प्राप्त किया.

शास्त्रीय संगीत पर उनकी पकड़ भी क्या खूब थी जनाब. गाईड़ में लता के गाये गीत पिया तोसे नैना लागे रे में उनका कमाल सुनने लायक था. रूपक ताल में निबद्ध किये गये इस क्लासिकल गीत में सचिन दा के संगीत के विज़न का दर्शन होता है और भावनाओं की अभिव्यक्ति का ,Visual Feel का अहसास होता है.

इसके लिये तो लगता है मुझे एक और पोस्ट लिखना पडे़गी. (बुधवार को ज़रूर)

तलाश फ़िल्म में भी तेरे नैना तलाश करें में मन्ना डे की अप्रतिम गायकी के साथ सुरों का संयोजन और साथ में मृदंग या पखावज़ का तबले के साथ अनोखा मेल उनके सुजनशीलता की इन्तेहां थी. इन्टरल्युड़ में सरोद , सितार और बांसुरी,के साथ कहीं कहीं तार शहनाई तो कहीं कहीं ताल तरंग का भी बडे़ ही अधिकार पूर्वक उपयोग किया गया है.

यह गीत पहले बिरादरी पर जारी भी हो चुका है.

तो आपसे इजाज़त लेकर अपनी एक तमन्ना पूरी कर लूँ?

यह गाना पिछले दिनों यहाँ स्टेज पर गाया गया था . मन्ना दा को समर्पित एक पूर्ण कार्यक्रम -दिल का हाल सुने दिल वाला - में स्टेज पर प्रस्तुत गीत का विडियो देखें और सुने. गायक यहाँ नगण्य है. उसकी मस्ती का , सुरों के नादब्रम्ह का आप भी अनुभव लें.

मन्ना दा जैसे हिमालय को नापना किसी भी गायक के लिए मुमकिन नहीं ये बात तय है दोस्तों. मगर वादक कलाकारों के कौशल को सुन दाद ज़रूर दें , क्योकि सभी कलाकारों ने अपने अपने स्तर पर अपना रोल बखूबी निभाया है. एक ही की बोर्ड पर सभी वाद्य - सितार, ताल तरंग, तार शहनाई, सरोद, बांसुरी और क्या क्या. मृदंग नहीं था तो एक हाल में तबला और दूसरे पर ढोलक लेकर इफेक्ट पैदा किया है.

अगले रिलीज़ : -
कड़ी - २ - पिया तोसे नैना लागे रे ... मेराथोन गीत का सुरीला विवेचन
कड़ी - ३ - सचिन दा, गुरुदत्त,साहिर,हेमंत कुमार से जुडी एक कॉमन स्मृति विशेष (पिछले महिने की श्रद्धांजली)

Wednesday, October 8, 2008

संगीत का आशावाद...(Optimism in Music) बनाम कानसेन/तानसेन

जोग लिखी संजय पटेल की के चिठ्ठे पर अभी अभी एक बेहद रोचक किंतु शिक्षाप्रद लेख पढ़ कर अभी अभी आया हूं(दोबारा).

श्रोता की खसलत कार्यक्रम का सत्यानाश कर देती है !

श्री संजय पटेल नें इस एक ही लेख में ’कानसेन’ और ’तानसेन’ को मुखातिब हो बड़ी ही सच्चाई और खुलूस से जो बात कही वह कहीं भी पढने को नही मिली, कम से कम मुझे तो.

आप इस लिन्क पर जा स्वयं पढ़े और फ़िर लौट के आयें यहां, थोड़ी चर्चा और करनी हो तो, क्योंकि बात बड़ी समझदारी की है. आपमें से कईयों ने तो वहां जाकर यह पोस्ट पढ़ भी लिया होगा .मैनें तो अपने आप से बिस्मिल्लाह किया है,सुधरने की इस प्रक्रिया में.
"http://joglikhisanjaypatelki.blogspot.com"

अब विस्तार से. थोडा़ समय लूंगा, माफ़ करियेगा.

उन कानसेनों के लिये जो अपने आप को बड़ा तानसेन समझते है - जो इस आत्ममुग्धता के वलय में ही रहते है,और ये निर्णय लेते हैं कि चूंकि वे अच्छे (?) गायक या वादक या कला के किसी भी माध्यम में दखल रखते हैं, इसलिये उन्हे यह अधिकार पहुंच जाता है, कि वे संगीत के अच्छे डॊक्टर हो गये है. हो भी सकते है, उनमें से कई होंगे भी , मगर तब तो उन्हे यह बात और जान लेना चाहिये कि कलाकार नें बड़ी मेहनत से अपना जो हुनर पेश किया है, उसके सकारात्मक पहलू में जा कर आप कुछ अच्छा ले सकते है, उससे कुछ पा सकते है तो क्या हर्ज़ है.मगर दुख की बात ये है, कि वह कानसेन (श्रोता) अपने साथ अपने तानसेन को भी ले जाता है,जिसका भूत उसके कान और सर पर चढ़ कर बोलता है. (कर्ण पिशाच्च ?!!).

मगर ऐसे सरस्वती पुत्रों को शायद यह अभिशाप ही है, जो मैनें अपनी संगीतयात्रा के दौरान अनुभव किया, कि इस मानसिकता के पीछे कारण होता है उनकी वह डाह या मत्सर जो इन टिप्पणीयों मे प्रतिध्वनित होता है कि भला इसकी कमीज़ मेरे कमीज़ से सफ़ेद क्यों ? कोई भी माई का लाल किसी भी गायक/गायिका की नकल शत प्रतिशत नहीं कर सकता. उनका जलाल आना तो संभव ही नही. मगर जैसा की संजय भाई के इस लेख पर की गयी एक टिप्पणी में यह बात बड़े गंभीरता से कही गयी है, कि किसी भी सूरत में लाईव्ह मेहफ़िल से बेहतर श्रवणानंद कहीं और नहीं मिल सकता. टेप या सी ड़ी में भी नहीं ,या उसी कार्यक्रम को रिकॊर्ड़ भी कर लें तो भी. क्योंकि वहां, श्रोता का कलाकार से सीधा आत्मिक संबंध जुड़ जाता है.साथ में माहौल, और श्रोता सत्संग का संयोग भी.

तभी जाकर संजय भाई के इस लेख की प्रासंगिकता और अधोरेखित होती है कि,

ईमानदार श्रोता वह है जो रहमदिल होकर कलाकार की तपस्या का मान करे और सह्र्दय होकर उसकी कला को दाद देकर उसे नवाज़े; उसका हौसला बढ़ाए.



अब बात करें उन कानसेनों की जो स्वयं तो कला के क्षेत्र के मात्र प्रबंधन या पद की वजह से जुड़े होते है,जो कला के किसी भी क्षेत्र से वास्ता नहीं रखते , मगर स्वयं को महान समीक्षक कहलाने में नही अघाते.ये उन टिप्पणीकारों की तरह है, जिन्होने कभी हाथ में बल्ला नहीं पकड़ा, कभी स्टेडियम में धूप में जाकर तपे नहीं मगर, घर में टी व्ही के सामने बैठ कर कहते है, भैया ये सचिन को इस तरह से खेलना था. वहां सचिन की जगह अगर भाईसाहब होते तो क्या गुल खिलाते उसका ज़िक्र यहां नहीं !

ऐसा नहीं की सभी ऐसे हों . इनमें कई ऐसे भी होते है, जो बेहद अच्छे श्रोता और पारखी होते है, संगीत की काफ़ी बारिकीयां उन्हे पकड़ में आती भी हैं. उनके पास संगीत से, माहौल से जुडे़ रहने से और गुणी, नामचीन कलाकारों को सुनने का अनुभव होने से यह पात्रता और इज़्ज़त हासिल हो जाती है. मगर उन्हे भी यह हक़ हासिल नहीं होता कि वे कलाकार के प्रस्तुतिकरण को हिकारत से या उनके पूर्वग्रह ,पूर्वधारणा से आकलन करें क्योकि संजय भाई नें यह भी तो लिखा है- हर दिन भट्टी जमें यह किसी भी बावर्ची (cook)के लिये संभव नहीं.

मैं तो आगे बढ कर यह वेदना भी व्यक्त करूंगा की अगर आप निर्णायक भी हैं तो क्या आपको उन कलाकारों का मखौ़ल उडा़ने का हक पहुंच जाता है? उनकी प्रतिभा या प्रस्तुति में अगर कोई ख़ामी है भी तो इसकी जगह उन्हे उचित मार्गदर्शन देकर मनोबल बढा नही सकते ? क्या आप नये इंडियन आईड़ल के गायक गायिकाओं के चयन प्रक्रिया को देख रहें है? सभी जजेस गुणी है, अपने अपने क्षेत्र के शीर्ष पर भी है. मगर उनकी प्रतिस्पर्धियों की इस तरह अप्रतिष्ठापूर्ण (Derogatory) हंसी उड़ा कर क्या अपने आप को एक अच्छा इंसान साबित कर रहें है?

एक और किस्म के श्रोता की जमात से आपको मिलवाता हूं . मेरे वे साथीगण ज़रूर समझ जायेंगे इसकी पीड़ा , जो गायक भी है.इन फ़रमाइशी श्रोताओं को हमेशा हर स्थान पर , हर मौके पर गाने की फ़रमाइश करने का रोग है.किसी भी महफ़िल में ये अचानक उग आते है, और किसी भी मेहमान को (अगर गायक हो तो) तपाक से गाना सुनाने की फ़रमाईश कर ड़ालते है.अब उस बेचारे की परेशानी तो ज़रा समझें.उसका बिना किसी सुर या ताल की संगत बिना गाना सुना सकने में हिचकिचाना लाज़मी है, (अगर वह थोड़ा बहुत भी गाना स्टेज पर गाता आया हो).संगत की अनुपस्थिती के वाजिब कारण से उसके नानुकूर करने पर ये फ़रमाइशी लाल तो पीछे ही पड़ जाते है,और दीगर भीड़ को भी साध लेते है.अरे, भाई साहब , आप तो गा ही दिजीये, यहां कौनसा स्टेज कार्यक्रम चल रहा है.अब वो नही गाता है तो ये कहते है क्या भाईसाहब, आप भी भाव खाने लगे. अरे मेरे कहने पर तो बड़े बड़े गायक गा चुके हैं, आपको तो घमंड़ हो गया है.यदि वह गा देता है, और मजमा जमता नही है तो मुंह बना कर कहते है - अभी कमजोर है, फ़लां फ़लां के सामने तो कुछ भी नही..पता नही ये लोग किसी पार्टी में अगर तेंडुलकर को भी मिलेंगे तो कहेंगे, ज़रा कवर ड्राईव मारकर तो बताईये!!

इसीलिये संजय भाई नें जिस मुद्दे पर बारीकी़ से और बेबाक़ी से रौशनी ड़ाली है, हमें उससे सबक लेना पड़ेगा .पहले अपने को, बाद में अपने इर्दगिर्द संगीतप्रेमीयों को अच्छे श्रोता से जो अपेक्षित है उसकी समझ दें.

और जो संगीतप्रेमी नहीं है, उन औरन्गज़बों से तो कुछ भी अपेक्षित नहीं किया जा सकता मगर उनसे भी भिड़ना तो पडेगा ही. अभी कुछ सालों पहले रफ़ी जी की पुण्यतिथी पर लायंस क्लब में एक कलाकार को गवाने का प्रस्ताव जब मैंने रखा था तो एक पदाधिकारी नें यह कहा था कि किसी और को ही क्यों, खुद रफ़ी जी को ही बुला लो. मैं उस समय तो चुप कर गया, मगर अब तक राह देख रहा हूं कि वे खुद उपर जाकर कब रफ़ी साहब को आमंत्रित करते हैं!!

अब उस चिठ्ठे की अगली महत्वपूर्ण बात पर गौर करें. आपका थोड़ा वक़्त और लूंगा.



जनाब मेहंदी हसन साहब के साथ गुज़रे अनुभव से हर संगीत के साधक का सर श्रद्धा से झुक जायेगा.यही नम्रता और अपने फ़न की तरफ़ मेहनत और मुसस्सल ईमानदारी का जज़बा हम सभी संगीत प्रेमी और विद्यार्थीयों को एक पाठ पढा़ जायेगा.वाह , क्या बात है!

संजय भाई को यह सौभाग्य प्राप्त है, कि अपने संगीत के शौक और संस्कृतिकर्मी होने की वजह से इन्दौर या पूरे मध्यप्रदेश में आये करीब करीब हर बड़े संगीतकार, गायक, गायिका, फ़िल्मी हस्तीयां, और संगीत की क्षेत्र में जुड़े हर कामयाब व गुमनाम साधक को उन्होनें बड़े करीब से जाना है, पहचाना है. बतौर एंकर पर्सन वाणी पर उनका प्रभुत्व तो है ही, मगर उनका शब्द लालित्य उनके मिजाज़ की तरह ही सुरीला है.इसीलिये उनसे यह आग्रह भी है, कि हम श्रोताओं के इस खा़स समूह को वो इतनी इज़्ज़त बक्षें और ऐसे ही कुछ अंतरंग और सारगर्भित अनुभव से हमें और भी नवाज़ें, ताकि नई पीढी़ को भी इन मूल्यों से रू-ब-रू करवाया जा सके.

बात मैंने भी ज़रा लंबी ही कर दी. मगर क्या करूं , जब संजय भाई ने लेख में उन पहलूओं को जब छूआ तो उस खसलत को मैंने भी महसूस किया.उपर से पिछले इतवार को कुछ ऐसा ही वाकया या अनुभव मेरे साथ भी दर पेश आया तो मैं भी लिख पडा़.(वह कल..)



चलो एक बार फिर से अच्छे श्रोता बन जाये हम दोनों..

मन्ना दा के किसी महफ़िल में तबलची की खस्लत!! हंसियेगा नही, वह भी कलाकार है.

Saturday, September 6, 2008

एकलव्य - सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं


गुरु पर्व
(वो जब याद आये, बहोत याद आये)

शिक्षक दिवस पर कईयों नें तो अपने अपने माड साब को याद किया होगा.अपने अपने तईं, कुछ मन से, कुछ जतन से जो यादें संजोई रखी होगी उसकी जुगाली भी की होगी.

व्यवसाय के फ़ेर में भटकने पर मजबूर दिलीप का ये दिल अंदर से कसमसा रहा है, कि कल क्यों नही कुछ लिखा. खैर, आज ही सही. हाले दिल का बयां, दिन के गुज़रने के बाद ही हो सकता है ना?अपना ब्लॊग बाद में ही सही.

तो आज आप लोग थोडा समय मेरे मन के अंतरंग को भी दे, कुछ नितांत व्यक्तिगत , स्वगत..कल से फ़िर अपने मकाम पर वापिस.

आज यहां संगीत की बात करें तो याद आते है मेरे वो गुरुजन , जिनसे मै चाहते हुए भी सीख नही पाया-

भोपाल में उस्ताद सलामत अली खां साहब, जिन्होने मुझे शास्त्रीय संगीत सिखाने का जिम्मा लिया. करीब ६ महिने सिर्फ़ सुर ही लगवाते रहे, मगर परिक्षा में डब्बा गोल होने पर अब्बा हुज़ूर नें फ़ौरन गाने पर पाबंदी लगा दी.शिक्षक दिवस पर उन्हे याद कर ,खुद आंसू बहा के उनसे मुआफ़ी मांग लेता हूं. आज कहां है वे?

इधर इंजिनीयर बनने के बाद जब एम.बी.ए. के लिये इंदौर आया तो एक राखी बहन मिली, कल्पना जो क्लासिकल संगीत की शिक्षा ले रही थी अपने गुरु और पिता श्री मामासहाब मुजुमदार जी से.(कुमार गंधर्व के मित्र).घर पर आना जाना, सुरों की खुशबू से महकती फ़िज़ा, बघार भी लगे तो पंचम और निशाद से.. मगर फ़िर वही कहानी. मामासहाब नें भी कई बार कहा. मगर अपनी ही धुन में रहे.

उन्हे भी कल याद किया.

फ़िर अनायास ही मुड गये सुगम संगीत की ओर. गाने तो बचपन से सुनते ही रहते थे, सभी के गाने, और इसीलिये ये सभी मेरे गुरु है उन्हे भी नमन..

मन्ना डे, मुहम्मद रफ़ी, मुकेश, तलत मेहमूद, हेमंत कुमार ..

इन फ़िल्मी संगीत के मूर्धन्य गायकों ने जो पंचामृत का खजाना रख छोडा है, इसे लूट रहा हूं. अनायास ही एकलव्य की भूमिका में अपने आप को पाता हूं.यहीं से तो कानसेन बने हैं, और तानसेन बनने की ख्वाईश नही..

गज़ल की दुनिया में भी सुनने को मिला मेहंदी हसन और गु़लाम अली को..उनके लिये उनकी लंबी आयु के लिये भी दुआ की.

फ़िर अपने आध्यात्मिक गुरु भी याद आये- नानासाहेब तराणेकर महाराज, और इस्लाम की रूहानी तालीम देने वाले बाबा सत्तार जी.. और मेरी मां भी .. नमन...

नाट्य शास्त्र की अल्प तालीम के लिये विजया मेहता, और चित्रकारी के लिये सच्चिदानंद नागदेवे याद आये..

उच्च संस्कार, सादे रहन सहन और वस्तुनिष्ठ विचारों के लिये और अपने अंदर समाहित इस लेखक के प्रणेता जन्मदाता महामहोपाध्याय डॊ. प्र.ना.कवठेकर को भी व्यक्तिगत रूप से साष्टांग प्रणाम किया.

अंत में whole thing is that कि मन में जो भाव उमड रहे है,उसकी अभिव्यक्ति के लिये मन्ना दा का एक गीत यहां सुनवा रहा हुं, पूर्णतः विचारों के समीप.उसे स्वीकार किजीये.. यह मूल गीत नही है.

सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं ..



सुर की सुराही तो रीती ही रह गई.

परसों आशाजी पर कुछ.
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