दोस्तों, कभी कभी हम अपने जीवन के ऐसे दौर से गुज़रते हैं, जब हमें खुदा हर तरफ़ से खुशियां बरसाता है, और आपका दिल बल्ले बल्ले उछल रहा होता है.
मगर , यूंही चलते चलते यादों के पुराने खंडहरों से हम गुज़रने लगते हैं, और खुशी और ग़म के समानांतर रास्ते पर जब हमारे गाडी़ हिचकोले खाती है,तो मीठी सी चुभन हो या तीखी सी ख़लिश हो, आप उसमें रमने लगते हैं, और दीदाए तर होते हैं.
पिछले दिनों, किशोर दा की जन्मदिन की खुशिया मनाईं कैरो (ईजिप्ट)में, जैसे कि रफ़ी साहब के पुण्यतिथी पर उन्हे याद किया था. रफ़ी साहब के बांद्रा स्थित घर के बरामदे में रखी हुई उनकी फ़िएट याद आये, जिसमें चाभी भी लटक रही है उस दिन से, या किशोर दा के बंगले पर गेट सेही उन्हे पेड पर चढे हुए गाना गाते हुए देखा और सुना....सभी यादें दिल में घर किये हुए है.
याद पडता है कि किशोर दा गाना गा रहे थे आशाजी का, जो दूरी के वजह से ठीक से सुनाई नही पड रहा था.. गाना था.........
यही वो जगह है ,यही वो फ़िज़ाएं, यहीं पर कभी आप हमसे मिले थे....
पता नहीं क्यों, जिस खूबसूरती से आशा जी नें गाया था वो गाना, किशोर दा किसी और मूड में दर्द के काढे़ में अपने स्वरों को उकाल उकाल कर क्या समा बना रहे थे.चौकिदार नें अंदर नहीं जाने दिया, इसका ग़म ना करते हम तो बडे से जायेंट व्हील पर बैठ कर स्वरों के उस उतार चढाव में खो गये.फ़िर अचानक बीच में गाना रोक कर किशोर दा चिल्लाकर किसे को आवाज़ देने लगे नारायण,नारायण... तो हम खिसक लिये.
तो अभे जब आशाजी की जन्मदिन की खुशियां मनाईं, तो उस दिन ये गाना रिकोर्ड कर लिया , कुछ ऐसे ही अंदाज़ में. संय़ोग ये रहा, कि इन दिनों में अल्पना जी से बातचित हुई तो उन्होने ये बताया कि अभिजीत नें भी इसे गाया है. खैर, आप भी सुनिये.
आशा जी सुनेंगी तो नाराज़ होंगी ही. पिछली नाराज़गी भारी पडी़ थी मुझे, जब इंदौर में उन्होने एक कार्यक्रम दिया था, और मैने, अखबार नईदुनिया में उसकी समीक्षा में उनके आलोचना के थी, क्योंकि उन्होने अधिकांश गीत नये लिये थे, और मेरे जैसे अनेक दीवानों को निराश किया था. इसलिये दूसरे दिन जाने से पहले उन्होनें नाराज़गी से लताडा था मुझे.(सर आंखों पर)
चलिये अब सुनिये, वही गीत और अगली बार समय रहा तो उस बात का जिक्र करूंगा, कि जब वे इंदौर आयीं थीं लताजी के नाम का पुरस्कार ग्रहण करने, और गाने का प्रोग्राम देनें से इंकार कर दिया था.और फ़िर इस खा़कसार को स्टेज पर आपातस्थिती में उतरना पडा था. आप सोच सकते हैं, कि जो पब्लिक उन्हे सुनने आये थी उसे मुझ जैसे नाचीज़ को सुनना पडा होगा तो क्या हुआ होगा!!!!(रब की मर्ज़ी)
यही वो जगह है, जहां कभी हमने आपके सामने गाया था....
पिछली पोस्ट पर आपकी टिप्पणियों के लिये शुक्रिया अदा करता हूं, क्योंकि वह पोस्ट काफ़ी समय बाद लिखी गयी थी,और लगा था कि आप मुझे भूल गये होंगे. (ऐसे ये हक है आपको, मेरे बात और है, मैने तो मुहब्बत की है).
मेरे मित्र OLD MONK नें फ़रमाया कि उन्हे व्यक्तिगत कारणों से आज क्यूं हमसे पर्दा है कव्वाली ज़्यादा माफ़िक लगी औरतों के लिये. तो उनसे गुज़ारिश है कि वे समय निकालकर अपने विचारों से इस बात की पुष्टि ज़रूर करेंगे ताकि उस अलग से एक पोस्ट पर डाला जा सके.वैसे ये बेहतरीन कव्वाली दिलीप के दिल के भी करीब है.
आज हम एक दूसरे गीत के बारे में बात करना चाहेंगे जिसका ज़िक्र पिछली पोस्ट में भी किया था---
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है...
डॊ, अनुराग जी नें अपनी टिप्पणी में सही लिखा है कि यह रचना भारत की उस समय की वर्तमान परिस्थिति को बखूबी परिलक्षित करती थी ,और पं नेहरू की भी आंख की किरकिरी थी, जिसके बारे में साहिर नें अपनी तीखी कलम से सही खाका खींचा था.
वैसे फ़िल्म प्यासा में आप हम नें देखा, सुना और उसके बेहतर चित्रीकरण , केमरा संचालन , प्रकाश संयोजन का कमाल देखा (दादा साहेब फ़ालके पुरस्कार २००९ के विजेता फ़ोटोग्राफ़र श्री मूर्ती की कलाकारी के बदौलत). लेकिन इमानदारी से कहूं तो गुरुदत्त के कौशलपूर्ण निर्देशन और भावपूर्ण अभिनय की साथ मिलने से बेहतर हुए एक क्लासिक फ़िल्म की इस क्लासिक रचना का असली श्रेय साहिर को दिया जाये या गुरुदात को ये मैं तय नहीं कर पाऊंगा. ये आप ही तय किजिये. अधिकतर ,प्यासा के आसपास फ़िल्मी दुनिया में यह चलन शुरु हो चुका था कि पहले एक अच्छी, रसीली, कर्णप्रिय तर्ज़ बना ली जाती थी और उसके अनुरूप गीतकार से फ़िल्म की सिच्युएशन के हिसाब से गीत लिखवा लिया जाता था.एस डी बर्मन साहब को कमोबेश इसका श्रेय दिया जा सकता है, और प्यासा में भी कुछ गीतों के संदर्भ में यही हुआ भी था.
मगर आपको ये जानकार कौतुहूल होगा और आश्चर्य कि प्यासा फ़िल्म का जब इंतेखा़ब किया गया था तो नायक विजय एक चित्रकार था, शायर नहीं.फ़िल्म की नायिका (माला सिन्हा) एक अमीरज़ादी थी जो चित्रकार के पेंटिंग्स की प्रदर्शनी करा कर उसे इस्तेमाल करती थी , सोसाईटी में अपने वजूद और वका़र का लोहा मनवाने के लिये.गुलाबो का तो कहीं पता ही नहीं था!!
फ़िल्म के लेखक अब्रार अल्वी जिनका अभी अभी इंतेकाल हुआ है, इस फ़िल्म के लेखक थे, और गुरुदत्त के फ़िल्म कंपनी में मुलाजिम भी. मगर जब गुरुदत्तजी नें साहिर नें लिखी हुई गज़लों की किताब परछाईयां पढी तो वे इस कदर दिवाने हुए उसमें लिखे गीतों को अपनी फ़िल्म प्यासा में शामिल करने के लिये बेचैन हो गये. यहां तक कि उन्होने नायक विजय के पात्र ही चित्रकार से शायर में बदल डाला!!
इस गज़ल संग्रह में से गीतों को लेने का मतलब था सचिन दा के लिये एक बडी चुनौती, क्योंकि भले ही मोटे तौर पर शब्दों को मीटर में लिखा गया होगा, मगर भावाभिव्यक्ति और नज़रिये को सही और पैने तौर पर रखने के लिये कहीं कहीं शायरी को तवज्जो दी गयी तरन्नुम की जगह.
वैसे सर जो तेरा चकराये/हो लाख मुसीबत रस्ते पर/हम आपकी आंखों में.. आदि गीत धुन बनवाने के बाद लिखे गये.मगर बाकी गीतों का इतिहास अलग है.
इसलिये आप देखिये एक गाना था - तंग आ चुके हैं कशमकशे ज़िंदगी से हम - जिसे मुशायरे में पढने की वजह से सिर्फ़ गुनगुना कर गवाया गया रफ़ी साहब से.( बाद में यही गीत आशा भोंसले नें फ़िल्म लाईट हाऊस के लिये एन दत्ता के संगीत निर्देशन में गाया था). आप सुनियेगा इस गीत को तो आप वाकई रफ़ी साहब के काय हो जायेंगे, कि बिना किसी सुर या ताल के कितना मधुर और मेलोडी की चासनी में दर्द को डुबा कर गाया है रफ़ी साहब नें.
दूसरा गीत है जाने वो कैसे लोग थे जिनसे... जो परछाईयां में से ही लिया गया, जिसके धुन बाद में बनाई गयी.गुरुदत्त और साहिर अड गये थे इस गाने को रफ़ी जी से गवांने के लिये , मगर मानना पडे़गा सचिन दा की संगीत की सोच और पकड़ की, कि उन्होने इस गीत को हेमंत दा से ही गवाया. यही बात बाद में गुरुदत्त/साहिर/सचिनदा के बीच की कशमकश और खाई की सबब बनीं(कडी ४ या ५ में )
और सबसे महत्व पूर्ण गीत था जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है?
क्या आप मानेंगे कि इस गीत की लय, शब्दों का मेनेजमेंट, एकदम अलग नहीं है? पायल की छन छन पर घुंगरू की आवाज़, तबले की धन धन पर तबले की आवाज़,खांसी की ठन ठन पर खांसी की और सिक्कों की झंकार पर साऊंड बाईटस के द्वारा साहिर की मनचाही नाटकीयता रचायी गयी.
अल्पना जी नें भी अपनी टिप्पणी में सही लिखा है कि साहिर की संवेदनशीलता ,साफ़गोई और तीखे चुभन लिये शब्दों के पीछे उनके व्यक्तिगत जीवन के अनुभव ही ज़िम्मेदार थे.
ज़रा ध्यान दें...
ये फ़ूलों के गजरे , ये पींको के छीटें, ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख़ फ़िकरे, ये ढ़लके बदन और ये बीमार चेहरे जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है? कहां है, कहां है , कहां है?
यकीन मानिये, जब साहिर नें ये बोल लिखे थे तो उसके सामने कोई सिच्युएशन नहीं थी. सिर्फ़ एक कविमन, या शायर के ज़ज़बातों की , पेथोस की अभिव्यक्ति थी या मन की पीडा का क्रंदन था.गुरुदत्त भी तो थे एक मासूम, ज़ज़बाती और संवेदनशील मन के मालिक.इसी वजह से ये क्रंदन सीधे उनके दिल के अंदर उतर गया.उन्हे ये लगने लगा कि साहिर के अंतरंग की इस पीडा़, इस झटपटाहट को चित्र रूप देकर रीयल लाईफ़ से रील लाईफ़ में लाकर उसे डिफ़ाईन किया जाये , सिनेमा के दर्शकों के लिये परिभाषित किया जाये.शायद इसी तरह से , इस तरह की रचना को प्यासा में डाल कर इस फ़िल्म को काव्यात्मक ऊंचाई पर ले जाया जा सके.
इसलिये उन्होंने अब्रार अल्वी को समन किया और कहा कि कुछ भी हो जाये, कुछ ऐसी सिच्युएशन पैदा करो ताकि इस फ़िल्म में रचना प्रभावी तरीके से फ़िल्माई जा सके.
तो देखिये साहिर द्वारा लिखे गये इन अमर अश’आर के लिये अब्रार अल्वी नें कैसी सिच्युएशन लिखी और महान गुरुदत्त नें अपनी कलात्मक और क्रियेटिव कौशल से उसके साथ कैसा न्याय किया.और सचिनदा की धुन पर रफ़ी साहब की दर्द में सोखी हुई पुरनूर आवाज़! कंबख्त , क्या कोंबिनेशन है जनाब!
क्या इससे बेहतर कोई और सिच्युएशन या पिक्चराएज़ेशन का इंतेखाब किया जा सकता है?
(अगली कडी में कैसे गुरुदत्त को इस गाने के लिये सिच्युएशन मिली .... कडी ३ में , बस इंतेज़ार करें, क्योंकि बडी पोस्ट से परहेज कर रहा हूं)
आज लगभग एक महिना होने आया, आपसे मुखातिब नहीं हो पाया.
पिताजी की तबियत के कारण, काम में थोडा पिछड गया था. मूड भी नहीं बन पा रहा था. गोया कोई बडा़ उपन्यास लिखना था,जो मूड बना रहा था.
इन दिनों, रफ़ी साहब का जन्म दिन चला गया २४ दिसंबर को. मैं संयोग से एक दिन पहले मुंबई में था, तो किसी से मिलने शाम को बांद्रा में था, तो पता चला, रफ़ी साहब का पुराना घर वहीं करीब था. बस, दिल नें चाहा और मैं निकल पडा.
मगर वहां चूंकि रेडियो मिर्ची FM की टीम आयी हुई थी, अंदर जाना संभव नहीं हो पाया, क्योंकि वह कोई किसी फ़िल्म का प्रीमीयर नहीं था जो भागम भाग में चला जाता. बस सोचा बाद में सुकून से दिली सुकूं पाने के लिये फ़िर आऊंगा. बस नीचे रखी हुई उनकी फ़ियेट ज़रूर देखी, जिसमें चाबी लगी हुई थी, और वही छल्ला जो रफ़ी साहब जेब में रखते थे, जब भी वे शौक से खुद गाडी चलाते थे. ऊपर जाना फ़िर कभी ....
फ़िर महेंद्र कपूर जी का भी जन्म दिन चला गया, ९ जनवरी को. उनके साथ बिताये कुछ लमहे याद किये और उनके गाये हुए गीत सुने और गुनगुनाये.
अब परसों स्व. ओ पी नय्यर साहब का जन्म दिन था. दो साल पहले इसी दिन उनसे मिलने जा पहुंचा था उनसे मिलने, मगर मिल नहीं पाया क्योंकि वे कहीं विरार गये थे आदिवासीयों में डाक्टरी करने. कुछ दिन बाद उनके निधन की खबर आयी, तो दिल को धक्का पहुंचा कि दुर्भाग्य रहा था मेरा.
खैर, रफ़ी जी और नय्यर साहब की जोडी तो सबसे ज़्यादह मकबूल हुई. करीब १५० से अधिक गानें उन्होने रफ़ी जी से गवाये. फ़िर महेंद्र कपूर जी से. किशोरदा, मुकेशजी ,हेमंतदा,मन्ना दा तो कम ही गा पाये उनकी बनाई तर्ज़ों पर. और तो और सरदार मलिक की तरह नय्यर साहब नें भी राज कपूर के लियी रफ़ी साहब को गवाया.
रफ़ी साहब को हमेशा यही मलाल रहा कि वे हमेशा हर हीरो या नायक के चरित्र, मेनरिझ्म और अदायगी की तरह से अपनी आवाज़ को बदल लेते थे, जबकि उन्हे लता जी की यह बात बडी़ ही अच्छी लगती थी लता जी नें कभी भी अपनी आवाज़ को नहीं बदला. लताजी के अनबन के बाद जब उनकी फ़िर से लता जी के साथ दिल जमाई हुई, तो उन्होने नय्यर साहब को यह बात बताई थी. नय्यर साहब बहुत हंसे थे, और उन्होने कहा था कि आप जिसे अपनी कमज़ोरी मान रहे हैं , वह तो आपकी खा़सियत है, जो दूसरे गायक कलाकारों को संभव नहीं है.
नय्यर साहब नें कई गानों की धुन बनाईं, ठसक के साथ पंजाबी ठेके पर , ढोलक की दुडकी चाल पर .चेलो, क्लेरिनेट और सॆक्सोफ़ोन जैसे पाश्चात्य वाद्यों से लेकर सारंगी , सितार ,और बांसुरी जैसे खालिस देसी वाद्यों का भरपूर उपयोग किया. मस्त ,रंगीन रोमांटिक गानों पर महारत रखनें वाले नय्यर साहब कभी कभी दर्द भरे गानों का भी सृजन बखूबी किया करते थे .
मेरी पसंद के दो महानतम दर्द भरे गानों की फ़ेहरिस्त में आपके दो गानें है:
चैन से हमको कभी .. और
है दुनिया उसीकी, ज़माना उसीका......
जी हां , फ़िल्म कश्मीर की कली का यह गीत दर्द के एहसासात की इंतेहां बयान करता है. रफ़ी साहब के भीगे हुए स्वरों में एस एच बिहारी नें लिखे हुए भावपूर्ण अश’आर, नय्यर साहब की पेथोस से भरी तर्ज़ में जब हमारे कानों में पडते हैं ,तो ज़माने भर के मुहब्बत करने वाले प्रेमीयों के टूटे दिलों के साथ आपके संवेदनशील दिल के तार अपने आप जुड जाते हैं, और आप उसी भाव में दर्द के उस सागर में डूबने उतरने लगते हैं. साथ में प्रस्तुत सॆक्सोफ़ोन की प्रील्युड और इंटरल्युड में सोलो रेंडरिंग आपके कलेजे को चीर डालती है, और भावनाओं से लहु लुहान हो कर शम्मी कपूर, रफ़ी जी, नयार साहब और आप एकजीव हो जाते हैं.
कौन नहीं चाहेगा इस तडप को , मेहबूब की बेवफ़ाई को जीना, भोगना?
चलिये, आपको यह गीत सुनवा देतें है. इसके विडियो को मिक्सिंग के लिये उपलब्ध कराने के लिये अल्पना जी का धन्यवाद. आप भी यह प्रयास देखें , सुनें, और पसंद आये तो दाद दिजीये. जिन्हे संगीत और रिकोर्डिंग में दिलचस्पी हो, उन्हे बता देना उचित होगा, कि यह असंभव ही है, कि किसी भी गाने का कराओके उस्के ओरिजिनल साऊंडट्रॆक से हूबहू मॆच करे. प्रस्तुत गाने की विडियो क्लिपिंग में मूल गाने को कराओके ट्रेक के साथ पहले सोफ़्ट्वेयर की मदत से कोशिश करके मिलाया, स्स्वर, ताल और लिप्स मूव्हमेंट में, फ़िर उसपर गीत रिकोर्ड किया और मिक्स किया. ऐसे प्रयोग करने सें जो दिली सुकून मिलता है, वह आप जैसे कलाकार या कवियों को पता ही है.
(आज फ़िल्मी जगत के प्रथम सिंगिंग सुपरस्टार के एल सहगल साहब की भी पुण्यतिथी है. रात को उनके गानों की समाधि में बैठूंगा)
ओडियो प्लेयर भी लगाया है, जिन्हे विडियो स्ट्रीमिंग में परेशानी आती है, उनके लिये. बाकि विडियो के लिये प्ले का बटन दबाने के बाद pause करने से थोडे देर बाद बिना रुके देख सुन सकने में आसानी होगी.
किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है.
बहुत कुछ पाया है इस ज़िंदगी से.
संगीत,रंगकर्म,चित्रकारी,फोटोग्राफ़ी में किये अव्यावसायिक प्रयोग और व्यवसाय में वास्तुशास्त्र, इंजिनीयरींग और मॆनेजमेंट के कुछ भुगते ,कुछ आज़माये फ़ंडे.
कुछ इहलोक की कुछ परलोक की.
कुछ आत्मा की, कुछ परमात्मा की..
कुछ पायें , कुछ लौटायें..