आज नशीली , जादुभारी आवाज़ की मलिक गीता दत्त का जन्म दिन है. अगर वे आज़ ज़िंदा होतीं, तो ८० वर्ष की होती!!
गेताजी के पुण्य तिथी पर कुछ खास लिखना चाहता था, मगर अब वे सुख भरे दिन बीते रे भैय्या... वाली स्थितियों के चलते हुए नही लिख पाया.गुरुदत्त जीकी पुण्य तिथी पर भी पिछले महिने कुछ नही लिख पाया.आज भी कुछ खास नही लिख पाउंगा.
याद आया कहीं पढा हुआ कि गुरुदत्त जी नें गीता रॊय से शादी के बाद अपनी हर फ़िल्म में गाने ज़रूर गवाये, जो काफ़ी मक़्बूल भी. मगर उन्होनें मात्र गीताजी के लिये बतौर हिरोईन एक फ़िल्म भी लॊंच की थी-’गौरी’, जो बंगला भाषा में बनने वाली थी और भारतीय फ़िमों के इतिहास में सबसे पहली सिनेमास्कोप फ़िल्म थी.
अगर वह फ़िल्म बनती तो पता नहीं हम गीता दत्त के रूप में एक अभिनेत्री से भी रूबरू हो जाते. फ़िर शायद सर्वकालीन कालजयी का़गज़ के फ़ूल बन पाती , जो लगभग उसी विषय वस्तु पर थी?
गुरुदत्त एक अफ़लातून , जिनीयस क्रियेटर या सर्जक थे, और अपने दिल की आवाज़ या सनक की वजह से फ़िल्म का विषय चुनते थे, और बिना ज़्यादह सोचे समझे फ़िल्म बनाना शुरु कर देते थे. उनके मित्र और लगभग हर फ़िल्म के लेखक जनाब अब्रार अल्वी नें उन्हे खूब समझाने की कोशिश की, कि बंगाली फ़िल्म तीन चार लाख में बनती थी क्योंकि उतना ही उसका रिटर्न होता था.जबकि हिंदी फ़िल्मों पर उन दिनों भी गुरुदत्त जी चालीस पचास लाख खर्च कर देते थे.
चलिये , आज उनके जिनीयस कलाकृतियों को World Cinema में पाठ्य पुस्तकों का दर्ज़ा मिलता है, मगर मैं तो गीता जी की मादक मगर शालीन आवाज़ के साथ उनकी सादगी भरी आंखों के भाव प्रवेणता का भी कायल था, और अवश्य गुरुदत्त जी के सधे हुए निर्देशन में हम एक बढिया अभिनेत्री को अपने बीच पाते.
चलिये, आपको गीताजी के एक बहुत ही बढियां गीत का कवर वर्शन सुनाते हैं जिसे हमारे ब्लोग दुनिया की हरफ़नमौला कलाकार और कवियत्री सुश्री अल्पना वर्मा नें गाया है.
जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैने कही, बात कुछ बन ही गयी....
अल्पनाजी वैसे हर गायिका के गानेंगाती हैं, मगर मुझे उनकी आवाज़ में गीता दत्त के मासूमियत भरे स्वर नज़दीक प्रतीत होतें हैं.
वैसे चलते चलते बता दूं, कि जिस समय गौरी फ़िल्म के निर्माण की बात चल रही थी, उसके पहले गुरुदत्त जी नें Women in White’ की कथावस्तु पर राज़ फ़िल्म का निर्माण शुरु किया था जिसमें वहिदा और सुनील दत्त थे. इस फ़िल्म के १०-१२ रीलें भी बन गयी थे. मगर वह फ़िल्म भी डब्बा बंद हो गयी...
पता है उस फ़िल्म में पहली बार संगीत कौन दे रहे थे?
जी हां.. राहुल देव बर्मन!!!! (What a rare combination! RD & Gurudutt!!!!)
पिछली पोस्ट पर आपकी टिप्पणियों के लिये शुक्रिया अदा करता हूं, क्योंकि वह पोस्ट काफ़ी समय बाद लिखी गयी थी,और लगा था कि आप मुझे भूल गये होंगे. (ऐसे ये हक है आपको, मेरे बात और है, मैने तो मुहब्बत की है).
मेरे मित्र OLD MONK नें फ़रमाया कि उन्हे व्यक्तिगत कारणों से आज क्यूं हमसे पर्दा है कव्वाली ज़्यादा माफ़िक लगी औरतों के लिये. तो उनसे गुज़ारिश है कि वे समय निकालकर अपने विचारों से इस बात की पुष्टि ज़रूर करेंगे ताकि उस अलग से एक पोस्ट पर डाला जा सके.वैसे ये बेहतरीन कव्वाली दिलीप के दिल के भी करीब है.
आज हम एक दूसरे गीत के बारे में बात करना चाहेंगे जिसका ज़िक्र पिछली पोस्ट में भी किया था---
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है...
डॊ, अनुराग जी नें अपनी टिप्पणी में सही लिखा है कि यह रचना भारत की उस समय की वर्तमान परिस्थिति को बखूबी परिलक्षित करती थी ,और पं नेहरू की भी आंख की किरकिरी थी, जिसके बारे में साहिर नें अपनी तीखी कलम से सही खाका खींचा था.
वैसे फ़िल्म प्यासा में आप हम नें देखा, सुना और उसके बेहतर चित्रीकरण , केमरा संचालन , प्रकाश संयोजन का कमाल देखा (दादा साहेब फ़ालके पुरस्कार २००९ के विजेता फ़ोटोग्राफ़र श्री मूर्ती की कलाकारी के बदौलत). लेकिन इमानदारी से कहूं तो गुरुदत्त के कौशलपूर्ण निर्देशन और भावपूर्ण अभिनय की साथ मिलने से बेहतर हुए एक क्लासिक फ़िल्म की इस क्लासिक रचना का असली श्रेय साहिर को दिया जाये या गुरुदात को ये मैं तय नहीं कर पाऊंगा. ये आप ही तय किजिये. अधिकतर ,प्यासा के आसपास फ़िल्मी दुनिया में यह चलन शुरु हो चुका था कि पहले एक अच्छी, रसीली, कर्णप्रिय तर्ज़ बना ली जाती थी और उसके अनुरूप गीतकार से फ़िल्म की सिच्युएशन के हिसाब से गीत लिखवा लिया जाता था.एस डी बर्मन साहब को कमोबेश इसका श्रेय दिया जा सकता है, और प्यासा में भी कुछ गीतों के संदर्भ में यही हुआ भी था.
मगर आपको ये जानकार कौतुहूल होगा और आश्चर्य कि प्यासा फ़िल्म का जब इंतेखा़ब किया गया था तो नायक विजय एक चित्रकार था, शायर नहीं.फ़िल्म की नायिका (माला सिन्हा) एक अमीरज़ादी थी जो चित्रकार के पेंटिंग्स की प्रदर्शनी करा कर उसे इस्तेमाल करती थी , सोसाईटी में अपने वजूद और वका़र का लोहा मनवाने के लिये.गुलाबो का तो कहीं पता ही नहीं था!!
फ़िल्म के लेखक अब्रार अल्वी जिनका अभी अभी इंतेकाल हुआ है, इस फ़िल्म के लेखक थे, और गुरुदत्त के फ़िल्म कंपनी में मुलाजिम भी. मगर जब गुरुदत्तजी नें साहिर नें लिखी हुई गज़लों की किताब परछाईयां पढी तो वे इस कदर दिवाने हुए उसमें लिखे गीतों को अपनी फ़िल्म प्यासा में शामिल करने के लिये बेचैन हो गये. यहां तक कि उन्होने नायक विजय के पात्र ही चित्रकार से शायर में बदल डाला!!
इस गज़ल संग्रह में से गीतों को लेने का मतलब था सचिन दा के लिये एक बडी चुनौती, क्योंकि भले ही मोटे तौर पर शब्दों को मीटर में लिखा गया होगा, मगर भावाभिव्यक्ति और नज़रिये को सही और पैने तौर पर रखने के लिये कहीं कहीं शायरी को तवज्जो दी गयी तरन्नुम की जगह.
वैसे सर जो तेरा चकराये/हो लाख मुसीबत रस्ते पर/हम आपकी आंखों में.. आदि गीत धुन बनवाने के बाद लिखे गये.मगर बाकी गीतों का इतिहास अलग है.
इसलिये आप देखिये एक गाना था - तंग आ चुके हैं कशमकशे ज़िंदगी से हम - जिसे मुशायरे में पढने की वजह से सिर्फ़ गुनगुना कर गवाया गया रफ़ी साहब से.( बाद में यही गीत आशा भोंसले नें फ़िल्म लाईट हाऊस के लिये एन दत्ता के संगीत निर्देशन में गाया था). आप सुनियेगा इस गीत को तो आप वाकई रफ़ी साहब के काय हो जायेंगे, कि बिना किसी सुर या ताल के कितना मधुर और मेलोडी की चासनी में दर्द को डुबा कर गाया है रफ़ी साहब नें.
दूसरा गीत है जाने वो कैसे लोग थे जिनसे... जो परछाईयां में से ही लिया गया, जिसके धुन बाद में बनाई गयी.गुरुदत्त और साहिर अड गये थे इस गाने को रफ़ी जी से गवांने के लिये , मगर मानना पडे़गा सचिन दा की संगीत की सोच और पकड़ की, कि उन्होने इस गीत को हेमंत दा से ही गवाया. यही बात बाद में गुरुदत्त/साहिर/सचिनदा के बीच की कशमकश और खाई की सबब बनीं(कडी ४ या ५ में )
और सबसे महत्व पूर्ण गीत था जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है?
क्या आप मानेंगे कि इस गीत की लय, शब्दों का मेनेजमेंट, एकदम अलग नहीं है? पायल की छन छन पर घुंगरू की आवाज़, तबले की धन धन पर तबले की आवाज़,खांसी की ठन ठन पर खांसी की और सिक्कों की झंकार पर साऊंड बाईटस के द्वारा साहिर की मनचाही नाटकीयता रचायी गयी.
अल्पना जी नें भी अपनी टिप्पणी में सही लिखा है कि साहिर की संवेदनशीलता ,साफ़गोई और तीखे चुभन लिये शब्दों के पीछे उनके व्यक्तिगत जीवन के अनुभव ही ज़िम्मेदार थे.
ज़रा ध्यान दें...
ये फ़ूलों के गजरे , ये पींको के छीटें, ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख़ फ़िकरे, ये ढ़लके बदन और ये बीमार चेहरे जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है? कहां है, कहां है , कहां है?
यकीन मानिये, जब साहिर नें ये बोल लिखे थे तो उसके सामने कोई सिच्युएशन नहीं थी. सिर्फ़ एक कविमन, या शायर के ज़ज़बातों की , पेथोस की अभिव्यक्ति थी या मन की पीडा का क्रंदन था.गुरुदत्त भी तो थे एक मासूम, ज़ज़बाती और संवेदनशील मन के मालिक.इसी वजह से ये क्रंदन सीधे उनके दिल के अंदर उतर गया.उन्हे ये लगने लगा कि साहिर के अंतरंग की इस पीडा़, इस झटपटाहट को चित्र रूप देकर रीयल लाईफ़ से रील लाईफ़ में लाकर उसे डिफ़ाईन किया जाये , सिनेमा के दर्शकों के लिये परिभाषित किया जाये.शायद इसी तरह से , इस तरह की रचना को प्यासा में डाल कर इस फ़िल्म को काव्यात्मक ऊंचाई पर ले जाया जा सके.
इसलिये उन्होंने अब्रार अल्वी को समन किया और कहा कि कुछ भी हो जाये, कुछ ऐसी सिच्युएशन पैदा करो ताकि इस फ़िल्म में रचना प्रभावी तरीके से फ़िल्माई जा सके.
तो देखिये साहिर द्वारा लिखे गये इन अमर अश’आर के लिये अब्रार अल्वी नें कैसी सिच्युएशन लिखी और महान गुरुदत्त नें अपनी कलात्मक और क्रियेटिव कौशल से उसके साथ कैसा न्याय किया.और सचिनदा की धुन पर रफ़ी साहब की दर्द में सोखी हुई पुरनूर आवाज़! कंबख्त , क्या कोंबिनेशन है जनाब!
क्या इससे बेहतर कोई और सिच्युएशन या पिक्चराएज़ेशन का इंतेखाब किया जा सकता है?
(अगली कडी में कैसे गुरुदत्त को इस गाने के लिये सिच्युएशन मिली .... कडी ३ में , बस इंतेज़ार करें, क्योंकि बडी पोस्ट से परहेज कर रहा हूं)
सचिन्द्र देव बर्मन, ये नाम मेरी पिछली पोस्ट पर चमक रहा था. अब भी मेरे मन में घुला घुला सा, गुनगुनाया सा नाच रहा है. कुछ भी लिख दूं, उनके लिये अधूरा सा लगता है.
और तो और, जब उनकी धुनों पर रचे गये गीत जब मैं गुनगुनाता हूं, तो वे खुद मुझमें परकाया प्रवेश से कर जाते है ,और मैं अपने गले से निकलती हुई इठलाती हुई स्वर लहरियां सुन कर,उनकी बंदिशों की मुरकीयों और हरकतों की बारीकी से और रिदम की लयकारी से अभिभूत हो कर, ना जाने किस संसार में पहुंच जाता हूं.फ़िर भी अधूरा पाता हूं अपने आप को. उनकी ये अद्भुत स्वररचना का क्षितिज़ दिखता भर है,पार जाना असंभव है.
आज इतने दिनों बाद मैं आपसे मुखातिब हूं , फ़िर भी सचिन दा की बनाई गयी धुनों के मोह जाल में अभी भी गिरफ़्तार हूं,इसलिये एक और पोस्ट पेशे खिदमत...
सचिन दा फ़िल्मों के चयन को लेकर बेहद चूज़ी थे. वे सिर्फ़ उन्ही के लिये संगीत देते थे जिन्हे संगीत की समझ थी. गायक के चुनाव करते हुए भी वे उतने ही चूज़ी होते थे. सुना है, जिस दिन उनकी रेकॊर्डिन्ग होती थी, वे सुबह गायक से फोन से बात करते थे और बातचीत के दौरान पता लगा लेते थे कि उस दिन उस गायक या गायिका के स्वर की क्या गुणवत्ता है.एक बार किशोर दा के किसी पुराने नटखट गाने को सुबह कहीं रेडियो पर सुना, और एकदम फ़ोन घुमा दिया- किशोर, आज की रिकोर्डिंग में मुझे छिछोरा पन नहीं चलेगा... किशोर दा सोचते ही रह गये कि जितनी संजीदगी से उन्होने उस दर्द भरे गीत की रिहल्सल की थी, उसमें छिछोरापन कहां से दिख गया दादा को!!
संगीत के कंपोज़िशन के साथ ही वाद्यों के ओर्केस्ट्राइज़ेशन की भी बारीकीयां उन्हे पता थी.एक दिन किसी कारणवश एक की जगह दो वायोलीन वादक रिकॊर्डिन्ग में बजा रहे थे, तो दादा नें कंट्रोल केबिन से साज़ों के हुजूम में से यह बात पकड़ ली.उन्होने कहा, मैं एक ही वायोलीन का इफ़ेक्ट चाहता हूं.
वे इस बात को मानते थे, और अपने बेटे राहुल को भी उन्होने यह बात बडे़ गंभीरता से समझाई थी कि हमेशा कुछ नया सृजन किया करो, ताकि लोगों में यह आतुरता बनी रहे, कि अब क्या. जब तीसरी मंज़िल फ़िल्म के लिये पंचम ने सभी गीत लगभग वेस्टर्न स्टाईल से दिये तो दादा बेहद खुश हुए. वे धोती कुर्ता ज़रूर पहनते थे मगर मन से बडे आधुनिक या मोडर्न थे.
पंचम से वे बेहद प्यार करते थे. एक दिन जब वे कहीं टहल रहे थे तो बच्चों के किसी समूह में से एक ने कहा- देखो, वे आर डी बर्मन के पिताजी जा रहे हैं. वे उस दिन बडे खुश होकर सब को पान खिलाने लगे (वे जब खुश होते थे तो सब को पान खिलाया करते थे)
किसी कारणवश प्यासा के समय उनकी बातचीत लता से बंद हो गयी थी. तो उन्होने आशा से गाने गवाये, मगर बाद में पंचम की वजह से छोटे नवाब की रिकोर्डिंग के समय वह रूठना खत्म हुआ.
सचिन दा से समय तक गीत पहले लिखे जाते थे, बाद में धुन बनाई जाती थी. दादा इतने नैसर्गिक कम्पोज़र थे कि मिनटों में धुन बना लेते थे, और इसीलियी उन्होने यह प्रथा पहली बार डाली कि पहले धुन बनेगी बाद में उसपर बोल बिठाये जायेंगे. साहिर, मजरूह और शैलेंद्र के साथ उनके कई गीत बनें, मगर देव आनंद नें नीरज, हसरत और पं. नरेन्द्र शर्मा से भी कई गीत लिखवाये जो हिन्दी में साहित्यिक वज़न रखते थे. पं. नरेन्द्र शर्मा से तो वे बडे़ खुश रहते थे क्योंकि वे भी मिनटों में कोई भी गीत रच लेते थे, वह भी बहर में, और विषय से बाबस्ता.
प्यासा फ़िल्म में गुरुदत्त नें उनसे एक गीत बिना किसी साज़ के भी बनवाया और रफ़ी से गवाया था. (तंग आ चुके है कश्मकशे जिंदगी से हम- जो बाद में फ़िल्म लाईट हाऊस में एन.दत्ता के निर्देशन में आशा नें भी गाया). साहिर की एक काव्य संग्रह 'परछाईयां' से उन्होने कुछ चुनिंदा रचनायें चुनी और सचिन दा से धुन बनवाई. जैसे जिन्हे -नाज़ है हिन्द पर वो कहां है, जाने वो कैसे लोग थे - फ़िल्म के बाकी गानो में आपको सचिन दा के अंदाज़ के गानें मिले होंगे- सर जो तेरा चकराये, हम आप की आंखों में आदि. मगर आपनें भी सुन ही लिया है, कि दूसरे गीत कितने अलग ढंग से संगीत बद्ध किये दादा नें.
यह फ़िल्म उनके गुरुदत्त और सचिन दा के जोडी़ का एक काव्यात्मक ऊंचाई प्राप्त करने वाला कमाल ही था, जो प्यासा के बाद दादा और साहिर के मनमुटाव के बाद टूट गया. सचिन दा का बोलबाला तब इतना बढ़ गया था कि गुरुदत्त को कागज़ के फ़ूल फ़िल्म के समय दोनों में से जब एक को चुनना पडा़ तो उन्होने दादा को ही चुना.(अबरार अल्वी अब नहीं रहे, उन्होने ये किस्सा कहीं बताया था, तो किसी और मौके पर वह भी सुना देंगे)
उनके गीतों में जो लोकगीतों की महक थी वह उत्तर पूर्व भारत के भटियाली, सारी और धमैल आदि ट्रेडिशन से उपजी थी. उनकी आवाज़ पतली ज़रूर थी मगर दमदार और एक विशिष्ट ठसके वाले लहजे की वजह से पृष्ठभूमि में गाये जाने वाले गीतों के लिये बड़ी सराही गयी.
आज फ़िर इच्छा हो रही है कि उनकी आवाज़ में भी एक गीत गाऊं -
सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे...
'बड़ी सूनी सूनी सी है, ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी ' इस गीत के रिकॊर्डिंग के दो दिन बाद ही वे हमें छोड़ कर चले गये और गाने के बोल सार्थक कर गये.
समय अभाव के कारण, पिछली पोस्ट थोडी देर से नश्र हुई, फ़िर एक दम संयोग से गुरुदत्त जी का स्मरण दिन आ गया. दोनों पोस्ट मिक्स हुई और बडी हो गयी. इसलिये उनका एक संस्मरण अब लिख रहा हूं, ११ ता. को , इसलिये क्षमा करें.
आपनें पिछली पोस्ट पढी ही होगी.( चौदहवीं का चांद हो) उस गीत पर एक और बात बतानी थी, मगर उसके पृष्ठभूमी के साथ, जो आशा है आप पसंद करें. इसे मैने स्व. गुरुदत्त की सगी बहन श्रीमती ललिता लाज़मी से बातचीत के दौरान सुना था.
किस्सा यूं है--
कुछ साल पहले इंदौर में हर साल होने वाले लता मंगेशकर पुरस्कार समारोह के आयोजन समिति के सदस्य होने के नाते मुझे मुंबई जाना पडा प्रसिद्ध संगीत निर्देशक श्री भुपेन हज़ारिका जी से मिलने . उन्हे मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उस साल के लता मंगेशकर पुरस्कार से नवाज़ा गया था. यह अवार्ड सन १९८३ से हर साल बारी बारी से एक गायक/गायिका और संगीत निर्देशक को दिया जाता है. इसमें पुरस्कृत कलाकार को अवार्ड की औपचारिकता के बाद अपना पर्फ़ोर्मेंस भी देना पडता है.सो, भुपेन दा से अनुरोध करना था कि वे अपने कुछ गीत गायें . अतः , यह ज़रूरी था कि उनके साथ कार्यक्रम की रूपरेखा और साज़िंदों की बातचीत तय हो जाये.
उन दिनों वे मुंबई में थे और स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे.उनकी आंखों का ऒपरेशन हुआ था, और वे प्रसिद्ध महिला निर्देशक सुश्री कल्पना लाज़मी के घर में रुके हुए थे. फ़ोन पर किसी महिला से बात हुई, जिसने खुद भुपेन दा से पूछ कर शाम को छः बजे का समय तय किया.
जब मैं वहां पहुंचा, तो एक अधेड , शालीन महिला नें दरवाज़ा खोला, और बडे आदर के साथ मुझे ड्राईंगरूम में बिठाया. कहा कि अभी अभी दवाई डाली है आंख में ,इसलिये आधा पौन घंटा रुकना पडेगा आपको. मैं मिलकर ही जाना चाहता था इसलिये वहां रखे हुए एक पुराने फ़िल्मफ़ेयर को लेकर पढने लगा.(संयोग से उस पर गुरुदत्तजी का चित्र था)
वह विदुषी देवी सी प्रतीत होने वाली महिला बाद में मेरे साथ ही बैठ गयी और हम ओकेज़नली एक दूसरे की तरफ़ देखते और वे स्नेहवश मुस्कान से मेरा स्वागत करती.हम कुछ बोल नहीं रहे थे.
फ़्लेट्नुमा वह घर बडे ही एथनीक स्टाईल में जमाया गया था( जैसे चमार की नज़र जूते पर ही पदती है, मेरी नज़र आंतरिक साजसज्जा पर पडी थी). मैने कौतुहुलवश उनसे पूछ ही लिया कि इस फ़्लेट का ईंटिरीयर डिज़ाईन किसनें किया है. वे हंस पडी, और उन्होने कहा मैंनें ही किया है. मैं कल्पना की मां हूं, ललिता लाज़मी.
मेरे दिमाग में एक दम सौ हेलोजन के बल्ब जल पडे़. अरे , ये तो वहीं है, ललिता आज़मी जो स्वर्गीय गुरुदत्त जी की बहन हैं!!और मैं पिछले आधा घंटे से यहां बेजान वस्तुओं में अपना दिमाग खपा रहा हूं.
मैं फ़िर सम्हल के बैठ गया, जैसे कि किसी मंदिर में देवी के समक्ष गर्भगृह में बैठा था.सौम्य, शांत और सरल व्यक्तित्व से जब रूबरू हुआ तो मन में याद आयी इसाक मुजावर द्वारा गुरुदत्त जी पर लिखी हुई वो पंक्तियां , जिसमें बताया गया था कि गुरुदत्त कितने अशांत, रेस्टलेस, अल्पसंतुष्ट कलाकार थे, और यहां बैठी उनकी बहन शांत सौम्य!! मैं पूछ बैठा उनसे गुरुदत्त जी के चरित्र के इस आयाम से. वे मुस्काई, और सम्हल के बैठ गयी, गोया Interview दे रही हैं. मैने उन्हे सहज किया और सुनने लगा उनकी मीठी निर्झर वाणी से उनके संस्मरण..
भाई अशांत और रेस्टलेस ज़रूर थे क्योंकि वे पर्फ़ेक्शनिस्ट थे, इसलिये हमेशा असंतुष्ट और सेंसेटिव रहते थे अपने Creation के संदर्भ में. मगर मोटे तौर पर वे तकनीशियनों से ज़्यादह अपेक्षा रखते थे पर्फ़ेक्शन की,एक्टर्स की बनिस्बत. उनके केमेरामेन श्री मूर्ती से तो उनकी हर शॊट में झडप हुआ करती थी, और गरमा गरम वाद विवाद भी हो जाते थे.मगर कलाकारों से थोडे नर्मी से पेश आते थे. मगर जब बात खुद के acting की होती थी तो भी कम संतुष्ट होते थे. फ़िल्म प्यासा के एक सीन में उन्हे मज़ा ही नहीं आ रहा था, और दोपहर से चल रहा उनके अभिनय वाला शॊट ओ के ही नहीं कर रहे थे. सभी नें उनसे कहा कि आप थकें है, तो पॆक अप कर लेतें है, मगर वे मान ही नहीं रहे थे. रात को दस बजे कहीं जा कर माने कि अब कल सुबह करेंगे, और आश्चर्य की बात है, दूसरे दिन सुबह एक ही टेक में शोट ओ के हो गया.
वे बडे सेंसेटिव और संवेदनशील मन के कलाकार थे , और उन दिनों गीता दत्त और वहीदाजी के कारण वे बडे तनाव में रहते थे. फ़िर वे मुस्कुराके बोली , भाई का वहीदा जी से कुछ ऐसा वैसा रोमांटिक नाता नहीं था, जैसा कि अमूमन कहा जाता है.वैसे वहीदा जी उनके जीवन में बहार बन के ज़रूर आई.
वहीदा जी भी जब भी शोट देती थी तो संयोग ये होता था कि वे एक शॊट के बाद दूसरे रीटेक में ठीक नहीं करती थी और बाद में तीसरे शोट में फ़िर ठीक हो जाता था, तो इस alternative Shots के OK होने का राज़ नही समझ पाते थे भाई, और मज़ाक में वे वहीदा जी की खिंचाई भी कर दिया करते थे.
जिस दिन रात को उनका निधन हुआ, उसके कुछ दिन पहले ही उनसे फ़ोन पर बातें हुई थी, जब भाई बडे खुश थे और वे बता रहे थी कि उन्होने अभी अभी एक नयी फ़िल्म शुरु की थी बंगला भाषा में जिसका नाम रखा था गौरी, जिसमें गीता दत्त अभिनय करने वाली थीं और एक सीन भी पिछले दिनों शूट कर लिया गया था. गीता दत्त की सृजन धर्मिता की और बिगडे हुए वैवाहिक रिश्तों को बचाने के खातिर यह कदम उठाया था उन्होने.
उस मनहूस रात को वहीदा जी मद्रास(चेन्नई)में थी और मुझसे और कल्पना से रात को ही फ़ोन पर इधर उधर की बातें भी की थी.फ़िर देर रात(अल सुबह) अब्रार अल्वी का फ़ोन आया तो वह मनहूस खबर हमें मिली.
वातावरण में स्वाभाविक रूप से गंभीरता आ गयी थी. तब तक कमरे में से भूपेन दा का मेसेज आ गया था कि आप बेडरूम में ही आ जायें, तो बेहतर होगा. मैंने इस मोनोलॊग या एकतरफ़ा संभाषण को विराम देने के लिये या विषयांतर करने के लिहाज़ से कहा- आपको उनकी कौनसी फ़िल्म पसंद आयी, और कौन सा गान जिसका पिक्चराईज़ेशन आपके लिहाज़ से बढिया था.
वे बोली प्यासा और कागज़ के फ़ूल तो ALL TIME GREAT हैं , और गाने में वक्त ने किया क्या हसीं सितम का फ़िल्मीकरण तो लाजवाब है. (इसके बारे में मैंने अपनी एक पोस्ट -गुरुदत्त - एक अशांत अधूरा कलाकार - संगीत को समर्पित एक प्रसिद्ध ब्लोग आवाज़ में पिछले साल ज़िक्र किया था जिसका लिंक है-
http://podcast.hindyugm.com/2008/10/remembering-gurudutt-genius-film-maker.html मेरे ब्लोग पर भी आप गुरुदत्त पर चटका लगा कर देख सकतें हैं....
और दूसरा गाना था - चौदहवीं का चांद हो , या आफ़ताब हो...
इस गीत का ज़िक्र आते ही उनकी बुझी हुई आंखों में जैसे फ़िर चमक आ गयी, और वे इस गीत के बारे में बताने लगीं.
उन दिनों कलर फ़िल्मों का ज़माना आ गया था, और गुरुदत्त जी भी चाहते थे कि ये फ़िल्म भी कलर में बनें. मगर एक्विपमेंट्स आने में देरी के कारण, और डिस्ट्रिब्युटर्स की जल्दी के कारण उन्होने फ़िल्म Black & White में ही पुउर्ण की और ये गीत भी.साथ में फ़िल्म को सेंसर से भी पास करवा लिया.
मगर फ़िर उन्हे क्या सूझा, उन्होने इस गीत को फ़िर से शूट करनी की ठानी, वह भी कलर में, क्योंकि तब तक एक्विपमेन्ट आ गये थे.ये तय किया गया कि फ़्रेम से फ़्रेम, शोट से शोट कॊपी कर के वैसे ही फ़िर से शूट किया जायेगा, चूंकि पहले के B&W रशेस तो बढियां ही थे.
खैर, जैसा कि प्लान किया गया था, वहीदाजी को बुलाया गया, और शूटिंग बढिया तरीके से संपन्न हुई.चूंकि फ़िल्मी करण रंगीन था, बडे बडे आर्क लाईट्स,करीब रखे गये, जिसकी वजह से वहीदा जी का स्किन झुलसने लगा. तो बडी मुश्किल से आईस पॆक रख कर शूटिंग संपन्न की गयी.तो उनकी आंखे भी इसीलिये लाल हो गयी थी.फ़िल्म को फ़िर से सेंसर बोर्ड को भेज दिया गया.
मगर सभी तब भौंचक्के रह गये जब उन्हे मालूम पडा सेंसरबोर्ड नें फ़िल्म को पास करने को मना कर दिया क्योंकि उन्होने इस गीत को बडा ही हॊट (HOT) बताया!!!! भाई नें उन्हे समझाने की कोशिश की कि सब कुछ तो वही था एक कलर के सिवा. तो पता है, उन्होने क्या जवाब दिया?
कहा, वहीदा जी की आंखे बडी लाल हो रही हैं, और इस बात को उन्होने Sensual and Suggestive करार कर दिया!!
भाई उस दिन बडे हंसे थे.खैर फ़िल्म तो पास हो गयी, मगर ललिताजी नें कहा कि अगर वे सेंसर बोर्ड के सदस्य आज जीवित होंगे और आज की फ़िल्में देखेंगे तो तुरंत ही प्राण छोड़ देंगे!!!
चूंकि बात नार्मल हो चुकी थी मैं उस साश्वी के सानिध्य से उठकर भूपेन दा के कमरे में चला गया.
(इन संस्मरणों को याद करना याने पुरानी यादों की जुगाली करना. जिनके लिये ये कलाकार , उनकी कला और उनका कला के प्रति योगदान और समर्पण का थोदा बहुत भी महत्व है उसे यूं लगता है कि कुछ क्षण हमनें भी टाईम मशीन में जाकर उनके साथ बिता लिये हैं. यही तो हमारे लिये elixir है, च्यवनप्राश है!!!- क्या आप सहमत हैं?
चौदहवीं का चांद और सुहानी रात का जो मि़क्स और You Tube Video का लिंक पिछली पोस्ट पर डाला था वह चला नहीं था किसी के लिये. अतः फ़िर से लगा रहा हूं.
याने पिछले हफ़्ते एक शब्द चांद बार बार कानों पर पडा़, क्योंकि बात साफ़ है.
पिछले हफ़्ते शरद पुर्णिमा की मदहोश रात थी.
सुनते आये हैं, कि इस रात को चंद्रमा से अमृत बरसता है. लगता है सही है, क्योंकि, पिछले कई सालों से बिना नागा, इस रात को संगीत के अमृत स्वर कानों में पडते रहते हैं. वातावरण में मस्ती, सुरीली तरन्नुम का आलम तारी रहता है.फ़िर रात को परमानंद की प्राप्ति - याने केशर पिस्ता युक्त गाढा दूध. बस और क्या चाहिये.
बस १ ता. से माहौल शुरु हो गया था. मैं जिस लायंस क्लब से जुडा हुआ हूं उसके तत्वावधान में शरद पूनम की संगीत रजनी हर साल की तरह से संपन्न हुई. इस दिन खास कर , पूणें से प्रसिद्ध पियानो एकोर्डियन के वादक श्री अनिल गोडे पधारे थे, जिन्होने अपने सुरीले साज से, और अपने हुनर के कमाल से इस बेजोड और बजाने में क्लिष्ट साज़ पर इतने पुराने गीत सुनाये कि बस मस्त कर दिया. अनिल जी हेमंत दा, तलत मेहमूद्जी,किशोर दा आदि के साथ देश विदेश में बजा चुकें हैं. पिछले साल पुना में मिले थे जब सुदेश भोंसले के साथ भी बजाया था. मात्र एकोर्डियन और ढोलक,कांगो पर बजाये हुए मधुर गानों की बानगी तो लीजिये -
चांद सा रोशन चेहरा, सुहानी रात ढल चुकी , फ़ूलों के रंग से,डम डम डिग डिगा, रमैय्या वस्ता वैय्या , और भी कई.
एक और खुशनुमा बात यह थी कि मेरे अनुज - मित्र संजय (श्री संजय पटेल) भी इस कार्यक्रम में आये थे. अमूमन ऐसी संगीत रजनीयों में संजय जी का संगीत पर समृद्ध एंकरिंग और मेरे स्वर का भी संयोग जमा करता था पहले कई बार, मगर एक दो सालों से दोनों की व्यस्तता से ये ग्रह युति हो नहीं पा रही थी.इस दिन कुछ मित्रों नें छेड दिया, फ़िर हम दोनों भी औपचारिता को दूर कर, कुछ कुछ गा बैठे.
फ़िर लगभग हर दिन कोई ना कोई कार्यक्रम था ही. मगर दुख ये रहा कि शरद पोर्णिमा की रात को इंदौर में बारीश की वजह से चांद नहीं दिख पाया, और जैसा कि हमारे यहां परंपरानुसार रात को चांद को नैवेद्य नहीं चढाया जा सका.(प्रस्तुत चित्र में दूध और पूजा का पात्र - जिसमें ऐरावत का आकार बनाया गया है चावल से, और इस दूध के बर्तन को चांदी की तलवार रख कर चंद्रमा की चांदनी में रखा जाता है.
इसिलिये चांद, चंद्रमा, चंदा आदि शब्दों को लिये हुए गीतों की धूमधाम रही इन दिनों.
एक बडा ही अहम गीत मेरे ज़ेहन में गूंज रहा था इन दिनों, जिसने अपने सहज सरल संगीत स्वर संयोजन और रफ़ी साहब के अमृत भरे केशर पिस्ता युक्त दूध की मानिंद मीठे, सुरीले स्वर के कारण मेरे मन में, दिल में जगह बना ली थी, और दिन रात के अधिकतर क्षणों में मेरे होटों पर आ रहा था. सोचा था कि इन दिनों कहीं गा ही दूं तो मन की ये मस्ती प्रकट में मेनिफ़ेस्ट हो जाये. मगर मौका नहीं आया.है
अचानक किसी मित्र नें भेजा हुआ एक कराओके ट्रॆक मिल गया जो बाज़ार में मिल रहे ट्रेक से बेहतर था, तो बैठ गया रिकोर्डिंग पर, और कर डाली दिल की भडास पूरी.
मगर एक बात पर एकदम दिल झूम गया , वह ये कि, साथ में इसी राग से मिलता जुलता एक और सुरीला और मीठा गीत भी होटों पर कॆट्वाक करने लगा- सुहानी रात ढल चुकी , ना जाने तुम कब आओगे-.
तो बस एकदम इसी गाने के तीसरे अंतरे के वाद्य संयोजन के बेकग्राऊंड में इस गीत का अंतरा भी गाकर देखा. तो संयोग यूं बना कि यह प्रयोग भी उम्दा जम गया.
बस क्या था. सोचा , इसे आपके साथ भी शेयर करूं, आखिर दिलीप के दिल से जो भी स्वर निकलेंगे, आह या वाह, आप तो हमसफ़र हैं ही. तो बस सुनिये इस बार यह गीत...चौदहवी का चांद हो, या आफ़ताब हो.... और सुहानी रात ढल चुकी का मिक्स.(इसे रिमिक्स ना कहिये, क्योंकि उसमें ना जाने क्या क्या किया जाता है- जिसका ज़िक्र फ़िर कभी)
एक और आश्चर्यजनक संयोग ये रहा है कि अभी दो दिन बाद हमारे श्रद्धेय कलाकार , बेजोड निर्देशक गुरुदत्त जी की पुण्यतिथी है (१० अक्तूबर १९६४). जिस फ़िल्म के लिये ये टाईटल गीत बनाया गया था उस फ़िल्म के निर्माता भी गुरुदत्त ही थे.चूंकि यह फ़िल्म मुस्लिम परिवेश में फ़िल्माई गयी थी, गुरुदत्त जी नें इस फ़िल्म के निर्देशन के लिये जनाब मोहम्मद सादिक़ को ज़िम्मेदारी सौंपी. वे वो दिन थे जब अपने ज़माने की सबसे बडी प्रयोगात्मक फ़िल्म कागज़ के फूल की असफ़लता से गुरुदत्त जी काफ़ी निराश थे.
मगर हुआ यूं कि इस फ़िल्म नें सफ़लता के ऐसे झंडॆ गाडे कि कहा जाता था कि १०० फ़िल्मों के बराबर बिज़नेस किया, और गुरुदत्त को दिवाला होते होते बचा लिया.(उनका स्टुडियो भी बिकत बिकते बच गया)
हालांकि वे इसके पहले एस डी बर्मन दा और ओ पी नय्यर के साथ काम कर चुके थे, ये एक आश्चर्यजनक बात थी कि मुस्लिम परिवेश के लिये होते हुए भी उन्होने रवि जैसे संगीतकार को साईन किया बतौर संगीतकार, जिन्होने इस फ़िल्म के संगीत के साथ पूरा न्याय किया.(इसका कारण थे अबरार अल्वी, मगर मज़ेदार बात यहा भी ये है कि भले ही उनने गुरुदत्त जी की इतनी सारी फ़िल्मों में कहानीयां लिखी, मगर इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी सागर उस्मानी नें!!)
आपने अगर ये फ़िल्म देखी होगी तो आप ज़रूर गुरुदत्त जी के डिटेल्स , लखनौ की तेहज़ीब , परिधान , नपे तुले डिफ़ाईन किये हुए चरित्र और उनके मेनरीझ्म की बारिकी में गये होंगे और दाद देने को जी चाहता होगा आपका.हालांकि निर्देशन मोहम्मद सादिक का था , इस फ़िल्म में गुरुदत्त का ही स्टांप था. और तो और सभी गाने शत प्रतिशत गुरुदत्त जी नें ही फ़िल्माये थे, जो उनके फ़ोटोग्राफ़र श्री वी के मूर्ती नें कबूल की थी.
तो अब देखिये भी उस इम्मोर्टल , कालजयी गीत का विडियो भी, जिसमें वहीदा जी का मूर्तिमंत सौंदर्य, अलसायी हुई लाल डोरे लिये आंखें, गुरुदत्तजी का सुकून भरे दिल से उस खूबसूरती की तारीफ़ में रोमांटिक अंदाज़ में इस गीत को गाना, और साथ में खुद मोहम्मद रफ़ी साहब की शहद से भी मीठी, सुरीली, और सात्विक स्वर एक ऐसा आलम तारी कर देते हैं कि पाकीज़गी से भरे इस हुस्न का ये नशा बिन पिये ही आपके रूह में कब दाखिल होकर आपको मदमस्त कर देता है, इसका होश भी आपको नहीं रहता.
(बिना शादी शुदा मित्र गण मुआफ़ करेंगे, क्योंकि उन्हे पता ही नहीं है कि अभी क्या बाकी है उनकी ज़िंदगी में, और शादी शुदा मित्र भी मुआफ़ करेंगे, कि दर्दे दिल छेड दिया गया है, और आप को नोस्टाल्जिया के गहरे समंदर में डुबा दिया गया है. अगर तैर कर ऊपर आ सकते हो तो आ जाईये, और डूबना हो तो मेरे साथ हो लिजिये......)
गुरुदत्त जी और इस गाने के बारे में एक रोचक संस्मरण बताये बगैर नहीं रह सकता, जिससे आप हंस पडेंगे - मगर यह पोस्ट काफ़ी लंबी हो गये है. मेनेजमेंट का खिलाडी हूं इसलिये सभी मिठाईयां एक साथ नहीं परोसूंगा.
तो दस तारीख को फ़िर पधारें गुरुदत्तजी की पुण्यतिथी के दिन , तो यह भी आपके साथ शेयर करूंगा.
एक अधूरी सी कविता , या बीच में रुक गयी फ़िल्म , जो अपने मंज़िल तक नहीं पहुंच पायी.
क्या क्या बेहतरीन गीत गायें थे ..
दर्द भरे भाव, संवेदना भरे स्वर को अपनी मखमली मदहोश करने वाली आवाज़ के ज़रिये.
गीता दत्त रॉय, पहले प्रेमिका, बाद में पत्नी.सुख और दुःख की साथी और प्रणेता ..
अशांत, अधूरे कलाकार गुरुदत्त की हमसफ़र..
क्या क्या नहीं कहा जा चुका है, गीता दत्त के बारे में.
उनका एक गीत तो कालातीत है, अमर है. उस गीत नें इतिहास रच डाला.
अपने भाव भरे बोल , कलेजे को चीर देने वाली धुन, विश्व स्तरीय निर्देशन और चित्रांकन, सिनेमेटोग्राफी की टेक्स्ट बुक में दर्ज़
वक्त नें किया क्या हसीं सितम, तुम रहे ना तुम , हम रहे ना हम….
गुरुदत्त पर संगीत को समर्पित शीर्ष ब्लोग हिन्दयुग्म के आवाज़ पर नश्र किये गये इस पोस्ट को अगर पढें ….
(गुरुदत्त इस क्लाईमेक्स की सीन में कुछ अलग नाटकीयता और रील लाईफ़ और रियल लाईफ का विरोधाभास प्रकाश व्यवस्था की माध्यम से व्यक्त करना चाहते थे. ब्लेक एंड व्हाईट रंगों से नायक और नायिका की मन की मोनोटोनी ,रिक्तता , यश और वैभव की क्षणभंगुरता के अहसास को बड़े जुदा अंदाज़ में फिल्माना चाहते थे…Contd…)
स्वयं लताजी नें भी इस खरगोशी आवाज़ के बारें , और उस गीता दत्त के मन के एहसासात के बारे में एक हमसफ़र के तौर पर जो भी महसूस किया वह यहां बखूबी सुना जा सकता है.उनकी खुद की रूहानी आवाज़ में…
एक और नयी बात पता चली. एक बहुत ही शानदार साईट उपलब्ध है गीता जी के चाहने वालों के लिये, जहां इस गुणी कलाकार के जीवन के हर अनछुए पहलु से रू ब रू कराया गया है.गीतों की फ़ेरहिस्त, जीवनी, सुहाने चित्र और जो दिल को सुकून दे ऐसे गाने…
आज गीता जी का एक और नया गीत सुनने को मिला. गीत के बोल हैं -
एक बात सुनाती हूं, किसी से ना कहना…
इस गीत की खासियत ये है, कि इसे पाकिस्तान के मशहूर लिजेंडरी संगीतकार बाबा जी. ए चिश्ती ने स्वरबद्ध किया है ,जिन्हे पाकिस्तानी फ़िल्मी संगीत जगत के जनक माना जाता है. सन १९५६ की एक फ़िल्म के लिये इसे रिकोर्ड किया गया था पाकिस्तानी फ़िल्म मिस ५६ के लिये, मगर बाद में इसी गीत को अंततः पाकिस्तानी गायिका नाहीद नयज़ी नें गाया.
(शायद पहले ये फ़िल्म यहां बनने वाली थी. लारा लप्पा गर्ल मीना शोरी के पति रूप के शोरी इसे यहां बनाने वाले थे. मगर बाद में ये तय हुआ कि इसे पाकिस्तान में बनाया जायेगा. इसीलिये फ़िर इन्ही गानों को वहां फ़िर से गवाया गया) . वैसे कुल मिला कर चार गाने गाये गये थे इस फ़िल्म के लिये हिंदुस्तानी कलाकारों ने, जिसमें एक गीता जी नें और गाया था -
ऐरे गै़रे नत्थु खैरे, घबरा गये…,और दो ड्युएट – जिन्हे बाद में सुरों के शहंशाह जनाब मेहंदी हसन जी नें गाया.(ये ७८ rpm पर उपलब्ध है)
तो सुनिये यह गीत….
मैं तो जब भी गीताजी के गाये गानों की लिस्ट पढता हूं, उनके सबसे पहले प्रसिद्ध हुए गाने में उनके जीवन का फलसफा पाता हूं…..जो फ़िल्म दो भाई के लिये सचिन देव बर्मन दा के लिये सन १९४६ में गाया था;
मेरा सुंदर सपना बीत गया,
मैं प्रेम में सब कुछ हार गयी, बदर्द ज़माना जीत गया, मेरा सुंदर सपना बीत गया….
क्या उनके भविष्य के प्रेम कहानी के खत्म होने का, जीवन के संगीत के जाने का यह पूर्वाभास था?…
महान फिल्मकार गुरुदत्त की पुण्यतिथी पर एक विशेष प्रस्तुति प्रसिद्ध संगीत को समर्पित हिन्दयुग्म के ब्लोग आवाज़ में पिछले अक्टूबर में मैने एक लेख लिखा था . हमारे काफ़ी संगीत प्रेमी मित्रों से वह छूट गया था, अतः वे कब से आग्रह कर रहे हैं कि वह पोस्ट ’ दिलीप के दिल से ’ पर भी जारी की जाय. उनसे अनुमती लेकर यहां वह पोस्ट जस की तस पेश कर रहा हूं .
कुछ दिनों पहले मैंने एक सूक्ति कहीं पढ़ी थी - To make simple thing complicated is commonplace. But ,to make complicated things awesomely simple is Creativity.
गुरुदत्त की अज़ीम शख्सियत पर ये विचार शत प्रतिशत खरे उतरते है. वे महान कलाकार थे , Creative Genre के प्रायः लुप्तप्राय प्रजाति, जिनके सृजनात्मक और कलात्मक फिल्मों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा.
४४ साल पहले १० अक्टुबर सन १९६४ को, उन्होंने अपने इस कलाजीवन से तौबा कर ली. रात के १ बजे के आसपास उनसे विदा लेने वाले आख़िरी शख्स थे अबरार अल्वी. उनके निधन से हमें उन कालजयी फिल्मों से मरहूम रहना पडा, जो उनके Signature Fims कही जाती है. वसंथ कुमार शिवशंकर पदुकोने के नाम से इस दुनिया में आँख खोलने वाले इस महान कलाकार नें एक से बढ़कर एक ऐसी फिल्मों से हमारा त,अर्रूफ़ करवाया जो विश्वस्तरीय Masterpiece थीं. गुरुदत्त नें गीत संगीत की चासनी में डूबी, यथार्थ से एकदम नज़दीक खट्टी मीठी कहानियों की पर बनी फ़िल्मों से, उन जीवंत सीधे सच्चे संवेदनशील चरित्रों से हमें मिलवाया,जिनसे हम आम ज़िन्दगी में रू-ब-रू होते है. परिणाम स्वरूप हम मंत्रमुग्ध हो, उनके बनाए फिल्मी मायाजाल में डूबते उबरते रहे.
गुरुदत्त अपने आपमें एक संपूर्ण कलाकार बनने की पूरी पात्रता रखते थे. वे विश्व स्तरीय फ़िल्म निर्माता और निर्देशक थे. साथ ही में उनकी साहित्यिक रूचि और संगीत की समझ की झलक हमें उनके सभी फिल्मों में दिखती ही है. वे एक अच्छे नर्तक भी थे, क्योंकि उन्होंने अपने फिल्मी जीवन का आगाज़ किया था प्रभात फिल्म्स में एक कोरिओग्राफर की हैसियत से. अभिनय कभी उनकी पहली पसंद नही रही, मगर उनके सरल, संवेदनशील और नैसर्गिक अभिनय का लोहा सभी मानते थे .(उन्होने प्यासा के लिये पहले दिलीप कुमार का चयन किया था).वे एक रचनात्मक लेखक भी थे, और उन्होंने पहले पहले Illustrated Weekly of India में कहानियां भी लिखी थी.
संक्षेप में , वे एक संपूर्ण कलाकार होने की राह पर चले ज़रूर थे. मगर, उनके व्यक्तित्व में एक अधूरापन रहा हर समय, एक अशांतता रही हर पल, जिसने उन्हें एक अशांत, अधूरे कलाकार और एक भावुक प्रेमी के रूप में, दुनिया नें जाना, पहचाना.
देव साहब जो उनके प्रभात फिल्म कन्पनी से साथी थे, जिन्होंने नवकेतन के बैनर तले अपनी फिल्म 'बाजी' के निर्देशन का भार गुरुदत्त पर डाला था, नें अभी अभी कहीं यह माना था की गुरुदत्त ही उनके सच्चे मित्र थे. जितने भावुक इंसान वे थे, उसकी वजह से हमें इतनी आला दर्जे की फिल्मों की सौगात मिली, मगर उनकी मौत का भी कारण वही भावुकता ही बनी .
उनकी व्यक्तिगत जीवन पर हम अगर नज़र डालें तो हम रू-बी-रू होंगे एक त्रिकोण से जिसके अहाते में गुरुदत्त की भावनात्मक ज़िंदगी परवान चढी.
ये त्रिकोण के बिन्दु थे गीता दत्त , वहीदा रहमान और लेखक अबरार अल्वी , जिन्होंने गुरुदत्त के जीवन में महत्वपूर्ण भुमिका निभाई. गीता दत्त रॉय, पहले प्रेमिका, बाद में पत्नी.सुख और दुःख की साथी और प्रणेता ..
वहीदा रहमान जिसके बगैर गुरुदत्त का वजूद अधूरा है, जैसे नर्गिस के बिना राज कपूर का. जो उनके Creative Menifestation का ज़रिया, या केन्द्र बिन्दु बनीं.
और फ़िर अबरार अल्वी, उतने ही प्रतिभाशाली मगर गुमनाम से लेखक, जिन्होंने गुरुदत्त के "आरपार" से लेकर "बहारें फ़िर भी आयेंगी" तक की लगभग हर फ़िल्म्स में कहानी, या पटकथा का योगदान दिया. आज भी विश्व सिनेमा का इतिहास अधूरा है गुरुदत्त के ज़िक्र के बगैर. पूरे जहाँ में लगभग हर फ़िल्म्स संस्थान में ,जहाँ सिनेमा के तकनीकी पहलू सिखाये जाते है, गुरुदत्त की तीन क्लासिक फिल्मों को टेक्स्ट बुक का दर्जा हासिल होता है. वे है " प्यासा ", " कागज़ के फ़ूल ", और "साहिब , बीबी और गुलाम ". इनके बारे में विस्तार से फ़िर कभी..
गुरुदत्त नें अपने फिल्मी कैरियर में कई नए तकनीकी प्रयोग भी किए. जैसे, फ़िल्म बाज़ी में दो नए प्रयोग किए-
1, १०० एमएम के लेंस का क्लोज़ अप के लिए इस्तेमाल पहली बार किया - करीब १४ बार. इससे पहले कैमरा इतने पास कभी नही आया, कि उस दिनों कलाकारों को बड़ी असहजता के अनुभव से गुज़रना पडा. तब से उस स्टाईल का नाम ही गुरुदत्त शॉट पड़ गया है.
२. किसी भी फ़िल्म्स में पहली बार गानों का उपयोग कहानी कोई आगे बढ़ाने के लिए किया गया.
वैसे ही फ़िल्म ' काग़ज़ के फूल ' हिन्दुस्तान में सिनेमा स्कोप में बनी पहली फ़िल्म थी. दरअसल , इस फ़िल्म के लिए गुरुदत्त कुछ अनोखा ,कुछ हटके करना चाहते थे , जो आज तक भारतीय फ़िल्म के इतिहास में कभी नही हुआ.
संयोग से तभी एक हालीवुड की फ़िल्म कंपनी 20th Century Fox नें उन दिनों भारत में किसी सिनेमास्कोप में बनने वाली फ़िल्म की शूटिंग ख़त्म की थी और उसके स्पेशल लेंस बंबई में उनके ऑफिस में छूट गए थे. जब गुरुदत्त को इसका पता चला तो वे अपने सिनेमाटोग्राफर वी के मूर्ति को लेकर तुंरत वहाँ गए, लेंस लेकर कुछ प्रयोग किये , रशेस देखे और फ़िर फ़िल्म के लिए इस फार्मेट का उपयोग किया. चलिए अब हम इस फ़िल्म के एक गाने का ज़िक्र भी कर लेते है -
वक्त नें किया क्या हसीं सितम .. तुम रहे ना तुम , हम रहे ना हम...
गीता दत्त की हसीं आवाज़ में गाये, और फ़िल्म में स्टूडियो के पृष्ठभूमि में फिल्माए गए इस गीत में भी एक ऐसा प्रयोग किया गया, जो बाद में विश्वविख्यात हुआ अपने बेहतरीन लाइटिंग की खूबसूरत संयोजन की वजह से.
आप ख़ुद ही देख कर लुत्फ़ उठाएं .
गुरुदत्त इस क्लाईमेक्स की सीन में कुछ अलग नाटकीयता और रील लाईफ़ और रियल लाईफ का विरोधाभास प्रकाश व्यवस्था की माध्यम से व्यक्त करना चाहते थे. ब्लेक एंड व्हाईट रंगों से नायक और नायिका की मन की मोनोटोनी ,रिक्तता , यश और वैभव की क्षणभंगुरता के अहसास को बड़े जुदा अंदाज़ में फिल्माना चाहते थे.
जिस दिन उन्होंने नटराज स्टूडियो में शूटिंग शुरू की, तो उनके फोटोग्राफर वी के मूर्ति नें उन्हें वेंटिलेटर से छन कर आती धूप की एक तेज़ किरण दिखाई, तो गुरुदत्त बेहद रोमांचित हो उठे और उनने इस इफेक्ट को वापरने का मन बना लिया. वे मूर्ति को बोले,' मैं शूटिंग के लिए भी सन लाईट ही वापरना चाहता हूँ क्योंकि वह प्रभाव की मै कल्पना कर रहा हूँ वह बड़ी आर्क लाईट से अथवा कैमरे की अपर्चर को सेट करके नहीं आयेगा. '
तो फ़िर दो बड़े बड़े आईने स्टूडियो के बाहर रखे गये, जिनको बडी़ मेहनत से सेट करके वह प्रसिद्ध सीन शूट किया गया जिसमें गुरु दत्त और वहीदा के बीच में वह तेज रोशनी का बीम आता है. साथ में चेहरे के क्लोज़ अप में अनोखे फेंटम इफेक्ट से उत्पन्न हुए एम्बियेन्स से हम दर्शक ठगे से रह जाते है एवं उस काल में, उस वातावरण निर्मिती से उत्पन्न करुणा के एहसास में विलीन हो जाते है, एकाकार हो जाते है. और बचता है .., गुरुदत्त के प्रति एक दार्शनिक सोच...,मात्र एक विचार , एक स्वर...
वक्त नें किया क्या हसीं सितम...
अगली कडी में पहले किये गये वादे के अनुसार, एक पोस्ट तैय्यार कर रहा हूं, जिस में गुरुदत्त, रफ़ी जी, हेमंत दा, एस डी बरमन , और एक अज़ीम शायर पर एक संस्मरण.. अगले हफ़्ते...
किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है.
बहुत कुछ पाया है इस ज़िंदगी से.
संगीत,रंगकर्म,चित्रकारी,फोटोग्राफ़ी में किये अव्यावसायिक प्रयोग और व्यवसाय में वास्तुशास्त्र, इंजिनीयरींग और मॆनेजमेंट के कुछ भुगते ,कुछ आज़माये फ़ंडे.
कुछ इहलोक की कुछ परलोक की.
कुछ आत्मा की, कुछ परमात्मा की..
कुछ पायें , कुछ लौटायें..