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Wednesday, July 23, 2008

आहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत


सलिल चौधरी ,
एक प्रयोगशील सन्गीतकार.
अपनी विलक्षण शैली मे अनेकानेक , विविध रंगों की छटा लिये स्रुजन करता एक प्रतिभाशाली ,क्रान्तिकारी कलाकार!!!
देश विदेश की शास्त्रीय सन्गीत मे निबद्ध अनोखी रचनाओं का मनोहारी गुंजन जब हमारे मानस पटल पर अन्कित होता है , तो दाद देने को जी चाह्ता है.

दो बीघा ज़मीन फ़िल्म का वह थीमसांग लें बानगी के तौर पर--

अपनी कहानी छोड जा, कुछ तो निशानी छोड जा, मौसम बीता जाये..

यह गीत की धुन भले ही रशियन रेड आर्मी के मार्चिंग सोंग से प्रेरित हो कर लिखी है, मगर उसमें हमारी गांव की मिट्टी की खुशबू ज़रूर आती है. ’हरीयाला सावन ढोल बजाता आया ’में मन्ना दा और लताजी ने गाये गीत ने लोकसंगीत पर उनकी पकड कितनी मज़बूत थी यह साबित किया.(घिर घिर बदरवा बरसे -- में भी )

इन्स्पिरेशन से याद आया,पिछले दिनों जब मै ऒस्ट्रिया के साल्सबर्ग मे एक पुरानी इमारत के करीब से गुज़र रहा था, मेरे कानो मे एक बहूत ही परिचित सी धुन पडी , जो कमोबेश मेरे दिलो दिमाग मे कबसे अन्कित थी, तलत और लता के गाने की,’इतना ना मुझसे तू प्यार बढा (छाया)’के इन्टरल्युड से बेहद करीब. मैं बरबस खींचता चला गया उस के उद्गम की ओर. पाश्चात्य वाद्य व्रंदों से सुसज्जित उस धुन के ऒर्केस्ट्राइज़ेशन से मन्त्रमुग्ध हो कर पूछ बैठा , तो पता चला की, वह जगह प्रसिद्ध सिम्फ़ोनी निर्देशक मोज़्ज़ार्ट का घर थी, और उनकी मूर्ति के नीचे बैठा मै , ठगा सा ,बावला सा ,सुरों के उतार चढाव के रोलरकोस्टर मे बैठा रस पान करता रहा.

उस गीत की धुन मै ले आया हुं, मगर अपलोड करना नही आता (करने की कोशिश में लगा हुं)लग गया तो वाह वाह,नही तो मोज़्ज़ार्ट के लेख के साथ वह फिर आ जायेगा , आप के लिये!!अगले पोस्ट मे..

इसमे कोई शक नही, की दूसरे सन्गीतकारों की तरह, सलिल दा ने भी पाश्चात्य धुनों से प्रेरणा ली, मगर उन्होने अलग से भारतीय संगीत के मेलोडी एवम पाश्चात्य सन्गीत के सिम्फोनी का एक अद्भुत संगम किया,और क्रियेटीविटी के एक नये आयाम को जन्म दिया. ऐसा नही की उनकी पकड भारतीय शास्त्रीय या सुगम संगीत मे नही थी. परख का ’ ओ सजना, बरखा बहार आई ’ और ’जा तोसे नही बोलूं कन्हैया- परिवार’ या जागते रहो का - ’जागो मोहन प्यारे ’ याद है? दिलीप कुमार को मुसाफ़िर में गवाया -’ लागी नाही छूटे ’

उनके प्रयोगशीलता का उदाहरण देखिये मधुमती फ़िल्म में, जहां चलन के विरुद्ध उनने दिलीप कुमार के लिये मुकेश जी से सभी रोमांटिक और मस्ती भरे गीत गवाये, वहीं दर्द भरे गीत ’टूटे हुए ख्वाबों में ’ के लिये रफ़ी साहब को तलब किया.(गाने की पिच और रेंज का तकाज़ तो था ही). वैसे, मुकेश जी और तलत उनके पसंदीदा गायक थे.किशोर से भी उन्होने
’ कुएं में डूब के मर जाना ’ जैसा धमाल कॊमेडी गीत गवाया ही, मगर दर्द की इन्तेहां हुई ’ कोई होता जिसको अपना’में.
लता जी का बेहद मधुर गीत ’न जाने क्यों, होता है ये ज़िन्दगी के साथ-’ के सुरों के मेलोडियस उतार चढाव,खास कर अन्तरे में, बेजोड है.

सलिल दा की बन्दीशें ्हैं , कहीं गोलाई या मींड लिये हुए ठन्डी हवा की बयार की तरह, तो कहीं झरने की तरह इठखेलियां खेलती हुई फ़ुआरों की तरह , या कभी उन्मुक्त आकाश मे डोलती हुई पतन्ग की तरह. अलग अलग मूड्स को दर्शार्ती हुई. तभी तो उनका नाम फ़िल्मों के पार्श्व सन्गीत में अग्रणी रहा है.
बहुत ही कम लोगों को यह मालूम होगा की मूल रूप से सलिल दा एक गीतकार का पिन्ड रखते थे. सुना है उनकी कुछ क्रान्तिकारी रचनाओं पर तो बंदीश भी थी कभी. उनकी एक बंगाली कविता ’चाबी गुछ्छा ’ गीतकार योगेश ने सुनायी थी, जिसका ज़िक्र फिर कभी--

वह चाबी का गुछ्छा मैने अपने दिल के भीतर सम्हाले हुए रखा है..अगले पोस्ट में ज़रूर लिखूंगा.

आप भी लिखिये आप को यह ब्लोग कैसा लगा, तो प्रेरणा मिलेगी. आखिर आप के लिये ही तो लिखा है, पहूंचा की नही दिलिप के दिल से , आपके दिल तक ?


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