
साहिर
कडी १
दो दिनों पहले ८ मार्च को अज़ीम शायर साहिर लुध्यानवी का जन्म दिन था. वह भी विश्व महिला दिवस के दिन!! क्या ये एक महज़ संयोग माना जाये या इसके पीछे विधाता का कोई डिज़ाईन है, कोई बडा़ मंतव्य है?
शायद हां. आप साहिर के अश’आर सुनें ,पढे़, तो उसमें आपको नारी के लिये एक जुनून की हद के पार जाती हुई संवेदनायें मिलेंगी. अहसासात के इस गहराते मंज़र की बानगी आपको उनके कई फ़िल्मी गीतों में मिलेगी, जिसमें कमोबेश किसी औरत की दिल की हकी़कतबयानी की गयी हो.
औरत नें जनम दिया मर्दों को एक ऐसा ही गीत है.

ज़िंदगी के इस नंगी सच्चाई को कितनी पीडा़ और ज़ल्लत के साथ उतारा है शब्दों में, और साथ में कमज़र्फ़ मर्दों की मानसिकता SICKNESS की सीमा तक बयां कर जाती है.साहिर वैसे तो मुला’इम और गुलाबी रूमानी गज़लें और गीत भी लिखतें है, मगर इस गीत में उन्होने जो दिल खराश और खारदार लफ़्ज़ों को पिरोया है वह किसी भी हाजी दिलसोज़ इंसां को पिघलाने का माद्दा रखतें हैं.साफ़गोई और तीखे चुभन लिये इन कठोर शब्दों से आप में से किसी के जिगर को अगर चाक नहीं किया हो तो मुलाहिज़ा फ़रमायें...
साहिर नें सब कुछ लिख दिया है फ़िल्म साधना के इस गीत में, मैं बहुत ही अदना मुलाज़िम हूं आप जैसे इल्मदानों और कदरदानों का. इसे विस्तार करना मेरे बस की बात नहीं....हां , एन दत्ता नें भी अपने नफ़ीज़ तर्ज़ से इस गाने के साथ इंसाफ़ किया है.(याद है इसी फ़िल्म की कव्वाली - आज क्यूं हम से पर्दा है?)
यूं नहीं कि साहिर के इस अजा’ईबखाने में इस तरह के और असलाह हथियार नहीं है.
याद किजिये फ़िल्म प्यासा का वह कालजयी गीत ...
ये कूचे , ये नीलाम घर दिलकशीं के,
ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के,
कहां है कहां है मुहाफ़िज़ खुदी के,
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है?
बडी पोस्ट नहीं चाहता इसलिये अगले तीन दिनों में वादा कि इस बार इस गीत को लिखने की साहिर की मानसिकता,गुरुदत्त का जुनून और ,प्यासा फ़िल्म में चित्रिकरण की पार्श्वभूमि, सभी विस्तार से लिखूंगा....
