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Tuesday, July 6, 2010

आओ ट्विस्ट करें- पंचम दा की विस्फ़ोटक धुनों पर....श्रद्धांजली

RDX of Rahul Dev Burman


आज तो बस मैने ठान ही ली है, कि आज एक पोस्ट ज़रूर हो जाये.

दर असल इतने दिनों में व्यस्तता का तो आलम था ही, मगर लेपटॊप खराब हो जाना, फ़िर इजिप्ट के दो तीन चक्कर और काम की अधिकता, बस ब्लोग से दूर ही रहा.

वैसे बात ये भी है कि मैं कोई लेखक तो हूं नहीं, जो स्वयंस्फ़ूर्त ही कुछ लिख दूं. दिल में जो मेहसूस करता हूं वही कलम पर या कीबोर्ड पर उतर जाता है, और दिलीप के दिल से पोस्ट का सृजन हो जाता है.

मगर इस बार दिल तो किवाडों के अंदर ही बंद रहा , और दिमाग के खेल चलते रहे. मसलन इजिप्ट में कंपनी खोलना, प्रोजेक्ट का श्रीगणेश करना आदि आदि.

तो आज सोचा कि आज तो बस लिख ही दें, जो भी मन में आता है.

दर असल इन दिनों फ़िल्मी संगीत से जुडी कई हस्तियां याद आई , उनके जन्म दिन या पुण्यतिथी पर.

तलत साहब याद आये, उनके इन्दौर में हुए कार्यक्रम की एंकरिंग की थी तो उनसे हुई अंतरंगता, राज कपूर साहब से निजी मुलाकातें, फ़िल्म बॊबी के लिये दिये गये गाने की अनौपचारिक ऒडिशन, राहुल देव बर्मन से होटल ताजमहल के क्रिस्टल हॊल में फ़िल्म अपना देश के प्रीमीयर पार्टी पर राजेश खन्ना के साथ की गयी उनकी मस्ती... ,बचपन की इन यादों ने दिल पर दस्तक दी, और परदेश में मन को दिले सुकून दे गयी ये यादें.


राहुल देव बर्मन तो बडे ही अफ़लातून संगीतकार थे.मेहमूद नें सही ही फ़रमाया था. वे उन दिनों ही इतना फ़्युचरिस्टिक संगीत का, धुनों का सृजन करते थे .वे हमेशा नई नई परकशन्स वाद्यों पर, स्वरों के विभिन्न आयामों पर यूं प्रयोग किया करते थे कि मेहमूद ने आज से चालीस साल पहले कहा था, कि शायद पंचम नाम का तारा बॊलीवूड के संगीत के आकाश में ज़रा जल्दी ही उग गया है. ज़रा दस बीस साल ठहर जाओ, वह धूमकेतु की तरह आकाश पे छा जायेगा.

उनका कहना सच ही हुआ, उन्ही दिनों में वह सुरों के आकाश पे छा गया था, अपनी निराली मगर मधुर धुनों से. मगर आज चालीस साल बाद ज़रा गौर करें , कि पिछले दस पंद्रह सालों में जितने भी रिमिक्स बनें है, उनमें अधिकाष पंचम दा की धुनों पर ही हैं.Is not it?

उनकी प्रयोगधर्मिता के तो हमें कायल होना ही पडेगा.गाने के अंदर ही स्केल चेंज का फ़ंडा पहली बार आपने ही दिया. अलग अलग तरह के ताल वाद्य और ठेके उन्होने गानों में उपयोग किये, जैसे कि मादल इत्यादि. अभी पिछली बार के दुबई टूर में मैंने एक साईड रिथम का अरेबीयन वाद्य खरीदा था, जो मारकस और रेसो रेसो का ही युगल स्वरूप था, जो अरेबियन संगीत के तालवाद्यों में से एक है. यू ट्युब पर राहुलदेव की एक पुरानी रिकोर्डिन्ग के विडियो में वह वाद्य प्रयोग किया गया दिखा!!

मगर काश वे आज जिंदा होते, तो क्या आज की पीढी के संगीतकारों से कहीं उन्नीस बैठते? शायद हां... क्योंकि वे शायद मेलोडी के साथ कंप्रोमाईज़ नहीं कर पाते,जो अधिकतर नये संगीतकार कर रहें हैं. यूं नही कि आज की पीढी के ये सृजनकार गुणी या टेलेंटेड नहीं है, मगर समय की कमी, नयी पीढी की अल्प स्मृति या रिदमिक ताल की तात्कालिक श्रवणीयता के बहाने जो भी परोसा जा रहा है, वह मेलोडी तो नही है.( अपवादों को छोडकर)

चलो , आपको उन्ही का एक गीत सुनवातें हैं, जो सन १९६५ के आसपास रचा गया था, मेहमूद के ही फ़िल्म भूत बंगला के लिये, जिसमें पंचम दा का भी कॊमिक रोल था.


गीत है आओ ट्विस्ट करें, क्या खुला मौसम....


इस गीत को मना दा नें क्या खूबसूरत गाया है. क्या एनर्जी और सुरों का पावरयोगा है ये गीत!!! आपको बता दूं, फ़िल्म में इस गानें से एकदम पहले अमीन सायनी साहब नें तनुजा का गीत पेश किया था , (लताजी की मधुर आवाज़ में) जो मेलोडी, माधुर्य से भरे भारतीय संगीत शैली का था, और उसके एकदम बाद यह पाश्चात्य शैली का ट्विस्ट सोंग, बिल्कुल विपरीत जोनर का... ये सिर्फ़ पंचम दा ही कर सकते थे.


ये गाना मन्ना दा को समर्पित कार्यक्रम दिल का हाल सुने दिल वाला .. से लिया गया है, और इस गाने को मैने भी फ़िल्म उपकार के धीर गंभीर गीत कसमें वाद प्यार वफ़ा के एकदम बाद गाया था, और कोशिश की कि उसमें में से कुछ उर्जा, कुछ पावर को मैं भी अपने गले में डाल सकूं. (मन्नादा से उदयपुर में शो के दौरान निजी मुलाकात में मैने पूछा था कि आप तो क्लासिकल आधारित गानों के लिये जाने जाते हैं,मगर फ़ास्ट गानों में आपको कौनसा गीत पसंद है? तो उन्होने कहा कि ये गीत उनके दिल के करीब है.कुछ लडके और लडकीयां जो वहां मौजूद थी वे दंग रह गये जब बाद में मन्नादा नें
उतनी ही जोश, तडक भडक और नफ़ासत के साथ यह फ़ास्ट गीत गाया.)मैं भी ज़रा ज़्यादा ही झूम लिया था इस गाने में.....!!!!!!

संजय भाई नें सही कहा है अपने एंकरींग में, इस गाने की पृष्ठभूमी बनाते हुए, कि आजकल हमें नये फ़्युज़न के नाम पर जो भी सुनाया जा रहा है, यही काम पंचम दा नें बरसों पहले किया और मधुरता को बरकरार रखते हुए!!! और चाहे कुछ भी हो जाये, पुराना संगीत कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा.आप उनके बात से सेहमत ज़रूर होंगे.

Saturday, May 1, 2010

सुर देवता मन्ना दा को जन्मदिन पर आदरांजली...




कडी १


ये बात तो पक्की है, कि इतने दिनों गायब होने के बाद जब फ़िर से आपके संम्मुख आया हूं तो मुआफ़ी तो मांगना ज़रूरी है.

कितनी बार आपसे वादे किये, अपने आप से कसमें खायी,ब्लोग जगत के मेरे सुरीले परिवार से प्यार और वफ़ा का वास्ता भी दिया, मगर फ़िर वही ढाक के तीन पात.

चलिये मान लेते हैं कि -

कसमें वादें प्यार वफ़ा सब,बातें हैं बातों का क्या?
कोई किसी का नहीं ये झूटे , नाते हैं नातों का क्या?....

मगर क्या करें, दिल है के मानता नहीं, और आज मन्ना दा के जन्म दिन के पावन पर्व पर फ़िर हाज़िर हूं.

मन्ना दा तो हम सभी के , आपके, मेरे हर दिल अज़ीज़ गायक है ही, मेरे लिये तो वे मेरे सुर देवता भी हैं, आराध्य भी हैं.बचपन से जब समझ आयी तो अपने आपको रफ़ी साहब और मन्ना दा का मुरीद पाया. हीरो जो मन में बसे थे वे थे शम्मी कपूर और मेहमूद, तो ये मुहब्बत तो होनी ही थी.

मगर जब जब भी गानों के चयन की बात होती थी तो मन्ना दा के गीतों को गाने मे बडा चेलेंज लगता था.

रफ़ी साहब और मन्ना दा एक ही पाये के गुणी गायक हैं. स्वर में माधुर्य, गोलाई, मींड, लोच, हरकतें और सुरों पर गज़ब की पकड!! और स्वरों की रेंज तो बस लाजवाब, अतुलनीय.

रफ़ी साहब को तो अल्लाहताला नें हम से छीन ही लिया है, लेकिन उसी खुदा पाक का लाख लाख शुक्र है कि उसनें मन्ना दा को भरी पूरी ज़िंदगी बक्षी है, और आज ईश्वर की कृपा से वे ९०-९१ साल की उम्र में भी संगीत की सेवा कर रहे हैं.
(अभी सुना था कि उन्होनें पिछली शनिवार को लखनऊ में कार्यक्रम दिया था- सलाम !!)

मैं खुशनसीब हूं कि मालिक के फ़दल से मुझे हिंदुस्तान के कई नामचीन संगीतकार और गायक से मुलाकात का अवसर मिला. लेकिन मन्ना दा से रूबरू मिलने का एक छोटा मार मुख्तसर सा मौका मिला था करीब बीस बाईस साल पहले, जब वे इंदौर पधारे थे प्रतिष्ठित लता मंगेशकर पुरस्कार को प्राप्त करनें. मगर जल्दबाज़ी मे कुछ गुफ़्तगू नहीं हो पायी. पांच छः साल पहले उदयपुर में ज़रूर मिला था, कार्यक्रम के बेक स्टेज पर , मगर कार्यक्रम की उधेडबुन में ज़्यादह बात नहीं कर पाया. हां , दो साल पहले, १ मई को, मेरे किसी मित्र किशन का कलकत्ता से फोन आया, कि क्या मन्ना दा से बात करना चाहोगे?उसके पास उन्का फ़ोन नं आया था.

मैंने कहा नेकी और पूछ पूछ? तुरंतो मैने उसके दिये हुए फ़ोन नं पर बात की . संयोग से मन्ना दा ने स्वयं फोन उठाया.

मैं इतना बल्ले बल्ले हुआ जा रहा था, कि विशेष कुछ बातें हो नहीं पायी, बस दादा बोलते रहे, और मैं सुनता रहा, कि अब भी वो कैसे गा रहें है, और किस तरह से आज की फ़िल्मी दुनिया का संगीत उनको रास नहीं आता.

मैं शर्मा शर्मी में बोल नहीं पाया था कि मैं उनके गानों को गाता हूं, और वे समझे कि मैं कोई कार्यक्रम करने वाली संस्था से जुडा हूं, और उनका प्रोग्राम करवाना चाहता हूं.

फ़िर मुझे उनसे कहना पडा कि मैं उनका ज़बरदस्त फ़ॆन हूं, और उनके गानें गाता हूं, तो वो हंस पडे. कहने लगे कि तुम ज़रूर रफ़ी साहब के गाने गाते रहे होगे, और साथ साथ में मेरे भी गाने भी गाते होगे.उनका कहना था जो वाकई में सही भी है, कि हम अमूमन देखते हैं, कि कोई रफ़ी साह्ब को गा रहा है, कोई मुकेशजी, हेमंत दा, तलत मेहमूद जी को. मगर Exclusively मन्ना दा को गाने वाला नहीं मिला.

मैने कहा कि वैसे तो मैं सभी गायकों को गाता हूं, और amateur या शौकिया गायक हूं तो ज़रा नाराज़ ही हो गये. फ़िर भी उनसे कहा कि पिछले दिनों मैने उनके गानों पर आधारित एक कार्यक्रम दिया था (Exclusive Manna Dey only), तो बोले, ऐसा तो कभी सुना नहीं कि सिर्फ़ उनके थीम पर कोई कार्यक्रम हुआ हो .

तो मैंने सोचा कि अपने उस कार्यक्रम की सी डी उनको भिजवा दूं, तो उनसे पता लिया, और विनम्र प्रार्थना की कि समय मिला तो वे सुनें. तो वे बडे बच्चे जैसे भाव से बोले, कि भाई मेरे पास प्लेयर नहीं है.(शायद सही ही नही होगा कलकत्ता के घर में , क्योंकि वे तो ज़्यादहतर बंगलोर में ही रहते हैं, या फ़िर मुझसे बचने के लिये कहा हो!)

बरह हाल मैने तो सीडी अपने मित्र किशन के साथ भेज दी थी . अब सुना या नहीं ये उन्हे ही या फ़िर भगवान को ही पता.

मित्रों , उस कार्यक्रम का टाईटल था दिल का हाल सुने दिलवाला और उसमें से कुछ गानें , मैने यहां आपको सुनवाये थे और दिखवाये भी थे---




तू प्यार का सागर है,

सुर ना सजे,

तेरे नैना तलाश करें,

किसने चिलमन से मारा,

तू है मेरा प्रेम देवता..
.




तो आज मुझे इज़ाज़त दें कि आज उसी कार्यक्रम में से आपको दो गाने और सुनवाऊं, जिससे मन्ना दा के विलक्षण रेंज और विपरीत मूडस को बखूबी निभाने की अद्भुत प्रतिभा परिलक्षित होगी. साथ में आप लुत्फ़ उठायें कार्यक्रम के सूत्रधार संजय भाई (पटेल) के लाजवाब और श्रेष्ठ निवेदन का, जिससे एक perfect ambience बन जाता है, और श्रोता उस सुर के समंदर में डूबता उतरता जाता है.इसिलिए, गाने से पहले उनका निवेदन भी आपके समक्ष है.

कसमें वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या-

नैराश्य और वैराग्य की पृष्टभूमि में गाया यह गीत, एक ठहरे हुए पानी से भरे पोखर के किनारे हमें ले जाता है, और हम जीवन की इस सच्चाई से रूबरू होते हैं.




साथ में और सुनिये एक दोगाना, जिसमें मेरा साथ प्रियाणी वाणी नें दिया है, जो दो साल पहले की Star Voice Of India की finalist थी.

प्रस्तुत कार्यक्रम में मैने मन्ना दा के विभिन्न मूड्स और पहलू के गीत सुनाये, जिसमें रोमांटिक,हास्य,क्लासिकल और दर्द भरे गीत तो थे ही, मगर ये गीत भी लिया, कई सुनकार श्रोताओं के विरोध के बावजूद, क्योंकि, उदयपुर में मन्ना दा नें खुद कहा था कि मैं हर तरह के गानें गा सकता हूं और ये गीत उन्हे बहुत ही पसंद है!

ये दो गाना है ---

ओ मेरी मैना, तू मान ले मेरा कहना,

जिसे महमूद और मुमताज़ पर फ़िल्माया गया था.आप स्वयम देखें, कि ये वही मन्ना दा का गीत है, जिन्होने कसमें वादे प्यार वफ़ा सब और पूछो ना कैसे मैने जैसे लाजवाब गीत गाये.और इस डांस गीत में वह रवानी, थ्रो, और मस्ती भरा आलम किस खूबी से आया है मन्ना दा नें.

वैसे इस सब में मेरा तो कोई कमाल नहीं है, कमाल है मन्ना दा के लिये मेरी भक्ति का है.

Tuesday, November 3, 2009

सचिन दा और मन्ना दा की जुगलबंदी - कव्वाली - किसनें चिलमन से मारा...


सचिन देव बर्मन एक ऐसा नाम है, जो हम जैसे सुरमई संगीत के दीवानों के दिल में अंदर तक जा बसा है. मेरा दावा है कि अगर आप और हम से यह पूछा जाये कि आप को सचिन दा के संगीतबद्ध किये गये गानों में किस मूड़ के, या किस Genre के गीत सबसे ज़्यादा पसंद है, तो आप कहेंगे, कि ऐसी को विधा नही होगी, या ऐसी कोई सिने संगीत की जगह नही होगी जिस में सचिन दा के मेलोड़ी भरे गाने नहीं हों.

आप उनकी किसी भी धुन को लें. शास्त्रीय, लोक गीत, पाश्चात्य संगीत की चाशनी में डूबे हुए गाने. ठहरी हुई या तेज़ चलन की बंदिशें. संवेदनशील मन में कुदेरे गये दर्द भरे नग्में, या हास्य की टाईमिंग लिये संवाद करते हुए हल्के फ़ुल्के फ़ुलझडी़यांनुमा गीत. जहां उनके समकालीन गुणी संगीतकारों नें अपने अपने धुनों की एक पहचान बना ली थी, सचिन दा हमेशा हर धुन में कोई ना कोई नवीनता देने के लिये पूरी मेहनत करते थे.उनकी हर धुन सिर्फ़ सुनाती ही नहीं थी, मगर उस भाव को दर्शाती थी. याने आप सिर्फ़ धुन सुन कर उस गीत के परिदृश्य का इंतेखाब कर सकते हैं आसानी से.


उनके बारे में सही ही कहा है, देव आनंद नें (जिन्होने अपने लगभग हर फ़िल्म में - बाज़ी से प्रेम पुजारी तक सचिन दा का ही संगीत लिया था)- He was One of the Most Cultured & and Sophisticated Music Director,I have ever encountered !

किशोर कुमार को एक अलग अंदाज़ में गवाने का श्रेय भी दादा को ही जाता है. उन्होंनें देव आनंद के लिये किशोर कुमार की आवाज़ को जो प्रयोग किया वह इतिहास बन गया. बाद में राजेश खन्ना के लिये भी किशोर की आवाज़ लेकर किशोर को दूसरी इनिंग में नया जीवन दिया, जिसके बाद किशोर नें कभी भी पीछे मुड़ कर नही देखा.

उसके बावजूद, सचिन दा ने देव आनंद के लिये हमेशा ही किशोर से नहीं गवाया, बल्कि रफ़ी साहब से भी गवाया, जैसे जैसे भी गाने की ज़रूरत होती थी. तीन देवियां में - ऐसे तो ना देखो, और अरे यार मेरी तुम भी हो गज़ब, तेरे घर के सामने में तू कहां , ये बता और छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा,गाईड़ में तेरे मेरे सपने और गाता रहे मेरा दिल, आदि.


अभी फ़िल्मी संगीत के आकाश पर विद्यमान एक महान , सर्वश्रेष्ठ गायक मन्ना डे साहब को दादासाहेब फ़ालके पुरस्कार से नवाज़ा गया. मन था कि उन पर भी कुछ लिखूं. मगर आज मन ये हो रहा है कि दिलीप के दिल से स्ट्रेट ड्राईव्ह मारूं और आपको आगे कुछ भी अधिक लिखने की बजाय, अपने एक खास कार्यक्रम - दिल का हाल सुने दिल वाला में से एक कव्वाली सुनाऊं, जिसे मन्ना दा नें अपने हरफ़न मौला स्वर में गाया है, और संगीत दिया है सचिन दा नें.
सचिन दा नें कव्वालीयां कम ही कंपोज़ की हैं, मगर यहां अपने आपमें कव्वाली और कोमेडी का बढियां ब्लेंडिंग किया है. बाकी रही बात मन्नादा के बारे में , तो हमारे हर दिल अज़ीज़ प्रसिद्ध उदघोषक , एंकर और मेरे अनुज मित्र श्री संजय पटेल से ही सुनें , जिनकी रसभरी वाणी में भी उनकी लेखनी की तरह सरस्वती का निवास है:


किसने चिलमन से मारा......

Friday, October 9, 2009

ए चौदहवी के चांद - सुहानी रात ढल चुकी है,, ना जाने तुम कब आओगे?



पिछला हफ़्ता बडा़ ही हट के गया.

याने पिछले हफ़्ते एक शब्द चांद बार बार कानों पर पडा़, क्योंकि बात साफ़ है.

पिछले हफ़्ते शरद पुर्णिमा की मदहोश रात थी.

सुनते आये हैं, कि इस रात को चंद्रमा से अमृत बरसता है. लगता है सही है, क्योंकि, पिछले कई सालों से बिना नागा, इस रात को संगीत के अमृत स्वर कानों में पडते रहते हैं. वातावरण में मस्ती, सुरीली तरन्नुम का आलम तारी रहता है.फ़िर रात को परमानंद की प्राप्ति - याने केशर पिस्ता युक्त गाढा दूध. बस और क्या चाहिये.

बस १ ता. से माहौल शुरु हो गया था. मैं जिस लायंस क्लब से जुडा हुआ हूं उसके तत्वावधान में शरद पूनम की संगीत रजनी हर साल की तरह से संपन्न हुई. इस दिन खास कर , पूणें से प्रसिद्ध पियानो एकोर्डियन के वादक श्री अनिल गोडे पधारे थे, जिन्होने अपने सुरीले साज से, और अपने हुनर के कमाल से इस बेजोड और बजाने में क्लिष्ट साज़ पर इतने पुराने गीत सुनाये कि बस मस्त कर दिया. अनिल जी हेमंत दा, तलत मेहमूद्जी,किशोर दा आदि के साथ देश विदेश में बजा चुकें हैं. पिछले साल पुना में मिले थे जब सुदेश भोंसले के साथ भी बजाया था.

मात्र एकोर्डियन और ढोलक,कांगो पर बजाये हुए मधुर गानों की बानगी तो लीजिये -

चांद सा रोशन चेहरा, सुहानी रात ढल चुकी , फ़ूलों के रंग से,डम डम डिग डिगा, रमैय्या वस्ता वैय्या , और भी कई.

एक और खुशनुमा बात यह थी कि मेरे अनुज - मित्र संजय (श्री संजय पटेल) भी इस कार्यक्रम में आये थे. अमूमन ऐसी संगीत रजनीयों में संजय जी का संगीत पर समृद्ध एंकरिंग और मेरे स्वर का भी संयोग जमा करता था पहले कई बार, मगर एक दो सालों से दोनों की व्यस्तता से ये ग्रह युति हो नहीं पा रही थी.इस दिन कुछ मित्रों नें छेड दिया, फ़िर हम दोनों भी औपचारिता को दूर कर, कुछ कुछ गा बैठे.

फ़िर लगभग हर दिन कोई ना कोई कार्यक्रम था ही. मगर दुख ये रहा कि शरद पोर्णिमा की रात को इंदौर में बारीश की वजह से चांद नहीं दिख पाया, और जैसा कि हमारे यहां परंपरानुसार रात को चांद को नैवेद्य नहीं चढाया जा सका.(प्रस्तुत चित्र में दूध और पूजा का पात्र - जिसमें ऐरावत का आकार बनाया गया है चावल से, और इस दूध के बर्तन को चांदी की तलवार रख कर चंद्रमा की चांदनी में रखा जाता है.

इसिलिये चांद, चंद्रमा, चंदा आदि शब्दों को लिये हुए गीतों की धूमधाम रही इन दिनों.

एक बडा ही अहम गीत मेरे ज़ेहन में गूंज रहा था इन दिनों, जिसने अपने सहज सरल संगीत स्वर संयोजन और रफ़ी साहब के अमृत भरे केशर पिस्ता युक्त दूध की मानिंद मीठे, सुरीले स्वर के कारण मेरे मन में, दिल में जगह बना ली थी, और दिन रात के अधिकतर क्षणों में मेरे होटों पर आ रहा था. सोचा था कि इन दिनों कहीं गा ही दूं तो मन की ये मस्ती प्रकट में मेनिफ़ेस्ट हो जाये. मगर मौका नहीं आया.है

अचानक किसी मित्र नें भेजा हुआ एक कराओके ट्रॆक मिल गया जो बाज़ार में मिल रहे ट्रेक से बेहतर था, तो बैठ गया रिकोर्डिंग पर, और कर डाली दिल की भडास पूरी.

मगर एक बात पर एकदम दिल झूम गया , वह ये कि, साथ में इसी राग से मिलता जुलता एक और सुरीला और मीठा गीत भी होटों पर कॆट्वाक करने लगा- सुहानी रात ढल चुकी , ना जाने तुम कब आओगे-.

तो बस एकदम इसी गाने के तीसरे अंतरे के वाद्य संयोजन के बेकग्राऊंड में इस गीत का अंतरा भी गाकर देखा. तो संयोग यूं बना कि यह प्रयोग भी उम्दा जम गया.

बस क्या था. सोचा , इसे आपके साथ भी शेयर करूं, आखिर दिलीप के दिल से जो भी स्वर निकलेंगे, आह या वाह, आप तो हमसफ़र हैं ही. तो बस सुनिये इस बार यह गीत...चौदहवी का चांद हो, या आफ़ताब हो.... और सुहानी रात ढल चुकी का मिक्स.(इसे रिमिक्स ना कहिये, क्योंकि उसमें ना जाने क्या क्या किया जाता है- जिसका ज़िक्र फ़िर कभी)




एक और आश्चर्यजनक संयोग ये रहा है कि अभी दो दिन बाद हमारे श्रद्धेय कलाकार , बेजोड निर्देशक गुरुदत्त जी की पुण्यतिथी है (१० अक्तूबर १९६४). जिस फ़िल्म के लिये ये टाईटल गीत बनाया गया था उस फ़िल्म के निर्माता भी गुरुदत्त ही थे.चूंकि यह फ़िल्म मुस्लिम परिवेश में फ़िल्माई गयी थी, गुरुदत्त जी नें इस फ़िल्म के निर्देशन के लिये जनाब मोहम्मद सादिक़ को ज़िम्मेदारी सौंपी. वे वो दिन थे जब अपने ज़माने की सबसे बडी प्रयोगात्मक फ़िल्म कागज़ के फूल की असफ़लता से गुरुदत्त जी काफ़ी निराश थे.

मगर हुआ यूं कि इस फ़िल्म नें सफ़लता के ऐसे झंडॆ गाडे कि कहा जाता था कि १०० फ़िल्मों के बराबर बिज़नेस किया, और गुरुदत्त को दिवाला होते होते बचा लिया.(उनका स्टुडियो भी बिकत बिकते बच गया)

हालांकि वे इसके पहले एस डी बर्मन दा और ओ पी नय्यर के साथ काम कर चुके थे, ये एक आश्चर्यजनक बात थी कि मुस्लिम परिवेश के लिये होते हुए भी उन्होने रवि जैसे संगीतकार को साईन किया बतौर संगीतकार, जिन्होने इस फ़िल्म के संगीत के साथ पूरा न्याय किया.(इसका कारण थे अबरार अल्वी, मगर मज़ेदार बात यहा भी ये है कि भले ही उनने गुरुदत्त जी की इतनी सारी फ़िल्मों में कहानीयां लिखी, मगर इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी सागर उस्मानी नें!!)

आपने अगर ये फ़िल्म देखी होगी तो आप ज़रूर गुरुदत्त जी के डिटेल्स , लखनौ की तेहज़ीब , परिधान , नपे तुले डिफ़ाईन किये हुए चरित्र और उनके मेनरीझ्म की बारिकी में गये होंगे और दाद देने को जी चाहता होगा आपका.हालांकि निर्देशन मोहम्मद सादिक का था , इस फ़िल्म में गुरुदत्त का ही स्टांप था. और तो और सभी गाने शत प्रतिशत गुरुदत्त जी नें ही फ़िल्माये थे, जो उनके फ़ोटोग्राफ़र श्री वी के मूर्ती नें कबूल की थी.

तो अब देखिये भी उस इम्मोर्टल , कालजयी गीत का विडियो भी, जिसमें वहीदा जी का मूर्तिमंत सौंदर्य, अलसायी हुई लाल डोरे लिये आंखें, गुरुदत्तजी का सुकून भरे दिल से उस खूबसूरती की तारीफ़ में रोमांटिक अंदाज़ में इस गीत को गाना, और साथ में खुद मोहम्मद रफ़ी साहब की शहद से भी मीठी, सुरीली, और सात्विक स्वर एक ऐसा आलम तारी कर देते हैं कि पाकीज़गी से भरे इस हुस्न का ये नशा बिन पिये ही आपके रूह में कब दाखिल होकर आपको मदमस्त कर देता है, इसका होश भी आपको नहीं रहता.

(बिना शादी शुदा मित्र गण मुआफ़ करेंगे, क्योंकि उन्हे पता ही नहीं है कि अभी क्या बाकी है उनकी ज़िंदगी में, और शादी शुदा मित्र भी मुआफ़ करेंगे, कि दर्दे दिल छेड दिया गया है, और आप को नोस्टाल्जिया के गहरे समंदर में डुबा दिया गया है. अगर तैर कर ऊपर आ सकते हो तो आ जाईये, और डूबना हो तो मेरे साथ हो लिजिये......)



गुरुदत्त जी और इस गाने के बारे में एक रोचक संस्मरण बताये बगैर नहीं रह सकता, जिससे आप हंस पडेंगे - मगर यह पोस्ट काफ़ी लंबी हो गये है. मेनेजमेंट का खिलाडी हूं इसलिये सभी मिठाईयां एक साथ नहीं परोसूंगा.

तो दस तारीख को फ़िर पधारें गुरुदत्तजी की पुण्यतिथी के दिन , तो यह भी आपके साथ शेयर करूंगा.

शब्बा खैर!!

Friday, August 21, 2009

रफ़ी साहब और किशोरदा - प्यार का मौसम....





जैसे ये जो सावन का महिना चल रहा था, उसमें पवन के सोर करने के अलावा अन्य विशिष्ट रेखांकित करने जैसी बात ये है कि इस अगस्त में कई त्योहारों नें हमारे धार्मिक परिवेश में ,हमारी दिनचर्या को भक्तिरस और उल्ल्हास के रौनक भरे क्ष्णों से नवाज़ा है.जैसे रक्षा बंधन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी , और राष्ट्रिय पर्व स्वाधिनता दिवस आदि.

मगर उसी प्रकार , ये महिना हमारे फ़िल्मी संगीत की सुरीली दुनिया में भी अहम स्थान रखता है. इसकी बानगी तो जाते जाते ३१ जुलाई ही दे गया जब कि हमारे हरदिल अज़ीज़ मोहम्मद रफ़ी जिअसे फ़नकार को हमसे जुदा किया, जब सावन के बादल भी वर्षा के बूंदों की जगह खून के आंसू रोया होगा. वैसे ही २७ अगस्त भी पास ही आने वाला है, जब हमारे लाडले रूहानी गायक मुकेश भी हमसे हमेशा के लिये रुख्सत हो गये.कल २१ अगस्त के मनहूस सोमवार को २००६ में उनकी सुरमई शहनाई हमेशा के लिये खामोश हो गयी थी.

हां, ये ज़रूर हुआ कि हरफ़नमौला कलाकार गायक किशोर कुमार को हमे ४ अगस्त को उनके जन्म दिन पर भी याद कर रंजो गम के इस मेले में कुछ रौनक लगाई.अभी अभी गुलज़ार जी नें भी अपने जन्मदिन पर अपनी बगिया के फ़ूलों से बहार खिलाई थी.

इसलिये आप पायेंगे, कि राष्ट्रिय पर्व की तरह हम सभी फ़िल्मी गीतों के शौकीन इन कलाकारों को इन दिनों शिद्दत से याद करते है, उन्हे अपनी भावनांजली पेश करते है, और फ़िर एक बार उनसे मुहब्बत की लौ को टिमटिमाये रखते हैं.

३१ जुलाई के आस पास हर जगह रफ़ी साहब को याद किया गया, और ४ अगस्त के आपपास किशोरदा को. एक कार्यक्रम में मैने ज़रूर शिरकत की थी , मगर बतौर गायक के नहीं, मगर स्पेशलिस्ट एंकर की तरह.(जाने माने एंकरपर्सन या उदघोषक श्री संजय पटेल किसी कारणवश उसमें नहीं जा सके तो मुझे बोला गया. मगर विकेट के आगे खेलनेकी आदत होने की जगह विकेट के पीछे कीपर बनने का खास अनुभव नही था).

मेरे एक करीबी शिष्य बनाम मित्र चिंतन बाकीवाला (K For Kishor- 2nd Runner Up) तो उस दिन खंडवा में गौरी कुंज में पूरा दिन बिताया जहां किशोर दा रहते थे और उत्सवी माहौल में शाम को विनोद राठोड के साथ गीतों की प्रस्तुति दी.


चिंतन तो पूर्णतयः किशोरमय हो गया है. बातचीत का लेहजा, ट्रेट्स,देह भंगिमा, देह भाषा आदि किशोरमयी हो गयी है. आकहिर क्यों ना हो, नागेश कूकनूर नें किशोर दा की जीवनी पर एक फ़िल्म घोषित की है, जिसमें वह किशोर दा का रोल निभायेगा. .पूरा खंडवा उन दिनों फ़ेस्टिवल मूड में रंग गया था.मध्य प्रदेश सरकार नें भी किशोर सन्मान पुरस्कार मय एक लाख की राशि से इस साल गुलशन बावरा को सन्मानित किया(मगर दुखद निधन की वजह से उस कार्यक्रम का क्या हुआ यह पता नहीं चला).

वैसे पिछले साल यह पुरस्कार मनोज कुमार को दिया गया. अब ये तो भगवान ही जानते हैं कि किशोर दा और मनोजकुमार में क्या साम्य है, क्योंकि पता चला था मुंबई में हुई निर्णायकों की बैठक में हमारे गुणी निर्णायक सिर्फ़ समोसा खा कर चले गये थे, सही कर.

अब मुकेश जी पर कार्यक्रमों की गहमा गहमी चल ही रही है इंदौर में.आज भी एक कार्यक्रम था , और पूरे हफ़्ते दो या तीन और हैं. हम तो बस अंधेरे कमरे में , लेपटोप की धीमी रोशनी में यही गाये जा रहे हैं कि

हमे क्या जो हर सू ,उजाले हुए हैं....
के हम तो अंधेरों के पाले हुए है...
(रफ़ी साहब )

दरसल कुछ साल पहले तक , श्री संजय पटेल अपने धुन के दीवाने इन सभी महान हस्तीयों को किसी ना किसी बहाने श्रोता बिरादरी के जाजम पर याद कर लेते थे, और खाकसार को भी ( ऐसा ही कुछ लिखा जाता है दोस्तों!!)ये फ़क्र हासिल हुआ था कि इन फ़नकारों को अपने तहे दिल से इज़हार ए अकीदत अपने सुरों के माध्यम से पेश कर सकूं. इन दिनों यह सब अब एक ख्वाब सा ही रह गया है. संजय भाई नें किसी वृहद मकसद से इन कार्यक्रमों से दूरी बना ली है(खुदा करे ये क्षणिक हो), और अपने राम के तो काम के कारण आराम के लाले पडे हुए है. सोचा था कि रफ़ी साहब के लिये इतना कुछ है लिखने को कि हर रोज़ भी लिखूं तो मुकेश जी की पुण्यतिथी तक लिख सकता हूं. हमारे एक साथी सुनील करंदीकर जी नें तो प्यार भरा फ़तवा ही निकाल लिया है , कि उनपर कुछ लिखूं.किशोर दा पर कार्यक्रम में भी कुछ बोला ही था, मगर यहां भी आपकी जाजम पर कुछ नही लिख सका.अभी गुलज़ार के जन्म दिवस पर भी कुछ मन बना था, मगर टांय टांय फ़िस्स!!

हां , ये ज़रूर किया है, कि एक गीत रिकोर्ड किया है, जो एक साथ रफ़ी जी और किशोर दा को मेरी स्वरांजली होगी.(मदन मोहन जी के समय पर भी आप सभी मित्रों का ये आग्रह था ही कि उनपर भी कुछ गा कर ही सुनवाया जाता. मगर लेट लतीफ़ी के कारण ये अब बाद में.

तुम बिन जाओं कहां...
के दुनिया में आके , कुछ ना फ़िर, चाहा कभी, तुमको चाह के....

अब इस गीत को अलग अलग रफ़ी जी नेम और किशोर दा नें गाया, और आप सुनेंगे तो फ़रक मेहसूस होगा अदायगी में, गले के टिंबर में, और हरकतों , मुरकीयों में.

रफ़ी जी की शहद भरी साफ़ आवाज़ में रोमांस का ज़ज़्बा , और जवानी की मस्ती का नूर झलकता है, और राहुलदेव नें धुन में गोलाईयां की जगह बनाई है.वहीं किशोरदा की आवाज़ में इस गीत में एक पहाडी़पन परिलक्षित होता है, जिसमें गंभीरता और मेच्युरिटी के साथ साथ खडे सुरों का मिश्रण राहुलदेव नें बखूबी किया है, और हरकतों की जगह योडेलिंग के खूबसूरत फ़ाल्स नोट्स को बोया है, और सुरीली फ़सल काटी है.(उनका किशोर प्रेम जगजाहिर था).रफ़ी जी की मीठी आवाज़ में बास के साथ रेझो़नेंस था तो किशोरदा की आवाज़ में ट्रेबल के साथ नासिका की खनक भी थी.(मोटे तौर पर लता और आशा की आवाज़ के टिंबर से अनुभव करें)


मैंने कोशिश की है, कि एक ही गाने में दोनों के वर्शन गाकर सुनाऊं, मात्र एक विनम्रता के साथ किये गये प्रयोग की तौर पर- क्योंकि इस बात का कोई प्रमाणपत्र नही चाहिये कि दोनों की आवाज़ को कॊपी किया है,क्योंकि कॊपी से अधिक महत्वपूर्ण है उनकी सुरों को रेंडर करने की स्टाईल, और अपने अपने जोनर की खूबियों को गाने में ज़ज़बातों के साथ इंटरप्रेट करना.

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वैसे जानकारों को ये बता दूं कि योडलिंग को सबसे पहले रफ़ी साहब नें गाया था. उनके एक या दो गीत मैं अगली बार पेश करूंगा, क्योंकि वे मेरे पास केसेट में है.कहीं ये भी बताया जाता है, कि दक्षिण अफ़्रीका में गये अनूप कुमार नें यह सुना था और आकर अपने भाई को सुनाया था. कुछ भी हो, योडलिंग के लिये किशोर दा ही श्रेष्ठ हैं.

यहा ये विवेचन या तुलनात्मक विष्लेषण इस लिये नहीं किया जा रहा है, कि इन दों में से किसी को श्रेष्ठ ठहराया जाये. बस हम तो तथ्यागत वस्तुपरक शास्त्रार्थ कर रहें है, क्योंकि हमें तो दोनों की अज़ीज़ है, प्यारे हैं. ये गीत उन दिनों का हैं जब किशोरदा के नाम का परचम अपनी दूसरी इनिंग में अर्श पर फ़हरा रहा था, और रफ़ी जी को सीमित गाने मिलने लगे थे.

वैसे रफ़ी जी या मन्ना दा की तरह किशोरदा शास्त्रीय संगीत में निपुण नहीं थे, मगर एक नैसर्गिक गायक थे. इसीलिये बरसों बाद अमितकुमार को उन्होनें शास्त्रीय संगीत के लिये मन्ना दा के पास भेजा था.खुद किशोर दा रफ़ी जी की स्वार्गिक आवाज़ के दीवाने थे. एक बार जब उनसे मिलने का मौका मिला था, तब होटल के रूम में टेप पर वे रफ़ी जी का ही गीत सुन रहे थे. - मन रे तू काहे ना धीर धरे....

बाद में कहीं उन्होनें यह गीत गाया भी था.

रफ़ी जी के ज़नाज़े के समय किशोर दा घंटो उनके पार्थिव देह के पास पैरों पर बैठे हुए देखे गये थे.लोगों की मन में अपनी अपनी स्वार्थगत कारणों द्वारा उपजे मत्सर के कारण यह गलत धारणा बनी थी कि दोनों में मनमुटाव था, जबकि वे एक दूसरे की बेहद इज़्ज़त किया करते थे. एक बार रफ़ी जी को किसी नें यह ज़रूर पूछा था कि क्या आपको के इस जलवे से मन में कोई मलाल है? तो उन्होनें हंसते हुए कहा था कि उनपर खुदा की नेमत है, वह बरकरार रहे. अपना अपना वक्त है.

मात्र एक बार उनमें किसी छोटी बात प्यार भरी तकरार ज़रूर हुई थी. रफ़ी साहब अक्सर किशोर कुमार को किशोर दादा कहते थे, जबकि किशोर दा ये सुनकर मन ही मन में चिढते थे कि रफ़ी तो उनसे उम्र में बडे हैं मगर फ़िर भी क्यों दादा कह कर बुलाते हैं.एक दिन बातों हीं बातों में उन्होने हल्के फ़ुल्के अंदाज़ में रफ़ी जी से अपनी शिकायत दर्ज़ कर ही दी. तो रफ़ी साहब नें बडे ही मासूमियत से ये कहा कि चूंकि बंगाली में दादा कहने का रिवाज़ है, इसलिये वे ऐसा कह रहे थे. बाद में दोनों खूब हंसे...

ये मासूमियत, ये खूलूस, ये स्नेह भरे प्यार के बंधन के दर्शन क्या आज की पीढी के गायकों में देखे जा सकतें हैं? गलाकाट प्रतिस्पर्धा नें उन भावनाओं को, संवेदनाओं को दरकिनारा कर दिया है, जो रफ़ी और किशोर नाम के उन सच्चे कलाकारों में कूट कूट कर भरे हुए थे.

काश, वे दोनों आज भी होते????????

Thursday, May 28, 2009

दिल का हाल सुने दिल वाला.. मन्ना दा के गीतों पर कार्यक्रम

मेरे आवाज़ की दुनिया के मित्रों,

आज तक आप मेरे साथ यहां तक आये, संगीत के सुरों के शीतल बयार में हमने अपनी दिल की प्यास बुझायी उन सदाबहार हिंदी फ़िल्मी गीतों से. साथ ही आप हमखयाल हुए उन गीतों से जुडे हुए सृजनकार स्वर ऋषियों की जीवनी से, मेथडोलोजी और अलग अलग विधाओंके पहलुओं से. हम रू ब रू हुए कई गायक और गायिका कलाकारों से , जिनके अथक परिश्रम से हम पा पाये ऐसे नायाब गीत जिन्हे हमने अपने सुरीले जीवन का एक हिस्सा बना रखा है.

जीवन की आपाधापी में, विशेषकर इन दिनों जब मैं अपने इजिप्ट के प्रोजेक्ट के सिलसिले में काफ़ी बाहर हूं, और आप सभी की मुझसे जो अपेक्षायें है, (यदि हैं),जो मैं पूरा नहीं कर पा रहा हूं. वैसे अपने इस प्रोजेक्ट के केस में सृजन की पराकाष्ठा को छू रहा हूं, फ़िर भी इन गीतों का सहारा मिल ही जाता है, कभी बीच में ड्राईंग बनाते बनाते हुए कुछ सुरीला सुन लिया, और दिली सूकून हासिल कर लिया.

मगर अब ये ब्लोग जगत भी दिली सूकून देने लग गया है. मन भागता रहता है पोस्ट करने को. मगर हालात होती है उस बल्लेबाज़ की तरह जो आऊट ओफ़ फ़ोर्म रहता है. कुछ भी लिख पाना समयाभाव की वजह से और वो भी लिखने पढने लायक,बडी़ ही टेडी़ खीर है.Hats Off to all those fellow Bloggers who manage this Herculean Task!! Indeed !!!

तो जैसा कि आपको पिछली बार लिखा था , मैं आज से वह शृंखला शुरु करने की अनुमती लेना चाहता हूं जिसमें मैं बीच बीच में अपने प्रोग्राम की विडियो या ऒडियो क्लिपिंग दिखाऊंगा. कार्यक्रम का नाम था दिल का हाल सुने दिल वाला - जिसमें मन्ना डे के गीतों को पेश किया गया था.

कुछ दो तीन सालों पहले हुए ये कार्यक्रम हुआ था इंदौर में, जो मेरे एक स्वनामधन्य मित्र की प्रयोगधर्मी संस्था श्रोता बिरादरी के बेनर तले हुआ था, जिसके सदस्य होते हैं वे सभी श्रोता जो अच्छे और सुरीले संगीत की गहरी पकड रखते हैं विशेष कर पुरानी फ़िल्मों का संगीत . ये समाज के सभी तबकों से चुन चुन कर स्वयं मेनिफ़ेस्ट होते है और इनके सामने सोच समझ कर ही गाया जा सकता है. ना कोई फ़ीस ना कोई सदस्यता की फ़ोर्मेलीटी, बस महिने के किसी एक शनिवार को शाम को ठीक छः बज कर पचपन मिनीट पर पुराने संगीत पर कोई अनोखे फ़ोर्मेट में, किसी अनोखी थीम पर मात्र देड घण्टे का प्रोग्राम होता था.कभी दुर्लभ गानों के रिकोर्ड या केसेट को सुनवाया जाता था,तो कभी किसी गायक गायिका या संगीतकार की जन्मदिन या पुण्यतिथी पर उसके चुने हुए गीत गाये जाते थे मधुर स्वरों के गायक और गायिकाओं से.

अमूमन सभी कार्यक्रमों की एंकरींग का ज़िम्मा वहन करते थे हमारे प्रदेश के प्रख्यात संस्कृतिकर्मी मेरे अनुज मित्र श्री संजय पटेल , जो अपनी वरेण्य वाणी के सन्मोहन से सभी श्रोताओं के दिलों को एक सूत्र में पिरोने का महत कार्य बखूबी किया करते थे, (अब भी करते है). हर गीत से पहले उसकी पृष्ठभूमी को , उसकी तकनीकी बारिकीयों को यूं पेश करते थे कि श्रोता उस गीत के रंग में खुद ब खुद रंग जाता था कि कलाकार का काम आसान हो जाता था.

साथ ही साथ ,उनके स्पष्ट ,धीर गंभीर आवाज़ का जादू श्रोताओं के साथ खुद कार्यक्रम पेश करने वाले कलाकारों पर भी खूब तारी होता था, और उनके हौसला अफ़ज़ाई की वजह से कलाकार अपने हुनर को कमाल की हद तक जाकर पर्फ़ेक्शनिस्ट की तरह पेश करता था.और क्या चाहिये एक सफ़ल और मुकम्मल प्रोग्राम के लिये.कई सालों से हम दोनों स्टेज पर एक साथ अपने अपने हुनर की सुरभी बिखेरते आ रहे है, और इंशा अल्लाह , आगे भी करते रहेंगे.

इस कार्यक्रम में सभी गीत गाने का सौभाग्य मुझे मिला था और मेरा साथ युगल गीतॊम के लिये दिया था सुश्री शीला वर्मा, और सुश्री प्रियाणी वाणी.

कार्यक्रम का प्रारंभ किया एक भक्ति गीत से -

तू प्यार का सागर है...

जो फ़िल्म सीमा के लिये शैलेंद्र जी ने सरल भावपूर्ण शब्दों मे लिखा है, और संगीत बद्ध किया है शंकर जयकिशन जी नें.

सुनिये और आनंद लिजिये...

Thursday, February 5, 2009

तू है मेरा प्रेम देवता, रफ़ी , मन्ना डे और नैय्यर

कडी़ - २
जब हम ओ पी नैय्यर के गानें सुनते हैं तो ये बात तो निर्विवाद सत्य है ही कि उनकी संगीत शैली, धुनों का Dynamics,सुरों के कोर्ड्स की विविधता, लय की मस्तानी चाल आदि अन्य संगीतकारों से एकदम हट के थी.साथ ही , हिंदुस्तानी तथा पाश्चात्य वाद्यों के माकूल उपयोग की विविधता भी आम चलन से अलग थी.

जैसे कि क्लेरिनेट के दो अलग अलग नोट्स या मोटी पतली आवाज़ का बांसुरी के साथ प्रयोग, सारंगी और सितार का फ़डकता पीस देकर मादकता की हद तक ले जाने का प्रयास, वातावरण की निर्मिती के लिये संतूर का आलाप के साथ ब्लेंडिंग, ढोलक और वन टू वन टू रिधम का अनूठा संगम, स्थाई/अंतरे और इंटरल्युड का गजब का मिक्सिंग, अपने आप में दीवाना बनाने के लिये काफ़ी था.

मगर साथ ही, उनकी शास्त्रीय रागदारी पर नियंत्रण भी हमें कई गीतों में नज़र आता है. हालांकि ऐसे गाने कम ही थे, और वे खुद ये बात कबूल करते थे कि उनकी शास्त्रीय संगीत की कोई विधिवत तालीम नहीं हुई थी.बावजूद इसके, उनकी गीतों में कहींभी कोई कमी नही रह जाती थी.

इसीलिये जब कल्पना फ़िल्म के लिये एक महत्वपूर्ण गाने का इंतेखा़ब किया गया तो कई जानकारों की भौंहें उठ गई थी कि देखें क्या गुल खिलाते है नय्यर साहब.त्रावणकोर बहनों के भरत नाट्यम की शानदार शास्त्रीय नृत्य शैली को दर्शाने के लिये इस गीत की ज़रूरत मेहसूस की गई -

तू है मेरा प्रेम देवता....

बिलाशक, रफ़ी जी तो नैय्यर साहब की पहली चाइस थे ही, क्योंकि आप देखेंगे कि फ़िल्म दो उस्ताद में राज कपूर के लिये भी वे मुकेश जी की जगह रफ़ी जी की आवाज़ के लिये अड़ गये थे (एरिरा राका राका का बाका,तू लडकी मैं लडका..).

तो साथ में दूसरे स्वर के लिये निसंदेह मन्ना दा का चयन तो होना ही था.तो फ़िर बनी वह कालजयी संगीत कृति इसको बनाने के लिये नैय्यर साहब नें भी बहुत मेहनत की.

बताते हैं कि रफ़ी साहब जब भी किसी गाने की रिकॊर्ड़ करने स्टुडियो पहूंचते थे तो तो अक्सर वे अपने पास एक इत्र के कुप्पी रखते थे और वहां मौजूद सभी व्यक्तियोंको खुशबू से तर बतर कर देते थे, गोया उनके मदहोश कर देने वाली आवाज़ से कोई कमी रह जाती हो.मगर उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.शायद इस गाने की गंभीरता को भी दोनों गायक बखूबी समझ रहे थे, तो इसीलिये काफ़ी रियाज़ के और तालीम के बाद ये गाना रिकॊर्ड किया गया.रिकोर्डिंग से पहले रफ़ी साहब साज़िंदों को कितना सन्मान देते थे वह इस बात से पता लगता था फ़ाईनल टेक से पहले वे स्वयं वाद्यवृंद समूह के पास जा कर सभी को बडी़ विनम्रता से कहते थे कि ज़रा सम्हाल लेना !!

ओ पी नय्यर की समस्या कुछ और भी थी. आवाज़ की गोलाई, रियाज़, सुरों पर पकड़ ,आदि सभी विधाओं में ये दोनो गायक कहीं भी एक दूसरे से कमतर नहीं थे. मगर उन दोनों की आवाज़ में जो अलग अलग कण था , अंदाज़े बयां या Timbre था उसके अनुरूप ही बंदिशें , ताने, या आलाप का सुर संयोजन होना ज़रूरी था, क्योंकि दोनों की पूर्ण क्षमता का और व्यक्तिगत खूबीयों का इज़हार प्रस्तुत गाने में होना लाज़मी था.

बखुदा , कितना मुश्किल , कठिण काम था जो नय्यर साहब नें आत्म विश्वास और हिम्मत से अंजाम दिया कि दोनों गायकों के सहित सभी उपस्थित जानकारों ने उनको खूब सराहा.

इस बात की कठिनता मैंने भी तब महसूस की जब पिछले दिनों जब मन्ना दा पर आधारित कार्यक्रम - दिल का हाल सुने दिल वाला - में मुझे इस गाने को पेश करने का मौका मिला. संयोग और सौभाग्य कहिये, इस कार्यक्रम में सिर्फ़ मैं ही गायक था, स्वाभाविक था कि दोनों गायकों के बोल मुझे ही गाने थे.

चलिये आज मैं एक आत्म अनूभूति या अंतरंग के अनुभव को ईमानदारी से आपके साथ बांटना चाहूंगा, जब मैंने इस गीत के लिये इन दोनो दिग्गज गायकों की गायन शैली को गहनता से समझने की कोशिश की.वैसे इन दोनों को अलग अलग गीतों के ज़रिये कई बार गाया था, मगर शास्त्रीय रंगों से तरबतर इस अनूठे मगर बेहद क्लिष्ट या कठिण इस गीत में दोनो के साथ न्याय करना मेरे जैसे की औकात के बाहर थी.


वैसे उन दिनों भारतीय फ़िल्म संगीत के आकाश पर जो सुरीले सितारे चमक रहे थे, उनकी आवाज़ में और अदायगी में फ़र्क हुआ करता था. मुकेश की नासिकोत्पन्न दर्द भरी आवाज़ से हेमंत कुमार की बेस लिये हुए हमिंग आवाज़ हो या किशोर कुमार की कडक और खनक लिये हुए आवाज़ से तलत मेहमूद की कोमल और लर्जिश भरी मखमली आवाज़ हो,एक पृथक पहचान लिये हुए ध्वनिरूप आपके मानस के सामने आ जाता है.मगर उस अनुपात में रफ़ी और मन्ना डे की आवाज़ में फ़र्क होने के बावजूद काफ़ी समानता भी थी.

इसलिये अपने सीमित स्वरविवेक से मैने ये पाया कि जहां मन्ना दा की धीर गंभीर आवाज़ में माधुर्य और स्वरों की गोलाई का और हरकतों का उनके अनोखी स्टाईल में उपयोग किया , वहां रफ़ी जी ने पाक निर्मल , जवां (Youthful) और सधी हुई मीठी सी आवाज़ में सीधे सच्चे तानों के सुर लगाये, और इस बात की बानगी दी कि गायकी की रेंज में और मेलोडी भरी अदायगी में शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत भी कितनी आसानी से गाया जा सकता है.पर्दे पर दोनों नायिकाओं में से कोई भी जीता हो,मगर इस गाने में भारतीय फ़िल्म जगत के दो महानतम गायक संपूर्ण रूप से जीत के भागीदार बनें.

तो मेरे संगीत के सुरीले सफ़र के साथियों, जैसा कि आपका आग्रह था, कि मैं इस संगीत गोष्ठी में अपनी आवाज़ में भी कुछ प्रस्तुत करूं तो आपको मसर्रत हासिल होगी.तो दिलीप के दिल के साथ अब ये दिलीप के सुरों से ये गीत सुनाता हूं.

अब इस प ध नि सा के बाद के आंठवें सुर को पेश करते हुए बिस्मिल्लाह करता हूं. इस कार्यक्रम में मेरे साथ सूत्रधार हैं, मेरे अज़ीज़ और अज़ीम फ़नकार श्री संजय पटेल जिन्होने एंकर की विधा को नये आयाम दिये.

(गाने में एक बात आप नोट करें - चूंकि इससे पहले एकदम अलग पृष्ठभूमी का और स्टाईल का गीत - आओ ट्वीस्ट करें गाया था. इसलिये, इस शास्त्रीय स्वरों से भरपूर गीत के लिये स्वरों को मन में उतारने के लिये थोडा़ समय लिया. दूसरा, इस गीत की मुश्किल बंदिश की वजह से इसे मात्र एक अंतरा गा कर समाप्त करने की योजना थी, मगर ऐन समय पर गीत के उस सत्चिदानंद स्वर समाधी का हल्का सा एह्सास होने की वजह से गीत को पूरा गाया गया.

आंठवा सुर..



अगले कडीं में - ओ पी नय्यर, रफ़ी, और गुरुदत्त ...

Friday, January 2, 2009

ना जाने तुम कब आओगे- रफ़ी और नौशाद - Musical Legends

कडी़ - १

पिछली बार मैंने आप से वादा किया था कि रफ़ी साहब के साथ भारतीय फ़िल्म जगत के एक महानतम संगीतकार जनाब नौशाद अली के बारे में कुछ लिखूंगा.

वैसे आप लोग तो मेरे वादों से तंग आ गये होंगे. मुझे याद है, मैने ’दिलीप के दिल से ’ की संगीत ब्लॊग यात्रा शुरु की थी तो बाकायदा रफ़ी साहब के लिये एक Structured , योजनाबद्ध लेखमाला शुरु की थी. आपमें से कई लोगों के लिये अब भी शायद उसे पढना अच्छा लगे.

मगर , भावुकता और प्रेमवश और साथ ही में तिथियों के लिहाज से अलग अलग विषयों पर लिखना शुरु किया.कभी समय अभाव रहा तो अधिकांश ब्लॊग समय से लेट ही लिख पाया.वैसे मैंने सोचा था कि समय पर सभी लिखेंगे, अगर मैंने बाद में भी लिखा तो क्या, ठीक तो लिखना ही पडेगा.

तो देखा आपने, मैने पहले भी रफ़ी जी पर ७ पोस्ट लिख डा़ले है, और एक पोस्ट थी रफ़ी और नौशाद का अज़ीम शाहकार - मधुबन में राधिका नाचे रे...

(http://dilipkawathekar.blogspot.com/2008/08/blog-post_14.html)

अभी पिछले हफ़्ते २४ दिसेंबर को रफ़ी साहब का और २५ दिसेंबर को नौशाद जी का जन्म दिन था. तो ये पोस्ट उन दोनों के नाम समर्पित है.आगे भी वही पुरानी प्लानिंग के हिसाब से चल देंगे, सिर्फ़ एक उस पोस्ट को लिख कर जिसका वादा किया था - एस.डी.बर्मन,गुरुदत्त, प्यासा,हेमंत कुमार ,साहिर, रफ़ी सबसे जुडा एक संस्मरण.( फ़िर वादा..वादा तेरा वादा..)

रफ़ी और नौशाद ये दोनो नाम एक दूसरे के पूरक रहे हैं इसमें कोई शक नही. रफ़ी साहब नें तो इतने सारे संगीतकारों के साथ काम किया, मगर नौशाद नें रफ़ी के अलावा बाकी गायकों के साथ अनुपात से कम ही काम किया.इसके बारे में नौशाद नें हमेशा कबूल किया था कि उनकी धुनों को सबसे बेहतर सिर्फ़ रफ़ी ही गा सकते थे.

अब देखिये ना. सन १९४४ में किसीने रफ़ी जी को नौशाद जी के वालिद से मिलवाया और उन्होने नौशाद जी के लिये एक शिफ़ारशी खत लिख कर दिया. नौशाद नें उसका मान रखते हुए रफ़ीजी को एक कोरस गीत में सबसे पहले चांस दिया -

पहले आप (१९४४)जिसमें उनके सह गायक थे दुर्रानी, श्याम कुमार, अल्लाउद्दिन, मोतीराम आदि.गाने के बोल थे -

" हिन्दोस्तां के हम है, हिन्दोस्तां हमारा, हिंदु मुस्लिम दोनों की आंखों का तारा " .

चूंकि उन दिनों माईक एक ही हुआ करता था, सभी गायक उसे घेर के खडे हुए. सैनिकों पर फ़िल्माये इस गीत के मार्चिंग रिदम के लिये सभी गायकों को आर्मी के बूट पहनाये गये और ओरिजिनल ध्वनी रिकोर्ड की गयी.१९ वर्ष के रफ़ी के पैरों में छाले पड गये थे. मगर वो था उनके करियर का आगाज़, और वे थे एक उदियमान कलाकार,क्या बोल पाते?

मगर यहां एक बात जो कम लोगों को मालूम होगी बताना चाहूंगा, जिससे, रफ़ी जी के निर्मल और गर्व रहित चरित्र का दर्शन होता है.वह उस समय की बात है, जब वे फ़िल्मी संगीत के सर्वश्रेष्ठ और मशहूर पार्श्वगायक हो गये थे, और लगभग ६०% से ज़्यादा के अनुपात में उन्हे गीत गाने को कहा जाता था.

लगभग सन १९६४-६५ की बात थी, जब संगीतकार मदन मोहन फ़िल्म हकीकत के लिये एक भावुक प्रसंग का समर गीत रिकॊर्ड कर रहे थे जिसमें रफ़ी जी के साथ मन्ना डे,तलत महमूद और भूपेन्द्र भी सह गायक थे.

होके मजबूर मुझे , उसने भुलाया होगा...

उस समय तो निस्संदेह रफ़ी साहब का नाम ऊंचाईयों पर था.मगर परेशानी फ़िर भी वही थी, एक ही माईक. उस पर संयोग ये कि बाकी सभी गायक उनसे कद में थोडे लंबे ही थे. तो परेशानी ये दर पेश आयी कि माइक को किसके हिसाब से एड्जस्ट किया जाये? अब रफ़ी साहब के हिसाब से एड्जस्ट करते हैं तो बाकीयों को परेशानी, और रफ़ी जी से कहने का सवाल ही नही पैदा होता था ऐसा उनका स्टेटस था उन दिनों.

मगर सरल और निश्छल मन के रफ़ी साहब ने खुद ही ये सुझाव दिया कि वे बाकी सभी के हिसाब से हाईट फ़िक्स कर दें, और वे किसी तरह से किसी स्टूल पर चढ कर गा लेंगे. तो साहब, आनन फ़ानन में स्टूल ढूंढा गया, मगर एक मिला भी तो थोडा छोटा पडा, जिससे रफ़ी साहब माईक से फिर भी नीचे ही रह गये. फ़िर भी रफ़ी साहब नें पूरे रिहल्सल में और फ़ाईनल टेक तक उस स्टूल पर चढ कर गाना रिकॊर्ड करवाया. और कमाल देखिये उनकी आवाज़ के थ्रो या एनर्जी लेवल का कि उनके स्वरों में और गले की जादुगरी की गहराई में कोई कमी नहीं आयी.(उन दिनों इतनी सारी तकनीकी मदत नही मिला करती थी)

(प्रस्तुत चित्र उसी गानें की रिकोर्डिंग का है )

अभी कुछ सालों पहले, जब भूपेन्द्र नें लता मंगेशकर पुरस्कार समारोह मे बतौर कलाकार एक कार्यक्रम देनें इन्दौर आये थे, तब इस बात की पुष्टि स्वयम उन्होने की और कहा कि उनमें बडे़ कलाकार होने का कोई भी दंभ नहीं था. निसंदेह , उस समय के उपस्थित सभी गायकों में वे सबसे शीर्ष पर थे, मगर मन्ना दा,और तलत मेहमूद को पूरी श्रद्धा और इज़्ज़त देते थे और यही ज़ज़बा इन मूर्धन्य कलाकारों के व्यवहार में झलकता था.उस दिन ये दोनों भी काफ़ी असहज से थे ये देख कर कि इतना बडा कलाकार उनकी वजह से स्टूल पर खडा हो कर गाने में नहीं हिचकिचा रहा है.

(इस गीत पर कभी और लिखूंगा - स्वर पक्ष और संस्मरण पर- फ़िर एक वादा- !!!!)

आप सभी ये बात तो जानते ही होंगे कि रफ़ी, किशोर दा, हेमंत दा, मुकेश, लता सभी सेहगल साहब के दिवाने थे, और दिल के अंदर एक सपना पाल के रखा था सहगल के साथ गानें का, मगर संयोग ये रहा कि सिर्फ़ रफ़ी जी का ही ये सपना पूरा हो पाया ,जब नौशाद जी नें ही दुबारा रफ़ी को मौका दिया सहगल के साथ गानें में फ़िल्म शहाजहान में ( १९४६) जब मजरूह द्वारा लिखे गये गीत " रूही रूही रूही, मेरे सपनों की रानी " में उन्हे दो लाईन गाने का मौका मिला.

मगर असल में रफ़ीजी को वास्तव में एक असली पार्श्वगायक बनने का जब उन्हे नौशाद साहब नें ही फ़िर मौका दिया फ़िल्म अनमोल घडी में (१९४६)- तेरा खिलौना टूटा बालक जिसमें रफ़ी जी नें गायकी के साथ अदायगी का भी एक नया रंग भरा पार्श्वगायन की विधा में, और फिर शुरु हुआ एक नया युग.

आप मेरी बात से सहमत होंगे कि इसके पहले के सुपर गायक सहगल जब गाते थे तो वे केवल अपने ही गाने पर पार्श्व गायन करते थे जो फ़िल्म के उनके चरित्र पर सूट करती ही थी. मगर जब बाद में पार्श्व गायन का ज़माना आगे आने लगा तो ज़रूरत पडनें लगी ऐसे गायकों की जो अलग अलग अभिनेताओं के अलग अलग चरित्र से ना केवल मेल खाये, गीत सुनते हुए श्रोता के मन में गायक और अभिनेता एकरूप हो जायें. रफ़ी साहब नें अपने अलग अंदाज़ से फ़िल्म इंडस्ट्री का चलन और फ़िल्मी गीतों का स्वरूप ही बदल गया, जिसे बाद में अन्य मूर्धन्य गायकों नें भी अपनाया और हमें इतनी अच्छी अच्छी कालजयी संगीत रचनाओं से धन्य धन्य कर दिया.

मगर नौशाद साहब को रफ़ी जी को खोजने और बनाने का श्रेय ज़रूर जाता है, और ये वे ही तो थे जिन्होने ये पाया कि रफ़ी साहब की आवाज़ में ना केवल मधुरता थी, या दमदार थ्रो था, मगर उनकी आवाज़ में गज़ब की रेंज थी, ऊंचाई थी. उनकी आवाज़ की कशिश और दर्द की रवानी तो थी ही ,मगर उनके गले में जो जादुई हरकतें थी,जो तानें और आलाप का नियंत्रित मेनिफ़ेस्टेशन था, वो तो कुछ और ही बंदिश या धुन मांगता था. नौशाद जी नें ये चेलेंज स्वीकार किया और हमें ऐसी धुनें दीं, जो उनके उन दिनों की कम्पोझिशन से अलग थी- फ़िल्म मेला (१९४८) - ये ज़िन्दगी के मेले .

फ़िर क्या था , सन १९४९ से एक से एक मधुर गीतों की झडी लग गयी- दुलारी, अंदाज़, चांदनी रात, दिल्लगी & So On....नौशाद ही वे संगीतकार थे, जिन्होने भारतीय संगीत की मेलोडी को गीतों में ढा़ला, शास्त्रीय रागों और लोकगीतों के अनमोल खज़ानों को आम आदमी के दिलों के भीतर उंडेल कर रख दिया, जिसके लिये हम उनके बडे ही शुक्रगुज़ार है.उनकी एक एक धुन मानों स्वरोंकी कशीदाकारी किये हुए पैरहन है.

आज ही विविध भारती पर नश्र किये गये एक कार्यक्रम में खुद लता जी ने क्या खूब कहा - कि पहले हमारे संगीतकार जो गीत रचते थे उनमें गायक या गायिका का गाना प्रधान होता था, और रिलीफ़ देने, या स्वरों के अम्बियेन्स को और खुलाने के लिये ऒर्केस्ट्रा हुआ करता था. आजकल तो ऒर्केस्ट्रा प्रधान और सर्वोपरी हो गया है, और गायक को रिलीफ़ के लिये डाला जाता है. नौशाद साहब उस स्कूल के संगीतकार थे.

एक और दिलचस्प बात.फ़िल्म अंदाज़ में नौशाद जी नें पहली बार लताजी के साथ एक ड्युएट गवाया रफ़ी जी के साथ- यूं तो आसपास में .. .क्या आपने नोट किया? इसे राज कपूर पर फ़िल्माया गया और दिलीप कुमार के लिये मुकेश जी नें गाया.( मैने ये फ़िल्म नही देखी है, मगर सुना है.आप कंफ़र्म करें तो बेहतर होगा)

बाद में यही कॊंबिनेशन उलटा ही मशहूर हुआ ये आप सभी जानते है.

चलो , ये कडी़ यहीं विराम चाहती है, अगले अंक में नौशाद और रफ़ी जी के अनेक खुशनुमा और हृदयस्पर्शी संस्मरण ले आऊंगा, अगर इज़ाज़त हुई तो.

यहां उस गीत का एक अंश सुनवा रहा हूं , जो रफ़ी साहब का प्रथम गीत था.

करीब ८ साल पहले इंदौर में रफ़ी साहब पर दिये गये एक कार्यक्रम- रफ़ी के अनेक भाव रंग मे प्रस्तुत करने के लिये मेरे आग्रह पर श्री संजय पटेल नें ये गीत मेरे लिये लाने की ज़ेहमत उठाई थी - श्री सुमन भाई चौरसिया के रिकॊर्ड भंडार में से - तो उस की विडिओ से निकाल कर यहां पेश कर रहा हूं.जीवन की सबसे बडी़ दुखद बात ये रही कि मेरे गायकी का इतना बडा लंबा सफ़र मैने वैसे तो मधुबन में राधिका नाचे गीत से सात साल की उम्र में किया, मगर बाद में संयोग से या दुर्भाग्य से, रफ़ी और नौशाद का एक भी गीत चाहते हुए भी स्टेज पर नही गा सका. ( सुहानी रात ढल चुकी- शायद एक बार गाया था)

तो सुनिये ’ हिंदोस्तां के हम है, हिन्दोस्तां हमारा....’

Wednesday, October 8, 2008

संगीत का आशावाद...(Optimism in Music) बनाम कानसेन/तानसेन

जोग लिखी संजय पटेल की के चिठ्ठे पर अभी अभी एक बेहद रोचक किंतु शिक्षाप्रद लेख पढ़ कर अभी अभी आया हूं(दोबारा).

श्रोता की खसलत कार्यक्रम का सत्यानाश कर देती है !

श्री संजय पटेल नें इस एक ही लेख में ’कानसेन’ और ’तानसेन’ को मुखातिब हो बड़ी ही सच्चाई और खुलूस से जो बात कही वह कहीं भी पढने को नही मिली, कम से कम मुझे तो.

आप इस लिन्क पर जा स्वयं पढ़े और फ़िर लौट के आयें यहां, थोड़ी चर्चा और करनी हो तो, क्योंकि बात बड़ी समझदारी की है. आपमें से कईयों ने तो वहां जाकर यह पोस्ट पढ़ भी लिया होगा .मैनें तो अपने आप से बिस्मिल्लाह किया है,सुधरने की इस प्रक्रिया में.
"http://joglikhisanjaypatelki.blogspot.com"

अब विस्तार से. थोडा़ समय लूंगा, माफ़ करियेगा.

उन कानसेनों के लिये जो अपने आप को बड़ा तानसेन समझते है - जो इस आत्ममुग्धता के वलय में ही रहते है,और ये निर्णय लेते हैं कि चूंकि वे अच्छे (?) गायक या वादक या कला के किसी भी माध्यम में दखल रखते हैं, इसलिये उन्हे यह अधिकार पहुंच जाता है, कि वे संगीत के अच्छे डॊक्टर हो गये है. हो भी सकते है, उनमें से कई होंगे भी , मगर तब तो उन्हे यह बात और जान लेना चाहिये कि कलाकार नें बड़ी मेहनत से अपना जो हुनर पेश किया है, उसके सकारात्मक पहलू में जा कर आप कुछ अच्छा ले सकते है, उससे कुछ पा सकते है तो क्या हर्ज़ है.मगर दुख की बात ये है, कि वह कानसेन (श्रोता) अपने साथ अपने तानसेन को भी ले जाता है,जिसका भूत उसके कान और सर पर चढ़ कर बोलता है. (कर्ण पिशाच्च ?!!).

मगर ऐसे सरस्वती पुत्रों को शायद यह अभिशाप ही है, जो मैनें अपनी संगीतयात्रा के दौरान अनुभव किया, कि इस मानसिकता के पीछे कारण होता है उनकी वह डाह या मत्सर जो इन टिप्पणीयों मे प्रतिध्वनित होता है कि भला इसकी कमीज़ मेरे कमीज़ से सफ़ेद क्यों ? कोई भी माई का लाल किसी भी गायक/गायिका की नकल शत प्रतिशत नहीं कर सकता. उनका जलाल आना तो संभव ही नही. मगर जैसा की संजय भाई के इस लेख पर की गयी एक टिप्पणी में यह बात बड़े गंभीरता से कही गयी है, कि किसी भी सूरत में लाईव्ह मेहफ़िल से बेहतर श्रवणानंद कहीं और नहीं मिल सकता. टेप या सी ड़ी में भी नहीं ,या उसी कार्यक्रम को रिकॊर्ड़ भी कर लें तो भी. क्योंकि वहां, श्रोता का कलाकार से सीधा आत्मिक संबंध जुड़ जाता है.साथ में माहौल, और श्रोता सत्संग का संयोग भी.

तभी जाकर संजय भाई के इस लेख की प्रासंगिकता और अधोरेखित होती है कि,

ईमानदार श्रोता वह है जो रहमदिल होकर कलाकार की तपस्या का मान करे और सह्र्दय होकर उसकी कला को दाद देकर उसे नवाज़े; उसका हौसला बढ़ाए.



अब बात करें उन कानसेनों की जो स्वयं तो कला के क्षेत्र के मात्र प्रबंधन या पद की वजह से जुड़े होते है,जो कला के किसी भी क्षेत्र से वास्ता नहीं रखते , मगर स्वयं को महान समीक्षक कहलाने में नही अघाते.ये उन टिप्पणीकारों की तरह है, जिन्होने कभी हाथ में बल्ला नहीं पकड़ा, कभी स्टेडियम में धूप में जाकर तपे नहीं मगर, घर में टी व्ही के सामने बैठ कर कहते है, भैया ये सचिन को इस तरह से खेलना था. वहां सचिन की जगह अगर भाईसाहब होते तो क्या गुल खिलाते उसका ज़िक्र यहां नहीं !

ऐसा नहीं की सभी ऐसे हों . इनमें कई ऐसे भी होते है, जो बेहद अच्छे श्रोता और पारखी होते है, संगीत की काफ़ी बारिकीयां उन्हे पकड़ में आती भी हैं. उनके पास संगीत से, माहौल से जुडे़ रहने से और गुणी, नामचीन कलाकारों को सुनने का अनुभव होने से यह पात्रता और इज़्ज़त हासिल हो जाती है. मगर उन्हे भी यह हक़ हासिल नहीं होता कि वे कलाकार के प्रस्तुतिकरण को हिकारत से या उनके पूर्वग्रह ,पूर्वधारणा से आकलन करें क्योकि संजय भाई नें यह भी तो लिखा है- हर दिन भट्टी जमें यह किसी भी बावर्ची (cook)के लिये संभव नहीं.

मैं तो आगे बढ कर यह वेदना भी व्यक्त करूंगा की अगर आप निर्णायक भी हैं तो क्या आपको उन कलाकारों का मखौ़ल उडा़ने का हक पहुंच जाता है? उनकी प्रतिभा या प्रस्तुति में अगर कोई ख़ामी है भी तो इसकी जगह उन्हे उचित मार्गदर्शन देकर मनोबल बढा नही सकते ? क्या आप नये इंडियन आईड़ल के गायक गायिकाओं के चयन प्रक्रिया को देख रहें है? सभी जजेस गुणी है, अपने अपने क्षेत्र के शीर्ष पर भी है. मगर उनकी प्रतिस्पर्धियों की इस तरह अप्रतिष्ठापूर्ण (Derogatory) हंसी उड़ा कर क्या अपने आप को एक अच्छा इंसान साबित कर रहें है?

एक और किस्म के श्रोता की जमात से आपको मिलवाता हूं . मेरे वे साथीगण ज़रूर समझ जायेंगे इसकी पीड़ा , जो गायक भी है.इन फ़रमाइशी श्रोताओं को हमेशा हर स्थान पर , हर मौके पर गाने की फ़रमाइश करने का रोग है.किसी भी महफ़िल में ये अचानक उग आते है, और किसी भी मेहमान को (अगर गायक हो तो) तपाक से गाना सुनाने की फ़रमाईश कर ड़ालते है.अब उस बेचारे की परेशानी तो ज़रा समझें.उसका बिना किसी सुर या ताल की संगत बिना गाना सुना सकने में हिचकिचाना लाज़मी है, (अगर वह थोड़ा बहुत भी गाना स्टेज पर गाता आया हो).संगत की अनुपस्थिती के वाजिब कारण से उसके नानुकूर करने पर ये फ़रमाइशी लाल तो पीछे ही पड़ जाते है,और दीगर भीड़ को भी साध लेते है.अरे, भाई साहब , आप तो गा ही दिजीये, यहां कौनसा स्टेज कार्यक्रम चल रहा है.अब वो नही गाता है तो ये कहते है क्या भाईसाहब, आप भी भाव खाने लगे. अरे मेरे कहने पर तो बड़े बड़े गायक गा चुके हैं, आपको तो घमंड़ हो गया है.यदि वह गा देता है, और मजमा जमता नही है तो मुंह बना कर कहते है - अभी कमजोर है, फ़लां फ़लां के सामने तो कुछ भी नही..पता नही ये लोग किसी पार्टी में अगर तेंडुलकर को भी मिलेंगे तो कहेंगे, ज़रा कवर ड्राईव मारकर तो बताईये!!

इसीलिये संजय भाई नें जिस मुद्दे पर बारीकी़ से और बेबाक़ी से रौशनी ड़ाली है, हमें उससे सबक लेना पड़ेगा .पहले अपने को, बाद में अपने इर्दगिर्द संगीतप्रेमीयों को अच्छे श्रोता से जो अपेक्षित है उसकी समझ दें.

और जो संगीतप्रेमी नहीं है, उन औरन्गज़बों से तो कुछ भी अपेक्षित नहीं किया जा सकता मगर उनसे भी भिड़ना तो पडेगा ही. अभी कुछ सालों पहले रफ़ी जी की पुण्यतिथी पर लायंस क्लब में एक कलाकार को गवाने का प्रस्ताव जब मैंने रखा था तो एक पदाधिकारी नें यह कहा था कि किसी और को ही क्यों, खुद रफ़ी जी को ही बुला लो. मैं उस समय तो चुप कर गया, मगर अब तक राह देख रहा हूं कि वे खुद उपर जाकर कब रफ़ी साहब को आमंत्रित करते हैं!!

अब उस चिठ्ठे की अगली महत्वपूर्ण बात पर गौर करें. आपका थोड़ा वक़्त और लूंगा.



जनाब मेहंदी हसन साहब के साथ गुज़रे अनुभव से हर संगीत के साधक का सर श्रद्धा से झुक जायेगा.यही नम्रता और अपने फ़न की तरफ़ मेहनत और मुसस्सल ईमानदारी का जज़बा हम सभी संगीत प्रेमी और विद्यार्थीयों को एक पाठ पढा़ जायेगा.वाह , क्या बात है!

संजय भाई को यह सौभाग्य प्राप्त है, कि अपने संगीत के शौक और संस्कृतिकर्मी होने की वजह से इन्दौर या पूरे मध्यप्रदेश में आये करीब करीब हर बड़े संगीतकार, गायक, गायिका, फ़िल्मी हस्तीयां, और संगीत की क्षेत्र में जुड़े हर कामयाब व गुमनाम साधक को उन्होनें बड़े करीब से जाना है, पहचाना है. बतौर एंकर पर्सन वाणी पर उनका प्रभुत्व तो है ही, मगर उनका शब्द लालित्य उनके मिजाज़ की तरह ही सुरीला है.इसीलिये उनसे यह आग्रह भी है, कि हम श्रोताओं के इस खा़स समूह को वो इतनी इज़्ज़त बक्षें और ऐसे ही कुछ अंतरंग और सारगर्भित अनुभव से हमें और भी नवाज़ें, ताकि नई पीढी़ को भी इन मूल्यों से रू-ब-रू करवाया जा सके.

बात मैंने भी ज़रा लंबी ही कर दी. मगर क्या करूं , जब संजय भाई ने लेख में उन पहलूओं को जब छूआ तो उस खसलत को मैंने भी महसूस किया.उपर से पिछले इतवार को कुछ ऐसा ही वाकया या अनुभव मेरे साथ भी दर पेश आया तो मैं भी लिख पडा़.(वह कल..)



चलो एक बार फिर से अच्छे श्रोता बन जाये हम दोनों..

मन्ना दा के किसी महफ़िल में तबलची की खस्लत!! हंसियेगा नही, वह भी कलाकार है.
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