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Saturday, October 10, 2009

गुरुदत्त - एक संस्मरण -चौदहवीं का चांद


समय अभाव के कारण, पिछली पोस्ट थोडी देर से नश्र हुई, फ़िर एक दम संयोग से गुरुदत्त जी का स्मरण दिन आ गया. दोनों पोस्ट मिक्स हुई और बडी हो गयी. इसलिये उनका एक संस्मरण अब लिख रहा हूं, ११ ता. को , इसलिये क्षमा करें.

आपनें पिछली पोस्ट पढी ही होगी.( चौदहवीं का चांद हो) उस गीत पर एक और बात बतानी थी, मगर उसके पृष्ठभूमी के साथ, जो आशा है आप पसंद करें. इसे मैने स्व. गुरुदत्त की सगी बहन श्रीमती ललिता लाज़मी से बातचीत के दौरान सुना था.

किस्सा यूं है--


कुछ साल पहले इंदौर में हर साल होने वाले लता मंगेशकर पुरस्कार समारोह के आयोजन समिति के सदस्य होने के नाते मुझे मुंबई जाना पडा प्रसिद्ध संगीत निर्देशक श्री भुपेन हज़ारिका जी से मिलने . उन्हे मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उस साल के लता मंगेशकर पुरस्कार से नवाज़ा गया था. यह अवार्ड सन १९८३ से हर साल बारी बारी से एक गायक/गायिका और संगीत निर्देशक को दिया जाता है. इसमें पुरस्कृत कलाकार को अवार्ड की औपचारिकता के बाद अपना पर्फ़ोर्मेंस भी देना पडता है.सो, भुपेन दा से अनुरोध करना था कि वे अपने कुछ गीत गायें . अतः , यह ज़रूरी था कि उनके साथ कार्यक्रम की रूपरेखा और साज़िंदों की बातचीत तय हो जाये.

उन दिनों वे मुंबई में थे और स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे.उनकी आंखों का ऒपरेशन हुआ था, और वे प्रसिद्ध महिला निर्देशक सुश्री कल्पना लाज़मी के घर में रुके हुए थे. फ़ोन पर किसी महिला से बात हुई, जिसने खुद भुपेन दा से पूछ कर शाम को छः बजे का समय तय किया.

जब मैं वहां पहुंचा, तो एक अधेड , शालीन महिला नें दरवाज़ा खोला, और बडे आदर के साथ मुझे ड्राईंगरूम में बिठाया. कहा कि अभी अभी दवाई डाली है आंख में ,इसलिये आधा पौन घंटा रुकना पडेगा आपको. मैं मिलकर ही जाना चाहता था इसलिये वहां रखे हुए एक पुराने फ़िल्मफ़ेयर को लेकर पढने लगा.(संयोग से उस पर गुरुदत्तजी का चित्र था)

वह विदुषी देवी सी प्रतीत होने वाली महिला बाद में मेरे साथ ही बैठ गयी और हम ओकेज़नली एक दूसरे की तरफ़ देखते और वे स्नेहवश मुस्कान से मेरा स्वागत करती.हम कुछ बोल नहीं रहे थे.

फ़्लेट्नुमा वह घर बडे ही एथनीक स्टाईल में जमाया गया था( जैसे चमार की नज़र जूते पर ही पदती है, मेरी नज़र आंतरिक साजसज्जा पर पडी थी). मैने कौतुहुलवश उनसे पूछ ही लिया कि इस फ़्लेट का ईंटिरीयर डिज़ाईन किसनें किया है. वे हंस पडी, और उन्होने कहा मैंनें ही किया है. मैं कल्पना की मां हूं, ललिता लाज़मी.

मेरे दिमाग में एक दम सौ हेलोजन के बल्ब जल पडे़. अरे , ये तो वहीं है, ललिता आज़मी जो स्वर्गीय गुरुदत्त जी की बहन हैं!!और मैं पिछले आधा घंटे से यहां बेजान वस्तुओं में अपना दिमाग खपा रहा हूं.

मैं फ़िर सम्हल के बैठ गया, जैसे कि किसी मंदिर में देवी के समक्ष गर्भगृह में बैठा था.सौम्य, शांत और सरल व्यक्तित्व से जब रूबरू हुआ तो मन में याद आयी इसाक मुजावर द्वारा गुरुदत्त जी पर लिखी हुई वो पंक्तियां , जिसमें बताया गया था कि गुरुदत्त कितने अशांत, रेस्टलेस, अल्पसंतुष्ट कलाकार थे, और यहां बैठी उनकी बहन शांत सौम्य!!

मैं पूछ बैठा उनसे गुरुदत्त जी के चरित्र के इस आयाम से. वे मुस्काई, और सम्हल के बैठ गयी, गोया Interview दे रही हैं. मैने उन्हे सहज किया और सुनने लगा उनकी मीठी निर्झर वाणी से उनके संस्मरण..

भाई अशांत और रेस्टलेस ज़रूर थे क्योंकि वे पर्फ़ेक्शनिस्ट थे, इसलिये हमेशा असंतुष्ट और सेंसेटिव रहते थे अपने Creation के संदर्भ में. मगर मोटे तौर पर वे तकनीशियनों से ज़्यादह अपेक्षा रखते थे पर्फ़ेक्शन की,एक्टर्स की बनिस्बत. उनके केमेरामेन श्री मूर्ती से तो उनकी हर शॊट में झडप हुआ करती थी, और गरमा गरम वाद विवाद भी हो जाते थे.मगर कलाकारों से थोडे नर्मी से पेश आते थे. मगर जब बात खुद के acting की होती थी तो भी कम संतुष्ट होते थे. फ़िल्म प्यासा के एक सीन में उन्हे मज़ा ही नहीं आ रहा था, और दोपहर से चल रहा उनके अभिनय वाला शॊट ओ के ही नहीं कर रहे थे. सभी नें उनसे कहा कि आप थकें है, तो पॆक अप कर लेतें है, मगर वे मान ही नहीं रहे थे. रात को दस बजे कहीं जा कर माने कि अब कल सुबह करेंगे, और आश्चर्य की बात है, दूसरे दिन सुबह एक ही टेक में शोट ओ के हो गया.

वे बडे सेंसेटिव और संवेदनशील मन के कलाकार थे , और उन दिनों गीता दत्त और वहीदाजी के कारण वे बडे तनाव में रहते थे. फ़िर वे मुस्कुराके बोली , भाई का वहीदा जी से कुछ ऐसा वैसा रोमांटिक नाता नहीं था, जैसा कि अमूमन कहा जाता है.वैसे वहीदा जी उनके जीवन में बहार बन के ज़रूर आई.

वहीदा जी भी जब भी शोट देती थी तो संयोग ये होता था कि वे एक शॊट के बाद दूसरे रीटेक में ठीक नहीं करती थी और बाद में तीसरे शोट में फ़िर ठीक हो जाता था, तो इस alternative Shots के OK होने का राज़ नही समझ पाते थे भाई, और मज़ाक में वे वहीदा जी की खिंचाई भी कर दिया करते थे.

जिस दिन रात को उनका निधन हुआ, उसके कुछ दिन पहले ही उनसे फ़ोन पर बातें हुई थी, जब भाई बडे खुश थे और वे बता रहे थी कि उन्होने अभी अभी एक नयी फ़िल्म शुरु की थी बंगला भाषा में जिसका नाम रखा था गौरी, जिसमें गीता दत्त अभिनय करने वाली थीं और एक सीन भी पिछले दिनों शूट कर लिया गया था. गीता दत्त की सृजन धर्मिता की और बिगडे हुए वैवाहिक रिश्तों को बचाने के खातिर यह कदम उठाया था उन्होने.

उस मनहूस रात को वहीदा जी मद्रास(चेन्नई)में थी और मुझसे और कल्पना से रात को ही फ़ोन पर इधर उधर की बातें भी की थी.फ़िर देर रात(अल सुबह) अब्रार अल्वी का फ़ोन आया तो वह मनहूस खबर हमें मिली.

वातावरण में स्वाभाविक रूप से गंभीरता आ गयी थी. तब तक कमरे में से भूपेन दा का मेसेज आ गया था कि आप बेडरूम में ही आ जायें, तो बेहतर होगा. मैंने इस मोनोलॊग या एकतरफ़ा संभाषण को विराम देने के लिये या विषयांतर करने के लिहाज़ से कहा- आपको उनकी कौनसी फ़िल्म पसंद आयी, और कौन सा गान जिसका पिक्चराईज़ेशन आपके लिहाज़ से बढिया था.

वे बोली प्यासा और कागज़ के फ़ूल तो ALL TIME GREAT हैं , और गाने में वक्त ने किया क्या हसीं सितम का फ़िल्मीकरण तो लाजवाब है.
(इसके बारे में मैंने अपनी एक पोस्ट -गुरुदत्त - एक अशांत अधूरा कलाकार - संगीत को समर्पित एक प्रसिद्ध ब्लोग आवाज़ में पिछले साल ज़िक्र किया था जिसका लिंक है-

http://podcast.hindyugm.com/2008/10/remembering-gurudutt-genius-film-maker.html
मेरे ब्लोग पर भी आप गुरुदत्त पर चटका लगा कर देख सकतें हैं....

और दूसरा गाना था - चौदहवीं का चांद हो , या आफ़ताब हो...

इस गीत का ज़िक्र आते ही उनकी बुझी हुई आंखों में जैसे फ़िर चमक आ गयी, और वे इस गीत के बारे में बताने लगीं.

उन दिनों कलर फ़िल्मों का ज़माना आ गया था, और गुरुदत्त जी भी चाहते थे कि ये फ़िल्म भी कलर में बनें. मगर एक्विपमेंट्स आने में देरी के कारण, और डिस्ट्रिब्युटर्स की जल्दी के कारण उन्होने फ़िल्म Black & White में ही पुउर्ण की और ये गीत भी.साथ में फ़िल्म को सेंसर से भी पास करवा लिया.

मगर फ़िर उन्हे क्या सूझा, उन्होने इस गीत को फ़िर से शूट करनी की ठानी, वह भी कलर में, क्योंकि तब तक एक्विपमेन्ट आ गये थे.ये तय किया गया कि फ़्रेम से फ़्रेम, शोट से शोट कॊपी कर के वैसे ही फ़िर से शूट किया जायेगा, चूंकि पहले के B&W रशेस तो बढियां ही थे.

खैर, जैसा कि प्लान किया गया था, वहीदाजी को बुलाया गया, और शूटिंग बढिया तरीके से संपन्न हुई.चूंकि फ़िल्मी करण रंगीन था, बडे बडे आर्क लाईट्स,करीब रखे गये, जिसकी वजह से वहीदा जी का स्किन झुलसने लगा. तो बडी मुश्किल से आईस पॆक रख कर शूटिंग संपन्न की गयी.तो उनकी आंखे भी इसीलिये लाल हो गयी थी.फ़िल्म को फ़िर से सेंसर बोर्ड को भेज दिया गया.

मगर सभी तब भौंचक्के रह गये जब उन्हे मालूम पडा सेंसरबोर्ड नें फ़िल्म को पास करने को मना कर दिया क्योंकि उन्होने इस गीत को बडा ही हॊट (HOT) बताया!!!! भाई नें उन्हे समझाने की कोशिश की कि सब कुछ तो वही था एक कलर के सिवा. तो पता है, उन्होने क्या जवाब दिया?

कहा, वहीदा जी की आंखे बडी लाल हो रही हैं, और इस बात को उन्होने Sensual and Suggestive करार कर दिया!!

भाई उस दिन बडे हंसे थे.खैर फ़िल्म तो पास हो गयी, मगर ललिताजी नें कहा कि अगर वे सेंसर बोर्ड के सदस्य आज जीवित होंगे और आज की फ़िल्में देखेंगे तो तुरंत ही प्राण छोड़ देंगे!!!

चूंकि बात नार्मल हो चुकी थी मैं उस साश्वी के सानिध्य से उठकर भूपेन दा के कमरे में चला गया.

(इन संस्मरणों को याद करना याने पुरानी यादों की जुगाली करना. जिनके लिये ये कलाकार , उनकी कला और उनका कला के प्रति योगदान और समर्पण का थोदा बहुत भी महत्व है उसे यूं लगता है कि कुछ क्षण हमनें भी टाईम मशीन में जाकर उनके साथ बिता लिये हैं. यही तो हमारे लिये elixir है, च्यवनप्राश है!!!- क्या आप सहमत हैं?

चौदहवीं का चांद और सुहानी रात का जो मि़क्स और You Tube Video का लिंक पिछली पोस्ट पर डाला था वह चला नहीं था किसी के लिये. अतः फ़िर से लगा रहा हूं.



http://www.youtube.com/watch?v=tKlrQ4TMxTc

Friday, October 9, 2009

ए चौदहवी के चांद - सुहानी रात ढल चुकी है,, ना जाने तुम कब आओगे?



पिछला हफ़्ता बडा़ ही हट के गया.

याने पिछले हफ़्ते एक शब्द चांद बार बार कानों पर पडा़, क्योंकि बात साफ़ है.

पिछले हफ़्ते शरद पुर्णिमा की मदहोश रात थी.

सुनते आये हैं, कि इस रात को चंद्रमा से अमृत बरसता है. लगता है सही है, क्योंकि, पिछले कई सालों से बिना नागा, इस रात को संगीत के अमृत स्वर कानों में पडते रहते हैं. वातावरण में मस्ती, सुरीली तरन्नुम का आलम तारी रहता है.फ़िर रात को परमानंद की प्राप्ति - याने केशर पिस्ता युक्त गाढा दूध. बस और क्या चाहिये.

बस १ ता. से माहौल शुरु हो गया था. मैं जिस लायंस क्लब से जुडा हुआ हूं उसके तत्वावधान में शरद पूनम की संगीत रजनी हर साल की तरह से संपन्न हुई. इस दिन खास कर , पूणें से प्रसिद्ध पियानो एकोर्डियन के वादक श्री अनिल गोडे पधारे थे, जिन्होने अपने सुरीले साज से, और अपने हुनर के कमाल से इस बेजोड और बजाने में क्लिष्ट साज़ पर इतने पुराने गीत सुनाये कि बस मस्त कर दिया. अनिल जी हेमंत दा, तलत मेहमूद्जी,किशोर दा आदि के साथ देश विदेश में बजा चुकें हैं. पिछले साल पुना में मिले थे जब सुदेश भोंसले के साथ भी बजाया था.

मात्र एकोर्डियन और ढोलक,कांगो पर बजाये हुए मधुर गानों की बानगी तो लीजिये -

चांद सा रोशन चेहरा, सुहानी रात ढल चुकी , फ़ूलों के रंग से,डम डम डिग डिगा, रमैय्या वस्ता वैय्या , और भी कई.

एक और खुशनुमा बात यह थी कि मेरे अनुज - मित्र संजय (श्री संजय पटेल) भी इस कार्यक्रम में आये थे. अमूमन ऐसी संगीत रजनीयों में संजय जी का संगीत पर समृद्ध एंकरिंग और मेरे स्वर का भी संयोग जमा करता था पहले कई बार, मगर एक दो सालों से दोनों की व्यस्तता से ये ग्रह युति हो नहीं पा रही थी.इस दिन कुछ मित्रों नें छेड दिया, फ़िर हम दोनों भी औपचारिता को दूर कर, कुछ कुछ गा बैठे.

फ़िर लगभग हर दिन कोई ना कोई कार्यक्रम था ही. मगर दुख ये रहा कि शरद पोर्णिमा की रात को इंदौर में बारीश की वजह से चांद नहीं दिख पाया, और जैसा कि हमारे यहां परंपरानुसार रात को चांद को नैवेद्य नहीं चढाया जा सका.(प्रस्तुत चित्र में दूध और पूजा का पात्र - जिसमें ऐरावत का आकार बनाया गया है चावल से, और इस दूध के बर्तन को चांदी की तलवार रख कर चंद्रमा की चांदनी में रखा जाता है.

इसिलिये चांद, चंद्रमा, चंदा आदि शब्दों को लिये हुए गीतों की धूमधाम रही इन दिनों.

एक बडा ही अहम गीत मेरे ज़ेहन में गूंज रहा था इन दिनों, जिसने अपने सहज सरल संगीत स्वर संयोजन और रफ़ी साहब के अमृत भरे केशर पिस्ता युक्त दूध की मानिंद मीठे, सुरीले स्वर के कारण मेरे मन में, दिल में जगह बना ली थी, और दिन रात के अधिकतर क्षणों में मेरे होटों पर आ रहा था. सोचा था कि इन दिनों कहीं गा ही दूं तो मन की ये मस्ती प्रकट में मेनिफ़ेस्ट हो जाये. मगर मौका नहीं आया.है

अचानक किसी मित्र नें भेजा हुआ एक कराओके ट्रॆक मिल गया जो बाज़ार में मिल रहे ट्रेक से बेहतर था, तो बैठ गया रिकोर्डिंग पर, और कर डाली दिल की भडास पूरी.

मगर एक बात पर एकदम दिल झूम गया , वह ये कि, साथ में इसी राग से मिलता जुलता एक और सुरीला और मीठा गीत भी होटों पर कॆट्वाक करने लगा- सुहानी रात ढल चुकी , ना जाने तुम कब आओगे-.

तो बस एकदम इसी गाने के तीसरे अंतरे के वाद्य संयोजन के बेकग्राऊंड में इस गीत का अंतरा भी गाकर देखा. तो संयोग यूं बना कि यह प्रयोग भी उम्दा जम गया.

बस क्या था. सोचा , इसे आपके साथ भी शेयर करूं, आखिर दिलीप के दिल से जो भी स्वर निकलेंगे, आह या वाह, आप तो हमसफ़र हैं ही. तो बस सुनिये इस बार यह गीत...चौदहवी का चांद हो, या आफ़ताब हो.... और सुहानी रात ढल चुकी का मिक्स.(इसे रिमिक्स ना कहिये, क्योंकि उसमें ना जाने क्या क्या किया जाता है- जिसका ज़िक्र फ़िर कभी)




एक और आश्चर्यजनक संयोग ये रहा है कि अभी दो दिन बाद हमारे श्रद्धेय कलाकार , बेजोड निर्देशक गुरुदत्त जी की पुण्यतिथी है (१० अक्तूबर १९६४). जिस फ़िल्म के लिये ये टाईटल गीत बनाया गया था उस फ़िल्म के निर्माता भी गुरुदत्त ही थे.चूंकि यह फ़िल्म मुस्लिम परिवेश में फ़िल्माई गयी थी, गुरुदत्त जी नें इस फ़िल्म के निर्देशन के लिये जनाब मोहम्मद सादिक़ को ज़िम्मेदारी सौंपी. वे वो दिन थे जब अपने ज़माने की सबसे बडी प्रयोगात्मक फ़िल्म कागज़ के फूल की असफ़लता से गुरुदत्त जी काफ़ी निराश थे.

मगर हुआ यूं कि इस फ़िल्म नें सफ़लता के ऐसे झंडॆ गाडे कि कहा जाता था कि १०० फ़िल्मों के बराबर बिज़नेस किया, और गुरुदत्त को दिवाला होते होते बचा लिया.(उनका स्टुडियो भी बिकत बिकते बच गया)

हालांकि वे इसके पहले एस डी बर्मन दा और ओ पी नय्यर के साथ काम कर चुके थे, ये एक आश्चर्यजनक बात थी कि मुस्लिम परिवेश के लिये होते हुए भी उन्होने रवि जैसे संगीतकार को साईन किया बतौर संगीतकार, जिन्होने इस फ़िल्म के संगीत के साथ पूरा न्याय किया.(इसका कारण थे अबरार अल्वी, मगर मज़ेदार बात यहा भी ये है कि भले ही उनने गुरुदत्त जी की इतनी सारी फ़िल्मों में कहानीयां लिखी, मगर इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी सागर उस्मानी नें!!)

आपने अगर ये फ़िल्म देखी होगी तो आप ज़रूर गुरुदत्त जी के डिटेल्स , लखनौ की तेहज़ीब , परिधान , नपे तुले डिफ़ाईन किये हुए चरित्र और उनके मेनरीझ्म की बारिकी में गये होंगे और दाद देने को जी चाहता होगा आपका.हालांकि निर्देशन मोहम्मद सादिक का था , इस फ़िल्म में गुरुदत्त का ही स्टांप था. और तो और सभी गाने शत प्रतिशत गुरुदत्त जी नें ही फ़िल्माये थे, जो उनके फ़ोटोग्राफ़र श्री वी के मूर्ती नें कबूल की थी.

तो अब देखिये भी उस इम्मोर्टल , कालजयी गीत का विडियो भी, जिसमें वहीदा जी का मूर्तिमंत सौंदर्य, अलसायी हुई लाल डोरे लिये आंखें, गुरुदत्तजी का सुकून भरे दिल से उस खूबसूरती की तारीफ़ में रोमांटिक अंदाज़ में इस गीत को गाना, और साथ में खुद मोहम्मद रफ़ी साहब की शहद से भी मीठी, सुरीली, और सात्विक स्वर एक ऐसा आलम तारी कर देते हैं कि पाकीज़गी से भरे इस हुस्न का ये नशा बिन पिये ही आपके रूह में कब दाखिल होकर आपको मदमस्त कर देता है, इसका होश भी आपको नहीं रहता.

(बिना शादी शुदा मित्र गण मुआफ़ करेंगे, क्योंकि उन्हे पता ही नहीं है कि अभी क्या बाकी है उनकी ज़िंदगी में, और शादी शुदा मित्र भी मुआफ़ करेंगे, कि दर्दे दिल छेड दिया गया है, और आप को नोस्टाल्जिया के गहरे समंदर में डुबा दिया गया है. अगर तैर कर ऊपर आ सकते हो तो आ जाईये, और डूबना हो तो मेरे साथ हो लिजिये......)



गुरुदत्त जी और इस गाने के बारे में एक रोचक संस्मरण बताये बगैर नहीं रह सकता, जिससे आप हंस पडेंगे - मगर यह पोस्ट काफ़ी लंबी हो गये है. मेनेजमेंट का खिलाडी हूं इसलिये सभी मिठाईयां एक साथ नहीं परोसूंगा.

तो दस तारीख को फ़िर पधारें गुरुदत्तजी की पुण्यतिथी के दिन , तो यह भी आपके साथ शेयर करूंगा.

शब्बा खैर!!

Friday, August 21, 2009

रफ़ी साहब और किशोरदा - प्यार का मौसम....





जैसे ये जो सावन का महिना चल रहा था, उसमें पवन के सोर करने के अलावा अन्य विशिष्ट रेखांकित करने जैसी बात ये है कि इस अगस्त में कई त्योहारों नें हमारे धार्मिक परिवेश में ,हमारी दिनचर्या को भक्तिरस और उल्ल्हास के रौनक भरे क्ष्णों से नवाज़ा है.जैसे रक्षा बंधन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी , और राष्ट्रिय पर्व स्वाधिनता दिवस आदि.

मगर उसी प्रकार , ये महिना हमारे फ़िल्मी संगीत की सुरीली दुनिया में भी अहम स्थान रखता है. इसकी बानगी तो जाते जाते ३१ जुलाई ही दे गया जब कि हमारे हरदिल अज़ीज़ मोहम्मद रफ़ी जिअसे फ़नकार को हमसे जुदा किया, जब सावन के बादल भी वर्षा के बूंदों की जगह खून के आंसू रोया होगा. वैसे ही २७ अगस्त भी पास ही आने वाला है, जब हमारे लाडले रूहानी गायक मुकेश भी हमसे हमेशा के लिये रुख्सत हो गये.कल २१ अगस्त के मनहूस सोमवार को २००६ में उनकी सुरमई शहनाई हमेशा के लिये खामोश हो गयी थी.

हां, ये ज़रूर हुआ कि हरफ़नमौला कलाकार गायक किशोर कुमार को हमे ४ अगस्त को उनके जन्म दिन पर भी याद कर रंजो गम के इस मेले में कुछ रौनक लगाई.अभी अभी गुलज़ार जी नें भी अपने जन्मदिन पर अपनी बगिया के फ़ूलों से बहार खिलाई थी.

इसलिये आप पायेंगे, कि राष्ट्रिय पर्व की तरह हम सभी फ़िल्मी गीतों के शौकीन इन कलाकारों को इन दिनों शिद्दत से याद करते है, उन्हे अपनी भावनांजली पेश करते है, और फ़िर एक बार उनसे मुहब्बत की लौ को टिमटिमाये रखते हैं.

३१ जुलाई के आस पास हर जगह रफ़ी साहब को याद किया गया, और ४ अगस्त के आपपास किशोरदा को. एक कार्यक्रम में मैने ज़रूर शिरकत की थी , मगर बतौर गायक के नहीं, मगर स्पेशलिस्ट एंकर की तरह.(जाने माने एंकरपर्सन या उदघोषक श्री संजय पटेल किसी कारणवश उसमें नहीं जा सके तो मुझे बोला गया. मगर विकेट के आगे खेलनेकी आदत होने की जगह विकेट के पीछे कीपर बनने का खास अनुभव नही था).

मेरे एक करीबी शिष्य बनाम मित्र चिंतन बाकीवाला (K For Kishor- 2nd Runner Up) तो उस दिन खंडवा में गौरी कुंज में पूरा दिन बिताया जहां किशोर दा रहते थे और उत्सवी माहौल में शाम को विनोद राठोड के साथ गीतों की प्रस्तुति दी.


चिंतन तो पूर्णतयः किशोरमय हो गया है. बातचीत का लेहजा, ट्रेट्स,देह भंगिमा, देह भाषा आदि किशोरमयी हो गयी है. आकहिर क्यों ना हो, नागेश कूकनूर नें किशोर दा की जीवनी पर एक फ़िल्म घोषित की है, जिसमें वह किशोर दा का रोल निभायेगा. .पूरा खंडवा उन दिनों फ़ेस्टिवल मूड में रंग गया था.मध्य प्रदेश सरकार नें भी किशोर सन्मान पुरस्कार मय एक लाख की राशि से इस साल गुलशन बावरा को सन्मानित किया(मगर दुखद निधन की वजह से उस कार्यक्रम का क्या हुआ यह पता नहीं चला).

वैसे पिछले साल यह पुरस्कार मनोज कुमार को दिया गया. अब ये तो भगवान ही जानते हैं कि किशोर दा और मनोजकुमार में क्या साम्य है, क्योंकि पता चला था मुंबई में हुई निर्णायकों की बैठक में हमारे गुणी निर्णायक सिर्फ़ समोसा खा कर चले गये थे, सही कर.

अब मुकेश जी पर कार्यक्रमों की गहमा गहमी चल ही रही है इंदौर में.आज भी एक कार्यक्रम था , और पूरे हफ़्ते दो या तीन और हैं. हम तो बस अंधेरे कमरे में , लेपटोप की धीमी रोशनी में यही गाये जा रहे हैं कि

हमे क्या जो हर सू ,उजाले हुए हैं....
के हम तो अंधेरों के पाले हुए है...
(रफ़ी साहब )

दरसल कुछ साल पहले तक , श्री संजय पटेल अपने धुन के दीवाने इन सभी महान हस्तीयों को किसी ना किसी बहाने श्रोता बिरादरी के जाजम पर याद कर लेते थे, और खाकसार को भी ( ऐसा ही कुछ लिखा जाता है दोस्तों!!)ये फ़क्र हासिल हुआ था कि इन फ़नकारों को अपने तहे दिल से इज़हार ए अकीदत अपने सुरों के माध्यम से पेश कर सकूं. इन दिनों यह सब अब एक ख्वाब सा ही रह गया है. संजय भाई नें किसी वृहद मकसद से इन कार्यक्रमों से दूरी बना ली है(खुदा करे ये क्षणिक हो), और अपने राम के तो काम के कारण आराम के लाले पडे हुए है. सोचा था कि रफ़ी साहब के लिये इतना कुछ है लिखने को कि हर रोज़ भी लिखूं तो मुकेश जी की पुण्यतिथी तक लिख सकता हूं. हमारे एक साथी सुनील करंदीकर जी नें तो प्यार भरा फ़तवा ही निकाल लिया है , कि उनपर कुछ लिखूं.किशोर दा पर कार्यक्रम में भी कुछ बोला ही था, मगर यहां भी आपकी जाजम पर कुछ नही लिख सका.अभी गुलज़ार के जन्म दिवस पर भी कुछ मन बना था, मगर टांय टांय फ़िस्स!!

हां , ये ज़रूर किया है, कि एक गीत रिकोर्ड किया है, जो एक साथ रफ़ी जी और किशोर दा को मेरी स्वरांजली होगी.(मदन मोहन जी के समय पर भी आप सभी मित्रों का ये आग्रह था ही कि उनपर भी कुछ गा कर ही सुनवाया जाता. मगर लेट लतीफ़ी के कारण ये अब बाद में.

तुम बिन जाओं कहां...
के दुनिया में आके , कुछ ना फ़िर, चाहा कभी, तुमको चाह के....

अब इस गीत को अलग अलग रफ़ी जी नेम और किशोर दा नें गाया, और आप सुनेंगे तो फ़रक मेहसूस होगा अदायगी में, गले के टिंबर में, और हरकतों , मुरकीयों में.

रफ़ी जी की शहद भरी साफ़ आवाज़ में रोमांस का ज़ज़्बा , और जवानी की मस्ती का नूर झलकता है, और राहुलदेव नें धुन में गोलाईयां की जगह बनाई है.वहीं किशोरदा की आवाज़ में इस गीत में एक पहाडी़पन परिलक्षित होता है, जिसमें गंभीरता और मेच्युरिटी के साथ साथ खडे सुरों का मिश्रण राहुलदेव नें बखूबी किया है, और हरकतों की जगह योडेलिंग के खूबसूरत फ़ाल्स नोट्स को बोया है, और सुरीली फ़सल काटी है.(उनका किशोर प्रेम जगजाहिर था).रफ़ी जी की मीठी आवाज़ में बास के साथ रेझो़नेंस था तो किशोरदा की आवाज़ में ट्रेबल के साथ नासिका की खनक भी थी.(मोटे तौर पर लता और आशा की आवाज़ के टिंबर से अनुभव करें)


मैंने कोशिश की है, कि एक ही गाने में दोनों के वर्शन गाकर सुनाऊं, मात्र एक विनम्रता के साथ किये गये प्रयोग की तौर पर- क्योंकि इस बात का कोई प्रमाणपत्र नही चाहिये कि दोनों की आवाज़ को कॊपी किया है,क्योंकि कॊपी से अधिक महत्वपूर्ण है उनकी सुरों को रेंडर करने की स्टाईल, और अपने अपने जोनर की खूबियों को गाने में ज़ज़बातों के साथ इंटरप्रेट करना.

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वैसे जानकारों को ये बता दूं कि योडलिंग को सबसे पहले रफ़ी साहब नें गाया था. उनके एक या दो गीत मैं अगली बार पेश करूंगा, क्योंकि वे मेरे पास केसेट में है.कहीं ये भी बताया जाता है, कि दक्षिण अफ़्रीका में गये अनूप कुमार नें यह सुना था और आकर अपने भाई को सुनाया था. कुछ भी हो, योडलिंग के लिये किशोर दा ही श्रेष्ठ हैं.

यहा ये विवेचन या तुलनात्मक विष्लेषण इस लिये नहीं किया जा रहा है, कि इन दों में से किसी को श्रेष्ठ ठहराया जाये. बस हम तो तथ्यागत वस्तुपरक शास्त्रार्थ कर रहें है, क्योंकि हमें तो दोनों की अज़ीज़ है, प्यारे हैं. ये गीत उन दिनों का हैं जब किशोरदा के नाम का परचम अपनी दूसरी इनिंग में अर्श पर फ़हरा रहा था, और रफ़ी जी को सीमित गाने मिलने लगे थे.

वैसे रफ़ी जी या मन्ना दा की तरह किशोरदा शास्त्रीय संगीत में निपुण नहीं थे, मगर एक नैसर्गिक गायक थे. इसीलिये बरसों बाद अमितकुमार को उन्होनें शास्त्रीय संगीत के लिये मन्ना दा के पास भेजा था.खुद किशोर दा रफ़ी जी की स्वार्गिक आवाज़ के दीवाने थे. एक बार जब उनसे मिलने का मौका मिला था, तब होटल के रूम में टेप पर वे रफ़ी जी का ही गीत सुन रहे थे. - मन रे तू काहे ना धीर धरे....

बाद में कहीं उन्होनें यह गीत गाया भी था.

रफ़ी जी के ज़नाज़े के समय किशोर दा घंटो उनके पार्थिव देह के पास पैरों पर बैठे हुए देखे गये थे.लोगों की मन में अपनी अपनी स्वार्थगत कारणों द्वारा उपजे मत्सर के कारण यह गलत धारणा बनी थी कि दोनों में मनमुटाव था, जबकि वे एक दूसरे की बेहद इज़्ज़त किया करते थे. एक बार रफ़ी जी को किसी नें यह ज़रूर पूछा था कि क्या आपको के इस जलवे से मन में कोई मलाल है? तो उन्होनें हंसते हुए कहा था कि उनपर खुदा की नेमत है, वह बरकरार रहे. अपना अपना वक्त है.

मात्र एक बार उनमें किसी छोटी बात प्यार भरी तकरार ज़रूर हुई थी. रफ़ी साहब अक्सर किशोर कुमार को किशोर दादा कहते थे, जबकि किशोर दा ये सुनकर मन ही मन में चिढते थे कि रफ़ी तो उनसे उम्र में बडे हैं मगर फ़िर भी क्यों दादा कह कर बुलाते हैं.एक दिन बातों हीं बातों में उन्होने हल्के फ़ुल्के अंदाज़ में रफ़ी जी से अपनी शिकायत दर्ज़ कर ही दी. तो रफ़ी साहब नें बडे ही मासूमियत से ये कहा कि चूंकि बंगाली में दादा कहने का रिवाज़ है, इसलिये वे ऐसा कह रहे थे. बाद में दोनों खूब हंसे...

ये मासूमियत, ये खूलूस, ये स्नेह भरे प्यार के बंधन के दर्शन क्या आज की पीढी के गायकों में देखे जा सकतें हैं? गलाकाट प्रतिस्पर्धा नें उन भावनाओं को, संवेदनाओं को दरकिनारा कर दिया है, जो रफ़ी और किशोर नाम के उन सच्चे कलाकारों में कूट कूट कर भरे हुए थे.

काश, वे दोनों आज भी होते????????

Friday, July 31, 2009

मूसीकी़ की हसीन दुनिया में चमकता हुआ आफ़ताब - मोहम्मद रफ़ी



शमा - ए - रफ़ी के परवानों .......

आखिर फ़िर वही मनहूस ३१ जुलाई आ ही गयी.

फ़िर वही मकाम आया है आज, जिससे गुज़रना हमारे दिलों पर फ़िर खंजर चलने से कम नहीं.आज ही के दिन हमारे मूसीकी़ की हसीन दुनिया में चमकता हुआ आफ़ताब गुल हो गया और छा गयी ऐसी तारीकी, कि आज तक हम उस उजाले के तसव्वूर में खुदी को भुलाये , खुद को भुलाये बस जीये जा रहे हैं.

बचपन से हमने जब भी होश सम्हाला, अपने को इस सुरमई शाहानः आवाज़ की मोहोब्बत की गिरफ़्त में पाया, जिसे मेलोडी या सुरीलेपन का पर्याय कहा जाता रहा है.हम मश्कूर हैं इस सुरों के पैगंबर के, जिसनें हमारे जवानी को , एहसासात की गहराई को , प्यार की भावनाओं को परवान चढाया, और हमें इस लायक बनाया कि हम उस खुदा के साथ साथ उसके अज़ीम शाहकार की भी इज़्ज़त और इबादत कर सके.

तब से आज तक वह नूरानी आवाज़ की परस्तिश सिर्फ़ मैं ही नहीं , आप सभी सुरों के दुनिया के बाशिंदे भी कर रहें है.काश होता ये कि मालिक हम सभी तुच्छ लोगों की ज़िंदगी में से कुछ दिनों को भी उनकी उम्र में जोड देते तो आज हम उस फ़रीश्ते की आवाज़ से मरहूम ना होते, और रोज़ रोज़ उनकी मधुर स्वर लहरीयों की छांव तले उस कुदरती मो’अजिज़ः को सुनते और बौराते फ़िरते.अभी वैसे भी मूसीकी़ के इस जहां में फ़ाकाकशी के अय्याम चल रहे है, और ऐसे में रफ़ी साहब की यादों में और उनके गाये हुए कालातीत गानों के सहारे ही मस्त हुए जा रहे हैं, अवलिया की तरह झूमें जा रहे हैं.

आपको पिछले साल रफ़ी साहब की पोस्ट पर बताया ही था कि मैने अपने गायन के शौक का आगाज़ किया था उम्र के सातवें साल में उस बेहतरीन गीत से जिसे नौशाद जी नें फ़िल्म कोहिनूर के लिये राग हमीर में निबद्ध किया था, और रफ़ी साहब में अपनी पुरनूर आवाज़ में चार चांद लगा दिये थे -

मधुबन में राधिका नाचे रे....

कृपया यहां पढें


(http://dilipkawathekar.blogspot.com/2008/08/blog-post_14.html)

उस दिन से रफ़ी जी के गानों का जुनून दिल में तारी हो रहा है.दिल दिन ब दिन हर गीत की गहराई में गोते खा कर नये नये आयाम खोज कर ला रहा है, हीरे मोती के खज़ाने निकाल रहा है. जैसे गीता को जितनी भी बार पढो उनती बार नये अर्थ निकल कर आते है, रफ़ी जी के गाये हर गीत को बार बार सुनने पर हर बार नया आनंद प्राप्त होता है.

आज सुबह साडे़ छः बजे जब विविध भारती पर भूले बिसरे गीत में एक गीत सुना तो लगा जैसे रफ़ी साहब के लिये आज कुदरत भी सुबह सुबह तैय्यार हो कर सलाम करने आ गयी है.

नाचे मन मोरा मगन तिकता धीगी धीगी.....

मैं रोज़ जहां सुबह घूमने जाता हूं (अमोघ का स्कूल - डेली कॊलेज , इंदौर...) ,उसके रास्ते में ये गीत सुना.और संयोग ये कि हल्की हल्की बूंदा बांदी हो चुकी थी, और फ़िज़ा में वही एम्बियेंस घुल रहा था .उस माहौल को मैने कॆमेरे में कैद कर लिया, जहां बदरा गिर आये थे भीगी भीगी रुत में . मोर भी अपनी प्रियतमा के लिये नहीं आज खास तौर पर स्वयं रफ़ी जी के लिये ही अपने मोरपंखों को फ़ैलाये नृत्य कर रहा था.

आईये , आप भी उस भीगे मौसम में भीगे मन से सराबोर होने आ जायें ,रफ़ी साहब की पुरकशिश आवाज़ में ये गीत भी सुनें और सुकून हासिल करें.

अगर इसे देखनें में असुविधा हो रही हो तो नीचे प्लेयर में देखें..



यकीन मानिये, इस फ़िल्म में कोई स्टॊक सीन नहीं है, बस आज प्रकृती नें भी रफ़ी जी के लिये अपना इज़हारे अकीदत पेश किया है.मानो रफ़ी जी के ही लिये ये पूरा महौल खास आज के लिये निर्मित किया गया हो.

आज से हम हर तीसरे दिन मुहम्मद रफ़ी जैसी शक्सि़यत पर कुछ ना कुछ लिखेंगे.कुछ दिल से दिल की बात करेंगे, और अपने अपने दिलों को सुरों के इस राह पर ले जायेंगे, जिसका रहनुमा भी रफ़ी जी हैं और मंज़िल भी रफ़ीजी . कि़यामत आती हो तो आने दो.

आईये, हम सभी श़ख्सी़ तौर पर उस पाक रूह की तस्कीन के लिये मिल कर दुआ करें, क्योंकि अब हमारे हाथ में दुआ करने के अलावा और कुछ भी नहीं जो उस श़क्स़ को नज़र कर सकें....

तेरे गीतों में बाकी़ अब तलक वो सोज़ है, लेकिन..
वो पहले फ़ूल बरसाते थे, अब दामन भिगोते हैं.......


(जावेद नसीम)

Sunday, May 10, 2009

तलत महमूद.. एक कोमल एहसास... दर्द की श्वेत श्याम तसवीर..


तलत महमूद,

जब भी तलत मेहमूद ये नाम हमारे ज़ेहन में आता है, तो हमारे यादों की खिडकीयों पर दस्तक देते हैं उनकी मखमली आवाज़ के मोरपंखी एहसासात.हमारा प्यासा मन खुद ब खुद, सुरों की इन हसीन वादीयों से टकरा कर गूंजते हुए दर्द भरे नगमों के समंदर में डूब जाता है.

अभी परसों तो उनकी बरसी थी.एक मित्र नें मेहफ़िल जमाई और देर रात तक उनके सभी गीत प्यार भरे, दर्द भरे सुनते रहे और फ़िर भी अतृप्त ही रहे.

आज कुछ और नहीं सिर्फ़ दिल की एक तमन्ना. इस महान गायक का एक गीत सुनाउं. गीत है फ़िल्म जहांआरा का

तेरी आंख के आंसू पी जाऊं....


मैं अब तक संकोच में ही था, कि क्या करूंगा अपने ही गीत सुना कर . फ़िर आप ही मित्रों में से एक सुरीले साथी नें सारथ्य किया और मेरे मन की दुविधा दूर कर दी. कहा, हम सभी अपने अपने हुनर को पेश करते हैं, जैसे कि कविता, लेख, कार्टून, चित्र आदि. फ़िर आप गाना अपने ही आवाज़ में क्यों नहीं. मगर मुझे ये भी पता है, कि जितने बुलंद और मधुर इन सभी गायकों के गीत होते है, हम सभी के ज़ेहन में गहरे बाबस्ता है, और कोई कुछ भी कर ले , यह अंतर पाटना किसी भी खां साहब के बस की बात नही, जब कि मैं एक अदना सा पार्ट टाईम गायक ,बिना किसी तालीम के. इस उत्तुंग हिमालय को लांघ सकने की सोच ही नही सकता. हां , इंजिनीयर हूं तो उसका ड्राईंग बनाए का प्रयास ज़रूर कर सकता हूं.

इसलिये ये कोशिश रहेगी कि सुरमई गीत भी चल निकले, गले से, दिल से, और हम सभी इस बात का खयाल ना रखें कि आवाज़ की कितनी सही कॊपी की गयी है. ये कतई कोई मिमिक्री नही है. यकीन मानिये, वह बहुत मुश्किल नहीं .मगर ज़रूर मेहसूस करें उस गीत की और महान गायक की मूल आत्मा और संगीतकार की सृजनता को, और स्वानंद की प्राप्ति करें.

तेरी आंख के आंसू पी जाऊं....




अभी एक और गीत सुना रफ़ी जी की कलेजे को भिड जाने वाली आवाज़ में..

चल उड जा रे पंछी .....

पहले ही आलाप में आर्तता की पराकाष्ठा ...

फ़िर सुना यही गीत तलत मेहमूद जी की कांपती हुई , दर्द की गहराई से निकलती हुई कोमल आवाज़ में. दोनों ही महान,मगर अंदाज़े बयां जुदा जुदा... साथ ही तलत जी का मुरकीयां लेने का एक विशिष्ट तरीका..

मैं तो लुट ही गया.

कंगाली के इस खूबसूरत आलम में दिल नें चाहा कि सिर्फ़ गुनगुनाऊं इन दोनों गीतों को तरन्नुम में, और गाने के शब्दों के उन भावों को , भावनाओं को नज़दीक से स्पर्श करूं.दोनों ही स्वर एक ही गीत के एक ही अंतरे में... मूल गीत आपने सुने ही होंगे, आज मुझे मौका दें..

चल उड जा रे पंछी...



Friday, May 8, 2009

शंकर जयकिशन, रफ़ी और मन्ना डे…

अभी आपने पिछली कडी में पढा़ था प्रसिद्ध संगीतकार जोडी के शंकर के जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में …

अभागे शंकर -(कृपया यहां पढे..)

हमारे एक टिप्पणीकार नें यह लिखा था कि इसमें से एक घटना को उन्होने किसी साप्ताहिक में पढी थी. वे सही हैं. जो भी हम यहां लिखते हैं, कहीं ना कहीं से हमे मालूम पडता ही है. चूंकि ये वस्तुस्थिती है, कि ये सम्भव नही कि हर घटना आपके सामने ही घटी हो. मित्रों, वैसे भी गायक , संगीत और गीत के बोलों के अलावा कुछ भी तो ORIGINAL नहीं.
आज हम कुछ और छोटी छोटी स्मृतियों के बारे में यहां ज़िक्र करेंगे. कुछ कहीं पढी हुई कुछ मित्रों द्वारा बताई गई:

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मोटे तौर पर ये बात बताई जाती है कि पहले कुछ सालों को छोडकर शंकर और जयकिशन नें हमेशा अलग अलग फ़िल्मों में संगीत दिया(भले ही नाम जोडी का दिया गया हो), जबकि दूसरे संगीतकार जोडी अपना काम यूं बांटते थे कि धुन एक बनाता था और अरेंजिंग दूसरा.(LP). और एक आश्चर्य की बात ओर मालूम पडी जिसे चेक करना पडेगा कि शंकर के लिये हमेशा हसरत जयपुरी लिखते थे और जयकिशन के लिये शैलेन्द्र!!!   ( जानकार बतायें कि क्या ये उनस भी १७१ फ़िल्मों के बारे में सही है , जिसके लिये इस जोडी नें संगीत दिया?)

पता है, सबसे पहला गीत जो शंकर नें रिकोर्ड किया वह था फ़िल्म बरसात में रफ़ी की आवाज़ में एकमात्र गाना – मैं ज़िंदगी में हर दम रोता ही रहा हूं…शंकर और बाकी सभी इस बात पर एकमत हुए थे कि ये गाना रफ़ी जी ही गायेंगे.मगर उन्हे ये डर था कि रफ़ी जी व्यस्तता के रहते हुए, उन जैसे नये संगीतकार जोडी के लिये गायेंगे या नही. मगर रफ़ी जी नें कोई शर्त नही रखी और ये गीत और बाकी सभी गीत बडे ही मकबूल हुए. बाद में तो इस जोडी नें रफ़ी  जी के साथ  अनगिनत हिट गानें दिये.  २१६ एकल गीत,११६ युगल गीत,९ मिश्र गीत = कुल ३४१ गीत.( लक्ष्मीकांत प्यारेलाल – ३६९)

कई सालों बाद जब फ़िल्म ब्रम्हचारी के लिये जयकिशन नें उनसे एक गीत दिल के झरोके में तुझको बिठा कर..के लिये एक अजीब फ़रमाईश की. उन्होने रफ़ी जी को आग्रह किया कि इस गीत का स्थाई (याने पहली लाईन) बिना सांस लिये लगातार गाये.(शंकर महादेवन का Breathless गाना याद है?) 

रफ़ी जी नें उनकी ये बात मानी और आप खुद सुनें कि पहली लाईन बिना सांस लिये गायी गयी है.रिकोर्डिंग के बाद हंसते हंसते  रफ़ी जी बोले, भाई याद है,आपके लिये मैंनें सबसे पहला गीत गाया था. अब आप मुझे यूं गवाते रहे अगला गाना गाने के लिये मैं ज़िन्दा ही नही रहूंगा और फ़िर लोग कहेंगे रफ़ी नें आपके लिये अपना अंतिम गीत गाया !!!

वैसे शंकर जयकिशन नये नये प्रयोग करते थे मगर रफ़ी जी भी कभी कभी मस्ती में आ कर कुछ अलग करते थे.फ़िल्म तुमसे अच्छा कौन है का गाना किस को प्यार करूं , कैसे प्यार करूं . तो गाना रिकोर्ड होने के बाद रिकोर्डिंग रूम से बाहर आ कर रफ़ीजी शंकर से बोले – इस गाने की रिकोर्डिंग एक और बार करते हैं. किसी को कूछ समझ नही आया.

मगर बाद में रफ़ीजी  नें कहा कि स्टुडियो में कुछ खूबसूरत लडकियों को बुलाया जाये और शर्त ये रहेगी कि उन से एक भी उनकी तरफ़ नहीं देखेंगी (Cheer girls of IPL?!!!!)

बस फ़िर क्या था. आनन फ़ानन में यूं जमाया गया, और गाने की रिकोर्डिंग फ़िर से कीग यी जिसमें रफ़ी जी नें उन सुंदरीयों की तरफ़ देखकर हाथों से मुद्रायें बनाते हुए पूरा गीत गाया जिसमें वह प्रभाव और आवाज़ में वह बिंदासपन कैसे झलका है ये आपने सुना ही है.

वैसे ही मिज़ाज़ के शौकीन शंकर नें फ़िल्म जंगली के गाने ऐयईय्या सूकू सूकू .. गाने मॆं ये बोल गाये है, फ़िल्म संगम के गाने दोस्त दोस्त ना रहा में पियानो बजाया है.

मैं इस बात से हमेशा  दुखी रहा   कि शंकर और लताजी के बीच में अनबन हो गयी थी(जयकिशन के साथ नहीं-याद है वे हसीं गीत – ओ मेरे शाहे खूबा…, तुम मुझे यूं…, तुम्हे याद करते करते ..) 

वैसे किशोर कुमार के साथ काफ़ी कम गीत  बनाये है इस जॊडीनें…

img0501(रिकोर्डिंग के समय)

अपने अंतिम दिनों मॆं जयकिशनकी मृत्यु के बाद शंकर के पास बहुत फ़िल्में नही आयी मगर वे LIVE concert  करते रहे, मगर इंडस्ट्री  में उनका वजन कम ही हो गया.

मुझे याद है ८० के दशक का वो वाकया, कि जब मैं एक बार मुंबई से इंदौर के लिये फ़्रंटियर मेल  मॆं चढा था (रतलाम तक), तो द्वितीय वर्ग के रिज़र्वेशन कोच में मैने एक musicians का ग्रूप देखा जिनके पास सभी instruments थे. इसमें से एक साथी मेरे पहचान का था जो इंदौर का था जिसनें मेरे साथ स्टेज पर कभी बजाया था .और साथ ही में आजके प्रसिद्ध संगीतकार की जोडी जतिन ललित  में से जतिन थे(शो अरेंजर के रूप में !!)

मुझे फ़िर ये भी बताया गया   कि इसी ट्रेन में खुद शंकर जी और शारदा भी जा रही थे, और तीसरे दिन  उनका दिल्ली में शो तथा बात ही बात में जतिन से पता चला कि इन सभी वादकों के समूह का रिज़र्वेशन तक नही हुआ था, सिर्फ़ टिकट थे. साथ में इन्हे जो बूक करके लाया था उसनें जतिन को  कोई एडवांस भी नही दिया था . जाहिर है ये बात मालूम होते ही अधिकतर वादक पसर गये, और उतरने की बातें करने लगे. जतिन  नें काफ़ी समझाया कि शंकर जी की इज़्ज़त दांव पर लगी है.मगर वे टस से मस नही हुए.

तब  मेरे युवा संवेदन मन को बडी ठेस पहुंची थी ये देख कर कि बंबई  में पैसे के आगे कोई भी बडा नाम  या हस्तीन हीचल ती जिसकी आप इतनी इज़्ज़त करते हैं .

इस बीच जतिन शंकर जी को बताने पहुंचे जो प्रथम वर्ग के केबिन में, तो मैं भी साथ हो  लिया , सोचा था कि मेरे फ़ेवराईट म्युज़िक डायरेक्टर से मुलाकात होगी. मगर अफ़सोस कि शंकर के  ये बात सुन यूं होश उडे के वे गश खाकर गिर ही पडे(उन्हे ब्लड प्रेशर का प्राब्लेम था ) शारदा नें  और हम ने बडी कोशिशों से उन्हे सम्हाला, और दवाई दे कर उन्हे सेटल किया. यहां तक कि ट्रेन रुकवाने की  नौबत आ गयी थी .

इसी बीच सूरत आ गया और देखते ही देखते सारे Musicians अपने अपने वाद्य लेकर उतर गये,और ग्रुप में रह गये सिर्फ़ जतिन और मेरा इंदौर का साथी.फ़िर क्या था. मैने मेरी बर्थ   ललित के साथ शेयर की, और वह दिल्ली निकल गया.मेरा साथी मेरे साथ इंदौर आया, और कुछ musicians दिल्ली ले गया, और सुना है, कि वहां कुछ और को साथ में लेकर शो हुआ था .आज जब भी वह वाकया याद आता है,तो दुख  होता है,कि  इस बंबई फ़िल्म ईंडस्ट्री में सभी चढते सूरज को सलाम करते है और जब ये सूरज़ ढलता है, तब उसे गर्त में धकेल दिया जाता है. जो व्यक्ति हमारे मनमें एक हीरो की तरह उसके साथ यूं बदसलूक दिल को चोट पहुंचाता है.(ऐसा ही वाकया बाद में  मेरे सामने महान संगीतकार जयदेव के साथ भी हुआ )
आज मैं यहां संगीतकार शंकर जयकिशन की एक सुंदर रचना को सुनाता हूं अपने ही  आवाज़ में. गीत है फ़िल्म दिल एक मंदिर का ….MV5BMTM2NjQ1Nzg2N15BMl5BanBnXkFtZTcwNDkyNjAzMQ@@__V1__SX96_SY140_

याद ना जाये ,बीते दिनों की…. 



इसे मूलतः रफ़ीजी नें गाया है, मगर यहां केरीओके (Karaaoke) की ट्रेक पर मैने गया है.मैं यहां अपने सुरीले साथियो को  बता दूं कि मैं मूलतः स्टेज का कलाकार हूं और ये घर पर ही amateurish Recording की गयी है.  गलती हो तो सुधी जन माफ़ करेंगें, और पसंद आया तो हौसला अफ़ज़ाई करें.इस माध्यम को भी उपयोग में ला कर देखें.

वैसे ये गीत मेरे दिल के  बहुत करीब है. वो इसलिये कि शंकर जयकिशन नें इस गीत में जैसे मेलोडी ठूस ठूस के भर दी है.मगर साथ में मन के अंदर  दर्द के धीरे धीरे हो रहे रिसाव को भी सुरों के माध्यम से बखूबी उभारा है. ऊपर से महागायक रफ़ी साहब के  एहसास भरे भीगे  स्वर .. ऊफ़्फ़ , आपकी और हमारी तो जान ही ले ली है.

और हां, जब दर्द भरे गीतों की जब बयार चली ही है,  तो याद आ गयी वो दिल की पीडा को बखूबी अभिव्यक्त करने वाली आवाज़  - मुकेश जी की ……..
और उनकी सरल , पाक साफ़ आवाज़ में , दिल की गहराई को  छू जाने वाला फ़िल्म यहुदी का ये गीत जिसकी  धुन में शंकर जयकिशनजी नें दुख की इंतेहा का जो आलम तारी किया है, वह दिल से भुलाये नही भूलता.वैसे इस गाने के लिये शैलेंद्र जी को फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड से  नवाज़ा जा चुका है.

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ये मेरा  दिवानापन है….



ये गीत मेरे किसी स्टेज कार्यक्रम का है, इसलिये ओडिटोरीयम   का प्रभाव आया है.
मन्ना डे - 

इस १ मई को इस महान गायक नें अपना ९० वां जन्म दिन मनाया. 


चाह कर ही उनके बारे  में प्लान करने के बावजूद पोस्ट नही लिख पाया. फ़िर भी इस लेट लतिफ़ नें vlcsnap-223198१ठान लिया है, कि अगली पोस्ट को छोड कर  मन्ना दा पर कुछ कडीयां लिखूंगा. और साथ ही में आप ही लोगों के आग्रह पर मन्ना दा के गीतों पर किये गये अपने एक स्टेज कार्यक्रम दिल का हाल सुने दिल वाला की क्रमवार गीत शृंखला का (विडियो) पेश करूंगा.

अगली पोस्ट नज़र है  मखमली आवाज़ के  शहेंशाह तलत मेहमूद पर जिनकी ९ मई को ११ वीं पुण्य तिथी है.तो एक दो गाने उनके भी …( ता.१० को )

Thursday, February 5, 2009

तू है मेरा प्रेम देवता, रफ़ी , मन्ना डे और नैय्यर

कडी़ - २
जब हम ओ पी नैय्यर के गानें सुनते हैं तो ये बात तो निर्विवाद सत्य है ही कि उनकी संगीत शैली, धुनों का Dynamics,सुरों के कोर्ड्स की विविधता, लय की मस्तानी चाल आदि अन्य संगीतकारों से एकदम हट के थी.साथ ही , हिंदुस्तानी तथा पाश्चात्य वाद्यों के माकूल उपयोग की विविधता भी आम चलन से अलग थी.

जैसे कि क्लेरिनेट के दो अलग अलग नोट्स या मोटी पतली आवाज़ का बांसुरी के साथ प्रयोग, सारंगी और सितार का फ़डकता पीस देकर मादकता की हद तक ले जाने का प्रयास, वातावरण की निर्मिती के लिये संतूर का आलाप के साथ ब्लेंडिंग, ढोलक और वन टू वन टू रिधम का अनूठा संगम, स्थाई/अंतरे और इंटरल्युड का गजब का मिक्सिंग, अपने आप में दीवाना बनाने के लिये काफ़ी था.

मगर साथ ही, उनकी शास्त्रीय रागदारी पर नियंत्रण भी हमें कई गीतों में नज़र आता है. हालांकि ऐसे गाने कम ही थे, और वे खुद ये बात कबूल करते थे कि उनकी शास्त्रीय संगीत की कोई विधिवत तालीम नहीं हुई थी.बावजूद इसके, उनकी गीतों में कहींभी कोई कमी नही रह जाती थी.

इसीलिये जब कल्पना फ़िल्म के लिये एक महत्वपूर्ण गाने का इंतेखा़ब किया गया तो कई जानकारों की भौंहें उठ गई थी कि देखें क्या गुल खिलाते है नय्यर साहब.त्रावणकोर बहनों के भरत नाट्यम की शानदार शास्त्रीय नृत्य शैली को दर्शाने के लिये इस गीत की ज़रूरत मेहसूस की गई -

तू है मेरा प्रेम देवता....

बिलाशक, रफ़ी जी तो नैय्यर साहब की पहली चाइस थे ही, क्योंकि आप देखेंगे कि फ़िल्म दो उस्ताद में राज कपूर के लिये भी वे मुकेश जी की जगह रफ़ी जी की आवाज़ के लिये अड़ गये थे (एरिरा राका राका का बाका,तू लडकी मैं लडका..).

तो साथ में दूसरे स्वर के लिये निसंदेह मन्ना दा का चयन तो होना ही था.तो फ़िर बनी वह कालजयी संगीत कृति इसको बनाने के लिये नैय्यर साहब नें भी बहुत मेहनत की.

बताते हैं कि रफ़ी साहब जब भी किसी गाने की रिकॊर्ड़ करने स्टुडियो पहूंचते थे तो तो अक्सर वे अपने पास एक इत्र के कुप्पी रखते थे और वहां मौजूद सभी व्यक्तियोंको खुशबू से तर बतर कर देते थे, गोया उनके मदहोश कर देने वाली आवाज़ से कोई कमी रह जाती हो.मगर उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.शायद इस गाने की गंभीरता को भी दोनों गायक बखूबी समझ रहे थे, तो इसीलिये काफ़ी रियाज़ के और तालीम के बाद ये गाना रिकॊर्ड किया गया.रिकोर्डिंग से पहले रफ़ी साहब साज़िंदों को कितना सन्मान देते थे वह इस बात से पता लगता था फ़ाईनल टेक से पहले वे स्वयं वाद्यवृंद समूह के पास जा कर सभी को बडी़ विनम्रता से कहते थे कि ज़रा सम्हाल लेना !!

ओ पी नय्यर की समस्या कुछ और भी थी. आवाज़ की गोलाई, रियाज़, सुरों पर पकड़ ,आदि सभी विधाओं में ये दोनो गायक कहीं भी एक दूसरे से कमतर नहीं थे. मगर उन दोनों की आवाज़ में जो अलग अलग कण था , अंदाज़े बयां या Timbre था उसके अनुरूप ही बंदिशें , ताने, या आलाप का सुर संयोजन होना ज़रूरी था, क्योंकि दोनों की पूर्ण क्षमता का और व्यक्तिगत खूबीयों का इज़हार प्रस्तुत गाने में होना लाज़मी था.

बखुदा , कितना मुश्किल , कठिण काम था जो नय्यर साहब नें आत्म विश्वास और हिम्मत से अंजाम दिया कि दोनों गायकों के सहित सभी उपस्थित जानकारों ने उनको खूब सराहा.

इस बात की कठिनता मैंने भी तब महसूस की जब पिछले दिनों जब मन्ना दा पर आधारित कार्यक्रम - दिल का हाल सुने दिल वाला - में मुझे इस गाने को पेश करने का मौका मिला. संयोग और सौभाग्य कहिये, इस कार्यक्रम में सिर्फ़ मैं ही गायक था, स्वाभाविक था कि दोनों गायकों के बोल मुझे ही गाने थे.

चलिये आज मैं एक आत्म अनूभूति या अंतरंग के अनुभव को ईमानदारी से आपके साथ बांटना चाहूंगा, जब मैंने इस गीत के लिये इन दोनो दिग्गज गायकों की गायन शैली को गहनता से समझने की कोशिश की.वैसे इन दोनों को अलग अलग गीतों के ज़रिये कई बार गाया था, मगर शास्त्रीय रंगों से तरबतर इस अनूठे मगर बेहद क्लिष्ट या कठिण इस गीत में दोनो के साथ न्याय करना मेरे जैसे की औकात के बाहर थी.


वैसे उन दिनों भारतीय फ़िल्म संगीत के आकाश पर जो सुरीले सितारे चमक रहे थे, उनकी आवाज़ में और अदायगी में फ़र्क हुआ करता था. मुकेश की नासिकोत्पन्न दर्द भरी आवाज़ से हेमंत कुमार की बेस लिये हुए हमिंग आवाज़ हो या किशोर कुमार की कडक और खनक लिये हुए आवाज़ से तलत मेहमूद की कोमल और लर्जिश भरी मखमली आवाज़ हो,एक पृथक पहचान लिये हुए ध्वनिरूप आपके मानस के सामने आ जाता है.मगर उस अनुपात में रफ़ी और मन्ना डे की आवाज़ में फ़र्क होने के बावजूद काफ़ी समानता भी थी.

इसलिये अपने सीमित स्वरविवेक से मैने ये पाया कि जहां मन्ना दा की धीर गंभीर आवाज़ में माधुर्य और स्वरों की गोलाई का और हरकतों का उनके अनोखी स्टाईल में उपयोग किया , वहां रफ़ी जी ने पाक निर्मल , जवां (Youthful) और सधी हुई मीठी सी आवाज़ में सीधे सच्चे तानों के सुर लगाये, और इस बात की बानगी दी कि गायकी की रेंज में और मेलोडी भरी अदायगी में शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत भी कितनी आसानी से गाया जा सकता है.पर्दे पर दोनों नायिकाओं में से कोई भी जीता हो,मगर इस गाने में भारतीय फ़िल्म जगत के दो महानतम गायक संपूर्ण रूप से जीत के भागीदार बनें.

तो मेरे संगीत के सुरीले सफ़र के साथियों, जैसा कि आपका आग्रह था, कि मैं इस संगीत गोष्ठी में अपनी आवाज़ में भी कुछ प्रस्तुत करूं तो आपको मसर्रत हासिल होगी.तो दिलीप के दिल के साथ अब ये दिलीप के सुरों से ये गीत सुनाता हूं.

अब इस प ध नि सा के बाद के आंठवें सुर को पेश करते हुए बिस्मिल्लाह करता हूं. इस कार्यक्रम में मेरे साथ सूत्रधार हैं, मेरे अज़ीज़ और अज़ीम फ़नकार श्री संजय पटेल जिन्होने एंकर की विधा को नये आयाम दिये.

(गाने में एक बात आप नोट करें - चूंकि इससे पहले एकदम अलग पृष्ठभूमी का और स्टाईल का गीत - आओ ट्वीस्ट करें गाया था. इसलिये, इस शास्त्रीय स्वरों से भरपूर गीत के लिये स्वरों को मन में उतारने के लिये थोडा़ समय लिया. दूसरा, इस गीत की मुश्किल बंदिश की वजह से इसे मात्र एक अंतरा गा कर समाप्त करने की योजना थी, मगर ऐन समय पर गीत के उस सत्चिदानंद स्वर समाधी का हल्का सा एह्सास होने की वजह से गीत को पूरा गाया गया.

आंठवा सुर..



अगले कडीं में - ओ पी नय्यर, रफ़ी, और गुरुदत्त ...

Thursday, January 29, 2009

चैन से हमको कभी, आपने जीने ना दिया... ओ.पी.नय्यर ..



रिधम किंग - ओ.पी. नैय्यर ,
कडी़ - १
-

कल उनकी पुण्य तिथी थी, २८ जनवरी को. अभी अभी दो साल ही तो हुए उन्हे हमसे बिछडे़.

फ़िल्मी संगीत की सुरीली दुनिया में कई संगीतकार हुए, जिन्होने अपनी अपनी प्रतिभा के बल पर हम संगीत प्रेमीयों को दिये नायाब खज़ानों की शक्ल में अलग अलग रागों में, emotions और संवेदना लिये हुए ढाई तीन मिनीट के गीत. जिनमें आप पाते है उस गाने का थीम या बेसिक खयाल, उसकी फ़िल्म में पूर्वपीठिका या वर्तमान स्वरूप, ज़ज़बात, मूड्स,मुख्त़सर से भावपूर्ण बोल जो गीतकार या शायर के जीनीयस मन की गहराई से निकले हैं, नवरसों को अपनी गिरफ़्त में लिये स्वरावली, गायक या गायिका का मेलोडी से भरपूर सुरीला अंदाज़, और सबसे महत्वपूर्ण उस संगीतकार के अपने SIGNATURE!!!

निसंदेह इतने सारे संगीतकारों में अपना अपना एक जुदा स्वर संयोजन होता है, जो अच्छे सुनकार बखूबी पहचान लेते है.ऐसी संगीतकारो की फ़ेरहिस्त में ओंकार प्रसाद नैय्यर का नाम शीर्ष पर है.

आपने सुना ही होगा उनकी रचनाओं में एक स्थाई भाव है हर गीत की रिदम. शास्त्रीय संगीत की कोई तालीम नही होने के बावजूद, उनकी पकड़ चलत वाले रिदम के गानों पर कितनी थी ये बताना नही पडेगा.इसीलिये उन्हे फ़िल्म इंडस्ट्री में रिदम किंग कहा जाता है.

पंजाब की नदियों के धारों सी अठखेलियां करती हुई ढो़लक की खींचती खींचती थाप,
(सुभानल्ला हसीं चेहरा, लेके पहला पहला प्यार, आईये मेहरबान,वो हसीन दर्द दे दो जिसे मैं गले लगा लूं...)

या तांगे में बैठ कर घोडों की टापों की लयकारी ,
(पिया पिया पिया मोरा जिया पुकारे, मांग के साथ तुम्हारा, ज़रा हौले हौले चलो मेरे साजना..)

या पाश्चात्य बीट्स से तली हुई हौले हौले आंच पर सीकी हुई ताल
(जाईये आप कहां जायेंगे,बंदा परवर थाम लो जिगर, मैं प्यार का राही हूं,ए दिल है मुश्किल जीना यहां....)

आपको नैय्यर साहब के हर गीत में मिल जायेगी. साथ में सारंगी की मींड भरी फ़ुहार, या क्लेरोनेट और म्य़ुट ट्रम्पेट की जुगलबंदी या सितार और फ़्ल्युट की बिजलियां एक जगह हो जायें तो नैय्यर की जादूगरी का कमाल आकार ले्ता था और हिस्ट्री बन जाती थी.(दीवाना हुआ बादल..)

क्या आपको सुनकर आश्चर्य नही होगा, कि सुबह की ओस की बूंदों के स्वर लिये गीत - आपके हसीन रूख पर में जहां पाश्चात्य संयोजन के लिये पियानो का उपयोग किया गया है, इंटरल्युड और अंतरे के संगम पर पृष्ठभूमि में कहीं पीछे आपको सारंगी का हलका हलका कंटिन्युटी नोट मिलता है, जो कमाल का है!!! ( ज़रा कान लगा कर सुनिये )

फ़्ल्युट का स्थाई स्वर तो है ही!!!

रफ़ी साह्ब के हसीन गलें से निकले इस नायाब मधुर गीत में आपको हर जगह बला की कशिश और शोखियां मिलेंगी और शबाब की बिजलीयों का अंडर करंट स्वरों की सुकून भरी तरन्नुम में आप यूं नहायेंगे जैसे कि सुबह सुबह किसी कुनकुने झरने से स्नान कर के आ रहे हों...


आज इस कडी़ में मैं एक अजीब सा संयोग बताना चाहूंगा जो दो साल पहले १६ जनवरी को उनकी जन्मतिथी पर घटा था.

मैं उस दिन मुंबई में था काम के सिलसिले में, और साथ ही मेरे बडे़ भाई साहब सुरेंद्र भैया के लडके अंकित को हिंदुजा अस्पताल में भरती किया गया था ब्रेन सर्जरी के लिये.सर्जरी के दूसरे दिन सुबह मैं और मेरे भैय्या अस्पताल के बाहर के किसी अच्छे रेस्टोरेंट में नाश्ता करने गये.

साथ ही के टेबल पर दो ६० के लगभग की उम्र के व्यक्ति बैठे थे और चर्चा का विषय था - ऒ पी नैय्यर . उन्होने बातों ही बातों में बताया कि उस दिन नैय्यर साहब का जन्म दिन था और वे बाद में उनसे मिलने उनके घर जा रहे थे.(वे हर साल जाते थे).

मैंने उत्सुकतावश कहा कि मैं भी जाना चाहूंगा, अगर उन्हे ऐतराज़ ना हो. उन्होने हर्ष से स्वीकार किया और हम निकले उनके नये ठिकाने थाना में , जहां वे विरार के बाद रहने आये थे.

दिल की धड़कनों को जब्त करते हुए जब हम उस घर की सीढी़ से उपर चढने लगा तो फ़िज़ा में संगीत की स्वर अणु बिखरे होने सा आभास मुझे होने लगा. ( य़े मेरा दिवानापन है, या मुहब्बत का सुरूर, कोई ना पहचाने तो है ये उसकी नज़रों का कसूर)

मैं रास्ते भर में लोकल में और फ़िर रिक्शा में उनके गीतों को गुनगुनाता आ रहा था, और नैय्यरमय हो गया था तब तक.

लेकिन खुदा को ये मंज़ूर नहीं था कि मेरा उनसे मिलने का सपना सच हो.वहां, जिनके घर में सबटेनेंट बन कर वो रह रहे थे उस युवा महिला में हमसे कहा कि वे अब किसीसे भी नहीं मिलते, और खासकर उनके जन्म दिन पर. इसलिये वे तारापोर के आदिवासी इलाके में सुबह से ही निकल गये है, जहां वे एक होमियोपेथी का क्लिनीक सा चलाते थे.

बडे ही मायूसी से उनके दर से हम निकल पडे़. जाते जाते उनके कमरे की खुली खिडकी में से उस रूम को देखा- कहीं कोई संगीत का साज़ या फ़िल्मी दुनिया से जुडी कोई यादगार ट्रोफ़ी या चित्र नदारद थे, सिर्फ़ टेबल पर पडी थी उनकी एक टोपी - जैसे के ज्वेल थीफ़ में देव आनंद नें पहनी थी.

उस टोपी को खामोशी भरा सलाम करते मैं सीढी उतर गया - ये गाते गाते -

चैन से हमको कभी, आपने जीने ना दिया...
ज़हर भी चाहा अगर पीना तो पीनी ना दिया....

बस दो हफ़्तों बाद अचानक ये खबर से सामना हुआ-

प्रख्यात संगीतकार ओ.का निधन............

Sunday, January 18, 2009

मेरी कहानी भूलने वाले, तेरा जहां आबाद रहे.., नौशाद और रफ़ी - अद्वितीय जुगलबंदी


कड़ी नं. २
नौशाद और रफ़ी

नौशाद और रफ़ी जी के अद्वितीय जुगलबंदी का जलवा जो मेला फ़िल्म के गीत से दुनिया के नोटीस में आया वह दुलारी फ़िल्म के गाने - सुहानी रात ढ़ल गई , ना जाने तुम कब आओगे? के बाद और परवान चढा़ और मोहम्मद रफ़ी का नाम हर फ़िल्मी गीत सुनने वाले की ज़ुबान पर चढ़ गया.

मैंने पिछली कडी़ में लिखा था कि जब सहगल के साथ रफ़ी जी नें गाया तो हर गायक की तरह रफ़ी जी पर भी उनकी गायन शैली का प्रभाव पडा़. या यूं कहें, उस समय का गाने का तौर तरीका या स्टाईल ही सहगल की शैली पर आधारित था.मगर रफ़ी साहब के गले का मूल Timbre या स्वर स्वरूप मीठास लिये साफ़ सुथरा था.उन्हे सहगल के धीर गंभीर खरज की आवाज़ जैसा बनाने के लिये बडा़ प्रयत्न करना पडता था. ये नौशाद ही थे जिनने रफ़ी की रेंज और तार सप्तक में(याने ऊपर के ऒक्टेव में)पूरी एनर्जी लेवल से गा पाने की क्षमता का आकलन किया और उसका उपयोग एक अलग शैली विकसित कर हम जैसे संगीत प्रेमीयों पर अहसान किया. बाद में इसी तरह लता जी नें भी नूरजहां या सुरैया की शैली से बाहर निकल कर स्वयं की साफ़ और मीठास भरी गायक शैली की पहचान बनाई. मैं यहां ये नहीं कहना चाहूंगा कि सहगल या नूरजहां की शैली में कोई खराबी या गलती नहीं थी, मगर फ़िल्मों की पेस या चाल की तरह गानों में भी लय, स्पीड बढी़, और उस नये वातावरण में रफ़ी की आवाज़ नें उस गॆप को बखूबी भरा.


इस बात पर नौशाद जी नें ये संस्मरण बताया था , कि रफ़ी जी भी खरज या लोवर ऒक्टेव में ही गीत गाते थे तो फ़िल्म दीदार के गानों की रिकोडिन्ग के दिनों में नौशाद नें रफ़ी से जब ये कहा की तुम्हारा आवाज़ खरज में यूं म्लान लगता है, जैसे की गला दबा रखा है. ज़रा खुल के गाओ, और गांभीर्य का पुट जरा हलका करो, ताकि जवां और अपरिपक्व नायक के नये चरित्र का प्रोजेक्शन हो सके.

रफ़ीजी को बात जंच गई.मगर उन्होनें नौशाद साहब से ही कहा कि आप ही कोई ऐसी धुन बनायें तो मैं उसे गाने की कोशिश कर सकूंगा.

तो उस कालजयी गाने की धुन नें जन्म लिया -

मेरी कहानी भूलने वाले, तेरा जहां आबाद रहे..

जब ये धुन नौशाद नें रफ़ी को सुनाई, तो पहली बार तो वे सुन कर एकदम अवाक ही रह गये, क्योंकि उससे पहले दिल्लगी, अनमोल घडी़ , मेला आदि फ़िल्मों की धुनों से ये तर्ज़ एकदम अफ़लातून ही थी.फ़िर भी रफ़ी ने ये चेलेंज सर आंखों पर लेकर रात दिन मेहनत की. कई बार नौशाद जी को फ़िर पूछा कि यहां समझ नही आ रहा है, कृपया फ़िर से बतायें. उस नई शैली के गीत को इस तरह कई बार मांजा गया, क्योंकि उस समय नौशाद नें वहां वहां थोडा़ मुरकी में या स्वरों के उतार चढाव में बदलाव किया जिससे रफ़ी जी के गले की तरलता की , लचीलेपन के अनोखे गुण से गीत के माधुर्य में मेलोडी़ में अद्भुत रसोत्पादन हो सके.साथ साथ वे रफ़ी जी के आत्मविश्वास को भी बढा़वा देते रहे.

आखिर एक दिन आया और रफ़ी जी नें कहा मैं तैयार हूं और आनन फ़ानन में दो तीन ट्रायल में ही गाना रेकोर्ड़ कर डाला!!
संयोग से इस फ़िल्म के नायक युसुफ़ दिलीप कुमार , निर्देशक नितिन बोस भी इस ध्वनिमुद्रण के समय एच एम वी के फ़्लोरा फ़ाउंटन के स्टुडियो में हाज़िर थे. जब रफ़ी रिकोर्डिंग खत्म कर रूम से बाहर आये तो दोनों नें रफ़ी जी को कस के गले लगा लिया, और कहने लगे कि ये गाना हिट होने से कोई भी नहीं रोक सकेगा.

उन दिनों गाना फ़िल्म के लिये ध्वनि मुद्रित तो होता ही था जो फ़िल्म के ओरिजिनल साउंड़ ट्रेक के हिसाब से बनाया जाता था, जिसमें तीन स्टॆन्झा होते थे .मगर साथ में 78 rpm की डिस्क जिसे हम रिकोर्ड कहते थे,के लिये भी अलग ट्रॆक रिकोर्ड होता था, क्योंकि सीमित जगह की वजह से अमूमन दो ही स्टॆंन्झा उसमें आ पाते थे. इसीलिये आप को मालूम ही होगा कि रेडियो पर या अधिक जगह पर वही संस्करण बाज़ार में सुना जाता था. बाद में जब लॊंन्ग प्लेयिंग रिकोर्ड का उद्भव हुआ तो वहां हम लोगों के लिये ओरिजिनल साउंड़ ट्रेक उपलब्ध होनें लगा.

तो उस समय उर्जावान गानें की आपाधापी में रिकोर्डिस्ट जी एन जोशी बोले, कि अभी समय है, अगर रफ़ी जी थक नहीं गये हों तो दूसरा वर्शन भी आज ही कर लें? रफ़ी जी नें तपाक से हां भर ली, और दूसरा वर्शन भी आनन फ़ानन में मुद्रित हो गया. तो जोशी जी जिन्होने इससे पहले कई गायकों को रिकोर्ड किया था ,नौशाद साहब से बोले- नौशादसहाब, ये नौजवान गायक तो निराला ही है, कोहिनूर से भी ज़्यादा चमक पैदा करेगा, इंडस्ट्री में खूब कामयाबी हासिल करेगा. नौशाद बोले- इंशाल्लाह !!!

चलो , सुनते है- मेरी कहानी ..



आपने सुना और देखा- स्थाई में रफ़ी जी खरज में पंचम तक और अंतरे में तार सप्तक में भी पंचम तक चले जाते है !! क्या बात है, किस अजब , गज़ब रेंज का मुजहिरा किया है जनाब . मगर ये भी मानना पडेगा कि अभिनय के सम्राट दिलीप कुमार इस गाने के उत्तुंग स्वरों को अभिनय के साथ मिलान नहीं कर पाये...(क्या आप सहमत है?)

(चलो आगे बढें या तीसरी कडी ? नही मेरे फ़र्मा रवा..आगे चलिये!)

और फ़िर क्या था, ऐसे खुली आवाज़ वाले गानों का चलन बढने लगा और उस शैली का विकास हुआ जिसमें खुले स्वर के साथ True Notes का उपयोग कलात्मक मुरकियों और संवेदनशील भावना से भीगे स्वरों का अभिर्भाव हिंदी फ़िल्मों के हुआ , जो अब तक चलता आ रहा है. (बाद में किशोर कुमार नें True notes के साथ साथ False notes की सुरमई संमिश्रण की शैली विकसित की जिसका वृहद रूप आज के गायकों की गायन शैली में दिखता है- इसका जिक्र बाद में जब हम किशोर और रफ़ी के स्वरों का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे, अगले किसी पोस्ट में)

रफ़ी जी नौशाद साहब नें की हौसला अफ़ज़ाई को कभी भूल नही पाये, और उनके स्वभाव में भी ये बर्ताव रच बस गया, जो बाद में कई स्थान पर हमें देखने को मिला. नौ्शाद साहब हमेशा उनके गॊड फ़ादर रहे.जब रफ़ी जी की बिटिया की शादी का न्योता देनें रफ़ी नौशाद जी के यहां पहुंचे तो कहा आपको आना है, निकाह का इंतेज़ाम और पार्टी ताजमहल होटल पर रखी है, तो नौशाद जी नें उन्हे कहा - कि अपनी बिटिया नें अपना बचपन अपने घर में गुज़ारा है, जहां लाखों यादें और भावनांयें उस वास्तु के साथ बाबस्ता हैं , तो मेरा सुझाव है कि आप शादी तो अपने घर से ही करिये, भले ही वह छोटी जगह है.वही हुआ , शादी उनके घर में (रफ़ी विला) ही हुई.

बकौल नौशाद के - एक साल बाद, जब रफ़ी नाम का ये सूरज अर्श पर स्थापित हो गया था, तो बैजु बावरा फ़िल्म के एक गानें के बारे में एक विशेष प्रभावित करने वाला संस्मरण सुनिये.

इस फ़िल्म में छोटा बैजु और उसके पिताजी रास्ते पर से साचो तेरो नाम नाम गाते गाते तानसेन की हवेली के सामने से जाने का प्रसंग था.इस गीत के लिये बैजु बावरा के पिता की आवाज़ के लिये मैने रफ़ी का चयन किया, और बैजु की बालक आवाज़ के लिये एक गुणी और तैयार बच्चे का चयन किया, जिसका इस तरह का प्ले बॆक देने का पहला ही अवसर था.ज़ाहिर है, वह रफ़ी जी के सामने कभी बिचकने या डरने लगा तो कभी घबराकर अटकने लगा. तो रफ़ी जी नें उस प्रतिभावान बालक को प्रेम से पुचकार कर गले से लयाया और उसका आत्मविश्वास जागृत किया.ये भी कहा कि बेटा घबराने की कोई बात नहीं है, तुम जब तक बोलोगे या संतुष्ट होगे , हम लोग गाते रहेंगे. बडी मेहनत के बाद वह गीत तैय्यार हुआ और बेहद अच्छा बना.

पता है वह बालक कौन था- आज का प्रसिद्ध गायक, और संगीतकर हृदयनाथ मंगेशकर...!!!


जानकारी - साभार स्वयं नौशाद..
रफ़ी जी पर कडी़ और आगे भी- सी रामचन्द्र, महेंद्र कपूर , चित्रगुप्त , ओ पी नय्यर , जिन्हे हम इस जनवरी में याद कर रहे हैं जन्म दिन या बरसी पर, उनके साथ रफ़ी के गीतों को और उनके साथ यादों की जुगाली करेंगे - हम लोग...

Friday, January 2, 2009

ना जाने तुम कब आओगे- रफ़ी और नौशाद - Musical Legends

कडी़ - १

पिछली बार मैंने आप से वादा किया था कि रफ़ी साहब के साथ भारतीय फ़िल्म जगत के एक महानतम संगीतकार जनाब नौशाद अली के बारे में कुछ लिखूंगा.

वैसे आप लोग तो मेरे वादों से तंग आ गये होंगे. मुझे याद है, मैने ’दिलीप के दिल से ’ की संगीत ब्लॊग यात्रा शुरु की थी तो बाकायदा रफ़ी साहब के लिये एक Structured , योजनाबद्ध लेखमाला शुरु की थी. आपमें से कई लोगों के लिये अब भी शायद उसे पढना अच्छा लगे.

मगर , भावुकता और प्रेमवश और साथ ही में तिथियों के लिहाज से अलग अलग विषयों पर लिखना शुरु किया.कभी समय अभाव रहा तो अधिकांश ब्लॊग समय से लेट ही लिख पाया.वैसे मैंने सोचा था कि समय पर सभी लिखेंगे, अगर मैंने बाद में भी लिखा तो क्या, ठीक तो लिखना ही पडेगा.

तो देखा आपने, मैने पहले भी रफ़ी जी पर ७ पोस्ट लिख डा़ले है, और एक पोस्ट थी रफ़ी और नौशाद का अज़ीम शाहकार - मधुबन में राधिका नाचे रे...

(http://dilipkawathekar.blogspot.com/2008/08/blog-post_14.html)

अभी पिछले हफ़्ते २४ दिसेंबर को रफ़ी साहब का और २५ दिसेंबर को नौशाद जी का जन्म दिन था. तो ये पोस्ट उन दोनों के नाम समर्पित है.आगे भी वही पुरानी प्लानिंग के हिसाब से चल देंगे, सिर्फ़ एक उस पोस्ट को लिख कर जिसका वादा किया था - एस.डी.बर्मन,गुरुदत्त, प्यासा,हेमंत कुमार ,साहिर, रफ़ी सबसे जुडा एक संस्मरण.( फ़िर वादा..वादा तेरा वादा..)

रफ़ी और नौशाद ये दोनो नाम एक दूसरे के पूरक रहे हैं इसमें कोई शक नही. रफ़ी साहब नें तो इतने सारे संगीतकारों के साथ काम किया, मगर नौशाद नें रफ़ी के अलावा बाकी गायकों के साथ अनुपात से कम ही काम किया.इसके बारे में नौशाद नें हमेशा कबूल किया था कि उनकी धुनों को सबसे बेहतर सिर्फ़ रफ़ी ही गा सकते थे.

अब देखिये ना. सन १९४४ में किसीने रफ़ी जी को नौशाद जी के वालिद से मिलवाया और उन्होने नौशाद जी के लिये एक शिफ़ारशी खत लिख कर दिया. नौशाद नें उसका मान रखते हुए रफ़ीजी को एक कोरस गीत में सबसे पहले चांस दिया -

पहले आप (१९४४)जिसमें उनके सह गायक थे दुर्रानी, श्याम कुमार, अल्लाउद्दिन, मोतीराम आदि.गाने के बोल थे -

" हिन्दोस्तां के हम है, हिन्दोस्तां हमारा, हिंदु मुस्लिम दोनों की आंखों का तारा " .

चूंकि उन दिनों माईक एक ही हुआ करता था, सभी गायक उसे घेर के खडे हुए. सैनिकों पर फ़िल्माये इस गीत के मार्चिंग रिदम के लिये सभी गायकों को आर्मी के बूट पहनाये गये और ओरिजिनल ध्वनी रिकोर्ड की गयी.१९ वर्ष के रफ़ी के पैरों में छाले पड गये थे. मगर वो था उनके करियर का आगाज़, और वे थे एक उदियमान कलाकार,क्या बोल पाते?

मगर यहां एक बात जो कम लोगों को मालूम होगी बताना चाहूंगा, जिससे, रफ़ी जी के निर्मल और गर्व रहित चरित्र का दर्शन होता है.वह उस समय की बात है, जब वे फ़िल्मी संगीत के सर्वश्रेष्ठ और मशहूर पार्श्वगायक हो गये थे, और लगभग ६०% से ज़्यादा के अनुपात में उन्हे गीत गाने को कहा जाता था.

लगभग सन १९६४-६५ की बात थी, जब संगीतकार मदन मोहन फ़िल्म हकीकत के लिये एक भावुक प्रसंग का समर गीत रिकॊर्ड कर रहे थे जिसमें रफ़ी जी के साथ मन्ना डे,तलत महमूद और भूपेन्द्र भी सह गायक थे.

होके मजबूर मुझे , उसने भुलाया होगा...

उस समय तो निस्संदेह रफ़ी साहब का नाम ऊंचाईयों पर था.मगर परेशानी फ़िर भी वही थी, एक ही माईक. उस पर संयोग ये कि बाकी सभी गायक उनसे कद में थोडे लंबे ही थे. तो परेशानी ये दर पेश आयी कि माइक को किसके हिसाब से एड्जस्ट किया जाये? अब रफ़ी साहब के हिसाब से एड्जस्ट करते हैं तो बाकीयों को परेशानी, और रफ़ी जी से कहने का सवाल ही नही पैदा होता था ऐसा उनका स्टेटस था उन दिनों.

मगर सरल और निश्छल मन के रफ़ी साहब ने खुद ही ये सुझाव दिया कि वे बाकी सभी के हिसाब से हाईट फ़िक्स कर दें, और वे किसी तरह से किसी स्टूल पर चढ कर गा लेंगे. तो साहब, आनन फ़ानन में स्टूल ढूंढा गया, मगर एक मिला भी तो थोडा छोटा पडा, जिससे रफ़ी साहब माईक से फिर भी नीचे ही रह गये. फ़िर भी रफ़ी साहब नें पूरे रिहल्सल में और फ़ाईनल टेक तक उस स्टूल पर चढ कर गाना रिकॊर्ड करवाया. और कमाल देखिये उनकी आवाज़ के थ्रो या एनर्जी लेवल का कि उनके स्वरों में और गले की जादुगरी की गहराई में कोई कमी नहीं आयी.(उन दिनों इतनी सारी तकनीकी मदत नही मिला करती थी)

(प्रस्तुत चित्र उसी गानें की रिकोर्डिंग का है )

अभी कुछ सालों पहले, जब भूपेन्द्र नें लता मंगेशकर पुरस्कार समारोह मे बतौर कलाकार एक कार्यक्रम देनें इन्दौर आये थे, तब इस बात की पुष्टि स्वयम उन्होने की और कहा कि उनमें बडे़ कलाकार होने का कोई भी दंभ नहीं था. निसंदेह , उस समय के उपस्थित सभी गायकों में वे सबसे शीर्ष पर थे, मगर मन्ना दा,और तलत मेहमूद को पूरी श्रद्धा और इज़्ज़त देते थे और यही ज़ज़बा इन मूर्धन्य कलाकारों के व्यवहार में झलकता था.उस दिन ये दोनों भी काफ़ी असहज से थे ये देख कर कि इतना बडा कलाकार उनकी वजह से स्टूल पर खडा हो कर गाने में नहीं हिचकिचा रहा है.

(इस गीत पर कभी और लिखूंगा - स्वर पक्ष और संस्मरण पर- फ़िर एक वादा- !!!!)

आप सभी ये बात तो जानते ही होंगे कि रफ़ी, किशोर दा, हेमंत दा, मुकेश, लता सभी सेहगल साहब के दिवाने थे, और दिल के अंदर एक सपना पाल के रखा था सहगल के साथ गानें का, मगर संयोग ये रहा कि सिर्फ़ रफ़ी जी का ही ये सपना पूरा हो पाया ,जब नौशाद जी नें ही दुबारा रफ़ी को मौका दिया सहगल के साथ गानें में फ़िल्म शहाजहान में ( १९४६) जब मजरूह द्वारा लिखे गये गीत " रूही रूही रूही, मेरे सपनों की रानी " में उन्हे दो लाईन गाने का मौका मिला.

मगर असल में रफ़ीजी को वास्तव में एक असली पार्श्वगायक बनने का जब उन्हे नौशाद साहब नें ही फ़िर मौका दिया फ़िल्म अनमोल घडी में (१९४६)- तेरा खिलौना टूटा बालक जिसमें रफ़ी जी नें गायकी के साथ अदायगी का भी एक नया रंग भरा पार्श्वगायन की विधा में, और फिर शुरु हुआ एक नया युग.

आप मेरी बात से सहमत होंगे कि इसके पहले के सुपर गायक सहगल जब गाते थे तो वे केवल अपने ही गाने पर पार्श्व गायन करते थे जो फ़िल्म के उनके चरित्र पर सूट करती ही थी. मगर जब बाद में पार्श्व गायन का ज़माना आगे आने लगा तो ज़रूरत पडनें लगी ऐसे गायकों की जो अलग अलग अभिनेताओं के अलग अलग चरित्र से ना केवल मेल खाये, गीत सुनते हुए श्रोता के मन में गायक और अभिनेता एकरूप हो जायें. रफ़ी साहब नें अपने अलग अंदाज़ से फ़िल्म इंडस्ट्री का चलन और फ़िल्मी गीतों का स्वरूप ही बदल गया, जिसे बाद में अन्य मूर्धन्य गायकों नें भी अपनाया और हमें इतनी अच्छी अच्छी कालजयी संगीत रचनाओं से धन्य धन्य कर दिया.

मगर नौशाद साहब को रफ़ी जी को खोजने और बनाने का श्रेय ज़रूर जाता है, और ये वे ही तो थे जिन्होने ये पाया कि रफ़ी साहब की आवाज़ में ना केवल मधुरता थी, या दमदार थ्रो था, मगर उनकी आवाज़ में गज़ब की रेंज थी, ऊंचाई थी. उनकी आवाज़ की कशिश और दर्द की रवानी तो थी ही ,मगर उनके गले में जो जादुई हरकतें थी,जो तानें और आलाप का नियंत्रित मेनिफ़ेस्टेशन था, वो तो कुछ और ही बंदिश या धुन मांगता था. नौशाद जी नें ये चेलेंज स्वीकार किया और हमें ऐसी धुनें दीं, जो उनके उन दिनों की कम्पोझिशन से अलग थी- फ़िल्म मेला (१९४८) - ये ज़िन्दगी के मेले .

फ़िर क्या था , सन १९४९ से एक से एक मधुर गीतों की झडी लग गयी- दुलारी, अंदाज़, चांदनी रात, दिल्लगी & So On....नौशाद ही वे संगीतकार थे, जिन्होने भारतीय संगीत की मेलोडी को गीतों में ढा़ला, शास्त्रीय रागों और लोकगीतों के अनमोल खज़ानों को आम आदमी के दिलों के भीतर उंडेल कर रख दिया, जिसके लिये हम उनके बडे ही शुक्रगुज़ार है.उनकी एक एक धुन मानों स्वरोंकी कशीदाकारी किये हुए पैरहन है.

आज ही विविध भारती पर नश्र किये गये एक कार्यक्रम में खुद लता जी ने क्या खूब कहा - कि पहले हमारे संगीतकार जो गीत रचते थे उनमें गायक या गायिका का गाना प्रधान होता था, और रिलीफ़ देने, या स्वरों के अम्बियेन्स को और खुलाने के लिये ऒर्केस्ट्रा हुआ करता था. आजकल तो ऒर्केस्ट्रा प्रधान और सर्वोपरी हो गया है, और गायक को रिलीफ़ के लिये डाला जाता है. नौशाद साहब उस स्कूल के संगीतकार थे.

एक और दिलचस्प बात.फ़िल्म अंदाज़ में नौशाद जी नें पहली बार लताजी के साथ एक ड्युएट गवाया रफ़ी जी के साथ- यूं तो आसपास में .. .क्या आपने नोट किया? इसे राज कपूर पर फ़िल्माया गया और दिलीप कुमार के लिये मुकेश जी नें गाया.( मैने ये फ़िल्म नही देखी है, मगर सुना है.आप कंफ़र्म करें तो बेहतर होगा)

बाद में यही कॊंबिनेशन उलटा ही मशहूर हुआ ये आप सभी जानते है.

चलो , ये कडी़ यहीं विराम चाहती है, अगले अंक में नौशाद और रफ़ी जी के अनेक खुशनुमा और हृदयस्पर्शी संस्मरण ले आऊंगा, अगर इज़ाज़त हुई तो.

यहां उस गीत का एक अंश सुनवा रहा हूं , जो रफ़ी साहब का प्रथम गीत था.

करीब ८ साल पहले इंदौर में रफ़ी साहब पर दिये गये एक कार्यक्रम- रफ़ी के अनेक भाव रंग मे प्रस्तुत करने के लिये मेरे आग्रह पर श्री संजय पटेल नें ये गीत मेरे लिये लाने की ज़ेहमत उठाई थी - श्री सुमन भाई चौरसिया के रिकॊर्ड भंडार में से - तो उस की विडिओ से निकाल कर यहां पेश कर रहा हूं.जीवन की सबसे बडी़ दुखद बात ये रही कि मेरे गायकी का इतना बडा लंबा सफ़र मैने वैसे तो मधुबन में राधिका नाचे गीत से सात साल की उम्र में किया, मगर बाद में संयोग से या दुर्भाग्य से, रफ़ी और नौशाद का एक भी गीत चाहते हुए भी स्टेज पर नही गा सका. ( सुहानी रात ढल चुकी- शायद एक बार गाया था)

तो सुनिये ’ हिंदोस्तां के हम है, हिन्दोस्तां हमारा....’

Wednesday, December 24, 2008

वो जब याद आये बहोत याद आये..हमारे लाडले गायक - मोहम्मद रफ़ी


वो जब याद आये बहोत याद आये,
ग़में ज़िंदगी के अंधेरे में हमने,
चरागे़ मोहोब्बत , जलाये बुझाये...

मोहम्मद रफ़ी..A Legend !!!

एक बेहतरीन गायक, सच्चा कलाकार,मगर उससे भी बेहतर एक कोमल हृदय का मालिक, दिलदार, और सच्चा इन्सान..

आज अगर वे जीवित होते तो पता नहीं क्या होता, मगर वे हमारे दिलों पर ज़रूर राज़ कर रहे होते. वैसे भी आज यही स्थिती है, बस दुख ये है कि वे हमारे साथ नहीं.

इसीलिये, आज के इस पावन दिवस पर हम उस ईश्वर , अल्लाहताला को ज़रूर धन्यवाद देंगे, जिसने, सन १९२४ में इस दुनिया में ये देवदूत भेजा, जिसने अपनी सुरीली ,सुमधुर और मन के अंतरंग को छू जाने वाली आवाज़ से इतने सालों से हम सुनकारों के दिलों में दिली सुकून जगाया.

क्या ठीक कहा है..

दर्दे दिल, दर्दे जिग़र, दिल में जगाया आपने......

रफ़ी जी की जन्म कुंडली

रफ़ी जी की जन्म कुंडली अभी कल ही पुणें में मुझे मिली, तो आपके लिये यहां दे रहा हूं. जिनका भी ज्योतिष का अभ्यास हो उन्हे शायद ये बडी़ सौगात होगी.अगर कोई इसका विश्लेषण कर सके और मुझे दे सके तो यहां पोस्ट कर सकूंगा.

जन्म दिवस - २४ दिसेंबर १९२४
समय - सुबह ३.३० बजे
स्थान - कोटला सुल्तानसिंह , अमृतसर, पंजाब.



रफ़ी जी पर लिख पाना और उनकी उत्तुंग करिश्माई व्यक्तित्व को शब्दों में ढा़ल पाना मेरे जैसे मर्त्य मानव के बस में नहीं.मगर इस चश्मे बद्दूर आवाज़ के साथ इतने साल जागा, सोया, गुनगुनाया,स्टेज पर गाया, खुद अनुभव किया. उनकी चिर युवा आवाज़ के स्वर सामर्थ्य की,मिठास की ,गोलाई की बेइन्तेहां नापी नही जा सकने वाली गुणवत्ता और गहराई को दूर से ही देख सकने की अपनी मजबूरी की यथार्थता सभी याद आ गयी. एव्हरेस्ट की चोटी मैनें जब नेपाल में चल रहे प्रोजेक्ट में देखी थी तो इच्छा तो हुई की उस चोटी को फ़तेह करूं. मगर कोशिश भी करूं तो संभव नहीं था. वैसे ही रफ़ी जी के गीत को गाते हुए मेहसूस हुआ. वे भारतीय फ़िल्म संगीत जगत के एव्हरेस्ट थे.

ये वह आवाज़ थी जो हमें अपनी खुद की आवाज़ लगती है.

तभी तो खुद रफ़ी जी नें क्या सही कहा है..

तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे,
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे..

उन नज़ारों की याद आयेगी
जब खयालों में मुझको लाओगे...


उनकी आवाज़ को तो Timbre या ध्वनिरूप ही यूं था कि हर नायक के चरित्र को गहराई तक अद्ययन कर पूरी तन्मयता से
अपनी आवाज़ में ढाल लेते थे. दिलीप कुमार और शम्मी कपूर की एक दूसरे से मीलों दूर व्यक्तित्व को बखूबी निभाया. जॊनी वाकर और देव आनंद दो अलग अलग ध्रुवों को एक गले में आत्मसात किया वे थे रफ़ी जी.इसीको तो हम परकाया प्रवेश की सिद्धी कह सकते हैं.

याद किजिये देव साहब के लिये दिल का भंवर करे पुकार और बाद में राजेश खन्ना के लिये गुन गुना रहे हैं भंवरे..अमिताभ के लिये ही कहां जॊन जानी जनार्दन और कहां तेरी बिंदिया रे...

जहां शम्मी कपूर के लिये मस्ती भरी उंचे सुरों में गाया हुआ आसमान से आया फ़रिश्ता गाया या आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा ,तो तब भी expressive और musical रहे और एहसान तेरा होगा मुझ पर या मेरी मुहब्बत जवां रहेगी में भी अहेसासात की सीमा पार कर गये.

दिलरुबा दिल पे तू, ये सितम किये जा में या अकेले अकेले कहां जा रहे हो मेम उनका फ़ुसफ़ुसाना ,मांग के साथ तुम्हारा में दिलीप कुमार के लिये गीत के अंत में टांगेवाले का चिल्लाना, काम की बात बता दी अरे कामेडी गाना गाके में जॊनी वाकर के ढंग से हंसना, ’लाल लाल गाल ” में रॊक एन रोल के लिये तूफ़ानी चिल्लाना वह भी सुर में, योडलिंग का गाना आग्रा रोड का सब याद आ रहा है.

एक बार हुवा यूं कि किसी फ़िल्म में राजेंद्र कुमार को लिया जाना था और फ़िल्म के चार गीत भी रेकॊर्ड कर लिये गये थे.मगर उन दिनों ज्युबिली कुमार के पास इतना काम था, और किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिये परदेस से आने में उनको ज़रा विलंब हुआ. इसलिये इस फ़िल्म के मिर्माता नें इतना रुकना उचित नहीं समझा और राजेंद्र कुमार की जगह जॊय मुखर्जी को नायक के लिये साईन कर लिया.

हर नायक की छबि, व्यक्तित्व और ढंग को उतरने वाले रफ़ी साहब को जब ये पता चला तो वे उस निर्माता के पास गये और कहा, कि चूंकि जॊय मुखर्जी को लिया है, सभी गीतों को फ़िर से रेकॊर्ड करना चाहिये.जॊय मुखर्जी की स्टाईल शम्मी कपूर से मिलती जुलती थी .संयोग से निर्माता और संगीतकार को ये बात बहुत ही उचित लगी और इसलिये उन सभी गीतों की फ़िर से रिकॊर्डिन्ग की गयी, और उन गीतों नें और फ़िल्म नें सिल्वर ज्युबिली मनाई.

जब इस का मेहनताना रफ़ी जी को निर्माता देने लगे तो उन्होने मना कर दिया. पता है उन्होने क्या कहा?

गाना मेरा पेशा है. मगर मेरे लिये पैसा नहीं पेशा अधिक महत्वपूर्ण है.

चलिये आज इतना ही सही. आज बाकी शाम उनके गीत सुनने में गुज़ारने की तमन्ना है, अगर आप इज़ाज़त दें तो.
अगले दो तीन पोस्ट में भी रफ़ी जी रहेंगे ये वादा. जो दिल में ही नहीं समा पा रहे है, वे तीन चार पोस्ट्स में क्या समायेंगे. फ़िर भी भावुक मन है.भक्तिभाव है, तो इस विराट स्वरूप के अंतर्दर्शन कर के मैं आप दोनों धन्य हों तो क्या हर्ज़ है?

हुई शाम उनका खयाल आ गया...


Monday, December 1, 2008

बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया...


कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया....


आज अभी तक दिल ग़मगीन है, दो तीन दिनों पहले के घावों की टीस अभी तक मन से रिस रही है. जैसे जैसे और मुम्बई की घटनायें सामने आ रही है,उन अपनों के बारे में पता चल रहा है,जो पिछले दिनों में इन आतंकवाद के दानव की भेंट चढ गये.उनके साथ बिताये पलों की, क्षणों की याद जो खिलते हुए फूलों के मसलने की दास्तान बयां कर रहीं है.वे नजदीकी अपने , जो रब से ये भी पूछ पाने की स्थिती में अभी नहीं है, कि उनके साथ ही ऐसा क्यूं हुआ, जब काल नें अपने क्रूर हाथों से उनकी बगिया की महकती फ़ुलवारी को उजाड़ दिया.

किन किन की अफ़सुर्दा-दिली बयां करूं, किस किस का दर्द भरा अफ़साना सुनाऊं और जब वे बार बार सामने याद आते है, तो मन उन जाने पहचाने चेहरों की याद भुला नहीं पाता है, जो अक्सर मुम्बई प्रवास में मिलते रहते हैं, या अब भारी मन से कहें ............थे.

अब वे कभी नहीं मिलेंगे.

किसीने अपने ब्लोग पर खूब लिखा है(सौरभ कुदेशिया-http://satat-vichar-manthan.blogspot.com/2008/11/blog-post_29.html) कि मेरे परिवार के १३० लोग मरे है,मौत हो गई है मेरे घर में.

पता नहीं क्यूं ये सवालात जेहन में टकरा रहे हैं कि ये कब तक? आज एक गाना ना जाने क्यूं लबों पर बार बार आ रहा है.

चलो वह गीत आपके को भी सुना देता हूं- हवा में ठंडक बढ गयी है, फिर भी उद्वेलित विचारों की तपन , आंच दिल को जला रही है. सूखे टहनीयों के जलने से चटखने की आवाज़ें बढ गयी है.

इस गीत को बिना साजो सामान के , बिना किसी भूमिका के सुना रहा हूं. वाओलीन ,हार्मोनियम, तबला आदि की आवाज़ कमज़ोर पड़ गयी है, बंदूकों के , गोलीयों की आवाज़ के सामने.सिर्फ़ मैं, मेरी तनहाई, और सर पर पंखे की गिरघिर.. जो हृदय में शूल उत्पन्न कर रही हैं- आंसूंओं का सैलाब थमने और थामने का जतन चल रहा है कि गीत को भी दो तीन बार में रेकॊर्ड करना पडा़.

मर्द हूं तो शायद ये स्वीकार करने मे शरम आये कि ..

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया-

जो है सो है.

Monday, August 25, 2008

मन तरपत हरि दर्शन को आज..

रफ़ी - भजन रंग

जय श्री कृष्ण !!!

वास्तव में जन्माष्टमी कल थी या आज है इसका किसको खयाल.. हमारे मन की अवस्था तो यूं है - मन तरपत हरि दर्शन को आज..

आज यह गीत कृष्ण भजन है और बैजु बावरा के प्रसिद्ध भजन का रिमिक्स है,खुद रफ़ी जी नें गाया. जैसा की पिछली बार”मधुबन में ’गाने में था.गीत में वैसा ही improvisation .खुला , कृष्ण भक्ति में मगन हो कर गाया रफ़ी जी द्वारा. एक आग्रह, कृपया पुराने ओरिजीनल गाने से तुलना न करें.

मै और कुछ भी लिख पाने की स्थिती में नही हूं. अभी अभी संजय भाई के सुरपेटी ब्लॊग पर माखन मिश्री खा कर आ रहा हूं . आप भी प्रसाद ग्रहण करने वहां पधारें.www.surpeti.blogspot.com.


प्रस्तुत भजन के संदर्भ में इस के संगीतकार जनाब नौशाद सहाब खुद कहते है-

गूंजते है तेरे नगमों से अमीरों के महल,
झोपडों में भी गरीबों के तेरी आवाज़ है,

अपनी मौसीकी पे सबको फ़क्र होता है मगर,
मेरे साथी आज मौसीकी को तुझपर नाज़ है...

यह कृष्ण के लिये कहा गया है, या रफ़ी जी के लिये , अपने अपने अर्थ आप स्वयं लगांयें...

देखा जाये तो सही अर्थों में धर्म निरपेक्षता हमें फ़िल्म जगत में ही दिखाई पडती है.

स्वयं भगवान शिव द्वारा रचित राग मालकौंस पर निबद्ध इस कृष्ण भजन को मोहम्मद रफ़ी नें गाया, मोहम्मद शकील ने लिखा, और नौशाद अली ने बनाया.. क्या बात है..

मुकद्दस पाकीज़गी से बनाया गया यह गीत आप को बेखुद कर दे ,आप पर अगर कैफ़ियत तारी हो जाये तो फिर मुझसे मत पूछियेगा कि ये किसका कमाल है..

आप खुद ही तय किजिये.....



मुझ पर भी इसकी कैफ़ियत तारी हो गयी है, इसलिये - दिलीप के दिल से - भी यह भजन सुनने का आग्रह.. यानी , मेरी आवाज़ में, वैसे ही- मै, आप, और रफ़ी !!

रफ़ी जी और आप से क्षमा चाह्ते हुए..

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