Wednesday, October 8, 2008

संगीत का आशावाद...(Optimism in Music) बनाम कानसेन/तानसेन

जोग लिखी संजय पटेल की के चिठ्ठे पर अभी अभी एक बेहद रोचक किंतु शिक्षाप्रद लेख पढ़ कर अभी अभी आया हूं(दोबारा).

श्रोता की खसलत कार्यक्रम का सत्यानाश कर देती है !

श्री संजय पटेल नें इस एक ही लेख में ’कानसेन’ और ’तानसेन’ को मुखातिब हो बड़ी ही सच्चाई और खुलूस से जो बात कही वह कहीं भी पढने को नही मिली, कम से कम मुझे तो.

आप इस लिन्क पर जा स्वयं पढ़े और फ़िर लौट के आयें यहां, थोड़ी चर्चा और करनी हो तो, क्योंकि बात बड़ी समझदारी की है. आपमें से कईयों ने तो वहां जाकर यह पोस्ट पढ़ भी लिया होगा .मैनें तो अपने आप से बिस्मिल्लाह किया है,सुधरने की इस प्रक्रिया में.
"http://joglikhisanjaypatelki.blogspot.com"

अब विस्तार से. थोडा़ समय लूंगा, माफ़ करियेगा.

उन कानसेनों के लिये जो अपने आप को बड़ा तानसेन समझते है - जो इस आत्ममुग्धता के वलय में ही रहते है,और ये निर्णय लेते हैं कि चूंकि वे अच्छे (?) गायक या वादक या कला के किसी भी माध्यम में दखल रखते हैं, इसलिये उन्हे यह अधिकार पहुंच जाता है, कि वे संगीत के अच्छे डॊक्टर हो गये है. हो भी सकते है, उनमें से कई होंगे भी , मगर तब तो उन्हे यह बात और जान लेना चाहिये कि कलाकार नें बड़ी मेहनत से अपना जो हुनर पेश किया है, उसके सकारात्मक पहलू में जा कर आप कुछ अच्छा ले सकते है, उससे कुछ पा सकते है तो क्या हर्ज़ है.मगर दुख की बात ये है, कि वह कानसेन (श्रोता) अपने साथ अपने तानसेन को भी ले जाता है,जिसका भूत उसके कान और सर पर चढ़ कर बोलता है. (कर्ण पिशाच्च ?!!).

मगर ऐसे सरस्वती पुत्रों को शायद यह अभिशाप ही है, जो मैनें अपनी संगीतयात्रा के दौरान अनुभव किया, कि इस मानसिकता के पीछे कारण होता है उनकी वह डाह या मत्सर जो इन टिप्पणीयों मे प्रतिध्वनित होता है कि भला इसकी कमीज़ मेरे कमीज़ से सफ़ेद क्यों ? कोई भी माई का लाल किसी भी गायक/गायिका की नकल शत प्रतिशत नहीं कर सकता. उनका जलाल आना तो संभव ही नही. मगर जैसा की संजय भाई के इस लेख पर की गयी एक टिप्पणी में यह बात बड़े गंभीरता से कही गयी है, कि किसी भी सूरत में लाईव्ह मेहफ़िल से बेहतर श्रवणानंद कहीं और नहीं मिल सकता. टेप या सी ड़ी में भी नहीं ,या उसी कार्यक्रम को रिकॊर्ड़ भी कर लें तो भी. क्योंकि वहां, श्रोता का कलाकार से सीधा आत्मिक संबंध जुड़ जाता है.साथ में माहौल, और श्रोता सत्संग का संयोग भी.

तभी जाकर संजय भाई के इस लेख की प्रासंगिकता और अधोरेखित होती है कि,

ईमानदार श्रोता वह है जो रहमदिल होकर कलाकार की तपस्या का मान करे और सह्र्दय होकर उसकी कला को दाद देकर उसे नवाज़े; उसका हौसला बढ़ाए.



अब बात करें उन कानसेनों की जो स्वयं तो कला के क्षेत्र के मात्र प्रबंधन या पद की वजह से जुड़े होते है,जो कला के किसी भी क्षेत्र से वास्ता नहीं रखते , मगर स्वयं को महान समीक्षक कहलाने में नही अघाते.ये उन टिप्पणीकारों की तरह है, जिन्होने कभी हाथ में बल्ला नहीं पकड़ा, कभी स्टेडियम में धूप में जाकर तपे नहीं मगर, घर में टी व्ही के सामने बैठ कर कहते है, भैया ये सचिन को इस तरह से खेलना था. वहां सचिन की जगह अगर भाईसाहब होते तो क्या गुल खिलाते उसका ज़िक्र यहां नहीं !

ऐसा नहीं की सभी ऐसे हों . इनमें कई ऐसे भी होते है, जो बेहद अच्छे श्रोता और पारखी होते है, संगीत की काफ़ी बारिकीयां उन्हे पकड़ में आती भी हैं. उनके पास संगीत से, माहौल से जुडे़ रहने से और गुणी, नामचीन कलाकारों को सुनने का अनुभव होने से यह पात्रता और इज़्ज़त हासिल हो जाती है. मगर उन्हे भी यह हक़ हासिल नहीं होता कि वे कलाकार के प्रस्तुतिकरण को हिकारत से या उनके पूर्वग्रह ,पूर्वधारणा से आकलन करें क्योकि संजय भाई नें यह भी तो लिखा है- हर दिन भट्टी जमें यह किसी भी बावर्ची (cook)के लिये संभव नहीं.

मैं तो आगे बढ कर यह वेदना भी व्यक्त करूंगा की अगर आप निर्णायक भी हैं तो क्या आपको उन कलाकारों का मखौ़ल उडा़ने का हक पहुंच जाता है? उनकी प्रतिभा या प्रस्तुति में अगर कोई ख़ामी है भी तो इसकी जगह उन्हे उचित मार्गदर्शन देकर मनोबल बढा नही सकते ? क्या आप नये इंडियन आईड़ल के गायक गायिकाओं के चयन प्रक्रिया को देख रहें है? सभी जजेस गुणी है, अपने अपने क्षेत्र के शीर्ष पर भी है. मगर उनकी प्रतिस्पर्धियों की इस तरह अप्रतिष्ठापूर्ण (Derogatory) हंसी उड़ा कर क्या अपने आप को एक अच्छा इंसान साबित कर रहें है?

एक और किस्म के श्रोता की जमात से आपको मिलवाता हूं . मेरे वे साथीगण ज़रूर समझ जायेंगे इसकी पीड़ा , जो गायक भी है.इन फ़रमाइशी श्रोताओं को हमेशा हर स्थान पर , हर मौके पर गाने की फ़रमाइश करने का रोग है.किसी भी महफ़िल में ये अचानक उग आते है, और किसी भी मेहमान को (अगर गायक हो तो) तपाक से गाना सुनाने की फ़रमाईश कर ड़ालते है.अब उस बेचारे की परेशानी तो ज़रा समझें.उसका बिना किसी सुर या ताल की संगत बिना गाना सुना सकने में हिचकिचाना लाज़मी है, (अगर वह थोड़ा बहुत भी गाना स्टेज पर गाता आया हो).संगत की अनुपस्थिती के वाजिब कारण से उसके नानुकूर करने पर ये फ़रमाइशी लाल तो पीछे ही पड़ जाते है,और दीगर भीड़ को भी साध लेते है.अरे, भाई साहब , आप तो गा ही दिजीये, यहां कौनसा स्टेज कार्यक्रम चल रहा है.अब वो नही गाता है तो ये कहते है क्या भाईसाहब, आप भी भाव खाने लगे. अरे मेरे कहने पर तो बड़े बड़े गायक गा चुके हैं, आपको तो घमंड़ हो गया है.यदि वह गा देता है, और मजमा जमता नही है तो मुंह बना कर कहते है - अभी कमजोर है, फ़लां फ़लां के सामने तो कुछ भी नही..पता नही ये लोग किसी पार्टी में अगर तेंडुलकर को भी मिलेंगे तो कहेंगे, ज़रा कवर ड्राईव मारकर तो बताईये!!

इसीलिये संजय भाई नें जिस मुद्दे पर बारीकी़ से और बेबाक़ी से रौशनी ड़ाली है, हमें उससे सबक लेना पड़ेगा .पहले अपने को, बाद में अपने इर्दगिर्द संगीतप्रेमीयों को अच्छे श्रोता से जो अपेक्षित है उसकी समझ दें.

और जो संगीतप्रेमी नहीं है, उन औरन्गज़बों से तो कुछ भी अपेक्षित नहीं किया जा सकता मगर उनसे भी भिड़ना तो पडेगा ही. अभी कुछ सालों पहले रफ़ी जी की पुण्यतिथी पर लायंस क्लब में एक कलाकार को गवाने का प्रस्ताव जब मैंने रखा था तो एक पदाधिकारी नें यह कहा था कि किसी और को ही क्यों, खुद रफ़ी जी को ही बुला लो. मैं उस समय तो चुप कर गया, मगर अब तक राह देख रहा हूं कि वे खुद उपर जाकर कब रफ़ी साहब को आमंत्रित करते हैं!!

अब उस चिठ्ठे की अगली महत्वपूर्ण बात पर गौर करें. आपका थोड़ा वक़्त और लूंगा.



जनाब मेहंदी हसन साहब के साथ गुज़रे अनुभव से हर संगीत के साधक का सर श्रद्धा से झुक जायेगा.यही नम्रता और अपने फ़न की तरफ़ मेहनत और मुसस्सल ईमानदारी का जज़बा हम सभी संगीत प्रेमी और विद्यार्थीयों को एक पाठ पढा़ जायेगा.वाह , क्या बात है!

संजय भाई को यह सौभाग्य प्राप्त है, कि अपने संगीत के शौक और संस्कृतिकर्मी होने की वजह से इन्दौर या पूरे मध्यप्रदेश में आये करीब करीब हर बड़े संगीतकार, गायक, गायिका, फ़िल्मी हस्तीयां, और संगीत की क्षेत्र में जुड़े हर कामयाब व गुमनाम साधक को उन्होनें बड़े करीब से जाना है, पहचाना है. बतौर एंकर पर्सन वाणी पर उनका प्रभुत्व तो है ही, मगर उनका शब्द लालित्य उनके मिजाज़ की तरह ही सुरीला है.इसीलिये उनसे यह आग्रह भी है, कि हम श्रोताओं के इस खा़स समूह को वो इतनी इज़्ज़त बक्षें और ऐसे ही कुछ अंतरंग और सारगर्भित अनुभव से हमें और भी नवाज़ें, ताकि नई पीढी़ को भी इन मूल्यों से रू-ब-रू करवाया जा सके.

बात मैंने भी ज़रा लंबी ही कर दी. मगर क्या करूं , जब संजय भाई ने लेख में उन पहलूओं को जब छूआ तो उस खसलत को मैंने भी महसूस किया.उपर से पिछले इतवार को कुछ ऐसा ही वाकया या अनुभव मेरे साथ भी दर पेश आया तो मैं भी लिख पडा़.(वह कल..)



चलो एक बार फिर से अच्छे श्रोता बन जाये हम दोनों..

मन्ना दा के किसी महफ़िल में तबलची की खस्लत!! हंसियेगा नही, वह भी कलाकार है.

Friday, September 26, 2008

देव आनंद - An epitome of YOUTH !!

सदाबहार अभिनेता , देव आनंद !!

एक व्यक्तिगत अनुभव.

८५ वर्ष के हुए, और चिरयौवन सेहत के धनी आज भी उतनी ही एनर्जी और उमंग के साथ फ़िल्में बनाने में लगे हुए है.

मेरा देव आनंद के साथ एक अजीब संबंध है.

हमारा परिवार एक संयुक्त परिवार था, और जब से समझने लगा ,तब से घर में देव आनंद के Fans भरे हुए थे. मेरे ताऊजी के मेरे दोनो बडे भिया लोग सुबह से देर रात तक देव आनंद के बारे में ही बाते करते थे, यहां तक बडी चाची भी .जब कॊलेज गया तो मेरा सबसे अज़ीज़ मित्र हुआ अरुण जो पागलपन और उन्माद की हद तक देव जी को चाहता था.

बचपन में जब हमारे शहर इन्दौर में प्रेम पुजारी की शूटिंग हुई तब उनसे मिला था. An epitome of youth !!

फ़िर एक बार कुछ सालों पहले मैं और मेरा मित्र अरुण बंबई गये तो आज के ही दिन हम देव साहब के घर पहुंच गये, Just took Chance.उन्ही दिनों , उनकी कोई फ़िल्म भी रिलीज़ हुई थी .आश्चर्य हुआ यह जान कर की देव साहब घर पर ही थे और कुछ मेहमान आये हुए थे.ज़ाहिर है ,दरबान ने कहा-साहब नही मिलेंगे.

मैं Lions Club International का सदस्य हूं. ऐसे ही सोचा और कह डाला -हम लायन्स क्लब से है. बस , कुछ देर बाद पूछ कर आया और खुल जा सिमसिम --

पता चला कि कोई पार्टी वार्टी नही थी देव साहब अपनी नयी फ़िल्म टाईम्स स्क्वायर के लिये कुछ अमेरिकन film crew से फ़िल्म के बारे में ही विचार विमर्श कर रहे थे.वह भी जन्म दिन के दिन!!

तो यह मेरे लिये एक सबक था जो आज तक ज़हन में बाबस्ता है - कडा परिश्रम और मेहनत का ही फ़ल है कामयाबी.WORK IS WORSHIP...

कुछ देर के लिये उनसे माफ़ी मांगते हुए देव साहब मुझ से मुखातिब हुए और फ़िर चला आधे घंटे का एक निजी बातचीत या Informal Interview कह लें,जिसमें हुई देव सहाब की १९४६ से लेकर अब तक की फ़िल्मों पर चर्चा . फ़िल्म निर्माण, अभिनय ,संगीत की हर विधा पर उनका प्रभुत्व देख समझ मै हैरान था .

मुझे यह फ़क्र हासिल हुआ था की कहीं मैने उनकी १९५० के पहले की फ़िल्म ’ खेल’ देखी थी (घिसी पिटी, मॆटिनी में).उन्हे याद था.यही नही , उन्होने और मेहरबान होकर दूसरे दिन भी मेहबूब स्टुडियो में उनकी एक और फ़िल्म की शूटिंग पर आमंत्रित किया.वहां भी गये, और तब से आज तक उन यादों को दिल की गहराई में इस्तरी कर , घडी कर सहेज कर रखा है.

उनके साथ हुई बातचीत के ब्योरे का यहां महत्व नही, महत्वपूर्ण है उनके जैसे मेहनती और दिलकश युवा इंसान से मिलना.

(चित्र नेट से साभार )

देव आनन्द की फ़िल्मी संगीत यात्रा में जिन गायकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, उनमें मुख्य है - मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार. वैसे उनके कुछ गीत तलत मेहमूद नें , हेमन्त कुमार नें और मन्ना डे ने भी गाये थे. जिसके बारे में एक अलग पोस्ट लिखूंगा.कुछ मजबूरियां है सेहत के मुताल्लिक, तो आप सहृदय हो मुआफ़ करेंगे.

चलिये आज उनके यह गीत सुनते है, जिन्हे मूलतः रफ़ी जी और किशोर दा नें गाया था.....(An Amature's karaoke )आज जब रेकॊर्डिंग की इतनी कमाल की तकनीकें मौजूद हैं ,जैसे कट पेस्ट, पिच करेक्शन , या टेम्पो करेक्शन आदि, तो यह कई साल पहले का प्रयास है. यकीन मानिये, आज सभी सुविधायें मौजूद है, मगर वह यादें और उसकी जुगाली कहां से लाऊंगा?

इसीलिये इन गीतों को सुनाना यहां ज़रूरी नही समझता. मगर क्या करें . दिल है के मानता नहीं...

अगर उचित समझें तो आगे बढें ,आप से नम्र निवेदन..

खोया खोया चांद, खुला आसमां, आंखों में सारी रात जायेगी...


फूलों के रंग से , दिल की कलम से...

वो जब याद आये..

आज २६ सेप्टेंबर है.

आज के दिन हम फ़िल्मों से जुडी दो विशिष्ट व्यक्तियों के बारे में आगे कुछ लिखेंगे.

देव आनंद ...



जिनका आज जन्म दिवस है. भगवान से उनके दीर्घ आयु के लिये प्रार्थना ........










और



हेमन्त कुमार



जिनकी आज पुण्य तिथी है. भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे.

उनपर अलग अलग लेख का इन्तेज़ार करें..







दिलीप कुमार

अभी अभी पता चला है कि जनाब दिलीप कुमार को अस्पताल में भरती किया गया है.

हम सभी उनके जल्दी अच्छे होने के खुदा से दुआ करते हैं...

सभी चित्र नेट से साभार

Tuesday, September 23, 2008

तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नज़र ना लगे.. चश्मे बद्दूर...


संगीत और भाषा में एक बात समान है, दोनों के स्वरूप बदलते रहते है. जहां जहां आदमी है वहां भाषा में जगह बदलते ही चलन और शैली बदल जाती है, और संगीत में भी यही बात है.

हिंदी फ़िल्मों के गीतों में भी यही बात लागू होती है, जहां भाषा और संगीत का एक अदभुत संगम दिखाई पडता है, और विविध प्रकार के बोल/शब्द विभिन्न अंदाज़ या शैली के रागों या सुरों के सामंजस्य से एक रंगबिरंगी कलाचित्र या मेहकता हुआ गुलदस्ता बना देते है.

आज कल दृष्य और श्राव्य माध्यम में प्रतिमा का महत्व ज़्यादा है बनिस्बत प्रतिभा के या उस गीत के भाव पक्ष या सुर लालित्य के.मगर सन १९५० के बाद के दशकों के फ़िल्मी गानों को देखने और सुनने का माध्यम मिलता था केवल फ़िल्म (जो एक या दो बार ही देखी जाती थी,और कई फ़िल्में गानों के repeat value के कारण लोकप्रिय हुई) या फ़िर आम आदमी को नसीब था रेडिओ पर बार बार सिर्फ़ सुन पाने का मौका.(रेडियोग्राम भी कुछ धनी लोगों तक ही सीमित था.)

इसीलिये गीत में उसके शब्द, भाव, सुर संयोजन आदि की महत्ता अधिक थी, और इसीलिये वे गीत शाश्वत हुए.यही बात है की मेलोडी कभी पुरानी नही होती. जैसे बालक की मुस्कान, भक्तिभाव से भरी भक्त की निगाहें, या किसी फ़ूल पर पडी सुबह की ओस हमेशा शाश्वत है, वैसे ही ये गीत.

फ़िल्मी गीतों के इस सुवर्णकाल में जहां कंटेंट का महत्व अधिक था, हमें नसीब हुए संगीतकार जैसे अनिल विश्वास, नौशाद, रोशन , सचिन देव बर्मन, सलिलदा, और शंकर जयकिशन. साथ ही हम रूबरू हुए ऐसे गीतकारों से, जिन्होने बडे ही सादगी से, हल्के फ़ुल्के बोलों के ज़रिये भावपूर्ण गीत दिये जो बरसों के बाद भी आज हमारे स्मृति में बाबस्ता है,जैसे- शैलेन्द्र , साहिर, शकील बदायुनी आदि, और हसरत जयपूरी.

जयपुर के इकबाल हुस्सैन ने राधा नाम की एक लडकी के प्रेम प्रसंग में असफ़ल होने पर बंबई की राह पकडी. अपने नाना फ़िदा हुसैन ’फ़िदा’,जो कवि नीरज की तरह शायरी पेश करते थे, की शागिर्दी में उर्दु अदब में उन्होने कदम रखा तो अपना तखल्लुस रखा हसरत जयपुरी और कभी बेस्ट कंडक्टर तो कभी सुपर सिनेमा में बुकिंग क्लर्क, तो कभी ऑपेरा हाउस के बाहर फ़ूटपाथ पर खिलौने या कपबसी बेचते हुए उन्होने अपना फ़िल्मी करियर शुरु किया.

वहीं कॅन्टीन में शंकर जयकिशन को और पृथ्वीराज कपूर को शायरी सुनाई और राज कपूर के बरसात से आगाज़ किया अपना फ़िल्मी गीतों का वह सुहाना सफ़र जिसने हमें ३५० से अधिक फ़िल्मों में २००० से भी ज़्यादा गीत दिये. जिया बेकरार है, यह सबसे पहला गीत,जिसे शंकर नें स्वरबद्ध किया, और पहला युगल गीत छोड गये बालम जिसकी धुन जयकिशन ने बनाई.

शंकर जयकिशन , राज कपूर की उनकी इस बेमिसाल जोडी में साथ थे उनके ही जैसे एक और प्रतिभावान और छायावादी कवि शैलेन्द्र!! और बनने लगे , गढ़ने लगे वे अनेक कालजयी गीत जिन्हे आज भी मन के किसी कोने में हमने सजाये रखे है.मीठे, मोहक, सीधी साधी हिंदी और उर्दु ज़ुबान में कसीदाकारी किये हुए वो गीत - जैसे की हम आपस में गुफ़्तगु ही कर रहे हों.

Friday, September 19, 2008

चश्मे बद्दूर..

हसरत जयपुरी

परसों थी सत्रह तारीख.17 सप्टेम्बर.

करीब नौ साल पहले १७ तारीख सन १९९९ को प्रसिद्ध उर्दू शायर/कवि जनाब हसरत जयपुरी इन्तेकाल फ़रमा गये, और हिंदी फ़िल्मों के गीत संगीत के इतिहास में अपना नाम सुनहरे हर्फ़ों में दर्ज़ करा गये.

उनके गीतों और जीवनी पर कुछ लिखने की तमन्ना थी , और हफ़्ते भर पहले से तैयारी भी चल रही थी.

मगर अचानक किसी कारणों से फ़िर लेट हो गये. इस बार एक दुर्घटना में पीठ और बायें हाथ पर पट्टा चढ गया.इसलिये क्षमा. अगर संभव हुआ तो कल ज़रूर कोशिश करूंगा, अगर इज़ाज़त मिली तो.

अल्लाताला ने उन्हे ज़न्नत तो ज़रूर बक्षी होगी, वे भी तो मुरीद होंगे उनके गीतों के...

हम भी उन्हे और उनके सभी गानों को याद कर अपनी श्रद्धांजली ज़रूर दें.

Monday, September 15, 2008

मुकेश और आतंकवाद !!!


मुकेश और आतंकवाद !!!

आप चौंक गये होंगे, एक अनहोनी सी बात, दूर दूर तक का कोई नाता नहीं.

मगर अभी मैं जिस हादसे से गुज़रा और उससे निकल पाया, वह भी एक बताने वाला वाकया.अपनी संगीत बिरादरी के साथ बांटने जैसी.

आप से कहा था कि आशा भोंसले के उपर कुछ लिखूंगा तो नही लिख पाया. आप भी कहते होंगे, गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया...मेरे व्यवसाय की वजह से मुझे यकायक कूच करना पडता है.इन्जिनीयरिंग के जो प्रोजेक्ट चल रहे है, उनका तकाज़ा है.

अभी किसी काम के सिलसिले में मुझे एक बेहद अल्प प्रवास पर दोहा और अबु धाबी जाना पडा. दोहा (कतर) के एयरपोर्ट के काम की वजह से, लौटते समय अबु धाबी में विमान बदलनें के लिये उतरना पडा, तो कस्टम चेकिंग की औपचारिकता चल रही थी.

हमारा जब चेकिंग चल रहा था , तो एक अरब अफ़सर मेरे पास आकर मुझे जबरन अंदर ले जाने लगा. मैनें पूछा यह क्यों? तो पता चला कि कुछ आतंकवादीयों की तलाश हो रही थी, और शायद मेरे नाक नक्श और डील डौल की वजह से मुझे भी हिरासत में ले लिया गया.

अंदर कुछ 7-8 व्यक्ति और थे हिरासत में, और सघन पूछ्ताछ चलने लगी. सबके सामान को खोल कर जांचा जाने लगा.

मेरे पास तो क्या था, कुछ ज़रूरी व्यक्तिगत सामान, और हमेशा की तरह मेरा लॆपटॊप एवम कुछ सी डी , अपने प्रोजेक्ट की और कुछ गानों की- मुकेश और मन्ना दा.

जब कुछ नही मिला तो उन्होने अपना मोर्चा सी डी की तरफ़ खोला. कहा की बता दो, अभी भी मौका है , या तो कोई एटोमिक विषय पर कुछ गलत जानकारी हो या फ़िर पोर्नोग्राफ़ी की फ़िल्में. मैने बेझिझक कहा, कुछ नही है, ये तो गानों की सीडीयां है, मुकेश और मन्ना डे पर. संयोग से , मुकेश की एक किताब भी निकल आयी, जो मै अभी पढ रहा था. वह बोला,ये तो सभी कहते है, बाहर कुछ लिखा होता है, अंदर कुछ.

यह सब देख कर उसने अपने वरिष्ठ अफ़सर को बुलाकर यह सब दिखाया.उसके nameplate पर ओमर अब्दुल्ला नाम पढ पाया मैं . उसने बडे रूखे अंदाज़ में पूछा- What Mukesh ?

मैने समझाया- कुछ मुकेश के बारे में तारीफ़ के पुल बांधे, और किताब दिखाई. उसने सीडी चेक करने का आदेश दिया.

मेरा blood pressure बढने लगा, अगले विमान से निकलना जो था . उनसे बिनती की, मगर वे टस से मस नही हुए.

संयोग से सबसे पहले उनके हाथ में लगी कुछ साल पहले रिकॊर्ड की गई मुकेश के गीत पर मेरे आवाज़ के गानों की सीडी, और पहला गीत था - सारंगा तेरी याद में.

वह सिनीयर अफ़सर बैठ गया, बडे गौर से सुनने लगा.मैने कहा- अगली सीडी लगाऊं? उसने कहा- No, continue this.

मैं गरीब ,आशा की कुछ किरण के इंतेज़ार में रुक गया. आज संगीत की सेवा का फ़ल शायद मिल जाये यह दुआ करने लगा.

फ़िर आया गीत- ये मेरा दीवानापन है..

वह भी सुना पूरा. अब मैं आश्वस्त सा हो चला था कि मुकेश या इन मेलोडी भरे गीतों पर मेरा मर मिटना मेरा दीवानापन नही है शायद. इधर समय बीत रहा था. किसी ने कहा - आंखों की पुतली का टेस्ट भी लेना बाकी है अभी. पर ओमर अब्दुल्ला था जो बेगानी शादी मे दिवाना हुए जा रहा था.

अगले गीत - सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं को सुनने के बाद वह चौंक कर उठा,समय ज़्यादा हो गया था शायद और ज्युनियर के कान में कुछ फ़ुसफ़ुसा कर निकल गया. कुछ शब्द मेरे कानों में पडे - मुकेश .. बंदा..

मैं अगले दिव्य की प्रतिक्षा में अपने आप को मज़बूत करने लगा.मगर उस ज्युनियर अफ़सर नें बडे शालीनता से कहा- You may go now!!

मैं चौंक पडा, भगवान को बार बार शुक्रिया कहा और उस अफ़सर को भी , उस फ़रिश्ते ओमर अब्दुल्ला को भी. पूछ ही बैठा - यह क्या चमत्कार है?

तो वह बोला- He said यह मुकेश का बंदा है, यह मुज़रिम(दहशतगर्द) नही हो सकता !!!इसे छोड दो....

मैं चकित था, मेरी आंखों में अश्रु उतर आये थे, कितनी बडी बात कह गया वह बंदा, और कितने बडे उपकार किये मुकेशजी नें मुझ पर!! पलकें झपका कर मै आंसू सुखाने के असफ़ल प्रयास में लग गया.

मेरी वह सभी सीडीयां प्यार से ’जप्त’ कर लीं गयीं, और मुझे छोड दिया गया. खुदा का शुक्र था कि मेरे पास लॆपटॊप में थे वे गाने.

बाद में पता चला कि जनाब ओमर अब्दुल्ला साहबनें हैदराबाद से एल.एल.बी किया था और मुकेश के दिवानों में वे भी शुमार थे!!!

आगे कुछ भी लिखने की , कहने की गुंजाईश ही नही है. मेरे मन को आपने पढ ही लिया होगा. आप के मन में उठती बातें आप लिख सकें तो मुझ पर करम और मुकेश जी पर आपके प्रेम की बानगी..

सारंगा तेरी याद में.. मुकेश ( मूल गीत नहीं )



कहने कि ज़रूरत नहीं की विमान में बैठ कर मैं यह गाने लगा..

सुहाना सफ़र ये मौसम हसीं...


Saturday, September 6, 2008

एकलव्य - सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं


गुरु पर्व
(वो जब याद आये, बहोत याद आये)

शिक्षक दिवस पर कईयों नें तो अपने अपने माड साब को याद किया होगा.अपने अपने तईं, कुछ मन से, कुछ जतन से जो यादें संजोई रखी होगी उसकी जुगाली भी की होगी.

व्यवसाय के फ़ेर में भटकने पर मजबूर दिलीप का ये दिल अंदर से कसमसा रहा है, कि कल क्यों नही कुछ लिखा. खैर, आज ही सही. हाले दिल का बयां, दिन के गुज़रने के बाद ही हो सकता है ना?अपना ब्लॊग बाद में ही सही.

तो आज आप लोग थोडा समय मेरे मन के अंतरंग को भी दे, कुछ नितांत व्यक्तिगत , स्वगत..कल से फ़िर अपने मकाम पर वापिस.

आज यहां संगीत की बात करें तो याद आते है मेरे वो गुरुजन , जिनसे मै चाहते हुए भी सीख नही पाया-

भोपाल में उस्ताद सलामत अली खां साहब, जिन्होने मुझे शास्त्रीय संगीत सिखाने का जिम्मा लिया. करीब ६ महिने सिर्फ़ सुर ही लगवाते रहे, मगर परिक्षा में डब्बा गोल होने पर अब्बा हुज़ूर नें फ़ौरन गाने पर पाबंदी लगा दी.शिक्षक दिवस पर उन्हे याद कर ,खुद आंसू बहा के उनसे मुआफ़ी मांग लेता हूं. आज कहां है वे?

इधर इंजिनीयर बनने के बाद जब एम.बी.ए. के लिये इंदौर आया तो एक राखी बहन मिली, कल्पना जो क्लासिकल संगीत की शिक्षा ले रही थी अपने गुरु और पिता श्री मामासहाब मुजुमदार जी से.(कुमार गंधर्व के मित्र).घर पर आना जाना, सुरों की खुशबू से महकती फ़िज़ा, बघार भी लगे तो पंचम और निशाद से.. मगर फ़िर वही कहानी. मामासहाब नें भी कई बार कहा. मगर अपनी ही धुन में रहे.

उन्हे भी कल याद किया.

फ़िर अनायास ही मुड गये सुगम संगीत की ओर. गाने तो बचपन से सुनते ही रहते थे, सभी के गाने, और इसीलिये ये सभी मेरे गुरु है उन्हे भी नमन..

मन्ना डे, मुहम्मद रफ़ी, मुकेश, तलत मेहमूद, हेमंत कुमार ..

इन फ़िल्मी संगीत के मूर्धन्य गायकों ने जो पंचामृत का खजाना रख छोडा है, इसे लूट रहा हूं. अनायास ही एकलव्य की भूमिका में अपने आप को पाता हूं.यहीं से तो कानसेन बने हैं, और तानसेन बनने की ख्वाईश नही..

गज़ल की दुनिया में भी सुनने को मिला मेहंदी हसन और गु़लाम अली को..उनके लिये उनकी लंबी आयु के लिये भी दुआ की.

फ़िर अपने आध्यात्मिक गुरु भी याद आये- नानासाहेब तराणेकर महाराज, और इस्लाम की रूहानी तालीम देने वाले बाबा सत्तार जी.. और मेरी मां भी .. नमन...

नाट्य शास्त्र की अल्प तालीम के लिये विजया मेहता, और चित्रकारी के लिये सच्चिदानंद नागदेवे याद आये..

उच्च संस्कार, सादे रहन सहन और वस्तुनिष्ठ विचारों के लिये और अपने अंदर समाहित इस लेखक के प्रणेता जन्मदाता महामहोपाध्याय डॊ. प्र.ना.कवठेकर को भी व्यक्तिगत रूप से साष्टांग प्रणाम किया.

अंत में whole thing is that कि मन में जो भाव उमड रहे है,उसकी अभिव्यक्ति के लिये मन्ना दा का एक गीत यहां सुनवा रहा हुं, पूर्णतः विचारों के समीप.उसे स्वीकार किजीये.. यह मूल गीत नही है.

सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं ..



सुर की सुराही तो रीती ही रह गई.

परसों आशाजी पर कुछ.
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