Monday, January 18, 2010

है दुनिया उसीकी,ज़माना उसीका... ओ पी नय्यर और रफ़ी का दर्द में डूबा हुआ एक कालजयी गीत



आज लगभग एक महिना होने आया, आपसे मुखातिब नहीं हो पाया.

पिताजी की तबियत के कारण, काम में थोडा पिछड गया था. मूड भी नहीं बन पा रहा था. गोया कोई बडा़ उपन्यास लिखना था,जो मूड बना रहा था.

इन दिनों, रफ़ी साहब का जन्म दिन चला गया २४ दिसंबर को. मैं संयोग से एक दिन पहले मुंबई में था, तो किसी से मिलने शाम को बांद्रा में था, तो पता चला, रफ़ी साहब का पुराना घर वहीं करीब था. बस, दिल नें चाहा और मैं निकल पडा.

मगर वहां चूंकि रेडियो मिर्ची FM की टीम आयी हुई थी, अंदर जाना संभव नहीं हो पाया, क्योंकि वह कोई किसी फ़िल्म का प्रीमीयर नहीं था जो भागम भाग में चला जाता. बस सोचा बाद में सुकून से दिली सुकूं पाने के लिये फ़िर आऊंगा. बस नीचे रखी हुई उनकी फ़ियेट ज़रूर देखी, जिसमें चाबी लगी हुई थी, और वही छल्ला जो रफ़ी साहब जेब में रखते थे, जब भी वे शौक से खुद गाडी चलाते थे. ऊपर जाना फ़िर कभी ....

फ़िर महेंद्र कपूर जी का भी जन्म दिन चला गया, ९ जनवरी को. उनके साथ बिताये कुछ लमहे याद किये और उनके गाये हुए गीत सुने और गुनगुनाये.

अब परसों स्व. ओ पी नय्यर साहब का जन्म दिन था. दो साल पहले इसी दिन उनसे मिलने जा पहुंचा था उनसे मिलने, मगर मिल नहीं पाया क्योंकि वे कहीं विरार गये थे आदिवासीयों में डाक्टरी करने. कुछ दिन बाद उनके निधन की खबर आयी, तो दिल को धक्का पहुंचा कि दुर्भाग्य रहा था मेरा.

खैर, रफ़ी जी और नय्यर साहब की जोडी तो सबसे ज़्यादह मकबूल हुई. करीब १५० से अधिक गानें उन्होने रफ़ी जी से गवाये. फ़िर महेंद्र कपूर जी से. किशोरदा, मुकेशजी ,हेमंतदा,मन्ना दा तो कम ही गा पाये उनकी बनाई तर्ज़ों पर. और तो और सरदार मलिक की तरह नय्यर साहब नें भी राज कपूर के लियी रफ़ी साहब को गवाया.


रफ़ी साहब को हमेशा यही मलाल रहा कि वे हमेशा हर हीरो या नायक के चरित्र, मेनरिझ्म और अदायगी की तरह से अपनी आवाज़ को बदल लेते थे, जबकि उन्हे लता जी की यह बात बडी़ ही अच्छी लगती थी लता जी नें कभी भी अपनी आवाज़ को नहीं बदला. लताजी के अनबन के बाद जब उनकी फ़िर से लता जी के साथ दिल जमाई हुई, तो उन्होने नय्यर साहब को यह बात बताई थी. नय्यर साहब बहुत हंसे थे, और उन्होने कहा था कि आप जिसे अपनी कमज़ोरी मान रहे हैं , वह तो आपकी खा़सियत है, जो दूसरे गायक कलाकारों को संभव नहीं है.

नय्यर साहब नें कई गानों की धुन बनाईं, ठसक के साथ पंजाबी ठेके पर , ढोलक की दुडकी चाल पर .चेलो, क्लेरिनेट और सॆक्सोफ़ोन जैसे पाश्चात्य वाद्यों से लेकर सारंगी , सितार ,और बांसुरी जैसे खालिस देसी वाद्यों का भरपूर उपयोग किया. मस्त ,रंगीन रोमांटिक गानों पर महारत रखनें वाले नय्यर साहब कभी कभी दर्द भरे गानों का भी सृजन बखूबी किया करते थे .

मेरी पसंद के दो महानतम दर्द भरे गानों की फ़ेहरिस्त में आपके दो गानें है:

चैन से हमको कभी .. और

है दुनिया उसीकी, ज़माना उसीका......



जी हां , फ़िल्म कश्मीर की कली का यह गीत दर्द के एहसासात की इंतेहां बयान करता है. रफ़ी साहब के भीगे हुए स्वरों में एस एच बिहारी नें लिखे हुए भावपूर्ण अश’आर, नय्यर साहब की पेथोस से भरी तर्ज़ में जब हमारे कानों में पडते हैं ,तो ज़माने भर के मुहब्बत करने वाले प्रेमीयों के टूटे दिलों के साथ आपके संवेदनशील दिल के तार अपने आप जुड जाते हैं, और आप उसी भाव में दर्द के उस सागर में डूबने उतरने लगते हैं. साथ में प्रस्तुत सॆक्सोफ़ोन की प्रील्युड और इंटरल्युड में सोलो रेंडरिंग आपके कलेजे को चीर डालती है, और भावनाओं से लहु लुहान हो कर शम्मी कपूर, रफ़ी जी, नयार साहब और आप एकजीव हो जाते हैं
.

कौन नहीं चाहेगा इस तडप को , मेहबूब की बेवफ़ाई को जीना, भोगना?

चलिये, आपको यह गीत सुनवा देतें है. इसके विडियो को मिक्सिंग के लिये उपलब्ध कराने के लिये अल्पना जी का धन्यवाद. आप भी यह प्रयास देखें , सुनें, और पसंद आये तो दाद दिजीये. जिन्हे संगीत और रिकोर्डिंग में दिलचस्पी हो, उन्हे बता देना उचित होगा, कि यह असंभव ही है, कि किसी भी गाने का कराओके उस्के ओरिजिनल साऊंडट्रॆक से हूबहू मॆच करे. प्रस्तुत गाने की विडियो क्लिपिंग में मूल गाने को कराओके ट्रेक के साथ पहले सोफ़्ट्वेयर की मदत से कोशिश करके मिलाया, स्स्वर, ताल और लिप्स मूव्हमेंट में, फ़िर उसपर गीत रिकोर्ड किया और मिक्स किया. ऐसे प्रयोग करने सें जो दिली सुकून मिलता है, वह आप जैसे कलाकार या कवियों को पता ही है.

(आज फ़िल्मी जगत के प्रथम सिंगिंग सुपरस्टार के एल सहगल साहब की भी पुण्यतिथी है. रात को उनके गानों की समाधि में बैठूंगा)





ओडियो प्लेयर भी लगाया है, जिन्हे विडियो स्ट्रीमिंग में परेशानी आती है, उनके लिये. बाकि विडियो के लिये प्ले का बटन दबाने के बाद pause करने से थोडे देर बाद बिना रुके देख सुन सकने में आसानी होगी.

Sunday, December 20, 2009

राज कपूर और शैलेंद्र... दोस्त दोस्त ना रहा...


मैं पिछले दो महिनों से इस दिन के लिये इंतेज़ार कर रहा था. यह दिन था १४ दिसंबर, जिस दिन हमारे हर दिल अज़ीज़ , फ़िल्म जगत के सबसे बडे , सर्व श्रेष्ठ शोमन राज कपूर का जन्म दिन था, और भावुक हृदय के , मानव संवेदनाओं को अचूक शब्दों और पद्य में ढालने वाले फ़िल्मी गानों के सर्व श्रेष्ठ गीतकार शैलेंद्र की पुण्य़तिथी थी.

मगर संयोग से मेरे पिताजी को दिल के दौरे की वजह से अस्पताल भर्ती करना पडा और इसलिये मैं उस दिन पोस्ट लिखने से चूक गया. खैर कोई बात नहीं. पिताजी अच्छे हो कर घर आ गये हैं तो आप भी तो घर वाले ही हैं, अब लिख देतें हैं.

राज कपूर एक बेहतरीन फ़िल्म निर्माता , निर्देशक एवं अभिनेता थे ये हर व्यक्ति जानता ही है.मगर वे एक बेहद संवेदनशील व्यक्तित्व के इंसान थे, जिसमें ह्युमन पेथोस, मानवीय मूल्यों और करुणा के आकलन का जजबा था. साथ ही में वे एक आला दर्ज़े के संगीत मर्मग्य भी थी. मैं तो ये भी कहूंगा कि वे एक बेहतरीन संगीतकार भी थे, और उनके फ़िल्म के हर फ़्रेम के हर प्लॊट के, हर सिच्युएशन के मूड्स को वे स्वरों की भाषा में डिफ़ाईन करना या अविष्कृत करना जानते थे.

दोस्त दोस्त ना रहा...


ये गीत मुझे कई कारणों से बहुत ही दिल के करीब लगता है. मेलोडी के बादशाह संगीतकार शंकर जयकिशन के संगीत में निबद्ध इस गीत में मित्र और पत्नी के लिये नायक के भग्न हृदय के कातर विचारों को बहुत ही असरदार तरीके से भाव प्रवीण बोलों में पिरोया है कविश्रेष्ठ शैलेंद्रजी नें और उन संवेदनाओं को ,उस चुभन को भीगे हुए स्वरों में अनुनादित किया है मुकेशजी नें , जिसके कारण यह गीत एक कालजयी गीत बन गया है.

मगर अगर आपने फ़िल्म देखी हो, तो ये भी कहना पडेगा कि राज जी नें वाकई में इस गीत में अपना दिल और उसके इमोशन्स उंडेल कर रख दिये हैं. आप देखिये , ये गाना पिक्चराईज़ करना बहुत ही मुश्किल होना चाहिये था. दर्शक से खुद राज जी गीत के माध्यम से रू ब रू होते हैं, अपने नज़रिये से, अपने दिल के ज़ख्मों को बयान करते हुए.


मगर साथ में गीत के दोनों इंटरल्युडस में आप देखते हैं विज़्युअल्स का कोलाज़ , पहले राजेंद्र कुमार के चेहरे के भावों के एक्स्प्रेशन पर फ़्लेशबेक के स्मृतिचित्रों से, और बाद में वैजयंतीमाला के, जिससे उनके नज़रिये में होते हुए बदल तक को राज जी नें कमाल के एडिटिंग से दर्शाया है.


साथ में पार्श्व में शंकर जयकिशन जी के उद्वेलित करने वाले पियानो के स्ट्रिंग नोट्स, मानो आपके दिल पर हथौडे से वार कर रहे हों , और काऊंट्रा मेलोडी के साथ प्रयुक्त किये हुए वायलीन के आरी के तरह रूह को चीरते हुए स्वर, इस गीत को अमर बना देती है.

कहा जाता है,कि ये गीत शैलेंद्रजी नें भारत चीन की दोस्ती के और युद्ध के संदर्भ में लिखा था.ये भी कहा जाता है कि तीसरी कसम को बनाने के लिये जब शैलेंद्र ने ठानी तो राज कपूर नें उनको मना किया था. फ़िर इस फ़िल्म के बनने में भी राज कपूर नें लगभग असहयोग ही किया. तो सही माने में इस गीत के बोल सार्थक हुए और एक दोस्त जान से चला गया.

उधर कोई ये भी कहता है कि ये बात गलत है, क्यों कि इस फ़िल्म के लेखक फ़णीश्वर नाथ रेणु , जिनकी किताब पर यह फ़िल्म बनीं थी, नें अपने संस्मरणों में कभी ये ज़िक्र नहीं किया कि ऐसी कोई बात थी.

ज़्यादह नहीं लिखता हूं, आपको ये फ़िल्म की क्लिप दिखाता हूं, मगर एक छोटी सी गुस्ताखी के साथ, कि ये भी मेरी स्वरांजली ही है, दिलीप के दिल से....

Friday, December 4, 2009

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे


सचिन्द्र देव बर्मन, ये नाम मेरी पिछली पोस्ट पर चमक रहा था. अब भी मेरे मन में घुला घुला सा, गुनगुनाया सा नाच रहा है. कुछ भी लिख दूं, उनके लिये अधूरा सा लगता है.

और तो और, जब उनकी धुनों पर रचे गये गीत जब मैं गुनगुनाता हूं, तो वे खुद मुझमें परकाया प्रवेश से कर जाते है ,और मैं अपने गले से निकलती हुई इठलाती हुई स्वर लहरियां सुन कर,उनकी बंदिशों की मुरकीयों और हरकतों की बारीकी से और रिदम की लयकारी से अभिभूत हो कर, ना जाने किस संसार में पहुंच जाता हूं.फ़िर भी अधूरा पाता हूं अपने आप को. उनकी ये अद्भुत स्वररचना का क्षितिज़ दिखता भर है,पार जाना असंभव है.

आज इतने दिनों बाद मैं आपसे मुखातिब हूं , फ़िर भी सचिन दा की बनाई गयी धुनों के मोह जाल में अभी भी गिरफ़्तार हूं,इसलिये एक और पोस्ट पेशे खिदमत...


सचिन दा फ़िल्मों के चयन को लेकर बेहद चूज़ी थे. वे सिर्फ़ उन्ही के लिये संगीत देते थे जिन्हे संगीत की समझ थी.
गायक के चुनाव करते हुए भी वे उतने ही चूज़ी होते थे. सुना है, जिस दिन उनकी रेकॊर्डिन्ग होती थी, वे सुबह गायक से फोन से बात करते थे और बातचीत के दौरान पता लगा लेते थे कि उस दिन उस गायक या गायिका के स्वर की क्या गुणवत्ता है.एक बार किशोर दा के किसी पुराने नटखट गाने को सुबह कहीं रेडियो पर सुना, और एकदम फ़ोन घुमा दिया- किशोर, आज की रिकोर्डिंग में मुझे छिछोरा पन नहीं चलेगा... किशोर दा सोचते ही रह गये कि जितनी संजीदगी से उन्होने उस दर्द भरे गीत की रिहल्सल की थी, उसमें छिछोरापन कहां से दिख गया दादा को!!

संगीत के कंपोज़िशन के साथ ही वाद्यों के ओर्केस्ट्राइज़ेशन की भी बारीकीयां उन्हे पता थी.एक दिन किसी कारणवश एक की जगह दो वायोलीन वादक रिकॊर्डिन्ग में बजा रहे थे, तो दादा नें कंट्रोल केबिन से साज़ों के हुजूम में से यह बात पकड़ ली.उन्होने कहा, मैं एक ही वायोलीन का इफ़ेक्ट चाहता हूं.

वे इस बात को मानते थे, और अपने बेटे राहुल को भी उन्होने यह बात बडे़ गंभीरता से समझाई थी कि हमेशा कुछ नया सृजन किया करो, ताकि लोगों में यह आतुरता बनी रहे, कि अब क्या. जब तीसरी मंज़िल फ़िल्म के लिये पंचम ने सभी गीत लगभग वेस्टर्न स्टाईल से दिये तो दादा बेहद खुश हुए. वे धोती कुर्ता ज़रूर पहनते थे मगर मन से बडे आधुनिक या मोडर्न थे.


पंचम से वे बेहद प्यार करते थे. एक दिन जब वे कहीं टहल रहे थे तो बच्चों के किसी समूह में से एक ने कहा- देखो, वे आर डी बर्मन के पिताजी जा रहे हैं. वे उस दिन बडे खुश होकर सब को पान खिलाने लगे (वे जब खुश होते थे तो सब को पान खिलाया करते थे)

किसी कारणवश प्यासा के समय उनकी बातचीत लता से बंद हो गयी थी. तो उन्होने आशा से गाने गवाये, मगर बाद में पंचम की वजह से छोटे नवाब की रिकोर्डिंग के समय वह रूठना खत्म हुआ.

सचिन दा से समय तक गीत पहले लिखे जाते थे, बाद में धुन बनाई जाती थी. दादा इतने नैसर्गिक कम्पोज़र थे कि मिनटों में धुन बना लेते थे, और इसीलियी उन्होने यह प्रथा पहली बार डाली कि पहले धुन बनेगी बाद में उसपर बोल बिठाये जायेंगे. साहिर, मजरूह और शैलेंद्र के साथ उनके कई गीत बनें, मगर देव आनंद नें नीरज, हसरत और पं. नरेन्द्र शर्मा से भी कई गीत लिखवाये जो हिन्दी में साहित्यिक वज़न रखते थे. पं. नरेन्द्र शर्मा से तो वे बडे़ खुश रहते थे क्योंकि वे भी मिनटों में कोई भी गीत रच लेते थे, वह भी बहर में, और विषय से बाबस्ता.

प्यासा फ़िल्म में गुरुदत्त नें उनसे एक गीत बिना किसी साज़ के भी बनवाया और रफ़ी से गवाया था. (तंग आ चुके है कश्मकशे जिंदगी से हम- जो बाद में फ़िल्म लाईट हाऊस में एन.दत्ता के निर्देशन में आशा नें भी गाया). साहिर की एक काव्य संग्रह 'परछाईयां' से उन्होने कुछ चुनिंदा रचनायें चुनी और सचिन दा से धुन बनवाई. जैसे जिन्हे -नाज़ है हिन्द पर वो कहां है, जाने वो कैसे लोग थे - फ़िल्म के बाकी गानो में आपको सचिन दा के अंदाज़ के गानें मिले होंगे- सर जो तेरा चकराये, हम आप की आंखों में आदि. मगर आपनें भी सुन ही लिया है, कि दूसरे गीत कितने अलग ढंग से संगीत बद्ध किये दादा नें.

यह फ़िल्म उनके गुरुदत्त और सचिन दा के जोडी़ का एक काव्यात्मक ऊंचाई प्राप्त करने वाला कमाल ही था, जो प्यासा के बाद दादा और साहिर के मनमुटाव के बाद टूट गया. सचिन दा का बोलबाला तब इतना बढ़ गया था कि गुरुदत्त को कागज़ के फ़ूल फ़िल्म के समय दोनों में से जब एक को चुनना पडा़ तो उन्होने दादा को ही चुना.(अबरार अल्वी अब नहीं रहे, उन्होने ये किस्सा कहीं बताया था, तो किसी और मौके पर वह भी सुना देंगे)

उनके गीतों में जो लोकगीतों की महक थी वह उत्तर पूर्व भारत के भटियाली, सारी और धमैल आदि ट्रेडिशन से उपजी थी. उनकी आवाज़ पतली ज़रूर थी मगर दमदार और एक विशिष्ट ठसके वाले लहजे की वजह से पृष्ठभूमि में गाये जाने वाले गीतों के लिये बड़ी सराही गयी.

आज फ़िर इच्छा हो रही है कि उनकी आवाज़ में भी एक गीत गाऊं -

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे...




'बड़ी सूनी सूनी सी है, ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी ' इस गीत के रिकॊर्डिंग के दो दिन बाद ही वे हमें छोड़ कर चले गये और गाने के बोल सार्थक कर गये.

Tuesday, November 3, 2009

सचिन दा और मन्ना दा की जुगलबंदी - कव्वाली - किसनें चिलमन से मारा...


सचिन देव बर्मन एक ऐसा नाम है, जो हम जैसे सुरमई संगीत के दीवानों के दिल में अंदर तक जा बसा है. मेरा दावा है कि अगर आप और हम से यह पूछा जाये कि आप को सचिन दा के संगीतबद्ध किये गये गानों में किस मूड़ के, या किस Genre के गीत सबसे ज़्यादा पसंद है, तो आप कहेंगे, कि ऐसी को विधा नही होगी, या ऐसी कोई सिने संगीत की जगह नही होगी जिस में सचिन दा के मेलोड़ी भरे गाने नहीं हों.

आप उनकी किसी भी धुन को लें. शास्त्रीय, लोक गीत, पाश्चात्य संगीत की चाशनी में डूबे हुए गाने. ठहरी हुई या तेज़ चलन की बंदिशें. संवेदनशील मन में कुदेरे गये दर्द भरे नग्में, या हास्य की टाईमिंग लिये संवाद करते हुए हल्के फ़ुल्के फ़ुलझडी़यांनुमा गीत. जहां उनके समकालीन गुणी संगीतकारों नें अपने अपने धुनों की एक पहचान बना ली थी, सचिन दा हमेशा हर धुन में कोई ना कोई नवीनता देने के लिये पूरी मेहनत करते थे.उनकी हर धुन सिर्फ़ सुनाती ही नहीं थी, मगर उस भाव को दर्शाती थी. याने आप सिर्फ़ धुन सुन कर उस गीत के परिदृश्य का इंतेखाब कर सकते हैं आसानी से.


उनके बारे में सही ही कहा है, देव आनंद नें (जिन्होने अपने लगभग हर फ़िल्म में - बाज़ी से प्रेम पुजारी तक सचिन दा का ही संगीत लिया था)- He was One of the Most Cultured & and Sophisticated Music Director,I have ever encountered !

किशोर कुमार को एक अलग अंदाज़ में गवाने का श्रेय भी दादा को ही जाता है. उन्होंनें देव आनंद के लिये किशोर कुमार की आवाज़ को जो प्रयोग किया वह इतिहास बन गया. बाद में राजेश खन्ना के लिये भी किशोर की आवाज़ लेकर किशोर को दूसरी इनिंग में नया जीवन दिया, जिसके बाद किशोर नें कभी भी पीछे मुड़ कर नही देखा.

उसके बावजूद, सचिन दा ने देव आनंद के लिये हमेशा ही किशोर से नहीं गवाया, बल्कि रफ़ी साहब से भी गवाया, जैसे जैसे भी गाने की ज़रूरत होती थी. तीन देवियां में - ऐसे तो ना देखो, और अरे यार मेरी तुम भी हो गज़ब, तेरे घर के सामने में तू कहां , ये बता और छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा,गाईड़ में तेरे मेरे सपने और गाता रहे मेरा दिल, आदि.


अभी फ़िल्मी संगीत के आकाश पर विद्यमान एक महान , सर्वश्रेष्ठ गायक मन्ना डे साहब को दादासाहेब फ़ालके पुरस्कार से नवाज़ा गया. मन था कि उन पर भी कुछ लिखूं. मगर आज मन ये हो रहा है कि दिलीप के दिल से स्ट्रेट ड्राईव्ह मारूं और आपको आगे कुछ भी अधिक लिखने की बजाय, अपने एक खास कार्यक्रम - दिल का हाल सुने दिल वाला में से एक कव्वाली सुनाऊं, जिसे मन्ना दा नें अपने हरफ़न मौला स्वर में गाया है, और संगीत दिया है सचिन दा नें.
सचिन दा नें कव्वालीयां कम ही कंपोज़ की हैं, मगर यहां अपने आपमें कव्वाली और कोमेडी का बढियां ब्लेंडिंग किया है. बाकी रही बात मन्नादा के बारे में , तो हमारे हर दिल अज़ीज़ प्रसिद्ध उदघोषक , एंकर और मेरे अनुज मित्र श्री संजय पटेल से ही सुनें , जिनकी रसभरी वाणी में भी उनकी लेखनी की तरह सरस्वती का निवास है:


किसने चिलमन से मारा......

Tuesday, October 27, 2009

बिछोह की पीडा़ का टोटल रिकॊल - मदन मोहन का संगीत


अभी रविवार को दोपहर को टाईम्स नाऊ चेनल पर टोटल रिकॊल में संगीत सम्राट मदन मोहन पर यादों के झरोकों से उनके जीवन के अंतरंग क्षणों से और सुर संयोजन के अनेक पहलुओं से हमारा तार्रुफ़ करवाया गया, तो मेरे मन की खिडकियों से दिल का पंछी सुरमयी गगन में उड चला और याद आने लगे उनके असंख्य गीत जिन्होंने हमारे सभी संगीतप्रेमी जीवों के दिलों पर बरसों से राज किया है.

मदन मोहन जी जो विरासत में हमारे लिये खज़ाना छोड गये हैं उनको हम अपने अंतरंग मन के सेफ़ डिपोझिट वाल्ट में रख कर दिवाली दिवाली बाहर निकालते हैं , साफ़ सुफ़ करने के लिये, और फ़िर चमका के वापिस रख देते, हैं, कि कही वक्त की ज़ालिम हवायें उन्हे मलीन ना कर दें. कभी कभार उनके गाने यहां वहां ब्याज में सुन लेते हैं, मूलधन तो सेफ़ ही रखा रहता है.

अभी यह महिना कुछ अलग रहा है मेरे लिये.मेरे बरसों पुराने मित्र अरुण में मुझसे एक बार बातें की.मुझे याद आया वह गाना -

मुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी ,हैरान हूं....

क्योंकि वह किसी अनजान बात से खफ़ा हो कर खुद ही दूर चला गया मेरी ज़िंदगी से . आठ दस साल हो गये. बहाना दिया आध्यात्म का. फ़िर पिछले दिनों एक दिन उसका पत्र आया मेरी बिटिया को, जिसे वह बेहद स्नेह रखता था.साथ ही एक छोटी सी मेमोरी चिप भेजी जिसमें पुराने गीतों का खज़ाना था, जो हम बचपन से एक साथ सुनते आ रहे हैं, और पसंद करते आये थे. बस उसे मुकेश पसंद नहीं था, तो मैं उसके सामने नहीं सुनता था.(आज भी कभी मुकेश का गाना सुनाई पडता है तो मन सहसा जांचने लगता है कि कहीं वह तो नहीं है आसपास).

उसमें लताजी के गाये दो गीत बडे ही शिद्दत से दिल को छू गये, जो काफ़ी समय के बाद सुने मैने-

और ना चाहते हुए भी आंसूओं का सैलाब नैनों के बांध तोड कर बहने को बेकरार हो उठा. मगर पुरुष होकर और साथ ही तथाकथित बुद्धिजीवी और मेच्युरिटी के नकाब के ओढ़ने का फ़ायदा लेकर जज़बातों के बहाव को रोक दिया.

पहला गीत है खुशनुमा - लताजी के अल्हड, मासूम स्वर में...

एक बात पूंछती हूं , ए दिल जवाब देना....

कुछ भी याद नहीं आ रहा था कि यह गीत किस फ़िल्म का है,और इसके संगीतकार का क्या नाम है. स्थाई के सुरों की मेलोडी (शंकर) जयकिशन के धुनों के काफ़ी करीब लगी,अंतरा तो और नज़दीक लगा. मगर इंटरल्युड के वाद्य संयोजन बिल्कुल मदन मोहन जी को नामांकित करते हैं. मेरे एक मित्र श्रीधर कामत को मैने पूछा ,जिन्हे सैकडों पुराने गानों की जन्मकुंडलीयां अमूमन याद रहती हैं. वे भी भूलवश इसे बेटी बेटे का गीत बता गये. मगर बाद में नेट पर पता चला कि ये गीत फ़िल्म सुहागन का था जिसे मदन जी नें ही संगीतबद्ध किया था. आईये सुनिये ये गीत विडियो पर और ऒडियो पर भी,
(ताकि सनद रहे- बकलम यूनुसजी)

दूसरा गीत है, मुझे याद करने वाले, तेरे साथ साथ हूं मैं - जो फ़िल्म रिश्ते नाते के लिये मदनजी नें ही सुरों से संवारा है. ना जाने क्यों , हसरत जी का लिखा हुआ ये गाना संवेदनाओं के सभी बंधन तोड गया.ये गाना भी लताजी नें ही गाया है, और इसमें भी मुझे जयकिशन जी के कहीं कहीं दर्शन होते हैं(शायद आम्रपाली का गीत तुम्हे याद करते करते कुछ इसी जोनर का है)वैसे लताजी के बारे में बार बार क्या कहना? उनके अलावा और कोई ये गीत गा सकेगा - इतनी पीडा़ , उद्वेग और विरह की टीस की इतनी गहरी अभिव्यक्ति के साथ- यह संभव ही नहीं.और हसरत जी के बोल - एक एक शब्दों पर गौर करें और आहें भरने का हिसाब नहीं रख पायेंगे आप.

वैसे पता नहीं क्यों , लगभग इसी सिच्युएशन का एक और गीत हमेशा सुनता आया था और दिल के काफ़ी करीब है भी -
तू जहां जहां चलेगा , मेरा साया साथ होगा.. (जो इसी राग में गूंथा गया है)

मगर यह गीत उसके भी पार चला गया, और कहीं ना कहीं मेरे मित्र के बिछडने के सांकेतिक एहसास को एकदम से ताज़ा कर गया वह पुराना ज़ख्म- जिसे नाज़ों के साथ पाल कर रखा था, जिसपर रोज़ पट्टी बांध कर रखता था, और कभी कभार खपली उखेड भी देता था- ताकि ज़ख्म हरा रहे, और यार के बिछोह की पीडा का एहसास हर पल इसलिये रहे कि ज़ख्म भर जाये तो एक अजीब मानूस कहीं अजनबी हो ना जाये...

गीत आप भी सुनिये...

मुझे याद करने वाले, तेरे साथ साथ हूं मैं...




शायद अरुण के टफ़ एक्स्टिरीयर के खोल के अंदर की कोमल हृदय की भावाभिव्यक्ति हो मेरे लिये, या फ़िर मेरे ही मन के भाव शब्दों में पिघलकर इस गीत में घुस गये हों. रोना तो अब लाज़मी ही है. उस एहसास-ए-दोस्ताना के टोटल रिकॊल के लिये, या उन विरह के भीगे हुए बोलों के साथ सुरों की मेलोडी , या अंतरे में १०० से भी अधिक साज़िंदों के कमाल के स्कोर के पार्श्व में पॆथोस के कोरस का एक खास अंदाज़ (शायद ट्रेमेलो या वाईब्रेटो कहते है इसे- एक निजी भेंट में अमितकुमार ने वाईब्रेटो कहा था और अन्नु कपूर नें ट्रेमेलो- अगर आपमें से कोई रोशनी डाल सके तो..मुझे लगता है इसे फ़ाल्सेटो कहते हैं)

वैसे एक गीत इन्ही शब्दों पर और है मल्लिका पुखराज जी जी की खनकभरी आवाज़ में...

अब आप मुझे माफ़ करेंगे अगरचे आप भी मदन मोहन जी की इस महान स्वर रचना को सुन कर रो पडे हों...

और अगर नहीं रोये.... तो माफ़ी मांग लिजियेगा... मुझसे नहीं, मदन मोहनजी से....

Wednesday, October 21, 2009

किशोर दा के कॊलेज जीवन के संस्मरण!- ये दिल ना होता बेचारा,कदम ना होते आवारा-




आपको शायद याद ही होगा कि हमारे हर दिल अज़ीज़ गायक शेहंशाह जनाब रफ़ी साहब की पुण्यतिथी ३१ जुलाई को मैने श्रद्धांजली के तौर पर एक विडीयो बनाया था --नाचे मन मोरा मगन तिकता धिगी धिगी....
(http://dilipkawathekar.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html)

वह तो एक संयोग था, मगर इस बार हमारे लाडले , मस्ताने ,बहु आयामी, हर हुन्नरी (ऒल राउंडर) कलाकार , गायक किशोर दा की पुण्य तिथी थी १३ अक्टूबर को,जिस दिन इस दिल दिवाने नें किशोर दा की याद में एक और बार एक विडीयो बनाया.

संभव है कि बहुत ही कम लोगों को ये पता होगा कि किशोरदा नें अपनी कॊलेज की पढाई इंदौर में पूरी की. वे यहां के प्रसिद्ध सौ से अधिक साल पुराने महाविद्यालय " इंदौर क्रिश्चियन कॊलेज "में एडमिशन लिया था और इस महाविद्यालय में सन १९४६ से लेकर १९४८ तक तीन सालों में पढाई के अलावा और कई गतिविधियां की.

उन्होने अपने भाई अनूप कुमार के साथ कॊलेज युनियन , होस्टल युनियन में सक्रिय कार्य किया. कॊलेज पत्रिका में लेखन, प्रोफ़ेसरों के साथ मस्ती, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लिया. उन्होंने कई नाटक मंचित किये और संगीत की मेहफ़िलें सजाई.

जैसा कि अपनी पिछली पोस्ट में लिख चुका हूं, मैं उनके जन्म स्थान खंडवा नहीं जा सका, इसलिये जा पहुंचा उनकी गुरुकुल की पावन स्थली में, और वहांकी फ़िज़ा में घुली किशोर दा की सुरमई यादें, कण कण में से झांकती किशोर दा के मधुर , मज़ाहिया व्यक्तित्व की छबि को दिल में उतारता चला गया. और हमेशा अब तो आप सभी हम सफ़र सुरीले मित्रों का भी खयाल था ही, इसलिये अपना छोटा केमेरा भी ले गया.


इसलिये , आज पेश है, वहां की कुछ झलकीयां, याने कॊलेज परिसर,जहां उन्होने अपने जीवन के हसीन पलों को जिया......
वह फ़ूटबॊल गाउंड,जहां वे और अनूप कुमार फ़ूटबाल मेच खेला करते थे......
होस्टल का वह कमरा नं. ४ , जिसमें कभी उनका रैनबसेरा हुआ करता था,जहां उन्होने अपने जीवन के रंगीन सपने देखे....
वह ब्रॊंसन हॊल जहां उन्होने अपने नाटक खेले, मस्ती भरे गीत गाये,और अपनी गायन एवम अभिनय प्रतिभा को निखारा....
वह इमली का पेड़, जहां उन्होने कई धुनों का सृजन किया जिन्हे हमने बाद में उनकी फ़िल्मों में सुना....
वह केंटीन जहां उनके पांच रुपये बारह आने अभी तक बकाया है....
उनकी क्लास रूम जहां उनकी अंग्रेज़ी के टीचर से झडपें हुआ करती थी....
वह दुध जलेबी की सुबह के नाश्ते की दुकान, जो उन्हे उनके घर की , खंडवा की याद दिलाती थी.



मैं उनके चित्र यहां प्रस्तुत करता हूं, और साथ में पेशे खिदमत है, दिलीप के दिल से इज़हारे अकीदत के तौर पर एक Audio Visual Tribute जिसे देख कर सुनकर आप आनंदित होंगे, और उन लोगों को भी सुकून हासिल होगा जो किशोर दा को इंतेहां मुहब्बत करते हैं और इबादत करते हैं.इसमें आप क्रिश्चियन कॊलेज के परिसर,ब्रोंसन हॊल जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे,क्लास रूम, होस्टल का परिसर और कमरा नं ४,वह इमली का पेड़ जहां जाकर मैं भी एक गीत गाकर आया, जैसे कि किशोर दा के मंदिर में जाकर आरती गा रहा हूं.


वह इमली का पेड़, जिसके नीचे बैठ कर किशोर दा अलग अलग धुनों का सृजन किया करते थे.यही वह जगह है, जहां उन्होनें प्रसिद्ध गीत " मैं हूं झुम झुम खुम झुम झुमरू..." की धुन बनाई थी, और अपने दोस्तों को सुनाई थी.




ये चित्र ब्रोन्सन हाल का है जहां किशोर दा के कार्यक्रम हुए . अगला चित्र उस स्टेज पर रखे हुए डायस टेबल का है, जिसके पीछे छुपकर किशोर दा गाते थे. सुना है, कि तब वे बडे ही शर्मीले स्वभाव के थे , और जब भी उनको गाना गाने को कहा जाता , वे घबरा जाते थे.फ़िर दोस्तों ने ये शगुफ़ा किया कि उन्होने इसके पीछे छिपकर गाना गाया, और उनके मित्रों में से एक नें सामने होंठ हिला कर गाने का अभिनय किया(फ़िल्म पडोसन का पार्श्व गायन याद है!!)

बाद में एक बार लद्दाख में सुनील दत्त जी के साथ अजंता आर्ट्स के तले सीमा पर जवानों के मनोरंजन के एक कार्यक्रम में जब किशोर दा को गाने के लिये कहा गया, तो पता नहीं क्यों, वे फ़िर से झिझकने लगे, और गाने से मना करने लगे. बडी मुश्किल से सुनीलजी नें उन्हे पर्दे के पीछे से गाने के लिये मनाया, और ऐन वक्त पर, पूर्व योजना के अनुसार गाने के बीच में पर्दा उठा दिया!!!


जिस होस्टल में वे रहे वहां के चित्र - गलियारा और कमरा नं ४.







आपको फ़िल्म चलती का नाम गाडी का ये गीत तो याद ही होगा - पांच रुपैय्या बारह आना.....
जी हां जनाब, ये जुमला उनके छात्र जीवन से ही जुडा हुआ है. किस्सा हुआ यूं था कि इसी कॊलेज के कॆंन्टीन में किशोर दा के पांच रुपैय्या बारह आने बाकी थे जो अभी तक बकाया हैं!!(चित्र केंटीन वाले का)

मैने इस फ़िल्म को बनाने में काफ़ी जद्दोजेहेद भी की क्योंकि मैं एक एमेच्युअर हूं और इसे एडिट करने और ऒडियो मिक्स करने में दो चार दिन लग गये.इसलिये, आप मुझे क्षमा करेंगे, अगर कुछ ग़लती हुई हो तो.



जिनके कंप्युटर पर स्पीड की वजह से ये फ़िल्म नहीं चल रही हो, उनके लिये ही ये सभी चित्र भी लगाये गये हैं. साथ में दिलीप के दिल से ये गीत भी सुन सकते हैं- ये दिल ना होता बेचारा...

Friday, October 16, 2009

किशोर दा के साथ- कश्ती का खा़मोश सफ़र -



अभी परसों ही हमारे लाडले , मस्ताने ,ऒल राउंडर कलाकार , गायक किशोर दा की पुण्य तिथी थी. १३ अक्टूबर १९८७ को वे हमको दर्द भरा अफ़साना सुना कर हमेशा के लिये इस ज़िंदगी के सुहाने सफ़र को खत्म कर के कहीं दूर चले गये. दूर गगन के इस राही नें, इस मुसाफ़िर नें हमें अपने खुशनुमा व्यक्तित्व से हंसाया और दुखी मन के स्वरों द्वारा रुलाया.

किशोर दा का जन्म खंडवा में हुआ था. खंडवा याने हमारे शहर इंदौर से ढाई घंटे के रास्ते पर एक छोटा सा कस्बा, जहां किशोर दा का बचपन गुज़रा. आपको सभी को पता ही है, कि वे अपने जन्मस्थान से कितनी मुहब्बत करते थे, कि उन्होनें यह वसीयत भी कर रखी थी कि उनका अंतिम संस्कार खंडवा में ही किया जाये.

इस बार मैंने सोचा था कि उनके जन्मस्थान खंडवा जाऊं , जहां उनके जन्म दिन और पुण्यतिथी पर उत्सव सा माहौल होता है. सारे देश के कोने कोने से किशोर दा के दीवाने यहां आते हैं ,उनके पैतृक घर और समाधि स्थल को बडे भक्तिभाव से विज़िट करते हैं. वहां स्थानीय लायंस क्लब द्वारा एक कार्यक्रम भी रखा था, जिसमें मुझे भी किशोरदा के गीत गानें का आमंत्रण था. मगर किसी कारणवश वह निरस्त हो गया.

तो मैने सोचा कि हमेशा की तरह आज मैं फ़िर उसी जगह जाऊं जहां की पावन ज़मीं पर किशोर दा के कदम पडे थे, जिस फ़िज़ां में उनकी गायी हुई स्वरलहरीयां अभी भी अठखेलियां करती होंगी.

इसलिये मैं जा पहुंचा इंदौर के उस महाविद्यालय में जहां किशोर दा नें अपने कोलेज जीवन के तीन साल गुज़ारे.

हां, मैं बात कर रहा हूं इंदौर क्रिश्चियन कॊलेज की.

वहां की झलकीयां मैं दिवाली के बाद कुछ चित्रों और विडियो के ज़रिये पेश करूंगा.एक Audio Visual Tribute जिसे देख कर सुनकर आप आनंदित होंगे, और उन लोगों को भी सुकून हासिल होगा जो किशोर दा को इंतेहां मुहब्बत करते हैं और इबादत करते हैं.


रात को हमेशा की तरह , अपने स्टडी में बैठ कर मैने किशोर दा के पुराने दर्द भरे नगमें गाये, वो नगमें जो मैं खंडवा में गाने वाला था.

इसी बीच, जैसा कि आपको पिछले साल बताया था, किशोरदा का एक गीत मेरे ज़ेहन में बहुत गहरे बैठा हुआ है, जो मेरे किशोर वय में हुए एक मीठी याद की वजह से है.

गीत है कश्ती का खा़मोश सफ़र है, शाम भी है , तनहाई भी, दूर किनारे पर बजती है, लहरों की शहनाई भी...
आज मुझे कुछ कहना है, आज मुझे कुछ कहना है.

यह गीत किशोर दा नें सुधा मल्होत्रा के साथ गाया था, जिसमें दिलों के कोमल एहसासातों की अभिव्यक्ति बडी ही शालीन ढंग से की गयी है, जो आज की पीढी के लिये एक आश्चर्य या शगुफ़ा हो सकता है.

यह गीत मेरे किशोर वय में भोपाल में मैंने हमीदिया कॊलेज के स्टेज पर सुना था, जहां मेरे पिताजी प्रोफ़ेसर थे, और श्री मल्होत्रा थे प्रिंसिपल ,जो सुधा मल्होत्रा के पिताजी थे.तो गॆदरींग में यह गीत सुधाजी नें गाया था, और चाहा था कि कोई स्थानीय गायक उनके साथ वह गीत गाये. किसी नें मेरा नाम भी सुझाया था, मगर सुधा जी नें मुझे देख कर हंस कर बोला, अरे तुम तो अभी छोटे हो!! तुम रहने दो.

बस , आज यह गीत गा ही देता हूं, अब तो बडा हो ही गया हूं. मगर फ़िर मैंने हमारे ब्लोग जगत की प्रसिद्ध कवियत्री, गायिका, फ़ोटोग्राफ़र, पर्यटन विषेशग्य, सुश्री अल्पना वर्मा से अनुरोध किया कि इस दोगाने को मेरे साथ गायें , जो उन्होने सहर्ष स्वीकार किया और उपकृत किया. वे भी किशोर दा की तरह हर हुनर में विषेश कमाल रखतीं है!!!

इस गाने की विषेशता ये है, कि इसमें कोई कराओके का ट्रेक इस्तेमाल नहीं किया है, मगर मूल पार्श्व वाद्यों को मिक्स करनें का प्रयत्न किया गया है.आशा है आपको पसंद आयेगा.

आपको साथ ही में धनतेरस की शुभ कामनाये. आपको यह वर्ष धन और समृद्धी की वर्षा लेकर आये. साथ ही किशोर दा नें जैसे कहा है कहा है- आपको संतोषधन मिले, आनंद धन मिले यही कामना.(जैसा कि इस गीत को गाकर मुझे मिला)

दिवाली के बाद फिर मिलता हूं अपनी रिपोर्ट के साथ.... ब्रेक के बाद!!!

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