Monday, December 1, 2008

बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया...


कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया....


आज अभी तक दिल ग़मगीन है, दो तीन दिनों पहले के घावों की टीस अभी तक मन से रिस रही है. जैसे जैसे और मुम्बई की घटनायें सामने आ रही है,उन अपनों के बारे में पता चल रहा है,जो पिछले दिनों में इन आतंकवाद के दानव की भेंट चढ गये.उनके साथ बिताये पलों की, क्षणों की याद जो खिलते हुए फूलों के मसलने की दास्तान बयां कर रहीं है.वे नजदीकी अपने , जो रब से ये भी पूछ पाने की स्थिती में अभी नहीं है, कि उनके साथ ही ऐसा क्यूं हुआ, जब काल नें अपने क्रूर हाथों से उनकी बगिया की महकती फ़ुलवारी को उजाड़ दिया.

किन किन की अफ़सुर्दा-दिली बयां करूं, किस किस का दर्द भरा अफ़साना सुनाऊं और जब वे बार बार सामने याद आते है, तो मन उन जाने पहचाने चेहरों की याद भुला नहीं पाता है, जो अक्सर मुम्बई प्रवास में मिलते रहते हैं, या अब भारी मन से कहें ............थे.

अब वे कभी नहीं मिलेंगे.

किसीने अपने ब्लोग पर खूब लिखा है(सौरभ कुदेशिया-http://satat-vichar-manthan.blogspot.com/2008/11/blog-post_29.html) कि मेरे परिवार के १३० लोग मरे है,मौत हो गई है मेरे घर में.

पता नहीं क्यूं ये सवालात जेहन में टकरा रहे हैं कि ये कब तक? आज एक गाना ना जाने क्यूं लबों पर बार बार आ रहा है.

चलो वह गीत आपके को भी सुना देता हूं- हवा में ठंडक बढ गयी है, फिर भी उद्वेलित विचारों की तपन , आंच दिल को जला रही है. सूखे टहनीयों के जलने से चटखने की आवाज़ें बढ गयी है.

इस गीत को बिना साजो सामान के , बिना किसी भूमिका के सुना रहा हूं. वाओलीन ,हार्मोनियम, तबला आदि की आवाज़ कमज़ोर पड़ गयी है, बंदूकों के , गोलीयों की आवाज़ के सामने.सिर्फ़ मैं, मेरी तनहाई, और सर पर पंखे की गिरघिर.. जो हृदय में शूल उत्पन्न कर रही हैं- आंसूंओं का सैलाब थमने और थामने का जतन चल रहा है कि गीत को भी दो तीन बार में रेकॊर्ड करना पडा़.

मर्द हूं तो शायद ये स्वीकार करने मे शरम आये कि ..

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया-

जो है सो है.

Wednesday, November 26, 2008

फिर मिलते हैं एक ब्रेक के बाद



तमाम कोशिशों के बाद आखिर दिल ये कह पडता है

फिर वही शाम वही ग़म ,
वही तनहाई है,
दिल को समझाने तेरी
याद चली आयी है.



फिर गिर पडे़ है हम भौतिक रूप में, और इससे पहले कि किसी की नज़रों में गिर पडे या आपकी यादों से ओझल हों, ये टाईम आउट ले रहे हैं.

फ़िल्म पडो़सन याद आयी, जिसमें आगा अपनी पत्नी से कहता है,

- जब जब जो जो होना है, तब तब सो सो होता है!

रोशन जी पर लिखा हुआ रह गया, सचिन देव बर्मन पर तीसरी कडी तैय्यार है, उसका वादा है, और बहुत सारे गीत हैं जिनका रसास्वादन करना बाकी है अभी...

फिर मिलते हैं एक ब्रेक के बाद..( मानस के अमोघ शब्द पर खुलासा किया है)

Monday, November 3, 2008

पिया तोसे नैना लागे रे...- सचिन देव बर्मन

कड़ी - २
सचिन देव बर्मन पर दूसरी कड़ी लेकर हाज़िर हूँ.

सुनकारों से आग्रह है, की अगर उन्होंने सचिन दा पर पहली कड़ी नही भेंट की हो तो कर लेंगे ,तो इस कड़ी का सन्दर्भ समझाने में ज़रा आसानी होगी.

हम बर्मन दा के पिटारे में से कई नायाब जवाहिरात चुनते है, तो इस गानें को अग्रिम पंक्ति में पाते है.

पिया तोसे नैना लागे रे...

गाईड फ़िल्म के ४ स्टॆन्झा और ८ मिनीट के इस मेरथॊन गीत को सचिन दा बिना किसी प्रील्युड से शुरु करते है(जैसा कि वे कई बार कर चुकें हैं), और स्थाई के बाद Rich Orchestra के Interludes गीत को अपनी मीठी गिरफ़्त में ले लेते हैं. साथ ही साथ शैलेन्द्र के अतिआकर्षक बोलों की जुगलबंदी सी चलती है ताल के साथ, जो धिनक धिन धिन धिनक धिन धिन पर थमती है.

The orchestral interludes in this song are rich and varied. Though these music pieces are tailor-made for a dance choreography, unlike most dance pieces they do not remain limited to a frenzy of ghungroos, tabla and sarangi/harmonium. The orchestral interludes, here, in typical SD Burman style, are uncluttered and spontaneous. However they still use a wide variety of instruments and are richly layered. Violins, Sitars, ghungroos, tabla, drums (note the lovely use of a north eastern drum in the portion before भोर की बेला सुहानी) and the flute all fit into the overall composition like pieces in a jigsaw puzzle. Strings, as with most of Dada’s songs, are used with great felicity. Note the extremely catchy short string pieces strewn all over the song. विशेषतयाः उस जगह जहां गाना मुखडे़ पर लौटता है ...

ताल में भी हमें कहीं कहीं भटियाली शैली के दर्शन होते हैं.कहीं कहीं तबला बॆक सीट ले पृष्ठ्भूमि में चला जाता है और ड्रम पर्कशन वाद्य समूह प्रभावी हो जाते है.

मगर मेरे मित्रों , ये सब बेमानी हो जाता है जब तक हम यह भी नही कबूल कर लेते कि विजय आनंद के निर्देशन में इतने अच्छे फ़िल्मांकन और वहीदा जी की बेमिसाल नृत्य अदायगी नें सचिन दा की मेहनत में चार चांद लगा दिये है.(Waheeda is Elegence & Grace Personified, indeed !!!)

फ़िल्म में इस गीत की कहानी का केंद्रबिंदु है राजू गाईड और रोज़ी के बीच पनपते रिश्तों का -नैना लागे रे!!
फ़िर समय के बीतने के संकेत होली और दिवाली के त्यौहारके पृष्ठभूमि में इन संबंधों में प्रगाढ़ता और व्यावसायिक कार्यक्रम की क्रमवार सफलता का बेहद प्रभावी चित्रण है. बड़ी शालीनता के साथ उनके बीच स्थापित होते शारीरिक और प्रेम सम्बन्ध भी खुलते हुए दिखाते है, और गीत के बोल भी ये सूचित करते है.चमकाना उस रात को जब मिलेंगे तन मन, मिलेंगे तन मन...

ज़रा पूरे गानों के बोलों पे भी बारीकी से गौर फरमाएं जनाब. और साथ ही में अनुभव करें कि
हर अंतरे में विभिन्न रंगों के और समय के रागों का मिश्रण खूबसूरती से गढा गया है.

इसीलिये ही कहा गया है, की संगीत यह स्वार्गिक सुखों के अनुभव की चीज़ है, तार्किक बुद्धिमत्ता की नहीं.

अब देखिये, गाईड फ़िल्म का वह गीत विडियो पर, और गोते लगाईये मधुर संगीत की फुआरों से सजे झरने में.

तीसरी कड़ी अगले हफ्ते ..

Sunday, November 2, 2008

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा ....

कड़ी - १
३१ अक्टूबर को पद्मश्री सचिन देव बर्मन की ३३ वीं पुण्यतिथी के दिन सारे दिन उनके गीतों को सुनता रहा, अपने मन की गहराई तक उन रचनाओं का आस्वाद लेता रहा जो हमेशा गाहे बगाहे कानों पर पड़ते तो ज़रूर थे, मगर सुकून से एक साथ
सुने नहीं गए.

उन्हे सुनने का अवसर भी बड़ा ख़ास इसलिए था, क्योंकि एक साथ जब हम उनके रचे हुए गीतों को सुनते है तो तब जाकर पता चलता है, की उनके सभी गीतों में कितनी विवि्धता थी, कितना माधुर्य था, कितनी वेदना थी.

सचिन दा निसंदेह सुरों के एक ऐसे चित्रकार थे जिन्होंने अपने हर पेंटिंग में अलग अलग विषयों पर अलग अलग रंग बिखेरे. उनके ब्रश के स्ट्रोक्स , उनका टेक्सचर , और ग्राफिक्स की विविधता उनके हर गाने में नज़र आती थी या सुनाई देती थी.

हिन्दयुग्म के आवाज़ पर सचिन दा पर एक पोस्ट लिखी तो सहजता से उनके गानों की सुरमई धुंध में मैं खोता चला गया.

मन ही नही भर रहा था. सोचा कुछ अपने यहाँ भी लिख उनको एक बार और श्रद्धांजली देकर, इज़हारे अकीदत पेश कर ,उनके संगीत से जो आज तक आनन्द लूटा है उसका कुछ क़र्ज़ तो उतार ही दूँ, भले ही अंश मात्र ही सही.

पिछले दिनों सिने संगीत को समर्पित हर एक ब्लॉग साईट पर आप पायेंगे इस महान संगीतकार पर कुछ ना कुछ लिखा हुआ , और साथ ही पायेंगे उनके ढेरों सारे गीत उनकी आवाज़ में भी. एक जगह की कमी बेहद खल रही है. श्रोता बिरादरी की जाजम इन दिनों बिछी नही किसी कारण वश. हर सू फैले दिवाली के प्रकाशमय उजियाले में इस प्रेरणा स्रोत सुरमई शमा की अनुपस्थिती ने सचिनदा के दर्द भरे गीतों से उपजी अफ़सुर्दा दिली और भी बढ़ा दी. आवाज़ दे कहां है....?

हमें कोई ग़म नही था ग़मे आशिकी से पहले ,
ना थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले...


सचिनदा के लिए काम करने के लिए बड़े बड़े गायक और गायिकाएं तरसते थे क्योंकि उनके गले की तासीर या Timbre का अचूक उपयोग वे करते थे. सेन्स्युअस गीत में आशा और गीता दत्त की आवाज़ के नैसर्गिक आउटपुट से आगे जा कर अपना एक ख़ास आउटपुट निकालने में माहिर थे. आज सजन मोहे अंग लगा ले, में मादकता का एक Undercurrent , पखावज़ की लय के मिश्रण से अद्भुत प्रभाव उत्पन्न कराते थे. वैसे ही कुछ प्रभाव उन्होंने रात अकेली है गीत में ढाला था , जिसका कान में फुसफुसानें का अलग अंदाज़ बेहद लोकप्रिय हुआ था.

भक्ति युक्त प्रेम भाव हो या संपूर्ण समर्पित अनंत आध्यात्म हो , या फिर अल्हड़ सी शोख़ सी यौवन की छुपी हुई भावाभिव्यक्ति हो , लता के पारलौकिक गले से वे रस उत्पत्ति कर हमें नवाज़ते थे ऐसी ऐसी सुरीली बंदिशों से कि हम उनके सुर सागर में डूबते तैरते बहने लगते है , और कहने लगते हैं कि कोई ना रोको दिल की उड़ान को , आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फ़िर मरने का इरादा हैं .

रफी हों या मन्ना दा, या किशोर , मुकेश , तलत अपनी अपनी जगह पर ही गाते थे उनके लिए.किसी भी गाने का मूल तत्त्व जिस पाये का होता था उसी पाये की आवाज़ वे अपने गाने के लिए लेते थे. हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए के रफी और दुखी मन मेरे के किशोर में दर्द की अभिव्यक्ति का फरक सिर्फ़ वे ही बखूबी कर सकते थे.

I am just listening to araay of his sweet and enchanting songs! What a pure , unadultrated mix of symphony & Melody !!

His music breathes of fresh born flowers, his songs are nestling places of whistling birds, tinkling bells and sobbing flutes, his orchestral creations contain both lyric and epic sweeps of design blended in such rare harmony of which only a composite genius like him is capable -- a genius who breathed music, dreamed music, lived music all his life.


उनके निधन पर दी गयी श्रद्धांजली पर कुछ अंश किशोर दा पर मेरी पिछली पोस्ट में भी आप सुन सकते हैं.

उनपर भारत सरकार नें भी सन २००६ में एक डाक टिकट निकाल कर उनका सन्मान किया था .

गायक के रूप में आराधना के गाये गीत सफल होगी तेरी आराधना पर राष्ट्रीय पुरस्कार १९७० में, और ज़िंदगी ज़िंदगी फ़िल्म में संगीत निर्देशन के लिये भी प्राप्त किया था.फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड़ भी फ़िल्म टॆक्सी ड्राईवर के लिये १९५४ में भी प्राप्त किया.

शास्त्रीय संगीत पर उनकी पकड़ भी क्या खूब थी जनाब. गाईड़ में लता के गाये गीत पिया तोसे नैना लागे रे में उनका कमाल सुनने लायक था. रूपक ताल में निबद्ध किये गये इस क्लासिकल गीत में सचिन दा के संगीत के विज़न का दर्शन होता है और भावनाओं की अभिव्यक्ति का ,Visual Feel का अहसास होता है.

इसके लिये तो लगता है मुझे एक और पोस्ट लिखना पडे़गी. (बुधवार को ज़रूर)

तलाश फ़िल्म में भी तेरे नैना तलाश करें में मन्ना डे की अप्रतिम गायकी के साथ सुरों का संयोजन और साथ में मृदंग या पखावज़ का तबले के साथ अनोखा मेल उनके सुजनशीलता की इन्तेहां थी. इन्टरल्युड़ में सरोद , सितार और बांसुरी,के साथ कहीं कहीं तार शहनाई तो कहीं कहीं ताल तरंग का भी बडे़ ही अधिकार पूर्वक उपयोग किया गया है.

यह गीत पहले बिरादरी पर जारी भी हो चुका है.

तो आपसे इजाज़त लेकर अपनी एक तमन्ना पूरी कर लूँ?

यह गाना पिछले दिनों यहाँ स्टेज पर गाया गया था . मन्ना दा को समर्पित एक पूर्ण कार्यक्रम -दिल का हाल सुने दिल वाला - में स्टेज पर प्रस्तुत गीत का विडियो देखें और सुने. गायक यहाँ नगण्य है. उसकी मस्ती का , सुरों के नादब्रम्ह का आप भी अनुभव लें.

मन्ना दा जैसे हिमालय को नापना किसी भी गायक के लिए मुमकिन नहीं ये बात तय है दोस्तों. मगर वादक कलाकारों के कौशल को सुन दाद ज़रूर दें , क्योकि सभी कलाकारों ने अपने अपने स्तर पर अपना रोल बखूबी निभाया है. एक ही की बोर्ड पर सभी वाद्य - सितार, ताल तरंग, तार शहनाई, सरोद, बांसुरी और क्या क्या. मृदंग नहीं था तो एक हाल में तबला और दूसरे पर ढोलक लेकर इफेक्ट पैदा किया है.

अगले रिलीज़ : -
कड़ी - २ - पिया तोसे नैना लागे रे ... मेराथोन गीत का सुरीला विवेचन
कड़ी - ३ - सचिन दा, गुरुदत्त,साहिर,हेमंत कुमार से जुडी एक कॉमन स्मृति विशेष (पिछले महिने की श्रद्धांजली)

Tuesday, October 28, 2008

इस दिवाली पर हार्दिक शुभकामनायें

मेरे ब्लॊग के अंतरंग मित्रों सुरीले साथियों,



आप सभी को इस दिवाली पर हार्दिक शुभकामनायें...

सुरमई अनुभूति और संवेदनशील धडकन के ताल पर आपके जीवन में सुखों की वर्षा हो.

और साथ ही भौतिक स्वरूप के सुख और समृद्धि की भी आप के और आपके परिवार में कभी कमी नहीं आये, ये जगत पिता ईश्वर से तहे दिल से प्रार्थना...


संगीत ही सभी दुखों को हर लेने का एक मात्र रामबाण इलाज है.सुरों का सानिध्य ही मन की वितुष्णा को निर्मल करने का सादा, और सीधा उपाय है.अहसासात की संवेदनशीलता ही दिल को , मन को ईश्वर के करीब ले जाती है.

सुखं हि दु:खान्यनुभूय शोभते,
घनांधकारेश्विव दीपदर्शनम्...


(मृच्छकटिकम् - शूद्रक)

घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है,
उसी प्रकार दुख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है.


आमीन..

Wednesday, October 15, 2008

किशोर कुमार के स्मृति में अनसुने पुराने गानों का कार्यक्रम

कड़ी - २

आपने वह गाना तो सुना ही होगा ,किशोर दा का.

वादा तेरा वादा , वादा तेरा वादा, वादे पे तेरे मारा गया , बंदा मैं सीधा साधा... , वादा तेरा वादा...

जी हां, मैंने आपसे वादा किया ज़रूर था , और आप भी ये गाना गा कर , एक सीधे साधे बंदे की तरह मुझे लानत तो नहीं भेज रहे होंगे, मगर खुश भी नहीं हुए होंगे.

लगभग ढ़ाई महिने पहले जब मैंने ब्लॉग का उपक्रम प्रारंभ किया था, तो ये मेरे कई प्रोजेक्टस की तरह एक था. मगर , बाद में यह मेरे दिल के करीब आता चला गया, अनजाने में, और जैसा की होता आया है, इसने नं.१ की पोजिशन प्राप्त कर ली है. साथ ही जैसा आगे होना था, प्रोजेक्ट के समय पर समाप्ति के वादे का टेंशन भी साथ साथ आने लगा.

होना यूँ था कि मैंने रफी साहब की कड़ी शुरू की थी. एक Engineer/Architect की तरह हर पोस्ट को प्लान किया, डिझाईन किया . रफ़ी साहब के अनेक रंग , अलग अलग छटा लिए गीतों का गुलदस्ता बनाते बनाते इन सभी का प्यार मुझे कब यहाँ ले आया पता ही नहीं चला .

पिछले महिने में विशेष हस्तियों के नाम पर काफ़ी कुछ लिखना चाहता था, जैसे लता जी, आशा जी, महेन्द्र कपूर , हसरत जयपुरी, आदि.

अब इस महिने विशिष्ट हस्तियां है, गुरुदत्त , फ़िर अमिताभ, अभी किशोर दा, फ़िर बेग़म अख़्तर आदि.पुराना प्रोजेक्ट तो अटक ही गया, नये भी ठीक से smoothly नहीं जा पाये. खै़र फ़िर अगले हफ्ते से वापिस अपने पहले वाले मकाम पर.

मैं आपसे कह रहा था कि किशोर कुमार के स्मृति में ता. १२ अक्तूंबर को इन्दौर के पास करीब १५-२० किमी ग्राम पिगडंबर में एक नये सुर आश्रम लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय में उनके कोई २० अनसुने, मधुर गीतों की रिकॊर्डस को पुराने रिकॊर्ड चेंजर पर बजा कर सुनवाया गया.

ये सौगात हमें दी है जाने माने ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संकलनकर्ता श्री सुमन चौरसिया नें, जिनके पास हज़ारों की तादात में अलग अलग भाषाओं में दुर्लभ संगीत रचनाओं,गानों के रिकॊर्ड्स का संग्रह है. ये संग्रहालय अभी पिछले दिनों लताजी के जन्म दिवस के पहली संध्या को ही लोकार्पित हुआ है, और हम आप जैसे शौकीन और समझू सुनकारों और कानसेनों के लिये ही ख़ास है.


इस स्वर महर्षि नें अपने सारा घर बार, जमीन जायज़ाद की आहुति इसी स्वर याग में दे कर ये अनूठा, और बेमिसाल तोहफ़ा देकर हमें उपकृत किया है.

उस दिन रेखांकित करने योग्य एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह थी, कि जैसा न्योते में कहा गया था, कार्यक्रम ठीक ३.५५ को सुमन जी नें शुरु करवा दिया. वे कह रहे थे की चाहे इतनी दूर कोई भी नहीं आये, या देर से आये, वे तो मात्र एक श्रोता को भी सुनवाना पसंद करेंगे, जो समय पर आ जायेगा.

पूरे कार्यक्रम की अवधि थी दो घण्टे से थोडा़ कम, और इन पूरे लमहों में हम जैसे स्थान और स्वयम की सुध बुध खो उन पुराने गीतों की मेलोडी में, उनके संगीतकारों के किये गये प्रयोगों में , और उसके विष्लेषण में इतना घुल मिल गये , कि होश ही नही रहा कि कब शाम ढल गयी. गांव के सुरम्य वातावरण में उस दिन वहां उपस्थित हर श्रोता डूबते सूरज की किरणों पर मन को सवार कर, किशोर कुमार के गाये एकल और दोगानों में जीवन का हर रंग ढूंढने में लग गया. खेमचंद्र प्रकाश से हेमंत कुमार नें अपने मधुर स्वरांकन से सजाये इन गीतों में गोधुली की उस पावन बेला पर घर लौटते हुए गायों के घुंगरूंओं की ताल मिल कर एक स्वर्गिक सुख का अनुभव करा रही थी.
(चित्र ’नई दुनिया ’ से साभार)

अब चलियें गीतों की लिस्ट पर नज़र डा़लें :

१. मरने की दुआएं क्यूँ मांगू - जिद्दी - खेमचंद्र प्रकाश
२. जगमग जगमग दीप - रिमझिम - खेमचंद्र
३. लहरों से पूछ लो (लता) - काफ़िला - हुस्नलाल भगतराम
४. हुस्न भी है उदास उदास - फ़रेब - अनिल विश्वास
५. भूलने वाले - गैर फिल्मी - भोलानाथ
६. आरारम,ताराराम - आवाज़ - सलिल चौधरी
७. तू चन्दा तो मैं हूँ चकोर (लता) - आगोश - रोशन
८. मैं हंसूं या रोऊँ - माँ (अप्रदर्शित फ़िल्म) - चित्र गुप्त
९. मोहे ला दे नौलखा हार (शमशाद) - नौलखा हार - भोला श्रेष्ठ
१०. चुप हो जा तेरे लिए -बंदी - हेमंत कुमार
११. ताकत के पंजे में - कहीं अँधेरा ,कहीं उजाला - ओ.पी. नय्यर
१२. पायलवाली देखना - एक राज - चित्रगुप्त
१३. दो आखें ज़नानी (आशा) - दाल में काला - सी. रामचंद्र
१४. पहली ना दूसरी - मदभरे नैन - एस.डी. बर्मन
१५. काली काली रातों - जोरू का भाई - जयदेव
१६. मेरे जीवन की रेल - महलों के ख़्वाब - एस. डी. बर्मन
१७. बंगला गीत जो इन गीतों की धुन पर पर गाये गये -राहुल देव बर्मन
- ये क्या हुआ, कैसे हुआ
- तुम बिन जाऊं कहां..
- किशोर दा की पहली पत्नी रुमा देवी के साथ गाया एक दोगाना
१८. हवाओं पे लिख दो - दो दूनी चार - हेमंत कुमार

ये अंतिम गीत उन्होने मेरे पसंद का सुनवाकर इस कार्यक्रम को विराम दिया.

मैं चाहता तो था कि इन गीतों मे से एक दो गीतों को यहां सुनवाऊं. ऐसा आग्रह भी मैने सुमन भाई ने किया भी था. उन्होने स्वीकृति भी दे दी . मगर किसी तकनीकी वजह से वे उन गीतों की रिकॊर्ड़ को टेप पर तबादला नहीं कर पानें से, वे गीत मुझ तक पहूंच नहीं पाये . सो मैं आपको मायूस करूंगा जिसका मुझे खेद है. दरसल यह पोस्ट तो १५ ता. को ही लिख कर तैयार थी और मैं राह देखकर अब पोस्ट लगा रहा हूं.

मगर रुकावट के लिये खेद है, के बाद का संगीत नहीं लगा कर, मैं आप को सुनवा रहा हूं किशोर दा की ही आवाज़ में एस.डी़.बर्मन के देहांत के बाद मे दिये गये किशोर दा द्वारा दिये गये साक्षात्कार को सुनवा रहा हूं. अगर सुमन जी दे पाये तो कल परसों में फ़िर हाज़िर हो जाऊंगा. वैसे आपकी कोई पसंद हो तो कहें..कोशिश करूंगा..






Monday, October 13, 2008

जिंदादिल और संजीदा कलाकार - किशोर कुमार

कड़ी - १

आज दिल बहुत उदास है.

ज़ाहिर है. आज 13 अक्टूबर को किशोर दा की पुण्यतिथि है, बींसवीं.


आज सुबह से ही एक बेकसी सी छाई रही. पहले जब भी कभी उदासी का आलम होता था तो किशोर दा के नगमों के साए तले आसन जमा कर बैठ जाते थे, उनके हर मूड के गीतों को सुन कर , कभी गुनगुना कर दिल का बोझ कुछ तो हलका कर लिया करते थे. मगर आज क्या करें ?

आज दिन भर वो मेरे करीब , आसपास रहे, उनका अहसास मन में और गहरा उतरता चला गया . यादों के रोलरकोस्टर पर मेरा मन बैठ उनके गानों के विश्व में , सुरों के चढाव और उतार में खो गया. कभी सुन कर, कभी गुनगुना कर किशोर दा के गीतों के महासागर में डूब गया.

किशोर दा के जिंदादिल व्यक्तित्व की बड़ी चर्चाएँ है. मगर कोई यह पूछे की वे पहले एक अच्छे गायक थे,या संगीतकार ,या
अभिनेता, या निर्देशक - तो यह भी अजीब सा सवाल हुआ. इस हरफन मौला कलाकार नें एक अवलिया संत की तरह किसी बंधन को नही स्वीकारा. फ्री स्टाईल कुश्ती के पहलवान की तरह अपने फक्कड़ अंदाज़ में वे हर आखाड़े में कूद पड़े! फ़िल्म संगीत की हर विधा में अपने सृजन की क्षुधा को शांत कराने में लगे रहे.

His genious was menifested in his genre of Inovative, Distinctive & passionate creativity ,parallel to none. His responce to Music was Sponteneous & Intuitive,yet intrepid enough to mesmerise us. His golden voice had all shades of human traits & emotional chords, echoed with pathos & malancholy.

Although, he was not a trained Singer, (He need not be ) he had an unique approach to singing - Kishorian approach!!,unlike his contempory equally genious peers, who had a perfetionist and traditional approach to rendering of songs.

A Natural player like Sachin or Lara, he could apply all his skills with his masterly strokes,at his free will, to all kind/genre of musical notes ,difficult or simple to execute.Kishor Kumar could make a song look so deceptively simple with his Sonorous Richness of Voice.

एक अच्छे गायक की पहचान के लिए, उसके गले के घुमाव, मींड , और अहसासात को , संवेदनाओं , भावनाओं को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त कराने के उसके कमाल को जानने, समझने के लिए किसी भी सुधी श्रोता को स्वयं गायक होना ज़रूरी नहीं. इसीलिये किशोर दा आम जनता की पसंद के गायक बनें.

किशोर कुमार के गले में जो खनक थी, उसके साथ गज़ब की कॉमेडी की टाईमिंग , अभिनय का अनूठा संयोग था जिसका उपयोग वे गीत में जीवंतता लाने के लिए करते थे. खासकर वे कॉमेडी गीत जिसमें संभाषण या बातचीत के सादे ढंग का उपयोग किया गया हो. कुछ इसी तरह का अनूठा गुण आशा भोंसले की आवाज़ में भी था, जिसकी वजह से उनके दोगानें भी बड़े मक़बूल हुए. (आंखों में क्या जी, हाल कैसा है जनाब का, आप यहाँ आए किस लिए, आदि)

उनकी यह जीवंतता , उनकी ये जिंदादिली , खिलन्दडपन के बावजूद वे एक संजीदा इंसान थे. मन के भीतर कहीँ गहरे में चुभ रहा वह अकेलापन , उनके दर्द भरे गीतों में उभर आता था .

एक टीस सा एहसास हमेशा के लिए अपने जिगर पर लेकर वे हमसे रुखसत हो गए.


कहीं ज़िक्र हुआ था किशोर दा से उनके सबसे ज़्यादा दिल के करीब पसंदीदा गानों के बारे में , तो उन्होंने जिन गीतों का चयन किया था वे सभी के सभी दर्द भरे गीत थे.

उनकी लिस्ट यहाँ दी जा रही है : ( Not in Order)

१. दुखी मन मेरे - सचिन देव बर्मन - फंटूश
२. जग मग जग मग करता निकला - खेमचंद्र प्रकाश - रिमझिम
३. हुस्न भी है उदास उदास - अनिल विश्वास - फ़रेब
४. चिंगारी कोई भड़के - राहुल देव बर्मन - अमर प्रेम
५. मेरे नैना सावन भादों - राहुल देव बर्मन - महबूबा
६. कोई हमदम ना रहा - किशोर कुमार - झुमरू
७. मेरे महबूब क़यामत होगी - लक्ष्मीकांत प्यारेलाल - मि. एक्स इन बोम्बे
८. कोई होता जिसको अपना - सलिल चौधरी - मेरे अपने
९. वो शाम कुछ अजीब थी - हेमंत कुमार - खामोशी
१०. बड़ी सूनी सूनी है - सचिन देव बर्मन - मिली

अभी जो गीत मैं यहाँ सुनवा रहूँ , ये मुझे बड़ा पसंद है ,

आ चल के तुझे , मैं ले के चलूँ , एक ऐसे गगन के तले,
जहाँ गम भी ना हो , आँसू भी ना हो, बस प्यार ही प्यार पले..

एक ऐसा ही जहाँ चाहते थे किशोरकुमार ...



किसी भी गायक की असली पहचान होती है ऐसे गाने से जिसमें सुरों का साथ बहुत कम लिया गया हो.
जिन रातों की भोर नहीं,
आज ऐसी ही रात आयी..

(कितना मौजूं है ये आज की रात ..........)


कल फ़िर लेकर आऊँगा एक अनूठे कार्यक्रम की रिपोर्ट लेकर, जो कल ही किशोर जी की स्मृति में आयोजित किया गया था, जिसमें जाने माने ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संकलनकर्ता श्री सुमन चौरसिया नें हमें किशोर कुमार के वे नायाब और दुर्लभ गीत सुनवाए की हम जैसे श्रोताओं के स्मृति पटल से वे अब तक मिट नही पा रहे है.

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