Friday, May 8, 2009

शंकर जयकिशन, रफ़ी और मन्ना डे…

अभी आपने पिछली कडी में पढा़ था प्रसिद्ध संगीतकार जोडी के शंकर के जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में …

अभागे शंकर -(कृपया यहां पढे..)

हमारे एक टिप्पणीकार नें यह लिखा था कि इसमें से एक घटना को उन्होने किसी साप्ताहिक में पढी थी. वे सही हैं. जो भी हम यहां लिखते हैं, कहीं ना कहीं से हमे मालूम पडता ही है. चूंकि ये वस्तुस्थिती है, कि ये सम्भव नही कि हर घटना आपके सामने ही घटी हो. मित्रों, वैसे भी गायक , संगीत और गीत के बोलों के अलावा कुछ भी तो ORIGINAL नहीं.
आज हम कुछ और छोटी छोटी स्मृतियों के बारे में यहां ज़िक्र करेंगे. कुछ कहीं पढी हुई कुछ मित्रों द्वारा बताई गई:

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मोटे तौर पर ये बात बताई जाती है कि पहले कुछ सालों को छोडकर शंकर और जयकिशन नें हमेशा अलग अलग फ़िल्मों में संगीत दिया(भले ही नाम जोडी का दिया गया हो), जबकि दूसरे संगीतकार जोडी अपना काम यूं बांटते थे कि धुन एक बनाता था और अरेंजिंग दूसरा.(LP). और एक आश्चर्य की बात ओर मालूम पडी जिसे चेक करना पडेगा कि शंकर के लिये हमेशा हसरत जयपुरी लिखते थे और जयकिशन के लिये शैलेन्द्र!!!   ( जानकार बतायें कि क्या ये उनस भी १७१ फ़िल्मों के बारे में सही है , जिसके लिये इस जोडी नें संगीत दिया?)

पता है, सबसे पहला गीत जो शंकर नें रिकोर्ड किया वह था फ़िल्म बरसात में रफ़ी की आवाज़ में एकमात्र गाना – मैं ज़िंदगी में हर दम रोता ही रहा हूं…शंकर और बाकी सभी इस बात पर एकमत हुए थे कि ये गाना रफ़ी जी ही गायेंगे.मगर उन्हे ये डर था कि रफ़ी जी व्यस्तता के रहते हुए, उन जैसे नये संगीतकार जोडी के लिये गायेंगे या नही. मगर रफ़ी जी नें कोई शर्त नही रखी और ये गीत और बाकी सभी गीत बडे ही मकबूल हुए. बाद में तो इस जोडी नें रफ़ी  जी के साथ  अनगिनत हिट गानें दिये.  २१६ एकल गीत,११६ युगल गीत,९ मिश्र गीत = कुल ३४१ गीत.( लक्ष्मीकांत प्यारेलाल – ३६९)

कई सालों बाद जब फ़िल्म ब्रम्हचारी के लिये जयकिशन नें उनसे एक गीत दिल के झरोके में तुझको बिठा कर..के लिये एक अजीब फ़रमाईश की. उन्होने रफ़ी जी को आग्रह किया कि इस गीत का स्थाई (याने पहली लाईन) बिना सांस लिये लगातार गाये.(शंकर महादेवन का Breathless गाना याद है?) 

रफ़ी जी नें उनकी ये बात मानी और आप खुद सुनें कि पहली लाईन बिना सांस लिये गायी गयी है.रिकोर्डिंग के बाद हंसते हंसते  रफ़ी जी बोले, भाई याद है,आपके लिये मैंनें सबसे पहला गीत गाया था. अब आप मुझे यूं गवाते रहे अगला गाना गाने के लिये मैं ज़िन्दा ही नही रहूंगा और फ़िर लोग कहेंगे रफ़ी नें आपके लिये अपना अंतिम गीत गाया !!!

वैसे शंकर जयकिशन नये नये प्रयोग करते थे मगर रफ़ी जी भी कभी कभी मस्ती में आ कर कुछ अलग करते थे.फ़िल्म तुमसे अच्छा कौन है का गाना किस को प्यार करूं , कैसे प्यार करूं . तो गाना रिकोर्ड होने के बाद रिकोर्डिंग रूम से बाहर आ कर रफ़ीजी शंकर से बोले – इस गाने की रिकोर्डिंग एक और बार करते हैं. किसी को कूछ समझ नही आया.

मगर बाद में रफ़ीजी  नें कहा कि स्टुडियो में कुछ खूबसूरत लडकियों को बुलाया जाये और शर्त ये रहेगी कि उन से एक भी उनकी तरफ़ नहीं देखेंगी (Cheer girls of IPL?!!!!)

बस फ़िर क्या था. आनन फ़ानन में यूं जमाया गया, और गाने की रिकोर्डिंग फ़िर से कीग यी जिसमें रफ़ी जी नें उन सुंदरीयों की तरफ़ देखकर हाथों से मुद्रायें बनाते हुए पूरा गीत गाया जिसमें वह प्रभाव और आवाज़ में वह बिंदासपन कैसे झलका है ये आपने सुना ही है.

वैसे ही मिज़ाज़ के शौकीन शंकर नें फ़िल्म जंगली के गाने ऐयईय्या सूकू सूकू .. गाने मॆं ये बोल गाये है, फ़िल्म संगम के गाने दोस्त दोस्त ना रहा में पियानो बजाया है.

मैं इस बात से हमेशा  दुखी रहा   कि शंकर और लताजी के बीच में अनबन हो गयी थी(जयकिशन के साथ नहीं-याद है वे हसीं गीत – ओ मेरे शाहे खूबा…, तुम मुझे यूं…, तुम्हे याद करते करते ..) 

वैसे किशोर कुमार के साथ काफ़ी कम गीत  बनाये है इस जॊडीनें…

img0501(रिकोर्डिंग के समय)

अपने अंतिम दिनों मॆं जयकिशनकी मृत्यु के बाद शंकर के पास बहुत फ़िल्में नही आयी मगर वे LIVE concert  करते रहे, मगर इंडस्ट्री  में उनका वजन कम ही हो गया.

मुझे याद है ८० के दशक का वो वाकया, कि जब मैं एक बार मुंबई से इंदौर के लिये फ़्रंटियर मेल  मॆं चढा था (रतलाम तक), तो द्वितीय वर्ग के रिज़र्वेशन कोच में मैने एक musicians का ग्रूप देखा जिनके पास सभी instruments थे. इसमें से एक साथी मेरे पहचान का था जो इंदौर का था जिसनें मेरे साथ स्टेज पर कभी बजाया था .और साथ ही में आजके प्रसिद्ध संगीतकार की जोडी जतिन ललित  में से जतिन थे(शो अरेंजर के रूप में !!)

मुझे फ़िर ये भी बताया गया   कि इसी ट्रेन में खुद शंकर जी और शारदा भी जा रही थे, और तीसरे दिन  उनका दिल्ली में शो तथा बात ही बात में जतिन से पता चला कि इन सभी वादकों के समूह का रिज़र्वेशन तक नही हुआ था, सिर्फ़ टिकट थे. साथ में इन्हे जो बूक करके लाया था उसनें जतिन को  कोई एडवांस भी नही दिया था . जाहिर है ये बात मालूम होते ही अधिकतर वादक पसर गये, और उतरने की बातें करने लगे. जतिन  नें काफ़ी समझाया कि शंकर जी की इज़्ज़त दांव पर लगी है.मगर वे टस से मस नही हुए.

तब  मेरे युवा संवेदन मन को बडी ठेस पहुंची थी ये देख कर कि बंबई  में पैसे के आगे कोई भी बडा नाम  या हस्तीन हीचल ती जिसकी आप इतनी इज़्ज़त करते हैं .

इस बीच जतिन शंकर जी को बताने पहुंचे जो प्रथम वर्ग के केबिन में, तो मैं भी साथ हो  लिया , सोचा था कि मेरे फ़ेवराईट म्युज़िक डायरेक्टर से मुलाकात होगी. मगर अफ़सोस कि शंकर के  ये बात सुन यूं होश उडे के वे गश खाकर गिर ही पडे(उन्हे ब्लड प्रेशर का प्राब्लेम था ) शारदा नें  और हम ने बडी कोशिशों से उन्हे सम्हाला, और दवाई दे कर उन्हे सेटल किया. यहां तक कि ट्रेन रुकवाने की  नौबत आ गयी थी .

इसी बीच सूरत आ गया और देखते ही देखते सारे Musicians अपने अपने वाद्य लेकर उतर गये,और ग्रुप में रह गये सिर्फ़ जतिन और मेरा इंदौर का साथी.फ़िर क्या था. मैने मेरी बर्थ   ललित के साथ शेयर की, और वह दिल्ली निकल गया.मेरा साथी मेरे साथ इंदौर आया, और कुछ musicians दिल्ली ले गया, और सुना है, कि वहां कुछ और को साथ में लेकर शो हुआ था .आज जब भी वह वाकया याद आता है,तो दुख  होता है,कि  इस बंबई फ़िल्म ईंडस्ट्री में सभी चढते सूरज को सलाम करते है और जब ये सूरज़ ढलता है, तब उसे गर्त में धकेल दिया जाता है. जो व्यक्ति हमारे मनमें एक हीरो की तरह उसके साथ यूं बदसलूक दिल को चोट पहुंचाता है.(ऐसा ही वाकया बाद में  मेरे सामने महान संगीतकार जयदेव के साथ भी हुआ )
आज मैं यहां संगीतकार शंकर जयकिशन की एक सुंदर रचना को सुनाता हूं अपने ही  आवाज़ में. गीत है फ़िल्म दिल एक मंदिर का ….MV5BMTM2NjQ1Nzg2N15BMl5BanBnXkFtZTcwNDkyNjAzMQ@@__V1__SX96_SY140_

याद ना जाये ,बीते दिनों की…. 



इसे मूलतः रफ़ीजी नें गाया है, मगर यहां केरीओके (Karaaoke) की ट्रेक पर मैने गया है.मैं यहां अपने सुरीले साथियो को  बता दूं कि मैं मूलतः स्टेज का कलाकार हूं और ये घर पर ही amateurish Recording की गयी है.  गलती हो तो सुधी जन माफ़ करेंगें, और पसंद आया तो हौसला अफ़ज़ाई करें.इस माध्यम को भी उपयोग में ला कर देखें.

वैसे ये गीत मेरे दिल के  बहुत करीब है. वो इसलिये कि शंकर जयकिशन नें इस गीत में जैसे मेलोडी ठूस ठूस के भर दी है.मगर साथ में मन के अंदर  दर्द के धीरे धीरे हो रहे रिसाव को भी सुरों के माध्यम से बखूबी उभारा है. ऊपर से महागायक रफ़ी साहब के  एहसास भरे भीगे  स्वर .. ऊफ़्फ़ , आपकी और हमारी तो जान ही ले ली है.

और हां, जब दर्द भरे गीतों की जब बयार चली ही है,  तो याद आ गयी वो दिल की पीडा को बखूबी अभिव्यक्त करने वाली आवाज़  - मुकेश जी की ……..
और उनकी सरल , पाक साफ़ आवाज़ में , दिल की गहराई को  छू जाने वाला फ़िल्म यहुदी का ये गीत जिसकी  धुन में शंकर जयकिशनजी नें दुख की इंतेहा का जो आलम तारी किया है, वह दिल से भुलाये नही भूलता.वैसे इस गाने के लिये शैलेंद्र जी को फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड से  नवाज़ा जा चुका है.

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ये मेरा  दिवानापन है….



ये गीत मेरे किसी स्टेज कार्यक्रम का है, इसलिये ओडिटोरीयम   का प्रभाव आया है.
मन्ना डे - 

इस १ मई को इस महान गायक नें अपना ९० वां जन्म दिन मनाया. 


चाह कर ही उनके बारे  में प्लान करने के बावजूद पोस्ट नही लिख पाया. फ़िर भी इस लेट लतिफ़ नें vlcsnap-223198१ठान लिया है, कि अगली पोस्ट को छोड कर  मन्ना दा पर कुछ कडीयां लिखूंगा. और साथ ही में आप ही लोगों के आग्रह पर मन्ना दा के गीतों पर किये गये अपने एक स्टेज कार्यक्रम दिल का हाल सुने दिल वाला की क्रमवार गीत शृंखला का (विडियो) पेश करूंगा.

अगली पोस्ट नज़र है  मखमली आवाज़ के  शहेंशाह तलत मेहमूद पर जिनकी ९ मई को ११ वीं पुण्य तिथी है.तो एक दो गाने उनके भी …( ता.१० को )

Tuesday, April 28, 2009

अभागे शंकर

शंकर रामसिंग रघुवंशी...

जब ये नाम मुझे बताया गया , तो मैं पहले समझ ही नही सका , कि ये उस अज़ीम और मकबूल शख्सियत का पूरा नाम है, जिसे आप और हम सभी फ़िल्मी संगीत की एक महान सफ़लतम जोडी शंकर - जयकिशन के एक स्तंभ के नाम से जानते है.जिसने चालीस के दशक के अंत में धूमकेतु की तरह हिंदी सिनेमा के संगीत के आकाश में विस्फ़ोट के साथ उदय किया और बाद में २५ वर्ष से भी अधिक काल में मधुर मेलोडियस गीतों से हम सभी संगीत प्रेमीयों को नवाज़ा.

अभी उनकी बरसी (२६ अप्रिल )को उन्हे हम से बिछडे बाईस साल हो गये.

महान शोमॆन राज कपूर की सन १९४८ में बनी फ़िल्म बरसात से आगाज़ करने वाली इस संगीतकार जोडी नें एक के बाद एक दिलकश ,सुरीले और श्रवणीय गीतों की झडी लगा दी और हमारा मन मयुर नाच उठा इस झम झम बारीश की फ़ुआरों के अपने मानस पटल पर एहसास कर. एक से बढ कर एक गीत उन्होने पेश किये की वे पचास के दशक के श्रेष्ठतम संगीत महर्षियों की फ़ेरहिस्त के शीर्ष पर पहुंच गये.सन १९७१ में जयकिशन के निधन से इस जोडी का करीश्माई वजूद बिखर गया.

शंकर मूलतः मध्य प्रदेश के थे, और बाद में पंजाब से चलकर हैद्राबाद में बस गये थे, जो मुम्बई की फ़िल्म नगरी में जब आये तो उनसे मुलाकात हुई जयकिशन डाह्याभाई पांचाल से जिन्होने कारपेंटरी के अपने पुश्तैनी व्यवसाय को छोड कर बलसाड के बांसडा गांव से बंबई नगरीया की राह पकडी थी.पृथ्वी थियेटर के नाटकों में पार्श्व संगीत के ऒर्केस्ट्रा में वे दो्नो पहली बार मिले, और दोस्ती परवान चढी. शंकर तबला और ढोलक बजाते थे , और जयकिशन हारमोनियम!!

कुछ दिन हुस्नलाल भगतराम और राम गांगुली के साथ बतौर असिस्टेंट काम करने के बाद वे राज कपूर की नज़र में जो चढे, आज तक हमारी जेहन में गहरे जा कर पैठ गये है. याद है जिया बेकरार है, और बरसात में हम से मिले तुम...

दरसल पहली फ़िल्म आग की तरह दूसरी फ़िल्म बरसात के लिये भी राज नें राम गांगुली को बतौर संगीतकार अनुबंधित किया था और एक गाने की रिकोर्डिंग तक कर ली थी.उन्हे ये फ़िल्म कैसे मिली उसका एक रोचक वृत्तांत है, जो शायद आपको मालूम ही होगा.

उन दिनों एक ही गाने की दो रिकोर्डिंग हुआ करती थी. एक Original Soundtrack के लिये और दूसरी ७८ rpm की रिकोर्ड के लिये जिसमें अमूमन दो ही अंतरा ही कवर हो पाते थे.पहली रिकोर्डिंग के दूसरी के लिये राम गांगुली एच एम व्ही के स्टुडियो पर आये ही नही और शंकर को भेज दिया. राज कपूर नें फ़िर भी उनकी राह देखी और और गायिका लता मंगेशकर को रुक जाने को कहा. इसी बीच एच एम व्ही के ही दूसरे स्टुडियो में भी रिकोर्डिंग चल रही थी, तो लताजी समय बिताने जब वहां पहुंची तो उन्हे आश्चर्य का जोरदार धक्का लगा जब उन्होने पाया कि राम गांगुली वहां किसी दूसरी फ़िल्म का गीत रिकोर्ड करवा रहे थे, और उस गीत की धुन भी इस गाने की धुन से मिलती जुलती थी. लता जी को स्वाभाविक है कि बडी ठेस पहुंची और उन्होने राज जी से इस बात की शिकायत कर दी.इस बात से राज कपूर इतने खफ़ा हो गये कि उन्होने आनन फ़ानन में राम गांगुली को बरसात फ़िल्म से अलग कर दिया और शंकर जयकिशन की नई जोडी को आज़माने का निश्चय कर लिया. इसके बाद जो हुआ वह तो इतिहास बन गया. इस फ़िल्म के सभी गाने प्रसिद्ध हुए जो कि उन दिनों एक रिकोर्ड ही हुआ.

बरसात में इस जोडी नें सिर्फ़ लता जी से ही सभी गाने गवाये. कुल दस गानों में सिर्फ़ एक गीत रफ़ी जी नें गाया (मैं ज़िंदगी में हर दम रोता ही रहा हूं)और बाकी ८ सोलो और एक मुकेशजी के साथ ड्युएट- पतली कमर है... याने नर्गिस, पहाडी लडकी विमला के लिये और नवाब बेगम के लिये भी.

नवाब बेगम? जिसे हम सभी निम्मी के नाम से जानते है!!!

इसी फ़िल्म से हमसे रू ब रू हुए महान गीतकार शैलेन्द्र , जिन्होने आग के समय राज कपूर को लौटा दिया था. इसी समय हसरत जयपुरी नें भी आकर ये प्रसिद्ध पंचक बनाया.राज,शंकर,जयकिशन, शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी ..

इस पंचक के साथ दो और सुर ऋषियों ने(लता और मुकेश) आर के बेनर के लिये अजर अमर कालातीत गाने देकर सप्तर्षि का ये समूह स्वयम अजरमर हो गया.



हम सभी शंकर की मेलोडी पर जबरदस्त पकड के बारे में तो जानते ही है, मगर एक और किस्सा है, जिससे हमें उनके एक और स्वरूप के दर्शन होते हैं.

एक बार शंकरजी प्रसिद्ध गज़ल ठुमरी गायिका शोभा गुर्टु से एक गीत गवा रहे थे किसी फ़िल्म के लिये . म्युज़िक रूम में रिहल्सल कराते हुए जब उन्होने गीत की धुन समझाई तो शोभा जी नें उसे अपने खास अंदाज़ से गाया.हर गायक का अपना अपना खास ढंग होता है, जिससे वह जाना जाता है. मगर संगीतकार ही है जो उसे अपने ढंग से गवाना चाहता है.अभी कल ही झी मराठी के एक रीयलिटी शो में हृदयनाथ मंगेशकर नें क्या खूब कहा- हर संगीतकार में एक हुनर , एक क्रियेटिव्ह जोनर होता है. यही हुनर सृजन कराता है उससे उसकी अद्भुत सुरीली रचना की, जिसे एक गायक अपने ढंग से पेश करता है. मगर इसका अर्थ यह नही कि गायक का भी अपना कोई हुनर नही, क्रियेटिव्ह जोनर नहीं होता. वह संगीतकार से भी आगे जाकर उस रचना में सुगंध भरता है, विविध रंगों से श्रवणीय बनाता है. लताजी ही एक मात्र गायिका थी जो किसी भी संगीतकार से आगे जा कर गीत में चार चांद लगा देती थी. मगर हृदयनाथ नें उसे मात्र २० % मार्क्स दिये, बाकी ८०% संगीतकार को दिये.

तो प्रस्तुत गीत में दोनों के अंदाज़ में एकरूपता नही आ पा रही थी शंकर जी के मनमाफ़िक.

बस एक मोड पर यूं हुआ कि शंकर जी ने शोभाजी को एक जगह मुरकी लेने को कहा, मगर किसे भी तरह उनसे वह मुरकी गले से नही उतरी.अंत में फ़ेस सेविंग के लिये शोभा जी नें कहा-शंकरजी, ये मुरकी तो गले में से निकलना संभव ही नही है, वरना मैं तो गा ही देती.

शंकर जी हंसे, हारमोनियम पकडा ,आंखें बंद की और त्वरित ही खुद गाकर वह मुरकी पेश की !!

मान गये शंकर जी... शोभा जी के हाथ खुद ब खुद जुड गये उस महान संगीतकार के वंदन में जो स्वयम एक महान गायक भी था!!

बरसात से जो सुरों का सिलसिला शुरु हुआ वह थमा साथी जयकिशन की मृत्यु पर, सन १९७१ में. आपमें से कईयों को मालूम ही होगा एक अजीब संयोग उस दिन का जिस दिन मेरिन ड्राईव्ह के गोविंद महल से जयकिशन जी की अंतिम यात्रा निकली थी तो हज़ारो गमगीन आंखों ने उन्हे श्रद्धांजली दी थी . भीड थी की एक समुंदर की मानिंद. संयोग से तभी ब्रेबोर्न स्टेडियम पर भी एक अलग भीड अजित वाडेकर की क्रिकेट टीम का जल्लोश से स्वागत कर रही थी. मराठी दैनिक मार्मिक में बालासहेब ठाकरे नें एक बढिया कार्टून अब तक नज़र में है..

मुम्बई की एक आंख में आंसू और एक आंख में हंसी ........



मगर जैसा कि मैने उपर लिखा है.. कि इस मामले में शंकर वाकी में अभागे रहे. २६ अप्रिल १९८७ को जब शाम को शंकर नें अंतिम सांसे ली तो उन्हे रात ही में अंतिम संस्कार के लिये ले जाया गया, बिल्कुल चार पांच लोगों की उपस्थिती में..

उसी समय देर दूरदर्शन को रात दिये गये अपने इंटरव्यु मेम राज कपूर ने इस अभागे सुर महर्षी के लिये क्या खूब कहा-

रोये तो यारों के कंधों पर...
जाये तो यारों के कंधों पर ...


(साभार - लोकसत्ता)
(अगली कडी में शंकर जयकिशन पर कुछ और..साथ में मन्ना दा पर , उनके जन्म दिन पर..)

Monday, March 30, 2009

आवाज़ की दुनिया - फ़िल्मी गीतों का सुरीला सफ़र

कभी कभी आप यूंही एक ऐसे जगह फ़ंस जाते हो, जहां आपको लगता है, कि

ये कहां आ गये हम ? यूंही साथ साथ चलते....

और कभी कभी अनजाने में आप उस जगह पहुंच जाते हैं जो आपके लिये एक स्वर्ग की अनूभूति देती है.


आज ही मुंबई से आया और अभी अभी देर शाम एक संगीत के विलक्षण कार्यक्रम को देख सुन आ रहा हूं.किसी मित्र नें याद किया और हम पहुंच गये संगीत की एक सुरीली मेहफ़िल में, जिसके सुरों की जादू से सन्मोहित होकर , घर लौटा हूं और पोस्ट लिखने बैठ गया.

आवाज़ की दुनिया ये फ़िल्मी गीतों का सुरीला सफ़र अशोक हांडे नें कुछ सालों पहले शुरु किया था.आप शायद जानते ही होंगे इस प्रोग्राम की थीम बडी ही अनूठी है.


प्रस्तुत प्रोग्राम की परिकल्पना जब अशोकभाई नें की थी तब अमूमन ऒर्केस्ट्रा के कार्यक्रम यूंही होते थे, जैसा कि आज भी हो रहा है, कि साजिन्दे स्टेज पर पीछे बैठे है,एक अनाऊंसर होता है जो कार्यक्रम का सूत्रधार होता है. जो फ़िल्मी गीतों के नाम और अन्य बातें दर्शकों को बताता है, एवं गायक गायिका फ़िल्मी गीतों को अपने पूर्ण क्षमता अनुसार गा कर हमारा मनोरंजन करते थे.इसमें कहीं कहीं एक मिमिक्री आर्टिस्ट भी होता था जो बीच में एक या दो बार आकर कलाकारों को और साथ ही में दर्शकों को भी रिलीफ़ देता था, और कार्यक्रम की मोनोटोनी बदलता था. कुछ शौकिन आयोजक उसमें नृत्य का भी समावेश कर देते थे, प्रेक्षकों की अभिरुची की खातिर.

उन दिनों की बातें थीं जब सिनेमा के गाने या तो फ़िल्म देखते हुए सुनने पडते थे या फ़िर रेडियो पर.श्रोता ये जानते हुए भी कि कोई भी गायक या गायिका कितना भी जतन कर ले , रफ़ी, मुकेश या लता आशा जैसा नहीं गा सकता, पूरे शिद्दत के साथ रुचि लेकर उन गानों के सुरों में खो जाता था.यह सब उस एम्बियेंस को मेनिफ़ेस्ट करने की सामूहिक कोशिश ही तो होती थी जिसने फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रमों को इतना पोप्युलर बनाया, कि आज भी आप हम इसके दीवाने है.

बाद में जब टीवी का उद्भव हुआ तो समीकरण बदलने लगे, और दृश्य श्राव्य माध्यमों का मिला जुला स्वरूप प्रस्तुत होने लगा, और रंगीन सपनों का मायाजाल बुनने लगा अलग अलग थीम को लेकर.

ऐसे में श्री अशोक हांडे नें सबसे पहले प्रेक्षकों की नब्ज़ को पकडा और शायद फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम के इतिहास में पहली बार एक ऐसे कार्यक्रम की संकल्पना की जो लीक से हटकर था.इस कार्यक्रम का नाम था आवाज़ की दुनिया.

इस कार्यक्रम का आगाज़ होता है पुराने गीतों से, जो आज भी हमें श्रवणीय , सुरीले और मनमोहक लगते है.साथ ही पीछे स्क्रीन पर उभरती है तसवीरें और परिदृश्य जो कहीं कहीं मूल फ़िल्म से तो कभी कभी अन्य फ़िल्मों के प्रभावी कोलाज़ से पेश किये गये है.स्वयं अशोक हांडे सूत्रधार की तरह अपनी साधी ,मीठी मगर प्रभावी वाणी की मदत से दर्शकों के दिलों पर कब्ज़ा कर लेते है, और हम सभी उनके साथ साथ उस सुरीले सफ़र पर निकल पडते है, जिसमें गायक और गायिकाओंकी पूरी मंडली पूरे अनुशासन के साथ रंगमंच के पात्रों की तरह विविध रंगों में रचे हुए नवरसों में पके स्वादिष्ट व्यंजन परोसने लगते है.यही क्या कुछ कम था कि किसी किसी गीत में नृत्य का भी एक शालीन तडका लगता था और साथ ही पृष्ठभूमी के अनुसार गायक गायिका भी उसी से बाबस्ता परिधान भी पहनते है, जिससे वातावरण निर्मिती में एकरूपता और जेन्युनिटी आ जाती है.पीछे की स्क्रीन पर ब्लॆक एण्ड व्हाईट तथा रंगीन दृश्यों के कोलाज़ साथ में हमें उस युग में त्वरित ट्रांसपोर्ट कर देते है.

साथ में इन फ़िल्मी गीतों की मेडली प्रस्तुत करते हुए उसके इतिहास से भी हम रू-ब-रू होते है, और करीब बीस साजिंदों की टोली हमें एक गीत से दूसरे गीत में ऐसे ले जाती हैं कि एक ऐसा सुरमई आलम तारी हो जाता है. हम सभी बच्चे हो जाते है, और अशोक हांडे के इस बाईस्कोप के विविधता भरे रंगों से होली खेलने लग जाते है.

स्वाभाविक है, कि फ़िल्मी गीतों का इतिहास जब बताया जा रहा हो तो उस दोगाने - मैं बन की चिडिया , मैं बन का पंछी, से, दिल जलता है तो जलने दे तक, आवाज़ दे कहां है से ओ गाडीवाले गाडी धीरे हांक रे तक, फ़िर ए मेरे वतन के लोगों से लेकर मेरे देश की धरती सोना उगले तक, और ना तो कांरवां की तलाश से लागा चुनरी में दाग तक और आज के परिप्र्येक्ष में टोप टेन के ये इश्क हाये , बैठे बिठाये , जन्नत दिखाये, नगाडा नगाडा, और गुज़ारीश तक गीत सुनाये.

इस पूरे कसावट से भरे , अच्छे समय प्रबंधन किये गये कार्यक्रम का सबसे केंद्रिय मूल तत्व जो समझ में आया कि फ़िल्मी गीतों द्वारा ही हम अपने अलग अलग क्षेत्रिय संस्कृति से परिचय पाते है. फ़िल्मों की ही वजह से आज हम भांगडा, गरबा, लावणी, भरतनाट्यम ,कुचिपुडी , आदि नृत्य शैलीयों से एक ही फ़िल्म के माध्यम से रूबरू होते आये है. राष्ट्रीय एकात्मकता का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है?

कुल मिला कर आवाज़ की दुनिया की ये प्रस्तुति मैंने पांच , छः बार देख चुका हूं , और साथ ही में अशोक जी नें इसी तरह की थीमों से तैयार किये अन्य कार्यक्रमों को मैं देख चुका हूं.जैसे- आज़ादी के पचास वर्ष, अमृतलता (लताजी पर केंद्रित), गाने सुहाने ,मधुरबाला (मधुबाला पर) और अन्य मराठी में भी . कल भी यहां उन्होने मधुरबाला की सफ़ल प्रस्तुती दी थी, मगर दुर्भाग्य वश मैं मुम्बई में होने की वजह से देख नहीं पाया.

अतः अगर आप को कभी मौका मिले तो ये कार्यक्रम देखना ना भूलें.

Sunday, March 15, 2009

गुरु दत्त , एक अशांत अधूरा कलाकार !

 


महान फिल्मकार गुरुदत्त की पुण्यतिथी पर एक विशेष प्रस्तुति प्रसिद्ध संगीत को समर्पित हिन्दयुग्म के ब्लोग आवाज़ में पिछले अक्टूबर में मैने एक लेख लिखा था . हमारे काफ़ी संगीत प्रेमी मित्रों से वह छूट गया था, अतः वे कब से आग्रह कर रहे हैं कि वह पोस्ट ’ दिलीप के दिल से ’ पर भी जारी की जाय. उनसे अनुमती लेकर यहां वह पोस्ट जस की तस पेश कर रहा हूं .


कुछ दिनों पहले मैंने एक सूक्ति कहीं पढ़ी थी -
To make simple thing complicated is commonplace.
But ,to make complicated things awesomely simple is Creativity.


गुरुदत्त की अज़ीम शख्सियत पर ये विचार शत प्रतिशत खरे उतरते है. वे महान कलाकार थे , Creative Genre के प्रायः लुप्तप्राय प्रजाति, जिनके सृजनात्मक और कलात्मक फिल्मों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा.

४४ साल पहले १० अक्टुबर सन १९६४ को, उन्होंने अपने इस कलाजीवन से तौबा कर ली. रात के १ बजे के आसपास उनसे विदा लेने वाले आख़िरी शख्स थे अबरार अल्वी. उनके निधन से हमें उन कालजयी फिल्मों से मरहूम रहना पडा, जो उनके Signature Fims कही जाती है.

वसंथ कुमार शिवशंकर पदुकोने के नाम से इस दुनिया में आँख खोलने वाले इस महान कलाकार नें एक से बढ़कर एक ऐसी फिल्मों से हमारा त,अर्रूफ़ करवाया जो विश्वस्तरीय Masterpiece थीं. गुरुदत्त नें गीत संगीत की चासनी में डूबी, यथार्थ से एकदम नज़दीक खट्टी मीठी कहानियों की पर बनी फ़िल्मों से, उन जीवंत सीधे सच्चे संवेदनशील चरित्रों से हमें मिलवाया,जिनसे हम आम ज़िन्दगी में रू-ब-रू होते है. परिणाम स्वरूप हम मंत्रमुग्ध हो, उनके बनाए फिल्मी मायाजाल में डूबते उबरते रहे.


गुरुदत्त अपने आपमें एक संपूर्ण कलाकार बनने की पूरी पात्रता रखते थे. वे विश्व स्तरीय फ़िल्म निर्माता और निर्देशक थे. साथ ही में उनकी साहित्यिक रूचि और संगीत की समझ की झलक हमें उनके सभी फिल्मों में दिखती ही है. वे एक अच्छे नर्तक भी थे, क्योंकि उन्होंने अपने फिल्मी जीवन का आगाज़ किया था प्रभात फिल्म्स में एक कोरिओग्राफर की हैसियत से. अभिनय कभी उनकी पहली पसंद नही रही, मगर उनके सरल, संवेदनशील और नैसर्गिक अभिनय का लोहा सभी मानते थे .(उन्होने प्यासा के लिये पहले दिलीप कुमार का चयन किया था).वे एक रचनात्मक लेखक भी थे, और उन्होंने पहले पहले Illustrated Weekly of India में कहानियां भी लिखी थी.


संक्षेप में , वे एक संपूर्ण कलाकार होने की राह पर चले ज़रूर थे. मगर, उनके व्यक्तित्व में एक अधूरापन रहा हर समय, एक अशांतता रही हर पल, जिसने उन्हें एक अशांत, अधूरे कलाकार और एक भावुक प्रेमी के रूप में, दुनिया नें जाना, पहचाना.

देव साहब जो उनके प्रभात फिल्म कन्पनी से साथी थे, जिन्होंने नवकेतन के बैनर तले अपनी फिल्म 'बाजी' के निर्देशन का भार गुरुदत्त पर डाला था, नें अभी अभी कहीं यह माना था की गुरुदत्त ही उनके सच्चे मित्र थे. जितने भावुक इंसान वे थे, उसकी वजह से हमें इतनी आला दर्जे की फिल्मों की सौगात मिली, मगर उनकी मौत का भी कारण वही भावुकता ही बनी .


उनकी व्यक्तिगत जीवन पर हम अगर नज़र डालें तो हम रू-बी-रू होंगे एक त्रिकोण से जिसके अहाते में गुरुदत्त की भावनात्मक ज़िंदगी परवान चढी.


ये त्रिकोण के बिन्दु थे गीता दत्त , वहीदा रहमान और लेखक अबरार अल्वी , जिन्होंने गुरुदत्त के जीवन में महत्वपूर्ण भुमिका निभाई.
गीता दत्त रॉय, पहले प्रेमिका, बाद में पत्नी.सुख और दुःख की साथी और प्रणेता ..


वहीदा रहमान जिसके बगैर गुरुदत्त का वजूद अधूरा है, जैसे नर्गिस के बिना राज कपूर का. जो उनके Creative Menifestation का ज़रिया, या केन्द्र बिन्दु बनीं.


और फ़िर अबरार अल्वी, उतने ही प्रतिभाशाली मगर गुमनाम से लेखक, जिन्होंने गुरुदत्त के "आरपार" से लेकर "बहारें फ़िर भी आयेंगी" तक की लगभग हर फ़िल्म्स में कहानी, या पटकथा का योगदान दिया.

आज भी विश्व सिनेमा का इतिहास अधूरा है गुरुदत्त के ज़िक्र के बगैर. पूरे जहाँ में लगभग हर फ़िल्म्स संस्थान में ,जहाँ सिनेमा के तकनीकी पहलू सिखाये जाते है, गुरुदत्त की तीन क्लासिक फिल्मों को टेक्स्ट बुक का दर्जा हासिल होता है. वे है " प्यासा ", " कागज़ के फ़ूल ", और "साहिब , बीबी और गुलाम ".
इनके बारे में विस्तार से फ़िर कभी..


गुरुदत्त नें अपने फिल्मी कैरियर में कई नए तकनीकी प्रयोग भी किए.
जैसे, फ़िल्म बाज़ी में दो नए प्रयोग किए-


1, १०० एमएम के लेंस का क्लोज़ अप के लिए इस्तेमाल पहली बार किया - करीब १४ बार. इससे पहले कैमरा इतने पास कभी नही आया, कि उस दिनों कलाकारों को बड़ी असहजता के अनुभव से गुज़रना पडा. तब से उस स्टाईल का नाम ही गुरुदत्त शॉट पड़ गया है.


२. किसी भी फ़िल्म्स में पहली बार गानों का उपयोग कहानी कोई आगे बढ़ाने के लिए किया गया.


वैसे ही फ़िल्म ' काग़ज़ के फूल ' हिन्दुस्तान में सिनेमा स्कोप में बनी पहली फ़िल्म थी. दरअसल , इस फ़िल्म के लिए गुरुदत्त कुछ अनोखा ,कुछ हटके करना चाहते थे , जो आज तक भारतीय फ़िल्म के इतिहास में कभी नही हुआ.


संयोग से तभी एक हालीवुड की फ़िल्म कंपनी 20th Century Fox नें उन दिनों भारत में किसी सिनेमास्कोप में बनने वाली फ़िल्म की शूटिंग ख़त्म की थी और उसके स्पेशल लेंस बंबई में उनके ऑफिस में छूट गए थे. जब गुरुदत्त को इसका पता चला तो वे अपने सिनेमाटोग्राफर वी के मूर्ति को लेकर तुंरत वहाँ गए, लेंस लेकर कुछ प्रयोग किये , रशेस देखे और फ़िर फ़िल्म के लिए इस फार्मेट का उपयोग किया.
चलिए अब हम इस फ़िल्म के एक गाने का ज़िक्र भी कर लेते है -


वक्त नें किया क्या हसीं सितम .. तुम रहे ना तुम , हम रहे ना हम...


गीता दत्त की हसीं आवाज़ में गाये, और फ़िल्म में स्टूडियो के पृष्ठभूमि में फिल्माए गए इस गीत में भी एक ऐसा प्रयोग किया गया, जो बाद में विश्वविख्यात हुआ अपने बेहतरीन लाइटिंग की खूबसूरत संयोजन की वजह से.


आप ख़ुद ही देख कर लुत्फ़ उठाएं .


गुरुदत्त इस क्लाईमेक्स की सीन में कुछ अलग नाटकीयता और रील लाईफ़ और रियल लाईफ का विरोधाभास प्रकाश व्यवस्था की माध्यम से व्यक्त करना चाहते थे. ब्लेक एंड व्हाईट रंगों से नायक और नायिका की मन की मोनोटोनी ,रिक्तता , यश और वैभव की क्षणभंगुरता के अहसास को बड़े जुदा अंदाज़ में फिल्माना चाहते थे.


जिस दिन उन्होंने नटराज स्टूडियो में शूटिंग शुरू की, तो उनके फोटोग्राफर वी के मूर्ति नें उन्हें वेंटिलेटर से छन कर आती धूप की एक तेज़ किरण दिखाई, तो गुरुदत्त बेहद रोमांचित हो उठे और उनने इस इफेक्ट को वापरने का मन बना लिया. वे मूर्ति को बोले,' मैं शूटिंग के लिए भी सन लाईट ही वापरना चाहता हूँ क्योंकि वह प्रभाव की मै कल्पना कर रहा हूँ वह बड़ी आर्क लाईट से अथवा कैमरे की अपर्चर को सेट करके नहीं आयेगा. '

तो फ़िर दो बड़े बड़े आईने स्टूडियो के बाहर रखे गये, जिनको बडी़ मेहनत से सेट करके वह प्रसिद्ध सीन शूट किया गया जिसमें गुरु दत्त और वहीदा के बीच में वह तेज रोशनी का बीम आता है. साथ में चेहरे के क्लोज़ अप में अनोखे फेंटम इफेक्ट से उत्पन्न हुए एम्बियेन्स से हम दर्शक ठगे से रह जाते है एवं उस काल में, उस वातावरण निर्मिती से उत्पन्न करुणा के एहसास में विलीन हो जाते है, एकाकार हो जाते है.
और बचता है .., गुरुदत्त के प्रति एक दार्शनिक सोच...,मात्र एक विचार , एक स्वर...


वक्त नें किया क्या हसीं सितम...



अगली कडी में पहले किये गये वादे के अनुसार, एक पोस्ट तैय्यार कर रहा हूं, जिस में गुरुदत्त, रफ़ी जी, हेमंत दा, एस डी बरमन , और एक अज़ीम शायर पर एक संस्मरण.. अगले हफ़्ते...

Monday, February 23, 2009

अल्ला रक्खा रहमान के दिल से--- जय हो....शिवमणी.


इस बार फ़िर देर हो गयी, घर में शादी जो थी.मित्रों को भी यही समय मिला था.

बस सब निपट चुका है, चार किलो वजन भी बढ गया है, और आज महाशिवरात्री के रोज़ का उपवास बडा सुकून भरा लग रहा है.

आज की सबसे बडी खबर ये है कि ओस्कर में भारतीय विषय पर बनी फ़िल्मों में स्लमडोग को ८ पुरस्कार मिले, और पिंकी की स्माईल और दूगनी हो गयी पुरस्कार के बाद. साथ ही हमारे सभी भारतीयों की भी स्माईल सौ गुना हो गयी, क्योंकि ऐसा अवसर बिरला ही आता है. अब इस बात में मीन मेख निकालने की कतई ज़रूरत नहीं कि यह फ़िल्म तो भारतीय नहीं.

चलिये साहब, आपने सुना नहीं? पुरस्कार मिलते ही रहमान नें क्या सही कहा है कि उसे जब चुनना पडा तो उसने सुख को चुना, दुख को नहीं. हम सब खुश हो जायें वाकई में, और न्यूज़ मीडिया भी खुश हो ले कि उसे दिन भर या २४ घंटे की खबर मिल गयी है.

मेरी बिटिया मानसी नें जब ये सुना तो कहा कि रहमान नें इससे भी अच्छे गाने कंपोज़ किये है, मगर इस गानें को जब मिलना था तो मिल ही गया.मेरे एक मित्र, जो मेनेजमेंट कोलेज चलाते हैं , ने कहा कि इस गीत की धुन कुछ इस तरह से बन पडी़ है, कि सकारात्मक फ़ीलींग आती है,और मेरे यहां एक परिसंवाद में ये विषय रखा गया था.

मैने सच कहूं तो ये गीत अब तक पूरा नहीं सुना था , इसलिये जब सुना तो पाया कि उत्साह के वातावरण में बुने हुए इस गीत के स्वर संयोजन में एक सीढी की तरह सुर नीचे से ऊपर जाते है, और जय हो पर ब्लास्ट करते है.

जहां तक गुलज़ार के लिखे शब्दों का सवाल है, अमूमन आजकल के गीतों के शब्दों पर तो युवा पीढी़ ध्यान ही नहीं देती.उन्हे तो गीत की धुन , उससे ज्यादा उसका रिदम से मतलब रहता है, ज़्यादाहतर. इसलिये कई युवाओं से जब पूछा तो अधिकतम सभी कन्नी काट गये. मैंने जब सुना तो पाया कि शब्द भी मधुर और डेकोरेटिव है.

मैं इसलिये यहां सिर्फ़ शब्द दे रहा हूं क्योंकि गीत तो अब अगले दो दिन और चलेगा हर चेनल पर.

जय हो,जय हो, जय हो, जय हो ,

आजा आजा जिन्द शामियाने के तले
आज जरीवाले नीले आसमान के तले,
जय हो,जय हो,२
जय हो, जय हो ,

रत्ती रत्ती सच्ची मैने जान गवाईं है,
नच नच कोयलों पे रात बिताई है,
अंखियों कि नींद मैने फूंको से उडा दी,
नीले तारे से मैने उंगली जलायी है,

आजा आजा जिन्द शामियाने के तले
आज जरीवाले नीले आसमान के तले,
जय हो,जय हो,२
जय हो, जय हो ,

चख ले , हां चख ले, ये रात शहद है..चख ले
रख ले , हां दिल है, दिल आखरी हद है,...रख ले
काला काला काजल तेरा कोइ जादू है ना
काला काला काजल तेरा कोइ जादू है ना

आजा आजा जिन्द शामियाने के तले
आज जरीवाले नीले आसमान के तले,
जय हो,जय हो,२
जय हो, जय हो ,

कब से, हां कब से तु लब पे रुकी है...कह दे
कह दे, हां कह दे अब आंख झुकी है...कह दे
ऐसी ऐसी रोशन आंखे रोशन दोनो भी है है क्या

आजा आजा जिन्द शामियाने के तले
आज जरीवाले नीले आसमान के तले,
जय हो,जय हो,२
जय हो, जय हो ,


क्या ही संयोग हुआ कि कल रहमान और उसकी टीम ओस्कर के समारोह के लिये तैय्यारी कर रहे थे, रहमान के बेंड का एक महत्वपूर्ण कलाकार शिवमणी यहां इन्दौर में था किसी निजी शादी के कार्यक्रम में, जहां उसने अपने हुनर और फ़न का ऐसा जबरदस्त मुजाहिरा किया कि सभी मौजूद श्रोता झूम उठे. चम्मच, स्टील का बर्तन, सूटकेस, बिसलेरी की खाली क्रंच की हुई बोतलें, मटका, सायकिल की घंटियां,बच्चों के खिलौने, पानी का बडा खाली टेंक... और क्या क्या सामान लेकर ताल वृंद या परकशन समूह से रस उत्पत्ती की.

कार्यक्रम शुरु होने से पहले जब मैं लान में सजी गोल टेबल पर बैठने गया ही था तो एक टेबल पर शिवमणी को अकेले बैठे देख मेरी तो बांछे ही खिल गयी. मेरे जिस मित्र नें अपने यहां शादी के रिशेप्शन में शिवमणी को बुलाया था, और किसी कामन मित्र की वजह से उसने ये पेरफ़ार्मेंस देना कबूल किया था.

जाहिर है, मैं और मेरी पत्नी उससे बातें करने लगे. उसने यह बताया कि दर असल आज उसे अमेरिका में होना था रहमान के साथ ओस्कर में मगर चूंकि पहले से कमिट कर दिया था मित्र को , तो यहां आ गये.एक और बात बताई जो महत्वपूर्ण है, कि आज रात को उसे मंगलोर में शिव मंदिर में अपना कार्यक्रम देना था, जो पिछले इतने सालों से वे मुफ़्त में दे रहे है.

शिवमणी वाकई में एक प्रयोगधर्मी कलाकार है और अपने साथी रहमान की तरह ही जिनीयस है.वह बता रहा था कि किस तरह वे दोनों इलाया राजा के पास कीबोर्ड और ताल वाद्य के लिये गये थे और उन्होने अपनी पूरी संगीत साधना वहीं की. बाद में उन्होने एक बेंड भी बनाया जिसका नाम था - रूट्स, जिसमें वे जिंगल्स और बेकग्राऊंड संगीत रचा करते थे. बाद में रोजा के ऐतिहासिक प्रसिद्धी के बाद उनकी टीम नें पीछे मुड कर नहीं देखा. इसी टीम में है नवीन कुमार जिसने मुंबई , ताल और दिल से में अपनी बांसुरी से हमारे होश उडा दिये थे.बेस गिटार के पीटर्स का भी यही मानना है, कि अगर आपमें कल्पना शक्ति है, तो आप रहमान के साथ जुड सकते हैं, क्योंकि वह सुरों का जादुगर है, और नई धुन में कुछ नयापन डालता है. जहां बाकी के संगीतकार नया करने की बजाय, एक ही सांचे में धुनों को ढालते है, क्योंकि वह धुन कामयाब हुई थी, रहमान इससे डरता नहीं.

मैंने उसे कहा कि वह वाकई में जिनीयस है, तो वह बडे ही सादगी से बोला, हम सब जिनीयस होते है, फ़रक सिर्फ़ यही है कि हम अपने आप को ईवोल्व कितना बेहतर कर पाते हैं. रहमान भी इसी लिये उससे बेहतर जिनीयस है, कलाकार है, क्योंकि उसने भारतीय मेलोडी और पाश्चात्य सिम्फनी का बेहद ही खूबसूरत फ़्युज़न किया. आज गुलज़ार नें भी तो कहा ही है, कि रहमान नें गाने के प्रचलित फ़ारमेट में कभी अपने आप को नही बांधा, और इसलिये,उसकी रचना में स्थाई, इंटरल्युड, अंतरा आदि में स्ट्रक्चर की जगह झरने जैसी अठखेलियां करती हुई धुनें होती है, जो कहीं ऊपर उठती है, तो कहीं ज़मीं पर कलकल बहती है.स्वदेश फ़िल्म का आठ मिनीट का वह गीत हो जिसे तीन गायकों ने गाया, या युवा फ़िल्म का अलग रिदम का गीत, रंग दे बसंती का युवाओं पर फ़िल्माया गीत आदि आदि.

मैंने शिवमणी से ये ज़रूर कहा कि मुझे राहुल देव बर्मन में और रहमान में ये बात कामन लगती है, कि दोनो ने ही प्रयोगधर्मी होने के साथ ताल और लय पर अलग अलग काम किया है. राहुल तो स्वयं ही एक अच्छे रिदम मास्टर थे, मगर रहमान के अलग अलग रिदम के प्रयोग के पीछे ज़रूर शिवमणी ही है. वह मुस्कुराया , शरमाया, और फ़िर कह उठा- रहमान को जो चाहिये वह हासिल कर लेता है, अपने ग्रुप से. हम भी यूं ट्युन हो गये है, कि हमेशा कुछ अलग रचने के लिये लालायित रहते है.उसे अपने काम पर गर्व ज़रूर है, खुद पर नहीं, क्योंकि उसमें एक बात है जिससे उसकी क्रियेटिविटी में हमेशा इज़ाफ़ा होता रहता है, वो है - उसकी स्पिरिच्युअलिटी या आध्यात्म!! (तभी तोआज उसने सबके सामने ये कह दिया- मेरे पास मां है. )

जय हो के गीत के बनने की प्रक्रिया पर उसनें बताया, कि इसपर रहमान के पास दो तीन धुनें थी, और सभी बढिया थी.

चलो , शिवमणी नें जो पर्फ़ार्मेंस दिया उसकी रिकोर्डिंग यहां दे रहा हूं आप के लिये- आनंद उठाईये, और मस्त हो जाईये--

जय हो !!!!



साथ में उसके विडियो भी देख लें...



Wednesday, February 11, 2009

हीरे मोती जडे़ गहनों जैसे फ़िल्मी गीतों के बोल- NO EXPIRY DATE !! पं. नरेंद्र शर्मा- पुण्यतिथी-

चित्र- साभार सुश्री लावण्याजी

अभी अभी कहीं ये बहस चल रही थी कि फ़िल्मी गीतों में गीतकार का क्या योगदान होता है.
बेशक , हम जो भी गाने आज सुनते है, उनमें से अधिकांश में बोल तो सिर्फ़ सुरों को बांधने के लिये ही है. और तो और, जैसा कि स्वयं लताजी नें अभी अभी किसी इंटरव्यु में क्या सच कहा था - कि आजकल तो गाने रिदम की बेस पर ही बनते है, और सुर तो उस ताल को चाल को बांधने के लिये ही होते है.तो फ़िर शब्दों की तो बिसात ही क्या.तभी तो इन गानों को लंबी आयु नसीब नहीं होती,और इन गानों की ए़क्सपायरी डेट बहुत ही कम होती है.

मगर हम जब फ़िल्मी गीतों का वह गरिमामयी इतिहास देखते हैं तो पाते हैं कि चालीस पचास दशक में गाने में बोल, सुर और ताल ये सभी घटक समान तौर पर महत्वपूर्ण होते थे, जिसमें गीतों के भावपक्ष का , साहित्यिक गहराई, या अदबी वज़्न का गीत के पोप्युलर होने में संपूर्ण योगदान होता था.तभी तो उन दिनों के गाने अभी तक सुने जा रहे हैं और उनकी एक्सपायरी डेट कभी भी खत्म नहीं होती!!!

पंडित नरेंद्र शर्मा उसी कालखंड के गुणी गीतकार थे, जिन्होने विशुद्ध हिंदी शब्दों में अपने हर गीत गूंथे , जो आज तक हमारे जेहन में बाबस्ता है, स्थाई रूप से अंकित हैं.

आपको तो पता ही है, कि पचास के दशक के प्रारंभ में जो भी गानें लिखे जाते थे वे मुख्यतः अदबी उर्दु के लफ़्ज़ों से गढे जाते थे जिसमें भावनाओं और संवेदनाओं को, अहसासात को बखूबी सुरों में पिरोया जाता था, और बनते थे वे कालजयी गीत जिन्हे आज भी आप हम सुन ही रहे हैं. ( साहिर, मजरूह, कैफ़ी आज़मी, शकील आदि)साथ ही में,भोजपुरी , अवधी आदि क्षेत्रिय बोलीयों में भी कहीं कहीं गीत बनाये गये.

मगर मात्र शुद्ध साहित्यिक हिंदी शब्दों पर बनाये हुए गीतों के लिये हम याद करते है शैलेन्द्र, प्रदीप, भरत व्यास ,नीरज और पं. नरेंद्र शर्मा.

सन १९५१ में फ़िल्म अफ़सर में सचिनदा के संगीत निर्देशन में पांच गीत आपने लिखे थे-

नैन दीवाने, इक नहीं माने..
मनमोर हुआ मतवाला..
गुन गुन गुन बोले रे ..
परदेसी रे जाते जाते...
प्रीत का नाता जोड़ने वाले..

याद है वह लताजी का गाया गैर फ़िल्मी गीत- जो समर में हो गये अमर, मैं उनकी याद में..

या विविध भारती के उदघाटन पर मन्ना डे द्वारा गाया गीत, जिसे अनिल विश्वास नें संगीत्बद्ध किया था- नाच रे मयूरा...

फ़िल्म फिर भी का ये गीत जो बेहद प्रसिद्ध हुआ, और मुझे भी गाने के लिये प्रेरणा देता रहा वह है-

क्यूँ प्याला छलकता है :
क्यूँ दीपक जलता है
दोनों के मन में कहीं अनहोनी विकलता है
क्यूँ प्याला छलकता है पत्थर में फूल खिला
दिल को एक ख़्वाब मिला
क्यूँ टूट गए दोनों इसका ना जवाब मिला
दिल नींद से उठ उठ कर
क्यूँ आँखें मलता है.. हैं राख की रेखाएँ लिखती है चिंगारी
हैं कहते मौत जिसे जीने की तैयारी
जीवन फिर भी जीवनजीने को मचलता है॥

मगर पंडितजी के लिखे हुए दो गीतों का खास ज़िक्र करना चाहूंगा, जिसनें उन्हे और इन गीतों को अमर कर दिया है-
वे है ज्योति कलश छलके, और लौ लगाती गीत गाती.

लताजी स्वयं ये बात मन से कबूल करती हैं कि पंडितजी में उन्हे उनके पिता के दर्शन होते थे, तभी तो वे उन्हे पापा कह कर बुलाती थी.

सँगीत : स्व. श्री सुधीर फडके
स्वर: लता मँगेशकर
कविता: स्व.पँ.नरेन्द्र शर्मा
फिल्म: भाभी की चूडियाँ
नायिका: स्व. मीना कुमारी

सुधीर फडके द्वारा कई गीतों को मराठी में स्वरबद्ध किया गया है, मगर हिंदी में उन्होने ये एक अनमोल भेंट दी है .

तो चलें -सुरों की आमराई में बैठ कर मीनाकुमारी के जीवंत और ओस से पावन , कोमल भावाभिव्यक्ति से भरे अभिनय की लता मंगेशकर के अलौकिक , उतनी ही पावन आवाज़ में गाई गई इन संगीत रचनाओं की जुगलबंदी का आनंद आप और हम लें, और यहीं पिघल कर इस स्वर गंगा में एकरूप हो जायें.........

ज्योति कलश छलके ,ज्योति कलश छलके..
हुए गुलाबी , लाल सुनहले,रंग दल बादल के...
ज्योति कलश छलके...

घर आनंद वन उपवन उपवन,
करती ज्योति अमृत के सिंचन,
मंगल घट ढ़लके,२
ज्योति कलश छलके...

अंबर कुंकुम कण बरसाये ,
फ़ूल पखुरिया पर मुसकाये,
बिंदु तुही न जलके,२
ज्योति कलश छलके...

पाट पाट बिरवा हरियाला,
धरती का मुख हुआ उजाला,
सच सपने कल के,२
ज्योति कलश छलके...

उषा नें आंचल फ़ैलाया,
फ़ैली सुख की शीतल छाया,
नीचे आंचल के,२
ज्योति कलश छलके...

ज्योति यशोदा धरती गैय्या ,
नील गगन गोपाल कन्हैय्या ,
श्यामल छबि छलके,२
ज्योति कलश छलके...





दूसरा गीत है -
लौ लगाती गीत गाती,
दीप हूँ मैँ, प्रीत बाती
नयनोँ की कामना,
प्राणोँ की भावना.
पूजा की ज्योति बन कर,
चरणोँ मेँ मुस्कुराती
आशा की पाँखुरी,
श्वासोँ की बाँसुरी ,
थाली ह्र्दय की ले,
नित आरती सजाती
कुमकुम प्रसाद है,
प्रभू धन्यवाद है
हर घर में हर सुहागन,
मँगल रहे मनाती

देखा, छोटी बहर में क्या कमाल के बोल चुन चुन कर बिठायें है, जैसे कि किसी मिनीयेचर पेंटिन्ग में स्वर्ण और चांदी के रंगो से बारिक कलाकारी की गई हो!!


एक छोटी सी पहेली पूछ रहा हूं.

सन १९५७ ने पं. नरेन्द्र शर्मा नें एक नाम सुझाया था जो आज भी बेहद लोकप्रिय है?

Thursday, February 5, 2009

तू है मेरा प्रेम देवता, रफ़ी , मन्ना डे और नैय्यर

कडी़ - २
जब हम ओ पी नैय्यर के गानें सुनते हैं तो ये बात तो निर्विवाद सत्य है ही कि उनकी संगीत शैली, धुनों का Dynamics,सुरों के कोर्ड्स की विविधता, लय की मस्तानी चाल आदि अन्य संगीतकारों से एकदम हट के थी.साथ ही , हिंदुस्तानी तथा पाश्चात्य वाद्यों के माकूल उपयोग की विविधता भी आम चलन से अलग थी.

जैसे कि क्लेरिनेट के दो अलग अलग नोट्स या मोटी पतली आवाज़ का बांसुरी के साथ प्रयोग, सारंगी और सितार का फ़डकता पीस देकर मादकता की हद तक ले जाने का प्रयास, वातावरण की निर्मिती के लिये संतूर का आलाप के साथ ब्लेंडिंग, ढोलक और वन टू वन टू रिधम का अनूठा संगम, स्थाई/अंतरे और इंटरल्युड का गजब का मिक्सिंग, अपने आप में दीवाना बनाने के लिये काफ़ी था.

मगर साथ ही, उनकी शास्त्रीय रागदारी पर नियंत्रण भी हमें कई गीतों में नज़र आता है. हालांकि ऐसे गाने कम ही थे, और वे खुद ये बात कबूल करते थे कि उनकी शास्त्रीय संगीत की कोई विधिवत तालीम नहीं हुई थी.बावजूद इसके, उनकी गीतों में कहींभी कोई कमी नही रह जाती थी.

इसीलिये जब कल्पना फ़िल्म के लिये एक महत्वपूर्ण गाने का इंतेखा़ब किया गया तो कई जानकारों की भौंहें उठ गई थी कि देखें क्या गुल खिलाते है नय्यर साहब.त्रावणकोर बहनों के भरत नाट्यम की शानदार शास्त्रीय नृत्य शैली को दर्शाने के लिये इस गीत की ज़रूरत मेहसूस की गई -

तू है मेरा प्रेम देवता....

बिलाशक, रफ़ी जी तो नैय्यर साहब की पहली चाइस थे ही, क्योंकि आप देखेंगे कि फ़िल्म दो उस्ताद में राज कपूर के लिये भी वे मुकेश जी की जगह रफ़ी जी की आवाज़ के लिये अड़ गये थे (एरिरा राका राका का बाका,तू लडकी मैं लडका..).

तो साथ में दूसरे स्वर के लिये निसंदेह मन्ना दा का चयन तो होना ही था.तो फ़िर बनी वह कालजयी संगीत कृति इसको बनाने के लिये नैय्यर साहब नें भी बहुत मेहनत की.

बताते हैं कि रफ़ी साहब जब भी किसी गाने की रिकॊर्ड़ करने स्टुडियो पहूंचते थे तो तो अक्सर वे अपने पास एक इत्र के कुप्पी रखते थे और वहां मौजूद सभी व्यक्तियोंको खुशबू से तर बतर कर देते थे, गोया उनके मदहोश कर देने वाली आवाज़ से कोई कमी रह जाती हो.मगर उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.शायद इस गाने की गंभीरता को भी दोनों गायक बखूबी समझ रहे थे, तो इसीलिये काफ़ी रियाज़ के और तालीम के बाद ये गाना रिकॊर्ड किया गया.रिकोर्डिंग से पहले रफ़ी साहब साज़िंदों को कितना सन्मान देते थे वह इस बात से पता लगता था फ़ाईनल टेक से पहले वे स्वयं वाद्यवृंद समूह के पास जा कर सभी को बडी़ विनम्रता से कहते थे कि ज़रा सम्हाल लेना !!

ओ पी नय्यर की समस्या कुछ और भी थी. आवाज़ की गोलाई, रियाज़, सुरों पर पकड़ ,आदि सभी विधाओं में ये दोनो गायक कहीं भी एक दूसरे से कमतर नहीं थे. मगर उन दोनों की आवाज़ में जो अलग अलग कण था , अंदाज़े बयां या Timbre था उसके अनुरूप ही बंदिशें , ताने, या आलाप का सुर संयोजन होना ज़रूरी था, क्योंकि दोनों की पूर्ण क्षमता का और व्यक्तिगत खूबीयों का इज़हार प्रस्तुत गाने में होना लाज़मी था.

बखुदा , कितना मुश्किल , कठिण काम था जो नय्यर साहब नें आत्म विश्वास और हिम्मत से अंजाम दिया कि दोनों गायकों के सहित सभी उपस्थित जानकारों ने उनको खूब सराहा.

इस बात की कठिनता मैंने भी तब महसूस की जब पिछले दिनों जब मन्ना दा पर आधारित कार्यक्रम - दिल का हाल सुने दिल वाला - में मुझे इस गाने को पेश करने का मौका मिला. संयोग और सौभाग्य कहिये, इस कार्यक्रम में सिर्फ़ मैं ही गायक था, स्वाभाविक था कि दोनों गायकों के बोल मुझे ही गाने थे.

चलिये आज मैं एक आत्म अनूभूति या अंतरंग के अनुभव को ईमानदारी से आपके साथ बांटना चाहूंगा, जब मैंने इस गीत के लिये इन दोनो दिग्गज गायकों की गायन शैली को गहनता से समझने की कोशिश की.वैसे इन दोनों को अलग अलग गीतों के ज़रिये कई बार गाया था, मगर शास्त्रीय रंगों से तरबतर इस अनूठे मगर बेहद क्लिष्ट या कठिण इस गीत में दोनो के साथ न्याय करना मेरे जैसे की औकात के बाहर थी.


वैसे उन दिनों भारतीय फ़िल्म संगीत के आकाश पर जो सुरीले सितारे चमक रहे थे, उनकी आवाज़ में और अदायगी में फ़र्क हुआ करता था. मुकेश की नासिकोत्पन्न दर्द भरी आवाज़ से हेमंत कुमार की बेस लिये हुए हमिंग आवाज़ हो या किशोर कुमार की कडक और खनक लिये हुए आवाज़ से तलत मेहमूद की कोमल और लर्जिश भरी मखमली आवाज़ हो,एक पृथक पहचान लिये हुए ध्वनिरूप आपके मानस के सामने आ जाता है.मगर उस अनुपात में रफ़ी और मन्ना डे की आवाज़ में फ़र्क होने के बावजूद काफ़ी समानता भी थी.

इसलिये अपने सीमित स्वरविवेक से मैने ये पाया कि जहां मन्ना दा की धीर गंभीर आवाज़ में माधुर्य और स्वरों की गोलाई का और हरकतों का उनके अनोखी स्टाईल में उपयोग किया , वहां रफ़ी जी ने पाक निर्मल , जवां (Youthful) और सधी हुई मीठी सी आवाज़ में सीधे सच्चे तानों के सुर लगाये, और इस बात की बानगी दी कि गायकी की रेंज में और मेलोडी भरी अदायगी में शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत भी कितनी आसानी से गाया जा सकता है.पर्दे पर दोनों नायिकाओं में से कोई भी जीता हो,मगर इस गाने में भारतीय फ़िल्म जगत के दो महानतम गायक संपूर्ण रूप से जीत के भागीदार बनें.

तो मेरे संगीत के सुरीले सफ़र के साथियों, जैसा कि आपका आग्रह था, कि मैं इस संगीत गोष्ठी में अपनी आवाज़ में भी कुछ प्रस्तुत करूं तो आपको मसर्रत हासिल होगी.तो दिलीप के दिल के साथ अब ये दिलीप के सुरों से ये गीत सुनाता हूं.

अब इस प ध नि सा के बाद के आंठवें सुर को पेश करते हुए बिस्मिल्लाह करता हूं. इस कार्यक्रम में मेरे साथ सूत्रधार हैं, मेरे अज़ीज़ और अज़ीम फ़नकार श्री संजय पटेल जिन्होने एंकर की विधा को नये आयाम दिये.

(गाने में एक बात आप नोट करें - चूंकि इससे पहले एकदम अलग पृष्ठभूमी का और स्टाईल का गीत - आओ ट्वीस्ट करें गाया था. इसलिये, इस शास्त्रीय स्वरों से भरपूर गीत के लिये स्वरों को मन में उतारने के लिये थोडा़ समय लिया. दूसरा, इस गीत की मुश्किल बंदिश की वजह से इसे मात्र एक अंतरा गा कर समाप्त करने की योजना थी, मगर ऐन समय पर गीत के उस सत्चिदानंद स्वर समाधी का हल्का सा एह्सास होने की वजह से गीत को पूरा गाया गया.

आंठवा सुर..



अगले कडीं में - ओ पी नय्यर, रफ़ी, और गुरुदत्त ...
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