अभी परसों ही हमारे लाडले , मस्ताने ,ऒल राउंडर कलाकार , गायक किशोर दा की पुण्य तिथी थी. १३ अक्टूबर १९८७ को वे हमको दर्द भरा अफ़साना सुना कर हमेशा के लिये इस ज़िंदगी के सुहाने सफ़र को खत्म कर के कहीं दूर चले गये. दूर गगन के इस राही नें, इस मुसाफ़िर नें हमें अपने खुशनुमा व्यक्तित्व से हंसाया और दुखी मन के स्वरों द्वारा रुलाया.
किशोर दा का जन्म खंडवा में हुआ था. खंडवा याने हमारे शहर इंदौर से ढाई घंटे के रास्ते पर एक छोटा सा कस्बा, जहां किशोर दा का बचपन गुज़रा. आपको सभी को पता ही है, कि वे अपने जन्मस्थान से कितनी मुहब्बत करते थे, कि उन्होनें यह वसीयत भी कर रखी थी कि उनका अंतिम संस्कार खंडवा में ही किया जाये.
इस बार मैंने सोचा था कि उनके जन्मस्थान खंडवा जाऊं , जहां उनके जन्म दिन और पुण्यतिथी पर उत्सव सा माहौल होता है. सारे देश के कोने कोने से किशोर दा के दीवाने यहां आते हैं ,उनके पैतृक घर और समाधि स्थल को बडे भक्तिभाव से विज़िट करते हैं. वहां स्थानीय लायंस क्लब द्वारा एक कार्यक्रम भी रखा था, जिसमें मुझे भी किशोरदा के गीत गानें का आमंत्रण था. मगर किसी कारणवश वह निरस्त हो गया.
तो मैने सोचा कि हमेशा की तरह आज मैं फ़िर उसी जगह जाऊं जहां की पावन ज़मीं पर किशोर दा के कदम पडे थे, जिस फ़िज़ां में उनकी गायी हुई स्वरलहरीयां अभी भी अठखेलियां करती होंगी.
इसलिये मैं जा पहुंचा इंदौर के उस महाविद्यालय में जहां किशोर दा नें अपने कोलेज जीवन के तीन साल गुज़ारे.
हां, मैं बात कर रहा हूं इंदौर क्रिश्चियन कॊलेज की.
वहां की झलकीयां मैं दिवाली के बाद कुछ चित्रों और विडियो के ज़रिये पेश करूंगा.एक Audio Visual Tribute जिसे देख कर सुनकर आप आनंदित होंगे, और उन लोगों को भी सुकून हासिल होगा जो किशोर दा को इंतेहां मुहब्बत करते हैं और इबादत करते हैं.
रात को हमेशा की तरह , अपने स्टडी में बैठ कर मैने किशोर दा के पुराने दर्द भरे नगमें गाये, वो नगमें जो मैं खंडवा में गाने वाला था.
इसी बीच, जैसा कि आपको पिछले साल बताया था, किशोरदा का एक गीत मेरे ज़ेहन में बहुत गहरे बैठा हुआ है, जो मेरे किशोर वय में हुए एक मीठी याद की वजह से है.
गीत है कश्ती का खा़मोश सफ़र है, शाम भी है , तनहाई भी, दूर किनारे पर बजती है, लहरों की शहनाई भी... आज मुझे कुछ कहना है, आज मुझे कुछ कहना है.
यह गीत किशोर दा नें सुधा मल्होत्रा के साथ गाया था, जिसमें दिलों के कोमल एहसासातों की अभिव्यक्ति बडी ही शालीन ढंग से की गयी है, जो आज की पीढी के लिये एक आश्चर्य या शगुफ़ा हो सकता है.
यह गीत मेरे किशोर वय में भोपाल में मैंने हमीदिया कॊलेज के स्टेज पर सुना था, जहां मेरे पिताजी प्रोफ़ेसर थे, और श्री मल्होत्रा थे प्रिंसिपल ,जो सुधा मल्होत्रा के पिताजी थे.तो गॆदरींग में यह गीत सुधाजी नें गाया था, और चाहा था कि कोई स्थानीय गायक उनके साथ वह गीत गाये. किसी नें मेरा नाम भी सुझाया था, मगर सुधा जी नें मुझे देख कर हंस कर बोला, अरे तुम तो अभी छोटे हो!! तुम रहने दो.
बस , आज यह गीत गा ही देता हूं, अब तो बडा हो ही गया हूं. मगर फ़िर मैंने हमारे ब्लोग जगत की प्रसिद्ध कवियत्री, गायिका, फ़ोटोग्राफ़र, पर्यटन विषेशग्य, सुश्री अल्पना वर्मा से अनुरोध किया कि इस दोगाने को मेरे साथ गायें , जो उन्होने सहर्ष स्वीकार किया और उपकृत किया. वे भी किशोर दा की तरह हर हुनर में विषेश कमाल रखतीं है!!!
इस गाने की विषेशता ये है, कि इसमें कोई कराओके का ट्रेक इस्तेमाल नहीं किया है, मगर मूल पार्श्व वाद्यों को मिक्स करनें का प्रयत्न किया गया है.आशा है आपको पसंद आयेगा.
आपको साथ ही में धनतेरस की शुभ कामनाये. आपको यह वर्ष धन और समृद्धी की वर्षा लेकर आये. साथ ही किशोर दा नें जैसे कहा है कहा है- आपको संतोषधन मिले, आनंद धन मिले यही कामना.(जैसा कि इस गीत को गाकर मुझे मिला)
दिवाली के बाद फिर मिलता हूं अपनी रिपोर्ट के साथ.... ब्रेक के बाद!!!
समय अभाव के कारण, पिछली पोस्ट थोडी देर से नश्र हुई, फ़िर एक दम संयोग से गुरुदत्त जी का स्मरण दिन आ गया. दोनों पोस्ट मिक्स हुई और बडी हो गयी. इसलिये उनका एक संस्मरण अब लिख रहा हूं, ११ ता. को , इसलिये क्षमा करें.
आपनें पिछली पोस्ट पढी ही होगी.( चौदहवीं का चांद हो) उस गीत पर एक और बात बतानी थी, मगर उसके पृष्ठभूमी के साथ, जो आशा है आप पसंद करें. इसे मैने स्व. गुरुदत्त की सगी बहन श्रीमती ललिता लाज़मी से बातचीत के दौरान सुना था.
किस्सा यूं है--
कुछ साल पहले इंदौर में हर साल होने वाले लता मंगेशकर पुरस्कार समारोह के आयोजन समिति के सदस्य होने के नाते मुझे मुंबई जाना पडा प्रसिद्ध संगीत निर्देशक श्री भुपेन हज़ारिका जी से मिलने . उन्हे मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उस साल के लता मंगेशकर पुरस्कार से नवाज़ा गया था. यह अवार्ड सन १९८३ से हर साल बारी बारी से एक गायक/गायिका और संगीत निर्देशक को दिया जाता है. इसमें पुरस्कृत कलाकार को अवार्ड की औपचारिकता के बाद अपना पर्फ़ोर्मेंस भी देना पडता है.सो, भुपेन दा से अनुरोध करना था कि वे अपने कुछ गीत गायें . अतः , यह ज़रूरी था कि उनके साथ कार्यक्रम की रूपरेखा और साज़िंदों की बातचीत तय हो जाये.
उन दिनों वे मुंबई में थे और स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे.उनकी आंखों का ऒपरेशन हुआ था, और वे प्रसिद्ध महिला निर्देशक सुश्री कल्पना लाज़मी के घर में रुके हुए थे. फ़ोन पर किसी महिला से बात हुई, जिसने खुद भुपेन दा से पूछ कर शाम को छः बजे का समय तय किया.
जब मैं वहां पहुंचा, तो एक अधेड , शालीन महिला नें दरवाज़ा खोला, और बडे आदर के साथ मुझे ड्राईंगरूम में बिठाया. कहा कि अभी अभी दवाई डाली है आंख में ,इसलिये आधा पौन घंटा रुकना पडेगा आपको. मैं मिलकर ही जाना चाहता था इसलिये वहां रखे हुए एक पुराने फ़िल्मफ़ेयर को लेकर पढने लगा.(संयोग से उस पर गुरुदत्तजी का चित्र था)
वह विदुषी देवी सी प्रतीत होने वाली महिला बाद में मेरे साथ ही बैठ गयी और हम ओकेज़नली एक दूसरे की तरफ़ देखते और वे स्नेहवश मुस्कान से मेरा स्वागत करती.हम कुछ बोल नहीं रहे थे.
फ़्लेट्नुमा वह घर बडे ही एथनीक स्टाईल में जमाया गया था( जैसे चमार की नज़र जूते पर ही पदती है, मेरी नज़र आंतरिक साजसज्जा पर पडी थी). मैने कौतुहुलवश उनसे पूछ ही लिया कि इस फ़्लेट का ईंटिरीयर डिज़ाईन किसनें किया है. वे हंस पडी, और उन्होने कहा मैंनें ही किया है. मैं कल्पना की मां हूं, ललिता लाज़मी.
मेरे दिमाग में एक दम सौ हेलोजन के बल्ब जल पडे़. अरे , ये तो वहीं है, ललिता आज़मी जो स्वर्गीय गुरुदत्त जी की बहन हैं!!और मैं पिछले आधा घंटे से यहां बेजान वस्तुओं में अपना दिमाग खपा रहा हूं.
मैं फ़िर सम्हल के बैठ गया, जैसे कि किसी मंदिर में देवी के समक्ष गर्भगृह में बैठा था.सौम्य, शांत और सरल व्यक्तित्व से जब रूबरू हुआ तो मन में याद आयी इसाक मुजावर द्वारा गुरुदत्त जी पर लिखी हुई वो पंक्तियां , जिसमें बताया गया था कि गुरुदत्त कितने अशांत, रेस्टलेस, अल्पसंतुष्ट कलाकार थे, और यहां बैठी उनकी बहन शांत सौम्य!! मैं पूछ बैठा उनसे गुरुदत्त जी के चरित्र के इस आयाम से. वे मुस्काई, और सम्हल के बैठ गयी, गोया Interview दे रही हैं. मैने उन्हे सहज किया और सुनने लगा उनकी मीठी निर्झर वाणी से उनके संस्मरण..
भाई अशांत और रेस्टलेस ज़रूर थे क्योंकि वे पर्फ़ेक्शनिस्ट थे, इसलिये हमेशा असंतुष्ट और सेंसेटिव रहते थे अपने Creation के संदर्भ में. मगर मोटे तौर पर वे तकनीशियनों से ज़्यादह अपेक्षा रखते थे पर्फ़ेक्शन की,एक्टर्स की बनिस्बत. उनके केमेरामेन श्री मूर्ती से तो उनकी हर शॊट में झडप हुआ करती थी, और गरमा गरम वाद विवाद भी हो जाते थे.मगर कलाकारों से थोडे नर्मी से पेश आते थे. मगर जब बात खुद के acting की होती थी तो भी कम संतुष्ट होते थे. फ़िल्म प्यासा के एक सीन में उन्हे मज़ा ही नहीं आ रहा था, और दोपहर से चल रहा उनके अभिनय वाला शॊट ओ के ही नहीं कर रहे थे. सभी नें उनसे कहा कि आप थकें है, तो पॆक अप कर लेतें है, मगर वे मान ही नहीं रहे थे. रात को दस बजे कहीं जा कर माने कि अब कल सुबह करेंगे, और आश्चर्य की बात है, दूसरे दिन सुबह एक ही टेक में शोट ओ के हो गया.
वे बडे सेंसेटिव और संवेदनशील मन के कलाकार थे , और उन दिनों गीता दत्त और वहीदाजी के कारण वे बडे तनाव में रहते थे. फ़िर वे मुस्कुराके बोली , भाई का वहीदा जी से कुछ ऐसा वैसा रोमांटिक नाता नहीं था, जैसा कि अमूमन कहा जाता है.वैसे वहीदा जी उनके जीवन में बहार बन के ज़रूर आई.
वहीदा जी भी जब भी शोट देती थी तो संयोग ये होता था कि वे एक शॊट के बाद दूसरे रीटेक में ठीक नहीं करती थी और बाद में तीसरे शोट में फ़िर ठीक हो जाता था, तो इस alternative Shots के OK होने का राज़ नही समझ पाते थे भाई, और मज़ाक में वे वहीदा जी की खिंचाई भी कर दिया करते थे.
जिस दिन रात को उनका निधन हुआ, उसके कुछ दिन पहले ही उनसे फ़ोन पर बातें हुई थी, जब भाई बडे खुश थे और वे बता रहे थी कि उन्होने अभी अभी एक नयी फ़िल्म शुरु की थी बंगला भाषा में जिसका नाम रखा था गौरी, जिसमें गीता दत्त अभिनय करने वाली थीं और एक सीन भी पिछले दिनों शूट कर लिया गया था. गीता दत्त की सृजन धर्मिता की और बिगडे हुए वैवाहिक रिश्तों को बचाने के खातिर यह कदम उठाया था उन्होने.
उस मनहूस रात को वहीदा जी मद्रास(चेन्नई)में थी और मुझसे और कल्पना से रात को ही फ़ोन पर इधर उधर की बातें भी की थी.फ़िर देर रात(अल सुबह) अब्रार अल्वी का फ़ोन आया तो वह मनहूस खबर हमें मिली.
वातावरण में स्वाभाविक रूप से गंभीरता आ गयी थी. तब तक कमरे में से भूपेन दा का मेसेज आ गया था कि आप बेडरूम में ही आ जायें, तो बेहतर होगा. मैंने इस मोनोलॊग या एकतरफ़ा संभाषण को विराम देने के लिये या विषयांतर करने के लिहाज़ से कहा- आपको उनकी कौनसी फ़िल्म पसंद आयी, और कौन सा गान जिसका पिक्चराईज़ेशन आपके लिहाज़ से बढिया था.
वे बोली प्यासा और कागज़ के फ़ूल तो ALL TIME GREAT हैं , और गाने में वक्त ने किया क्या हसीं सितम का फ़िल्मीकरण तो लाजवाब है. (इसके बारे में मैंने अपनी एक पोस्ट -गुरुदत्त - एक अशांत अधूरा कलाकार - संगीत को समर्पित एक प्रसिद्ध ब्लोग आवाज़ में पिछले साल ज़िक्र किया था जिसका लिंक है-
http://podcast.hindyugm.com/2008/10/remembering-gurudutt-genius-film-maker.html मेरे ब्लोग पर भी आप गुरुदत्त पर चटका लगा कर देख सकतें हैं....
और दूसरा गाना था - चौदहवीं का चांद हो , या आफ़ताब हो...
इस गीत का ज़िक्र आते ही उनकी बुझी हुई आंखों में जैसे फ़िर चमक आ गयी, और वे इस गीत के बारे में बताने लगीं.
उन दिनों कलर फ़िल्मों का ज़माना आ गया था, और गुरुदत्त जी भी चाहते थे कि ये फ़िल्म भी कलर में बनें. मगर एक्विपमेंट्स आने में देरी के कारण, और डिस्ट्रिब्युटर्स की जल्दी के कारण उन्होने फ़िल्म Black & White में ही पुउर्ण की और ये गीत भी.साथ में फ़िल्म को सेंसर से भी पास करवा लिया.
मगर फ़िर उन्हे क्या सूझा, उन्होने इस गीत को फ़िर से शूट करनी की ठानी, वह भी कलर में, क्योंकि तब तक एक्विपमेन्ट आ गये थे.ये तय किया गया कि फ़्रेम से फ़्रेम, शोट से शोट कॊपी कर के वैसे ही फ़िर से शूट किया जायेगा, चूंकि पहले के B&W रशेस तो बढियां ही थे.
खैर, जैसा कि प्लान किया गया था, वहीदाजी को बुलाया गया, और शूटिंग बढिया तरीके से संपन्न हुई.चूंकि फ़िल्मी करण रंगीन था, बडे बडे आर्क लाईट्स,करीब रखे गये, जिसकी वजह से वहीदा जी का स्किन झुलसने लगा. तो बडी मुश्किल से आईस पॆक रख कर शूटिंग संपन्न की गयी.तो उनकी आंखे भी इसीलिये लाल हो गयी थी.फ़िल्म को फ़िर से सेंसर बोर्ड को भेज दिया गया.
मगर सभी तब भौंचक्के रह गये जब उन्हे मालूम पडा सेंसरबोर्ड नें फ़िल्म को पास करने को मना कर दिया क्योंकि उन्होने इस गीत को बडा ही हॊट (HOT) बताया!!!! भाई नें उन्हे समझाने की कोशिश की कि सब कुछ तो वही था एक कलर के सिवा. तो पता है, उन्होने क्या जवाब दिया?
कहा, वहीदा जी की आंखे बडी लाल हो रही हैं, और इस बात को उन्होने Sensual and Suggestive करार कर दिया!!
भाई उस दिन बडे हंसे थे.खैर फ़िल्म तो पास हो गयी, मगर ललिताजी नें कहा कि अगर वे सेंसर बोर्ड के सदस्य आज जीवित होंगे और आज की फ़िल्में देखेंगे तो तुरंत ही प्राण छोड़ देंगे!!!
चूंकि बात नार्मल हो चुकी थी मैं उस साश्वी के सानिध्य से उठकर भूपेन दा के कमरे में चला गया.
(इन संस्मरणों को याद करना याने पुरानी यादों की जुगाली करना. जिनके लिये ये कलाकार , उनकी कला और उनका कला के प्रति योगदान और समर्पण का थोदा बहुत भी महत्व है उसे यूं लगता है कि कुछ क्षण हमनें भी टाईम मशीन में जाकर उनके साथ बिता लिये हैं. यही तो हमारे लिये elixir है, च्यवनप्राश है!!!- क्या आप सहमत हैं?
चौदहवीं का चांद और सुहानी रात का जो मि़क्स और You Tube Video का लिंक पिछली पोस्ट पर डाला था वह चला नहीं था किसी के लिये. अतः फ़िर से लगा रहा हूं.
याने पिछले हफ़्ते एक शब्द चांद बार बार कानों पर पडा़, क्योंकि बात साफ़ है.
पिछले हफ़्ते शरद पुर्णिमा की मदहोश रात थी.
सुनते आये हैं, कि इस रात को चंद्रमा से अमृत बरसता है. लगता है सही है, क्योंकि, पिछले कई सालों से बिना नागा, इस रात को संगीत के अमृत स्वर कानों में पडते रहते हैं. वातावरण में मस्ती, सुरीली तरन्नुम का आलम तारी रहता है.फ़िर रात को परमानंद की प्राप्ति - याने केशर पिस्ता युक्त गाढा दूध. बस और क्या चाहिये.
बस १ ता. से माहौल शुरु हो गया था. मैं जिस लायंस क्लब से जुडा हुआ हूं उसके तत्वावधान में शरद पूनम की संगीत रजनी हर साल की तरह से संपन्न हुई. इस दिन खास कर , पूणें से प्रसिद्ध पियानो एकोर्डियन के वादक श्री अनिल गोडे पधारे थे, जिन्होने अपने सुरीले साज से, और अपने हुनर के कमाल से इस बेजोड और बजाने में क्लिष्ट साज़ पर इतने पुराने गीत सुनाये कि बस मस्त कर दिया. अनिल जी हेमंत दा, तलत मेहमूद्जी,किशोर दा आदि के साथ देश विदेश में बजा चुकें हैं. पिछले साल पुना में मिले थे जब सुदेश भोंसले के साथ भी बजाया था. मात्र एकोर्डियन और ढोलक,कांगो पर बजाये हुए मधुर गानों की बानगी तो लीजिये -
चांद सा रोशन चेहरा, सुहानी रात ढल चुकी , फ़ूलों के रंग से,डम डम डिग डिगा, रमैय्या वस्ता वैय्या , और भी कई.
एक और खुशनुमा बात यह थी कि मेरे अनुज - मित्र संजय (श्री संजय पटेल) भी इस कार्यक्रम में आये थे. अमूमन ऐसी संगीत रजनीयों में संजय जी का संगीत पर समृद्ध एंकरिंग और मेरे स्वर का भी संयोग जमा करता था पहले कई बार, मगर एक दो सालों से दोनों की व्यस्तता से ये ग्रह युति हो नहीं पा रही थी.इस दिन कुछ मित्रों नें छेड दिया, फ़िर हम दोनों भी औपचारिता को दूर कर, कुछ कुछ गा बैठे.
फ़िर लगभग हर दिन कोई ना कोई कार्यक्रम था ही. मगर दुख ये रहा कि शरद पोर्णिमा की रात को इंदौर में बारीश की वजह से चांद नहीं दिख पाया, और जैसा कि हमारे यहां परंपरानुसार रात को चांद को नैवेद्य नहीं चढाया जा सका.(प्रस्तुत चित्र में दूध और पूजा का पात्र - जिसमें ऐरावत का आकार बनाया गया है चावल से, और इस दूध के बर्तन को चांदी की तलवार रख कर चंद्रमा की चांदनी में रखा जाता है.
इसिलिये चांद, चंद्रमा, चंदा आदि शब्दों को लिये हुए गीतों की धूमधाम रही इन दिनों.
एक बडा ही अहम गीत मेरे ज़ेहन में गूंज रहा था इन दिनों, जिसने अपने सहज सरल संगीत स्वर संयोजन और रफ़ी साहब के अमृत भरे केशर पिस्ता युक्त दूध की मानिंद मीठे, सुरीले स्वर के कारण मेरे मन में, दिल में जगह बना ली थी, और दिन रात के अधिकतर क्षणों में मेरे होटों पर आ रहा था. सोचा था कि इन दिनों कहीं गा ही दूं तो मन की ये मस्ती प्रकट में मेनिफ़ेस्ट हो जाये. मगर मौका नहीं आया.है
अचानक किसी मित्र नें भेजा हुआ एक कराओके ट्रॆक मिल गया जो बाज़ार में मिल रहे ट्रेक से बेहतर था, तो बैठ गया रिकोर्डिंग पर, और कर डाली दिल की भडास पूरी.
मगर एक बात पर एकदम दिल झूम गया , वह ये कि, साथ में इसी राग से मिलता जुलता एक और सुरीला और मीठा गीत भी होटों पर कॆट्वाक करने लगा- सुहानी रात ढल चुकी , ना जाने तुम कब आओगे-.
तो बस एकदम इसी गाने के तीसरे अंतरे के वाद्य संयोजन के बेकग्राऊंड में इस गीत का अंतरा भी गाकर देखा. तो संयोग यूं बना कि यह प्रयोग भी उम्दा जम गया.
बस क्या था. सोचा , इसे आपके साथ भी शेयर करूं, आखिर दिलीप के दिल से जो भी स्वर निकलेंगे, आह या वाह, आप तो हमसफ़र हैं ही. तो बस सुनिये इस बार यह गीत...चौदहवी का चांद हो, या आफ़ताब हो.... और सुहानी रात ढल चुकी का मिक्स.(इसे रिमिक्स ना कहिये, क्योंकि उसमें ना जाने क्या क्या किया जाता है- जिसका ज़िक्र फ़िर कभी)
एक और आश्चर्यजनक संयोग ये रहा है कि अभी दो दिन बाद हमारे श्रद्धेय कलाकार , बेजोड निर्देशक गुरुदत्त जी की पुण्यतिथी है (१० अक्तूबर १९६४). जिस फ़िल्म के लिये ये टाईटल गीत बनाया गया था उस फ़िल्म के निर्माता भी गुरुदत्त ही थे.चूंकि यह फ़िल्म मुस्लिम परिवेश में फ़िल्माई गयी थी, गुरुदत्त जी नें इस फ़िल्म के निर्देशन के लिये जनाब मोहम्मद सादिक़ को ज़िम्मेदारी सौंपी. वे वो दिन थे जब अपने ज़माने की सबसे बडी प्रयोगात्मक फ़िल्म कागज़ के फूल की असफ़लता से गुरुदत्त जी काफ़ी निराश थे.
मगर हुआ यूं कि इस फ़िल्म नें सफ़लता के ऐसे झंडॆ गाडे कि कहा जाता था कि १०० फ़िल्मों के बराबर बिज़नेस किया, और गुरुदत्त को दिवाला होते होते बचा लिया.(उनका स्टुडियो भी बिकत बिकते बच गया)
हालांकि वे इसके पहले एस डी बर्मन दा और ओ पी नय्यर के साथ काम कर चुके थे, ये एक आश्चर्यजनक बात थी कि मुस्लिम परिवेश के लिये होते हुए भी उन्होने रवि जैसे संगीतकार को साईन किया बतौर संगीतकार, जिन्होने इस फ़िल्म के संगीत के साथ पूरा न्याय किया.(इसका कारण थे अबरार अल्वी, मगर मज़ेदार बात यहा भी ये है कि भले ही उनने गुरुदत्त जी की इतनी सारी फ़िल्मों में कहानीयां लिखी, मगर इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी सागर उस्मानी नें!!)
आपने अगर ये फ़िल्म देखी होगी तो आप ज़रूर गुरुदत्त जी के डिटेल्स , लखनौ की तेहज़ीब , परिधान , नपे तुले डिफ़ाईन किये हुए चरित्र और उनके मेनरीझ्म की बारिकी में गये होंगे और दाद देने को जी चाहता होगा आपका.हालांकि निर्देशन मोहम्मद सादिक का था , इस फ़िल्म में गुरुदत्त का ही स्टांप था. और तो और सभी गाने शत प्रतिशत गुरुदत्त जी नें ही फ़िल्माये थे, जो उनके फ़ोटोग्राफ़र श्री वी के मूर्ती नें कबूल की थी.
तो अब देखिये भी उस इम्मोर्टल , कालजयी गीत का विडियो भी, जिसमें वहीदा जी का मूर्तिमंत सौंदर्य, अलसायी हुई लाल डोरे लिये आंखें, गुरुदत्तजी का सुकून भरे दिल से उस खूबसूरती की तारीफ़ में रोमांटिक अंदाज़ में इस गीत को गाना, और साथ में खुद मोहम्मद रफ़ी साहब की शहद से भी मीठी, सुरीली, और सात्विक स्वर एक ऐसा आलम तारी कर देते हैं कि पाकीज़गी से भरे इस हुस्न का ये नशा बिन पिये ही आपके रूह में कब दाखिल होकर आपको मदमस्त कर देता है, इसका होश भी आपको नहीं रहता.
(बिना शादी शुदा मित्र गण मुआफ़ करेंगे, क्योंकि उन्हे पता ही नहीं है कि अभी क्या बाकी है उनकी ज़िंदगी में, और शादी शुदा मित्र भी मुआफ़ करेंगे, कि दर्दे दिल छेड दिया गया है, और आप को नोस्टाल्जिया के गहरे समंदर में डुबा दिया गया है. अगर तैर कर ऊपर आ सकते हो तो आ जाईये, और डूबना हो तो मेरे साथ हो लिजिये......)
गुरुदत्त जी और इस गाने के बारे में एक रोचक संस्मरण बताये बगैर नहीं रह सकता, जिससे आप हंस पडेंगे - मगर यह पोस्ट काफ़ी लंबी हो गये है. मेनेजमेंट का खिलाडी हूं इसलिये सभी मिठाईयां एक साथ नहीं परोसूंगा.
तो दस तारीख को फ़िर पधारें गुरुदत्तजी की पुण्यतिथी के दिन , तो यह भी आपके साथ शेयर करूंगा.
आज स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जन्म दिन है, और मन बडा ही गुले गुलज़ार हो रहा है, बौरा रहा है, क्या सुनूं, क्या सुनाऊं, कुछ भी समझ नहीं आ रहा है.
अभी कल ही जन्मदिन पूर्व संध्या को हमारे मित्र सुमन चौरसिया नें यहां प्रेस क्लब में लता जी का जन्म दिन मनाया और केक काटी. प्रसिद्ध संगीत समिक्षक अजातशत्रु भी मौजूद थे, और इस अवसर पर कुछ ऐसे संगीत के दिवानों का भी सन्मान किया गया जिन्होनें पिछले कई वर्षों से संगीत की किसी ना किसी तरह से सेवा की है, साहित्य या पत्रकारिता के ज़रिये.
हमारे सभी के लाडले भाई यूनुस खान का भी सन्मान किया गया. उनकी मधुर वाणी अभी तक तो विविध भारती पर सुनते ही आये थे , मगर उनका भावप्रवीण चेहरा और उसपर Highly Infectious मधुर मुस्कान के तो हम दिवाने ही हो गये.
मुझे आज याद आयी आज से कुछ सालों पहले का वह वाकया जब मैं अनायास ही , अनजाने में ही लता जी से रूबरू हुआ था, पहले फोन पर ,बाद में उनके समक्ष ही.
मौका था सात आठ साल पहले लताजी का वह यादगार कार्यक्रम जो उन्होने मुंबई के अंधेरी स्पोर्ट्स कोम्प्लेक्स के मैदान पर बडे सालों के बाद दिया था.
मैं उन दिनों इंदौर में एक N R I परिवार श्री अजित माहेश्वरी के बंगले का इंटिरीयर डेज़ाईनिंग कर रहा था. आंतरिक साजसज्जा के साथ हम आध्यात्म में साथ साथ रुचि रखने के कारण इतने घुल मिल गये कि जैसे एक ही परिवार हो गये थे.
उनकी छोटी बहन उन दिनों इंदौर आयी थी जिनके पति श्री प्रमोद झंवर मुंबई में बॊंबे होस्पिटल में जाने माने डॊक्टर थे.विषेश बात ये थी कि वे लताजी के निजी चिकित्सक भी थे. तो इसिलिये जब उन दोनों को मेरा संगीत में रुचि मालूम पडी तो उन्होने मुझे मुंबई आमंत्रित किया उस कार्यक्रम के लिये , जिनके स्पेशल वी आई पी पासेस उनके पास जो थे.
नेकी और पूछ पूछ ? मैं तुरंत ही उस दिन सुबह की फ़्लाईट से मुंबई पहुंचा और झंवर दंपत्ती के ब्रीच केंडी के नज़दीक घर में जा पहुंचा.
नाष्ता वैगेरे निपटा कर ज्यों ही मैं मुंबई के अपने कार्य निपटाने के लिये तैय्यार हुआ तो एक फोन आया, जिसपर मराठी के प्रसिद्ध संगीतकार अनिल मोहिले थे, जिन्होने डॊ. साहब से बात करवाने के लिये कहा और कहा कि स्वयं लता दीदी बात करना चाह रही थी.
मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ अपने इस भाग्य पर. मैं भागते हुए डों साहब को बुलाने गया. वे चूंकि बाथरूम से आ ही रहे थे मैं मोहिले जी को दो मीनीट रुकने के लिये वापिस फोन पर जा पहुंचा.
जैसे ही मैने चोंगा उठा कर हेलो कहा, उधर तब तब एक चिरपरिचित आवाज़ नें फ़ोन ले लिया था. संसार की सबसे मधुर आवाज़, स्वर , उस तरफ़ था, और अनजाने में मुझको डॊ.साहब समझ कर उन्होने बात करना शुरु कर दिया.मुझे तो बस एकदम लकवा सा ही मार गया था, जो मैं मूर्तिवत हो कर उस अमृत स्वर गंगा की पावन स्वर धारा का रसपान करने लगा.
बात यूं हुई थी कि चूंकि लताजी का उसी दिन शाम को कार्यक्रम था, पिछले दो या तीन दिनों से उनकी रिहल्सल्स लीला पेंटा होटल में ही चल रही थी. मगर किसी कारणवश लता जी संतुष्ट नहीं थी, या तो अपने पर्फ़ोर्मेंस की वजह से , या फ़िर वाद्य वृंद के संयोजन से. इसलिये उन्हे एसिडीटी हो गयी और बाद में दस्त जैसे लग गये थे.
काम के प्रति उनकी कमिटमेंट, क्वालिटी और संपूर्णता की जिद तो मैं उनमें सन १९८३ में ही देख चुका था जब वें पहली बार इंदौर आयीं थी अपने कार्यक्रम देने के लिये.(वह भी एक अलग सा अनुभव था जो बाद में बाटूंगा आपके साथ)जिस लता मंगेशकर के गाने के हम इतने दिवाने हैं,( एकदम पागलपन की हद तक ) वह स्वयं अपने आउटपुट के प्रति सजग और चिंतित कितनी हैं ये पता चला.
बाद में डॊ. साहब नें खुद फोन ले लिया और लता जी को आश्वस्त करते हुए उन्हे कुछ गोलीयां लिख दी, और शाम को कार्यक्रम में थोडा पहले आकर पर्सनली देखनें का भी आश्वासन दिया.
शाम को जब हम सभी साथ साथ कार्यक्रम की वेन्यु पर पहुंचे तो लताजी राह ही देख रही थी. एक अलग सा कमरा था जहां उन्होने करीब एक घंटे पहले अपने आप को बंद कर लिया था, ताकि कार्यक्रम पर मन एकाग्र कर सकें.डा. साहब के साथ लताजी के समक्ष जा कर खडे हो गये.
लताजी का पहनावा याने लगा कि साक्षात किसी देवी के मंदिर में आकर हम दर्शन के लिये खडे हो गये हैं. स्वच्छ सफ़ेद साडी केसरिया बॊर्डर के साथ, लंबे बाल, और थोडा म्लान , क्लांत सा चेहरा, पेट की खराबी की वजह से.
उनकी बातें हुई. मेरा मात्र परिचय कराया गया कि इंदौर से हैं, तो लताजी मुस्कुरा दी.मैं ठगा सा खडा ही रह गया, और ये भी नही सूझा कि उन्हे नमस्ते ही कर दूं , या फ़िर चरण छूकर अपनी तहे दिल के अंदर छिपी श्रद्धा को किसी माध्यम से प्रकट कर दूं. बस हम बाहर आ गये.....
और मैं तब से बाहर ही खडा हूं आज तक, लता जी के बंद किये द्वार के बाहर, उनकी मुसकान और मधुर आवाज़ की लुटिया लिये, बस सुन रहा हूं तो उनके हर वो गीत, जिसमें उन्होनें आनंद , खुशियां, दर्द, रंजो ग़म , अल्हडता, रोमांस , स्नेह , मां का दुलार, पत्नी का समर्पण , सभी अपने स्वरों की चासनी में डुबो कर हमें डुबा दिया उस संगीत के सागर में.
चलिये अब मैं आपको आज सुनवाता हूं उनका संगीतबद्ध किया हुआ एक बेहद ही मधुर गीत - ऐरणी चा देवा तुला ठिनगी ठिनगी वाहु दे,आभाळागत माया तुझी आम्हावरी राहू दे.. मराठी फ़िल्म साधी माणसं के लिये लताजी नें आनंदघन नाम से जिन ५ फ़िल्मों में संगीत दिया था उसमें से एक ये है.
जिन्होने इसे नहीं सुना हो, वो उनके सुरों की समझ, वाद्यों का वाजिब प्रयोग, और मेलोडी का भरपूर उपयोग..
प्रील्युड में एक अलग से रिदम से आरंभ होकर पार्ष्व में लोहे को कूटते हुए घन की आवाज़, और साअथ ही इंटरल्युड में सुमधुर मुरली के स्वर. पता नहीं , क्या क्या साईड रिदम के वाद्यों का प्रयोग किया गया है.(कोई बता सके तो आभारी रहूंगा)
क्या आपको यह गीत संगीत से समाधि तक नहीं ले जा रहा?
नामवर संगीतकार जोडी शंकर जयकिशन में से एक जयकिशन डाह्याभाई पांचाल.....
अभी पिछली १२ तारीख को आपकी पुण्यतिथी थी और हम सबनें उन्हे याद किया. वैसे पिछली ६ ता. को यहां मुंबई से आई एक फ़िल्मी संगीत को समर्पित एक ग्रुप आया था जिसनें शंकर जयकिशन जी की धुनों के प्यारे प्यारे नगमें सुनाये थे. मैं जा नहीं सका क्योंकि अस्पताल में था बिटिया के लिये, मगर बाद में पता चल्ल कि बेहद ही बढिया कार्यक्रम हुआ था उस रात. खुद संजय पटेल जो स्वयं पुराने फ़िल्मी गीतों के दर्दी हैं,गुले गुलज़ार हो कर मुझे दाद देते हुए कहा कि एक तो शंकर जयकिशन की मेलोडी और ऊपर से इतना बढिया प्रोग्राम. बस उनकी टिप्पणी में ही मैंने पूरे कार्यक्रम का लुत्फ़ उठा लिया.
शंकर जयकिशन दोनों अलग अलग संगीत देते थे ये बात हम सभी जानते ही हैं. मगर कई बार सुनने वाले यही जानने की चेष्टा में लगे रहते हैं, कि कौनसी फ़िल्म में गीत शंकर जी नें दिया था और कौनसी में जयकिशन जी नें.
मेरे एक मित्र श्री श्रीधर कामत बता रहे थे कि अमूमन शैलेन्द्र नें शंकर के लिये लिखा था और हसरत नें जयकिशन के लिये. मगर मुझे लगता है ये पूर्णतयः सही नही होना चाहिये. रात के हमसफ़र ये गीत शैलेंद्र नें लिखा था मगर मेलोडी जयकिशन की लगती है.
वैसे पgaला कहीं का, एप्रिल फ़ूल, आम्रपाली,दिल एक मंदिर आदि जयकिशन जी नें ही दिये होंगे. क्योंकि मोटे तौर पर जब भी हम उनकी धुन को सुनते हैं उसमें मेलॊडी की बहुतायत मिलेगी बनिस्बत पाश्चात्य सिम्फनी भरे कोर्ड्स भरी धुन के जो शंकर का बेस्टन था या उनकी स्ट्रेंग्थ थी.शंकर के गीतों में ऒर्केस्टा ज़्यादा मिलेगा,जिसमें पाश्चात्य वाद्यों की बहुतायत होगी, और जयकिशन के ईंटरल्य़ुड्स में भारतीय वाद्य और तबले ढोलक का उपयोग ज़्यादा.
पहचान के लिये एक और छोटा सा नुस्खा मैं वापरता हूं. शंकर जी का बाद में लताजी से अनबन होने की वजह से उनकी धुनों को लताजी नें नहीं गाया, जबकि जयकिशनजी नें लताजी की मधुर आवाज़ का उपयोग बादमें भी किया.
ये चित्र एक रिकोर्डिंग के समय का हैं जो हमें विश्वास नेरुरकर (लोकसत्ता)के सौजन्य से प्राप्त हुआ है.ये रिकोर्डिंग ज़र हटके है.
दायीं ओर जयकिशन जी को तो पहचानने में कठिनाई नहीं आयेगी. बायीं तरफ़ है, प्रख्यात सितारवादक रईसखान , जिन्होने हिंदी फ़िल्मी गीतों में कई बार सितार के पीसेस बजाये हैं ( तुम्हे याद करते करते- लताजी- आम्रपाली)
काला चष्मा लगाये हुए चश्मे बद्दूर हैं, मशहूर सॆक्सोफ़ोन वादक मनोहारी सिंग (तुम्हे याद होगा कभी हम मिले थे- हेमंत-लता - सट्टा बाज़ार) या (आवाज़ देके हमें-रफ़ी-लता-प्रोफ़ेसर)ये बाद में प्रसिद्ध संगीतकार राहुलदेव बर्मन के मुख्य असिस्टेंट और अरेंजर भी रहे हैं (छोटे नवाब से लव स्टोरी १९४२ तक)
जयकिशनजी के पीछे बैठकर ड्रम बजा रहे हैं ड्रमप्लेय लेस्ली गोदिन्हा.
ये रिकोर्डिंग किसी फ़िल्म की गाने की ना होकर १९६८ में बनी एक एल पी रिकोर्ड ’राग - ज़ेज़ स्टाईल ’ के समय का है.जानकारी के अनुसार इसमें और जिन वादक कलाकरों नें अपने हुनर दिखाये थे वे थे -
अनंत नैय्यर और रमाकांत (तबला) झॊन परेरा ( ट्रंपेट) एडी ट्रेवर्स (बास) दिलीप नाईक और एनिबाल केस्ट्रो ( एलेक्ट्रिक गिटार) सुमंत (फ़्ल्यूट)
वाद्यवृंद संयोजन था एस. जे. का!! जिन्हे हमेशा की तरह असिस्ट किया दत्ताराम और सेबेस्टियन डिसूज़ा नें.
हिंदुस्तानी राग और पश्चिमी संगीत का फ़्युज़न ४० साल पहले करने का भारत में ये पहला और अभिनव प्रयोग था. इससे पहले उस्ताद रविशंकर जी नें ऐसे प्रयोग किये थी ज़रूर, मगर अमेरीका में.
उन दिनों किसी कारणवश फ़िल्म इंडस्ट्री के वादकों का स्टाईक चल रहा था, और कई दिनों से संगीतकार बस घर बैठे थे.तो ऐसे में एच एम व्ही के श्री विजयकिशोर दुबे के मन में इस परिकल्पना का जन्म हुआ और उन्होंने यह बात जयकिशन को बताई. वैसे ये बात शंकर जी को खास पसंद नहीं आयी, और उन्होंनें इसका कुछ विरोध भी किया.मगर जयकिशन जी को ये बात और चेलेंज इतना मन भाया कि उन्होने शंकर के विरोध के बावजूद इस क्रीयेटिव काम को अंजाम देनेम की ठान ली.
शास्त्रीय संगीत में प्रचलित प्रसिद्ध राग तोडी, भैरव, मालकंस, कलावती, तिलक कामोद, मियां की मल्हार,बैरागी जयजयवंती ,पिलू, शिवरंजनी, और भैरवी इन ग्यारह रागों पर आधारित फ़्युज़न संरचना उन्होने कंपोज़ की ये अलग सी इंस्टुमेंटल रिकोर्ड. उन दिनों नयी तकनीक से स्टीरीयो में ध्वनिमुद्रण किया गया, जिन धुनों को बाद में कहीं किन्ही फ़िल्मों में जयकिशन जी नें उपयोग भी किया था.
परंपरा को छोड कर किया गया कोई नवप्रयोग हमेशा टीका का पात्र होता आया है.इस रिकोर्ड का भी हश्र ऐसा ही हुआ, और कालांतर में इस सृजन को भुला दिया गया. बाद में सारेगामा कं नें सी डी में ये एल पी फ़िर से बाज़ार में लायी थी तब फ़िर से उन क्षणॊम को फ़िर से याद किया गया.
मैं इस सी डी की खोज में हूं. जिस तरह स्व. मदन मोहन जी एक पुराने गीतों की मनमोहन रिकोर्डिंग फ़िर से सुनाई दी थी, ये भी सुनने की ख्वाईश है, खासकर आज जब काउंटर मेलोडी के नाम पर पॊप रिथम के अंतर्गत ना जाने क्या क्या परोसा जा रहा है.
किसी भी संगीतप्रेमी के पास यह रिकोर्ड मिलेगी? लता दीनानाथ मंगेशकर संग्रहालय के सुमन चौरसिया जी के पास शायद होना चाहिये, जो अभी मुम्बई गये हुए हैं.
(जानकारी लोकसत्ता से साभार) तो सुनिये वह बेहतरीन नगमा जो लताजी नें गा कर अमर कर दिया.
सेंस्युलिटी का एक अंडरकरंट जो इस गाने में है, वह उस्ताद रईसखान जी के सितार में आपको मिलेगा. सॆक्सोफ़ोन को लोग नाम के अनुरूप सेक्स्युलिटी का प्रतिरूप कहते हैं, मगर सितार का जो उपयोग हुआ है, वह तो इस दुनिया के बाहर की चीज़ है.
सेक्सोफोन का भी उपयोग अधिकतर पार्टी गीत में रात को उपयोग किया जाता है, मगर विरह के लिये जिस तरह मनोहारी सिंग नें प्रोफ़ेसर फ़िल्म में बजाया गया है, वह भी इस दुनिया से बाहर की चीज़ है.सॆक्सोफोन के सुर सीधे तार सप्तक में मींड के साथ घूमते हैं तो यूं लगता है, कि जैसे किसीने बरफ़ के चाकू को सीने में गोद दिया है, और उसे हलके से घुमा रहा हो.साथ में तबले की ताल नें और भी गज़ब ढाया है.रफ़ी जी और लताजी के दर्द भरे सुर कलेजे को चीर कर अंदर घुस जाते हैं.
और क्या लिखूं और? आपही सुन खुद सुन लिजिये...और शंकर जयकिशन के इस कालजयी रचनाओं को दाद दिजिये.
और साथ ही इंदौर में एक मेगा ईवेंट भी चल रहा था, जुनून.. सात सुरों का, जिसमें अन्नु कपूर नें इंदौर आकर करीब सौ गायक गायिकाओं में से २४ कलाकार चुनें, सुगम (फ़िल्मी), सूफ़ी और लोकगीत विधाओं में , और ता. ९ को यहां के बडे अभय प्रशाल में उनकी कोंपिटीशन हुई तीन बडे निर्णायकों के सामने- इला अरुण , जस्पिन्दर कौर नरुला , और मोहम्मद वकील, (उभरते हुए ग़ज़ल फ़नकार) जो नितिन मुकेश के बदले बुलाये गये, क्योंकि उन्हे अचानक विदेश जाना पडा़.इस ईवेंट में मेरी और श्री संजय पटेल की हमेशा की तरह एक महती भूमिका रही.
लगता है, नज़र लग गयी और खाकसार भी गिर पडे़ चारो खाने चित, याने बुखार में, और पिछले तीन दिन से ज्वर की पीडा से गुज़र रहें है.
इन दिनों मेरे दिल के बेहद करीब , सुरों के साम्राज्य की मलिका, मदहोश दिलकश आवाज से पिछले साठ से भी ज़्यादा हम सभी के दिलों पर और कान पर राज करने वाली आशा भोंसले का जन्म दिन भी था ८ सितंबर को.(१९३३) याने यह उनका ७८ वां जन्म दिन था.
बाद में मेलोडी धुनों के शहंशाह जयकिशन जी की भी पुण्य तिथि थी १२ सितंबर को (१९७१).
इधर वाईरल नें घेरा और उधर संयोग ये रहा कि मेरे घर और ऒफ़िस के लेप्टॊप दोनों खराब हो गये. दर्द का आलम ये है पिछले तीन दिनों से कि रात जागते तिलमिलाते गुज़र रही थी, क्योंकि नेट से कट गये.बस एक ही चमकती रोशनी की किरण जो उस पीडा के अंधियारे से फ़ूट पडी वो आशा जी के कुछ वो नगमें जो ना मालूम क्यों रात रात भर मन में ही गनगुनाता रहा और दर्द से आंशिक सुकून पाता रहा. प्यारा हिंडोला मेरा, चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया, ये है रेशमी जुल्फ़ों का अंधेरा (क्या खूब गाकर सुनाया था जस्पिंदर नरुला नें उस दिन)
अब ये लेप्टोप आ गया है, तो दर्दे दिल, दर्दे जिगर सभी इसमें ही समा गये हैं.
और ये गीत जो मैं आप को सुनाने जा रहा हूं, जिसके संगीतकार भी संय़ोग से शंकर जयकिशन ही है..
रे मन सुर में गा sss
ये गीत पहले कभी तैय्यार किया था, मगर गा नहीं पाये थे किसी भी कार्यक्रम में, उस कार्यक्रम में भी नहीं, जो बरसों पहले हमनें आशाजी की लिये पेश किया था और उसमें सामने स्वयं आशाजी नें हमें सुना.
इस गीत की रागरागिनी(राग यमन) पर बात करने की बजाय इस १०२ डिग्री बुखार में आशाजी की सिर्फ़ वह तान बार बार सुनाई दे रही है, जिसके सामने मैं नतमस्तक हूं. सुरों के हिमालय खुद मन्ना दा भी इस गाने में आशाजी के गले से निकली हरकतों, मुरकीयों के कायल हुए होंगे ज़रूर. कोई भी मानव गला ऐसी साफ़ सुथरी स्वच्छ पानी के झरने जैसी एक सुर से दूसरे सुर में फ़िसलती हुई नियंत्रित तान नही गा पाया हैं.क्या आरोह क्या अवरोह
(लताजी के दिवाने मुझें माफ़ करें, मगर उनका गला तो मानवीय है कहां?)
तो चले उस अमानवीय गले की भी तान नहीं सुनेंगे? तो प्रस्तुत है दिव्यात्मा लता जी का गीत ...
मनमोहना बडे झूटे
जिसके संगीतकार भी संयोग से शंकर जयकिशन ही हैं.
मगर मैं दोनों अज़ीम शाहकाराओं की तुलना करने का दुस्साहस क्यों कर रहा हूं? शायद वाईरल नें दिमाग पर असर कर दिया है,(दिल पर नहीं).
इसलिये मैं तो इस बहाने इस गुनाह की सज़ा से बच जाऊंगा. मगर आप क्या करेंगे जनाब?
अभी दो दिन पहले ही मुंबई काम के सिलसिले में जाना हुआ.विघ्नहर्ता विनायक की स्थापना मुंबई के गली गली , कूचे कूचे में हुई नज़र आ रही थी. बडे बडे पांडाल, रोशनीयों की झप झप , झक पक, और एक दूसरे से होड लेती हुई भगवान गणपति देवा की बडी बडी ,दर्शनीय, और मनोहारी मूर्तियां....
क्या संयोग ही था कि हम प्रसिद्ध लालबाग चा राज़ा के गणपति पंडाल के पास के ही होटल में रुके हुए थे. चाहता तो था कि रात को ही दर्शन करता , मीटिंग देर तक चल रही थी और देर रात को भी इतनी भीड थी (कोई फ़िल्म स्टार आया था).तो सोचा कि कल अंतिम दिन याने अनंत चौदस को ही देखेंगे.
मगर एकदम खबर ये आयी इंदौर से, कि मेरी प्यारी सी बिटिया मानसी को तेज़ बुखार की वजह से हॊस्पिटल में भरती किया है.बस आनन फ़ानन में सुबह के प्लेन की टिकीट बुक किये और अल सुबह किंगफ़िशर की उडान में बैठ कर वापिस इंदौर चल दिये.मुंबई में बारीश हल्की हल्की हो ही रही थी, और विमान नें जब उडान भरी तो बादलों के कोहरे में से ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं के शीश झांक रहे थे.पता चला कि दो दिन से इंदौर में भी झम झम बारीश हो रही थी.
फ़्लाईट में दिल मश्कूक था और मन में असंख्य शंकायें जन्म ले रही थी.इंदौर में भी वाईरल का बुखार चल पडा था, डेंग्यु फ़्ल्यु का प्रकोप था ही, और रही सही कसर स्वाईन फ़्ल्यु में पूरी कर रखी थी. विमान में विडियो और ऒडियो एंटर्टेनमेंट था,मगर बिटिया की चिंता में कुछ भी देखने का मूड नही हो रहा था,तभी एक चेनल पर मुकेश जी के गीत सुनाई दिये तो बस वहीं अटक गया.
करीब एक घंटे की फ़्लाईट के बाद जब कप्तान नें इंदौर आने का संकेत दिया, तो संयोग से मुकेश जी का एक गीत लगा-
ये कौन .....चित्रकार है?
अमूमन जब भी ये गीत लगता है, तो मैं इसे फ़ास्ट फ़ारवर्ड कर देता था, क्योंकि अक्सर हर संगीत के अधिकतर कार्यक्रम में (जिसमें मुकेशजी के गीत होते है)ये गीत ज़रूर लिया जाता है. मगर दुर्भाग्य से या तो ऒर्केस्ट्रा के साज़ों के कंडक्शन में कहीं खामी रह जाती थी या गायक इस गीत के उत्तुंग भावों को पकड नहीं पाता था. संक्षेप में, इस गीत के बोल और वाद्य संयोजन के जादू को मैं कभी पहचान नहीं पाया था.
इस लिये अपने मन में हो रही हलचल का ध्यान बंटाने मैं खिडकी से बाहर झांक कर देखने लगा.तो मैने वर्षा के बादलों के झुरमुट में से नीचे दृष्टि डालकर देखा तो मैं ठगा सा ही रह गया.
नीचे हरे हरे गालीचे की माफ़िक मालवा की धरती फ़ैली हुई थी. कहीं कहीं भीगी भीगी सी झाडि़यां, कहीं सांप सी लहर खाती हुई नदीयां और उफ़नते नाले, कहीं पानी के बडे बडे लबालब भरे हुई जलाशय ....मानों अपने घर के आंगन के बगीचे में पानी भरा हुआ हो और हम उसमें ’आई’(मां) की स्नेहमई नज़र से बचते बचाते फ़चाक से कूद पडते हैं, गीले हो जाते हैं.या फ़िर कभी कभी कागज़ की कश्तियां तैराया करते थे
क्या मंज़र था... मुकेशजी की पाक नर्म सुरीली आवाज़ ,पं भरत व्यास के शुद्ध शहद से टपकते हुए मधुर बोल, अमृत में धुली हुई फ़िज़ा ए सहरी ,जमीं का शफ़्फ़ाफ़ सा लेहलहाता हुआ स्वरूप जैसे वसुंधरा की गोद फूलोँ से भरी हो, सिंदूरी आफ़ताब का चमकता अक्स कभी कभी सफ़ेद राजहंसों के हुजूम से उड रहे बादलों से चीर कर बारीश के पानी को ओढे पैरहन से पलट कर आता हुआ . .
मैं खा़लिक़ (सृष्टिकर्ता) की खा़लिस़ कुदरती ’अक्कासी (चित्रकारी)से अभिभूत हो कर , सन्मोहित हो कर मालिक के इस अज़ीम शाहकार से नतमस्तक हो गया, और वाकई में आंखों से भक्तिमय आंसूं तर आये.मन के भाव बौने हो गये, और उस महान सर्व शक्तिमान निर्माता के उत्तुंग व्यक्तित्व से प्रभावित मैं भक्तिसागर में डूब गया, कि जब हवाई जहाज नें जब ज़मीन को छुआ तब उस सन्मोहन से उबरा.
आज अभी देर रात को उस अस्पताल में हूं जिसको आज से कई सालों पहले मैने ही बनाया था एक होटल के लिये .उसके चौथे माले के प्राईवेट वार्ड के कमरे में बाहर बडी खिडकी से इंदौर शहर पर झमझमाती बारीश की चादर में से कहीं कहीं बिजली की कडकडाहट और रोशनी को देख रहा हूं , कहीं कहीं अनंत चौदस के गणपति विसर्जन की झांकीयों की रोशनी का उजाला देख रहा हूं , और फ़िर भी सुबह के उस मंज़र का खयाल दिलोदिमाग से निकाल नहीं पा रहा हूं.
चलो, आप को भी अपने इस अनुभव से गुज़ारने की हिमाकत करता हूं...
सुनिये और देखिये इस गीत के अंश को, दृष्यावली को, और शिक्षक बनें जीतेंद्र को (शिक्षक दिवस की संध्या पर). आप भी सन्मोहित हो जाये उस ईश्वर के जादूगरी का तसव्वूर कर के.आप पर भी वही आलम तारी हो जाये जो मुझ पर हुआ है.
अगर मज़ा नहीं आया तो मुझे कोसियेगा, ईश्वर को नहीं या इन्हे भी नहीं....!!!!
हरी हरी वसुंधरा पे नीला नीला ये गगन, के जिसके बादलों की पालकी उडा रहा पवन, दिशायें देखो रंग भरी....., चमक रही उमंग भरी ये किसने फूल फूल पे ......किया सिंगार है ये कौन चित्रकार है? ये कौन चित्रकार है? ये कौन .....चित्रकार है?
तपस्वीयों सी है अटल ये पर्वतों की चोटीयां, ये सर्प सी घुमेरदार घेरदार घाटियां, ध्वजा से ये खडे हुए .....है वृक्ष देवदार के , गलीचे ये गुलाब के बगीचे ये बहार के , ये किस कवि की कल्पना .....का चमत्कार है,
ये कौन चित्रकार है? ये कौन चित्रकार है?
कुदरत की इस पवित्रता को तुम निहार लो, इसके गुणों को अपने मन में तुम उतार लो चमका लो आज लालिमा ....अपने ललाट की, कण कण से झांकती तुम्हे छवि विराट की अपनी तो आंख एक है, उसकी हज़ार है.
गीतकार पं. भरत व्यास, संगीतकार सतीश भाटिया, फ़िल्म बूंद जो बन गयी मोती ( वी. शांताराम)
किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है.
बहुत कुछ पाया है इस ज़िंदगी से.
संगीत,रंगकर्म,चित्रकारी,फोटोग्राफ़ी में किये अव्यावसायिक प्रयोग और व्यवसाय में वास्तुशास्त्र, इंजिनीयरींग और मॆनेजमेंट के कुछ भुगते ,कुछ आज़माये फ़ंडे.
कुछ इहलोक की कुछ परलोक की.
कुछ आत्मा की, कुछ परमात्मा की..
कुछ पायें , कुछ लौटायें..