Wednesday, December 24, 2008

वो जब याद आये बहोत याद आये..हमारे लाडले गायक - मोहम्मद रफ़ी


वो जब याद आये बहोत याद आये,
ग़में ज़िंदगी के अंधेरे में हमने,
चरागे़ मोहोब्बत , जलाये बुझाये...

मोहम्मद रफ़ी..A Legend !!!

एक बेहतरीन गायक, सच्चा कलाकार,मगर उससे भी बेहतर एक कोमल हृदय का मालिक, दिलदार, और सच्चा इन्सान..

आज अगर वे जीवित होते तो पता नहीं क्या होता, मगर वे हमारे दिलों पर ज़रूर राज़ कर रहे होते. वैसे भी आज यही स्थिती है, बस दुख ये है कि वे हमारे साथ नहीं.

इसीलिये, आज के इस पावन दिवस पर हम उस ईश्वर , अल्लाहताला को ज़रूर धन्यवाद देंगे, जिसने, सन १९२४ में इस दुनिया में ये देवदूत भेजा, जिसने अपनी सुरीली ,सुमधुर और मन के अंतरंग को छू जाने वाली आवाज़ से इतने सालों से हम सुनकारों के दिलों में दिली सुकून जगाया.

क्या ठीक कहा है..

दर्दे दिल, दर्दे जिग़र, दिल में जगाया आपने......

रफ़ी जी की जन्म कुंडली

रफ़ी जी की जन्म कुंडली अभी कल ही पुणें में मुझे मिली, तो आपके लिये यहां दे रहा हूं. जिनका भी ज्योतिष का अभ्यास हो उन्हे शायद ये बडी़ सौगात होगी.अगर कोई इसका विश्लेषण कर सके और मुझे दे सके तो यहां पोस्ट कर सकूंगा.

जन्म दिवस - २४ दिसेंबर १९२४
समय - सुबह ३.३० बजे
स्थान - कोटला सुल्तानसिंह , अमृतसर, पंजाब.



रफ़ी जी पर लिख पाना और उनकी उत्तुंग करिश्माई व्यक्तित्व को शब्दों में ढा़ल पाना मेरे जैसे मर्त्य मानव के बस में नहीं.मगर इस चश्मे बद्दूर आवाज़ के साथ इतने साल जागा, सोया, गुनगुनाया,स्टेज पर गाया, खुद अनुभव किया. उनकी चिर युवा आवाज़ के स्वर सामर्थ्य की,मिठास की ,गोलाई की बेइन्तेहां नापी नही जा सकने वाली गुणवत्ता और गहराई को दूर से ही देख सकने की अपनी मजबूरी की यथार्थता सभी याद आ गयी. एव्हरेस्ट की चोटी मैनें जब नेपाल में चल रहे प्रोजेक्ट में देखी थी तो इच्छा तो हुई की उस चोटी को फ़तेह करूं. मगर कोशिश भी करूं तो संभव नहीं था. वैसे ही रफ़ी जी के गीत को गाते हुए मेहसूस हुआ. वे भारतीय फ़िल्म संगीत जगत के एव्हरेस्ट थे.

ये वह आवाज़ थी जो हमें अपनी खुद की आवाज़ लगती है.

तभी तो खुद रफ़ी जी नें क्या सही कहा है..

तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे,
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे..

उन नज़ारों की याद आयेगी
जब खयालों में मुझको लाओगे...


उनकी आवाज़ को तो Timbre या ध्वनिरूप ही यूं था कि हर नायक के चरित्र को गहराई तक अद्ययन कर पूरी तन्मयता से
अपनी आवाज़ में ढाल लेते थे. दिलीप कुमार और शम्मी कपूर की एक दूसरे से मीलों दूर व्यक्तित्व को बखूबी निभाया. जॊनी वाकर और देव आनंद दो अलग अलग ध्रुवों को एक गले में आत्मसात किया वे थे रफ़ी जी.इसीको तो हम परकाया प्रवेश की सिद्धी कह सकते हैं.

याद किजिये देव साहब के लिये दिल का भंवर करे पुकार और बाद में राजेश खन्ना के लिये गुन गुना रहे हैं भंवरे..अमिताभ के लिये ही कहां जॊन जानी जनार्दन और कहां तेरी बिंदिया रे...

जहां शम्मी कपूर के लिये मस्ती भरी उंचे सुरों में गाया हुआ आसमान से आया फ़रिश्ता गाया या आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा ,तो तब भी expressive और musical रहे और एहसान तेरा होगा मुझ पर या मेरी मुहब्बत जवां रहेगी में भी अहेसासात की सीमा पार कर गये.

दिलरुबा दिल पे तू, ये सितम किये जा में या अकेले अकेले कहां जा रहे हो मेम उनका फ़ुसफ़ुसाना ,मांग के साथ तुम्हारा में दिलीप कुमार के लिये गीत के अंत में टांगेवाले का चिल्लाना, काम की बात बता दी अरे कामेडी गाना गाके में जॊनी वाकर के ढंग से हंसना, ’लाल लाल गाल ” में रॊक एन रोल के लिये तूफ़ानी चिल्लाना वह भी सुर में, योडलिंग का गाना आग्रा रोड का सब याद आ रहा है.

एक बार हुवा यूं कि किसी फ़िल्म में राजेंद्र कुमार को लिया जाना था और फ़िल्म के चार गीत भी रेकॊर्ड कर लिये गये थे.मगर उन दिनों ज्युबिली कुमार के पास इतना काम था, और किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिये परदेस से आने में उनको ज़रा विलंब हुआ. इसलिये इस फ़िल्म के मिर्माता नें इतना रुकना उचित नहीं समझा और राजेंद्र कुमार की जगह जॊय मुखर्जी को नायक के लिये साईन कर लिया.

हर नायक की छबि, व्यक्तित्व और ढंग को उतरने वाले रफ़ी साहब को जब ये पता चला तो वे उस निर्माता के पास गये और कहा, कि चूंकि जॊय मुखर्जी को लिया है, सभी गीतों को फ़िर से रेकॊर्ड करना चाहिये.जॊय मुखर्जी की स्टाईल शम्मी कपूर से मिलती जुलती थी .संयोग से निर्माता और संगीतकार को ये बात बहुत ही उचित लगी और इसलिये उन सभी गीतों की फ़िर से रिकॊर्डिन्ग की गयी, और उन गीतों नें और फ़िल्म नें सिल्वर ज्युबिली मनाई.

जब इस का मेहनताना रफ़ी जी को निर्माता देने लगे तो उन्होने मना कर दिया. पता है उन्होने क्या कहा?

गाना मेरा पेशा है. मगर मेरे लिये पैसा नहीं पेशा अधिक महत्वपूर्ण है.

चलिये आज इतना ही सही. आज बाकी शाम उनके गीत सुनने में गुज़ारने की तमन्ना है, अगर आप इज़ाज़त दें तो.
अगले दो तीन पोस्ट में भी रफ़ी जी रहेंगे ये वादा. जो दिल में ही नहीं समा पा रहे है, वे तीन चार पोस्ट्स में क्या समायेंगे. फ़िर भी भावुक मन है.भक्तिभाव है, तो इस विराट स्वरूप के अंतर्दर्शन कर के मैं आप दोनों धन्य हों तो क्या हर्ज़ है?

हुई शाम उनका खयाल आ गया...


Friday, December 12, 2008

माने ना मेरा दिल दिवाना ,हाय रे...हाय रे संयोग..

आज ११ दिसेम्बर है.

तो हुआ करे.

नही जनाब. आज मेरे दो दोस्तों की शादी की सालगिरह है, और इसलिये इंदौर के एक प्रतिष्ठित तारांकित हॊटेल सयाजी में जब इनमें से एक मित्र नें आज शाम को शादी की वर्षगांठ पर पार्टी दी तो, दूसरा मित्र भी संयोग से वहीं मिल गया. मुझे अकेला देखकर चौंक कर पूछ बैठा कि भाई साहब, आप अकेले, भाभी जी कहां हैं?

उसका चौंकना इसलिये लाज़मी था क्योंकि संयोग से आज मेरे शादी की भी सालगिरह है, और मेरी पत्नी नेहा अभी पूणें में नूपुर बिटिया के पास है,जो स्वास्थ्य लाभ कर रही है.शादी के बाद पहली बार हम दोनों इस बार साथ साथ नहीं हैं.

जाहिर है, हम सभी मित्रों के साथ ग़म गलत (?)करनें बैठ गये. मेरा तरीका जरा अलग है. चूंकि मैं हमेशा अपनी धुन में अपने नशें में रहता हूं , मुझे किसी और नशे की ज़रूरत नहीं पड़ी आज तक, और इसीलिये फ़्रेश लाईम सोडा़ के नशें में हमने अपनी पत्नी के विरह को सेलिब्रेट किया.दोस्तों को साथ देने के लिये अब तक इतना फ़्रेश लाईम सोडा़ पी चुका हूं कि देखते ही सुरूर आ जाता है.( पैसा भी नही लगता!!)

डिसेंबर महिना है, अभी भी रातें ठंडी़ नही हुई. वर्ना अब तक हमेशा इतनी थंड़ बढ़ जाती थी कि मेरी दूसरी बिटिया मानसी की नाक हमेशा बहती रहती थी, क्योंकि उसे अक्सर सर्दी लग जाती थी. वो आज बोली,पापा , आज पहली बार मेरे जन्मदिन पर मुझे सर्दी नहीं हुई है.

ओह,तो शायद मैंने बताया नहीं कि आज संयोग से उसका भी जन्मदिवस है, और वो मेरे साथ, और पत्नी नेहा ,नूपुर के साथ.अब कोई और संयोग नही है, निश्चिंत रहिये.

नही, अभी खत्म नही हुआ है ये संयोग. ज़रा दिल थामके बैठिये और सुनिये ..

ये जो मेरे मित्र मुझे मिले थे अभी, जिनकी शादी उसी साल हुई थी, मेरे शादी वाले दिन ही हुई थी. और ये मेरे मित्र बने कश्मीर में, जब संयोग से वे भी हनीमून पर श्रीनगर पहूंचे थे और हम एक ही फ़्लाईट से श्रीनगर उतरे.

इन्दौर वालों की ये खा़सियत है, कि कहीं भी बाहर मिल जायें तो एक दम घुल मिल जायेंगे,भले ही पहली बार मिलें हों.(इन्दौर में मिलें तो यही बात हो ये ज़रूरी नही!!). तो हमने बाकी दिन साथ ही घूमने देखने का प्लान किया.

एक बडा़ शोख़ वाकया याद आया जो आज भी हमने याद किया और बहुत हंसे भी,जो आपको नज़र कर रहा हूं. अब आप से क्या पर्दा( पर्दा नहीं जब कोई खुदा से, दोस्तों से पर्दा करना क्या जब ..)

एक शाम हम खिलनमर्ग में घुडसवारी के लिये गये, तो शाम लगभग हो चुकी थी और झुरमिटी अंधियारा सा होने जा रहा था. हमने चार घोडे तय किये और दोनो कपल घोडों पर बैठ ,हौले हौले हाथों में हाथ डाले क्षितिज की तरफ़ बढने लगे.

चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो..


अलग अलग.

जरा अलग अलग को रेखांकित किजिये,क्योंकि यहां भी संयोग ने गड़्बडी़ की थी.कहीं गाना भी चल रहा था- कोइ प्यार की देखे जादुगरी , गुलफ़ाम को मिल गयी सबज़परी...

अभी हम प्यार की जादुगरी देख ही रहे थे कि अचानक हमने पाया कि गुलफ़ाम को सब्ज़परी मिलने की बजाय दोनो गुलफ़ामों के घोडे एक साथ मिल कर किसी तीसरी राह पर चल पडे़ थे, और दोनों सब्ज़परीयों के घोडे़ पीछे ही रह गये. हमने लाख कोशिशें कीं , बडा ज़ोर भी लगाया मगर वो हो न सका जिसकी हमें जुस्तजू थी. घोडे़ थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे .

बस फ़िर क्या, मैं और मेरी तनहाई, और साथ में दूसरा गुल्फ़ाम तनहा सा, सहमा सा,क्योंकि घोडे़ वाले भी पीछे कहीं ओझल हो गये थे. फ़िर उस नशीली रात में , उस ठंड में मैनें उस मित्र से कहा कि ज़रा ठंड रख, क्योंकि ये कोई फ़िल्म नही है, जो कुंभ के मेले में हम लोग बिछड जायेंगे.कोइ जतन कर के इन चलते हुए घोडों से उतरने की तरकीब निकाली जाये. जब भी हम कोई कोशिश करते,घोडे़ स्पीड़ बढा देते!!

ये भी संयोग था कि दोनो घोडे साथ साथ ही चल रहे थे, जैसे कि जय और वीरु हों, नहीं तो ये भी अलग अलग हो जाते तो कहीं मुंह दिखाने को नहीं रह जाते ( दरसल रात के अंधेरे में मुंह ही नही दिख रहा था, और कौनो दू्जी बात नाही है रे बावरों !)

अब हमारे मराठीयों में तो घोडी चढ़ के तो दुल्हन नहीं लाते, हम तो बग्गी में लाये थे. इसलिये उसे कहा की मेरे पंजाब दे पुत्तर, तूने तो अभी अभी घोड़ी चढी थी, तो तु बता कैसे उतरे.

वो क्या बोलता, रुआंसां होते हुए बोला, चढने का तो एक्सपेरियेंस है, मगर उतरने का नहीं.अच्छा हुआ कि उसने ये नहीं कहा कि नाचने वाली घोडी का ए़क्सपेरिएंस है.

अब हमारी भगवान को याद करने की फ़ोर्मेलिटी करने की बारी थी.शायद उसे भी हमारे दया आ गयी होगी, बॆकग्राउंड में गाना तो नहीं बजा,कि मेरा तो जो भी कदम है, वो तेरी राह में है, के तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाहों में है.
खरामा खरामा घोडे़ रुक गये , और पहली फ़ुर्सत में हम दोनो घुड़सवार से ज़मीनदोस्त हुए.हम बस्ती से दूर निकल आये थे, मगर इस बात का शुक्र मना रहे थे कि हमारी बेटर हाफ़ जोडी़ होटेल से दूर नहीं थीं, तो उनकी चिंता नहीं थी.

बस क्या था, हम दोनों जय और वीरु की तरह चलते चलते ये गीत याद करते करते, गुनगुनाते हुए होटल पहुचे कि-

तू कहां , ये बता, इस नशीली रात में ,
माने ना मेरा दिल दिवाना ,हाय रे...


होटल पहुंच कर सबसे पहले हमने अपने अपने डाग़ चेक किये और फिर पिल पडे़ उस घोडे़वाले पर जो हमारी राह देख रहा था.
उसकी भी हालत पतली थी, क्योंकि उसके घोड़े तो अभी भी गायब थे.

हमने तो सबसे पहले उससे जवाब तलब किया कि ऐसे कैसे घोड़े दे दिये तूने, कि हम अपनों से जुदा हो गये.

पता है उसने क्या कहा? हाय रे ,फिर वही संयोग..

मित्रों ,वे घोडे़ जय और वीरू नहीं थे, मगर वीरू और बसंती थे...


और इसलिये साथ साथ थे कि प्यार किया तो ड़रना क्या ?प्यार किया कोई चोरी नहीं की.आयी बात समझ में?

(बाद में होटल छोडने तक कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नही मिली की दो हंसो के जोडे़ को बिछड़वाने वाली उस घोडा़ घोडी़ की जोडी़ का क्या हुआ. हमारा तो हनीमून खतम हुआ, मगर शायद उनका चल रहा होगा!!)

आज इस घटना को याद करते करते हम दोनो अपनी अपनी घोडी़ पर चढ़ कर, माफ़ किजिये कार में चढ कर घर को लौटे.

अब बस , सोचा आपसे क्या छिपाऊं, तो हाले दिल बयां कर दिया.

दिल क्यों चहका रे चहका आधी रात को, बेला महका रे महका आधी रात को,

मगर अकेलेपन के एहसास में ऐसे कई गीत दरवाज़े पर दस्तक देने लगे जैसे- अकेले है चले आओ.. रफ़ी साहब , मुकेश,तलत आदि ने मेरे इर्दगिर्द जमावडा़ कर लिया और मुझे सांत्वना देने लग गये.

वही गीत,जो पहले कभी रिकोर्ड किया था, आज यहां लगा देता हूं.

तू कहां , ये बता, इस नशीली रात में ..

लगाऊं या ना लगाऊं ? चलो लगा ही देते हैं... दिल ही तो है..

Monday, December 1, 2008

बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया...


कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया....


आज अभी तक दिल ग़मगीन है, दो तीन दिनों पहले के घावों की टीस अभी तक मन से रिस रही है. जैसे जैसे और मुम्बई की घटनायें सामने आ रही है,उन अपनों के बारे में पता चल रहा है,जो पिछले दिनों में इन आतंकवाद के दानव की भेंट चढ गये.उनके साथ बिताये पलों की, क्षणों की याद जो खिलते हुए फूलों के मसलने की दास्तान बयां कर रहीं है.वे नजदीकी अपने , जो रब से ये भी पूछ पाने की स्थिती में अभी नहीं है, कि उनके साथ ही ऐसा क्यूं हुआ, जब काल नें अपने क्रूर हाथों से उनकी बगिया की महकती फ़ुलवारी को उजाड़ दिया.

किन किन की अफ़सुर्दा-दिली बयां करूं, किस किस का दर्द भरा अफ़साना सुनाऊं और जब वे बार बार सामने याद आते है, तो मन उन जाने पहचाने चेहरों की याद भुला नहीं पाता है, जो अक्सर मुम्बई प्रवास में मिलते रहते हैं, या अब भारी मन से कहें ............थे.

अब वे कभी नहीं मिलेंगे.

किसीने अपने ब्लोग पर खूब लिखा है(सौरभ कुदेशिया-http://satat-vichar-manthan.blogspot.com/2008/11/blog-post_29.html) कि मेरे परिवार के १३० लोग मरे है,मौत हो गई है मेरे घर में.

पता नहीं क्यूं ये सवालात जेहन में टकरा रहे हैं कि ये कब तक? आज एक गाना ना जाने क्यूं लबों पर बार बार आ रहा है.

चलो वह गीत आपके को भी सुना देता हूं- हवा में ठंडक बढ गयी है, फिर भी उद्वेलित विचारों की तपन , आंच दिल को जला रही है. सूखे टहनीयों के जलने से चटखने की आवाज़ें बढ गयी है.

इस गीत को बिना साजो सामान के , बिना किसी भूमिका के सुना रहा हूं. वाओलीन ,हार्मोनियम, तबला आदि की आवाज़ कमज़ोर पड़ गयी है, बंदूकों के , गोलीयों की आवाज़ के सामने.सिर्फ़ मैं, मेरी तनहाई, और सर पर पंखे की गिरघिर.. जो हृदय में शूल उत्पन्न कर रही हैं- आंसूंओं का सैलाब थमने और थामने का जतन चल रहा है कि गीत को भी दो तीन बार में रेकॊर्ड करना पडा़.

मर्द हूं तो शायद ये स्वीकार करने मे शरम आये कि ..

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया-

जो है सो है.

Wednesday, November 26, 2008

फिर मिलते हैं एक ब्रेक के बाद



तमाम कोशिशों के बाद आखिर दिल ये कह पडता है

फिर वही शाम वही ग़म ,
वही तनहाई है,
दिल को समझाने तेरी
याद चली आयी है.



फिर गिर पडे़ है हम भौतिक रूप में, और इससे पहले कि किसी की नज़रों में गिर पडे या आपकी यादों से ओझल हों, ये टाईम आउट ले रहे हैं.

फ़िल्म पडो़सन याद आयी, जिसमें आगा अपनी पत्नी से कहता है,

- जब जब जो जो होना है, तब तब सो सो होता है!

रोशन जी पर लिखा हुआ रह गया, सचिन देव बर्मन पर तीसरी कडी तैय्यार है, उसका वादा है, और बहुत सारे गीत हैं जिनका रसास्वादन करना बाकी है अभी...

फिर मिलते हैं एक ब्रेक के बाद..( मानस के अमोघ शब्द पर खुलासा किया है)

Monday, November 3, 2008

पिया तोसे नैना लागे रे...- सचिन देव बर्मन

कड़ी - २
सचिन देव बर्मन पर दूसरी कड़ी लेकर हाज़िर हूँ.

सुनकारों से आग्रह है, की अगर उन्होंने सचिन दा पर पहली कड़ी नही भेंट की हो तो कर लेंगे ,तो इस कड़ी का सन्दर्भ समझाने में ज़रा आसानी होगी.

हम बर्मन दा के पिटारे में से कई नायाब जवाहिरात चुनते है, तो इस गानें को अग्रिम पंक्ति में पाते है.

पिया तोसे नैना लागे रे...

गाईड फ़िल्म के ४ स्टॆन्झा और ८ मिनीट के इस मेरथॊन गीत को सचिन दा बिना किसी प्रील्युड से शुरु करते है(जैसा कि वे कई बार कर चुकें हैं), और स्थाई के बाद Rich Orchestra के Interludes गीत को अपनी मीठी गिरफ़्त में ले लेते हैं. साथ ही साथ शैलेन्द्र के अतिआकर्षक बोलों की जुगलबंदी सी चलती है ताल के साथ, जो धिनक धिन धिन धिनक धिन धिन पर थमती है.

The orchestral interludes in this song are rich and varied. Though these music pieces are tailor-made for a dance choreography, unlike most dance pieces they do not remain limited to a frenzy of ghungroos, tabla and sarangi/harmonium. The orchestral interludes, here, in typical SD Burman style, are uncluttered and spontaneous. However they still use a wide variety of instruments and are richly layered. Violins, Sitars, ghungroos, tabla, drums (note the lovely use of a north eastern drum in the portion before भोर की बेला सुहानी) and the flute all fit into the overall composition like pieces in a jigsaw puzzle. Strings, as with most of Dada’s songs, are used with great felicity. Note the extremely catchy short string pieces strewn all over the song. विशेषतयाः उस जगह जहां गाना मुखडे़ पर लौटता है ...

ताल में भी हमें कहीं कहीं भटियाली शैली के दर्शन होते हैं.कहीं कहीं तबला बॆक सीट ले पृष्ठ्भूमि में चला जाता है और ड्रम पर्कशन वाद्य समूह प्रभावी हो जाते है.

मगर मेरे मित्रों , ये सब बेमानी हो जाता है जब तक हम यह भी नही कबूल कर लेते कि विजय आनंद के निर्देशन में इतने अच्छे फ़िल्मांकन और वहीदा जी की बेमिसाल नृत्य अदायगी नें सचिन दा की मेहनत में चार चांद लगा दिये है.(Waheeda is Elegence & Grace Personified, indeed !!!)

फ़िल्म में इस गीत की कहानी का केंद्रबिंदु है राजू गाईड और रोज़ी के बीच पनपते रिश्तों का -नैना लागे रे!!
फ़िर समय के बीतने के संकेत होली और दिवाली के त्यौहारके पृष्ठभूमि में इन संबंधों में प्रगाढ़ता और व्यावसायिक कार्यक्रम की क्रमवार सफलता का बेहद प्रभावी चित्रण है. बड़ी शालीनता के साथ उनके बीच स्थापित होते शारीरिक और प्रेम सम्बन्ध भी खुलते हुए दिखाते है, और गीत के बोल भी ये सूचित करते है.चमकाना उस रात को जब मिलेंगे तन मन, मिलेंगे तन मन...

ज़रा पूरे गानों के बोलों पे भी बारीकी से गौर फरमाएं जनाब. और साथ ही में अनुभव करें कि
हर अंतरे में विभिन्न रंगों के और समय के रागों का मिश्रण खूबसूरती से गढा गया है.

इसीलिये ही कहा गया है, की संगीत यह स्वार्गिक सुखों के अनुभव की चीज़ है, तार्किक बुद्धिमत्ता की नहीं.

अब देखिये, गाईड फ़िल्म का वह गीत विडियो पर, और गोते लगाईये मधुर संगीत की फुआरों से सजे झरने में.

तीसरी कड़ी अगले हफ्ते ..

Sunday, November 2, 2008

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा ....

कड़ी - १
३१ अक्टूबर को पद्मश्री सचिन देव बर्मन की ३३ वीं पुण्यतिथी के दिन सारे दिन उनके गीतों को सुनता रहा, अपने मन की गहराई तक उन रचनाओं का आस्वाद लेता रहा जो हमेशा गाहे बगाहे कानों पर पड़ते तो ज़रूर थे, मगर सुकून से एक साथ
सुने नहीं गए.

उन्हे सुनने का अवसर भी बड़ा ख़ास इसलिए था, क्योंकि एक साथ जब हम उनके रचे हुए गीतों को सुनते है तो तब जाकर पता चलता है, की उनके सभी गीतों में कितनी विवि्धता थी, कितना माधुर्य था, कितनी वेदना थी.

सचिन दा निसंदेह सुरों के एक ऐसे चित्रकार थे जिन्होंने अपने हर पेंटिंग में अलग अलग विषयों पर अलग अलग रंग बिखेरे. उनके ब्रश के स्ट्रोक्स , उनका टेक्सचर , और ग्राफिक्स की विविधता उनके हर गाने में नज़र आती थी या सुनाई देती थी.

हिन्दयुग्म के आवाज़ पर सचिन दा पर एक पोस्ट लिखी तो सहजता से उनके गानों की सुरमई धुंध में मैं खोता चला गया.

मन ही नही भर रहा था. सोचा कुछ अपने यहाँ भी लिख उनको एक बार और श्रद्धांजली देकर, इज़हारे अकीदत पेश कर ,उनके संगीत से जो आज तक आनन्द लूटा है उसका कुछ क़र्ज़ तो उतार ही दूँ, भले ही अंश मात्र ही सही.

पिछले दिनों सिने संगीत को समर्पित हर एक ब्लॉग साईट पर आप पायेंगे इस महान संगीतकार पर कुछ ना कुछ लिखा हुआ , और साथ ही पायेंगे उनके ढेरों सारे गीत उनकी आवाज़ में भी. एक जगह की कमी बेहद खल रही है. श्रोता बिरादरी की जाजम इन दिनों बिछी नही किसी कारण वश. हर सू फैले दिवाली के प्रकाशमय उजियाले में इस प्रेरणा स्रोत सुरमई शमा की अनुपस्थिती ने सचिनदा के दर्द भरे गीतों से उपजी अफ़सुर्दा दिली और भी बढ़ा दी. आवाज़ दे कहां है....?

हमें कोई ग़म नही था ग़मे आशिकी से पहले ,
ना थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले...


सचिनदा के लिए काम करने के लिए बड़े बड़े गायक और गायिकाएं तरसते थे क्योंकि उनके गले की तासीर या Timbre का अचूक उपयोग वे करते थे. सेन्स्युअस गीत में आशा और गीता दत्त की आवाज़ के नैसर्गिक आउटपुट से आगे जा कर अपना एक ख़ास आउटपुट निकालने में माहिर थे. आज सजन मोहे अंग लगा ले, में मादकता का एक Undercurrent , पखावज़ की लय के मिश्रण से अद्भुत प्रभाव उत्पन्न कराते थे. वैसे ही कुछ प्रभाव उन्होंने रात अकेली है गीत में ढाला था , जिसका कान में फुसफुसानें का अलग अंदाज़ बेहद लोकप्रिय हुआ था.

भक्ति युक्त प्रेम भाव हो या संपूर्ण समर्पित अनंत आध्यात्म हो , या फिर अल्हड़ सी शोख़ सी यौवन की छुपी हुई भावाभिव्यक्ति हो , लता के पारलौकिक गले से वे रस उत्पत्ति कर हमें नवाज़ते थे ऐसी ऐसी सुरीली बंदिशों से कि हम उनके सुर सागर में डूबते तैरते बहने लगते है , और कहने लगते हैं कि कोई ना रोको दिल की उड़ान को , आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फ़िर मरने का इरादा हैं .

रफी हों या मन्ना दा, या किशोर , मुकेश , तलत अपनी अपनी जगह पर ही गाते थे उनके लिए.किसी भी गाने का मूल तत्त्व जिस पाये का होता था उसी पाये की आवाज़ वे अपने गाने के लिए लेते थे. हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए के रफी और दुखी मन मेरे के किशोर में दर्द की अभिव्यक्ति का फरक सिर्फ़ वे ही बखूबी कर सकते थे.

I am just listening to araay of his sweet and enchanting songs! What a pure , unadultrated mix of symphony & Melody !!

His music breathes of fresh born flowers, his songs are nestling places of whistling birds, tinkling bells and sobbing flutes, his orchestral creations contain both lyric and epic sweeps of design blended in such rare harmony of which only a composite genius like him is capable -- a genius who breathed music, dreamed music, lived music all his life.


उनके निधन पर दी गयी श्रद्धांजली पर कुछ अंश किशोर दा पर मेरी पिछली पोस्ट में भी आप सुन सकते हैं.

उनपर भारत सरकार नें भी सन २००६ में एक डाक टिकट निकाल कर उनका सन्मान किया था .

गायक के रूप में आराधना के गाये गीत सफल होगी तेरी आराधना पर राष्ट्रीय पुरस्कार १९७० में, और ज़िंदगी ज़िंदगी फ़िल्म में संगीत निर्देशन के लिये भी प्राप्त किया था.फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड़ भी फ़िल्म टॆक्सी ड्राईवर के लिये १९५४ में भी प्राप्त किया.

शास्त्रीय संगीत पर उनकी पकड़ भी क्या खूब थी जनाब. गाईड़ में लता के गाये गीत पिया तोसे नैना लागे रे में उनका कमाल सुनने लायक था. रूपक ताल में निबद्ध किये गये इस क्लासिकल गीत में सचिन दा के संगीत के विज़न का दर्शन होता है और भावनाओं की अभिव्यक्ति का ,Visual Feel का अहसास होता है.

इसके लिये तो लगता है मुझे एक और पोस्ट लिखना पडे़गी. (बुधवार को ज़रूर)

तलाश फ़िल्म में भी तेरे नैना तलाश करें में मन्ना डे की अप्रतिम गायकी के साथ सुरों का संयोजन और साथ में मृदंग या पखावज़ का तबले के साथ अनोखा मेल उनके सुजनशीलता की इन्तेहां थी. इन्टरल्युड़ में सरोद , सितार और बांसुरी,के साथ कहीं कहीं तार शहनाई तो कहीं कहीं ताल तरंग का भी बडे़ ही अधिकार पूर्वक उपयोग किया गया है.

यह गीत पहले बिरादरी पर जारी भी हो चुका है.

तो आपसे इजाज़त लेकर अपनी एक तमन्ना पूरी कर लूँ?

यह गाना पिछले दिनों यहाँ स्टेज पर गाया गया था . मन्ना दा को समर्पित एक पूर्ण कार्यक्रम -दिल का हाल सुने दिल वाला - में स्टेज पर प्रस्तुत गीत का विडियो देखें और सुने. गायक यहाँ नगण्य है. उसकी मस्ती का , सुरों के नादब्रम्ह का आप भी अनुभव लें.

मन्ना दा जैसे हिमालय को नापना किसी भी गायक के लिए मुमकिन नहीं ये बात तय है दोस्तों. मगर वादक कलाकारों के कौशल को सुन दाद ज़रूर दें , क्योकि सभी कलाकारों ने अपने अपने स्तर पर अपना रोल बखूबी निभाया है. एक ही की बोर्ड पर सभी वाद्य - सितार, ताल तरंग, तार शहनाई, सरोद, बांसुरी और क्या क्या. मृदंग नहीं था तो एक हाल में तबला और दूसरे पर ढोलक लेकर इफेक्ट पैदा किया है.

अगले रिलीज़ : -
कड़ी - २ - पिया तोसे नैना लागे रे ... मेराथोन गीत का सुरीला विवेचन
कड़ी - ३ - सचिन दा, गुरुदत्त,साहिर,हेमंत कुमार से जुडी एक कॉमन स्मृति विशेष (पिछले महिने की श्रद्धांजली)

Tuesday, October 28, 2008

इस दिवाली पर हार्दिक शुभकामनायें

मेरे ब्लॊग के अंतरंग मित्रों सुरीले साथियों,



आप सभी को इस दिवाली पर हार्दिक शुभकामनायें...

सुरमई अनुभूति और संवेदनशील धडकन के ताल पर आपके जीवन में सुखों की वर्षा हो.

और साथ ही भौतिक स्वरूप के सुख और समृद्धि की भी आप के और आपके परिवार में कभी कमी नहीं आये, ये जगत पिता ईश्वर से तहे दिल से प्रार्थना...


संगीत ही सभी दुखों को हर लेने का एक मात्र रामबाण इलाज है.सुरों का सानिध्य ही मन की वितुष्णा को निर्मल करने का सादा, और सीधा उपाय है.अहसासात की संवेदनशीलता ही दिल को , मन को ईश्वर के करीब ले जाती है.

सुखं हि दु:खान्यनुभूय शोभते,
घनांधकारेश्विव दीपदर्शनम्...


(मृच्छकटिकम् - शूद्रक)

घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है,
उसी प्रकार दुख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है.


आमीन..
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