Friday, July 31, 2009

मूसीकी़ की हसीन दुनिया में चमकता हुआ आफ़ताब - मोहम्मद रफ़ी



शमा - ए - रफ़ी के परवानों .......

आखिर फ़िर वही मनहूस ३१ जुलाई आ ही गयी.

फ़िर वही मकाम आया है आज, जिससे गुज़रना हमारे दिलों पर फ़िर खंजर चलने से कम नहीं.आज ही के दिन हमारे मूसीकी़ की हसीन दुनिया में चमकता हुआ आफ़ताब गुल हो गया और छा गयी ऐसी तारीकी, कि आज तक हम उस उजाले के तसव्वूर में खुदी को भुलाये , खुद को भुलाये बस जीये जा रहे हैं.

बचपन से हमने जब भी होश सम्हाला, अपने को इस सुरमई शाहानः आवाज़ की मोहोब्बत की गिरफ़्त में पाया, जिसे मेलोडी या सुरीलेपन का पर्याय कहा जाता रहा है.हम मश्कूर हैं इस सुरों के पैगंबर के, जिसनें हमारे जवानी को , एहसासात की गहराई को , प्यार की भावनाओं को परवान चढाया, और हमें इस लायक बनाया कि हम उस खुदा के साथ साथ उसके अज़ीम शाहकार की भी इज़्ज़त और इबादत कर सके.

तब से आज तक वह नूरानी आवाज़ की परस्तिश सिर्फ़ मैं ही नहीं , आप सभी सुरों के दुनिया के बाशिंदे भी कर रहें है.काश होता ये कि मालिक हम सभी तुच्छ लोगों की ज़िंदगी में से कुछ दिनों को भी उनकी उम्र में जोड देते तो आज हम उस फ़रीश्ते की आवाज़ से मरहूम ना होते, और रोज़ रोज़ उनकी मधुर स्वर लहरीयों की छांव तले उस कुदरती मो’अजिज़ः को सुनते और बौराते फ़िरते.अभी वैसे भी मूसीकी़ के इस जहां में फ़ाकाकशी के अय्याम चल रहे है, और ऐसे में रफ़ी साहब की यादों में और उनके गाये हुए कालातीत गानों के सहारे ही मस्त हुए जा रहे हैं, अवलिया की तरह झूमें जा रहे हैं.

आपको पिछले साल रफ़ी साहब की पोस्ट पर बताया ही था कि मैने अपने गायन के शौक का आगाज़ किया था उम्र के सातवें साल में उस बेहतरीन गीत से जिसे नौशाद जी नें फ़िल्म कोहिनूर के लिये राग हमीर में निबद्ध किया था, और रफ़ी साहब में अपनी पुरनूर आवाज़ में चार चांद लगा दिये थे -

मधुबन में राधिका नाचे रे....

कृपया यहां पढें


(http://dilipkawathekar.blogspot.com/2008/08/blog-post_14.html)

उस दिन से रफ़ी जी के गानों का जुनून दिल में तारी हो रहा है.दिल दिन ब दिन हर गीत की गहराई में गोते खा कर नये नये आयाम खोज कर ला रहा है, हीरे मोती के खज़ाने निकाल रहा है. जैसे गीता को जितनी भी बार पढो उनती बार नये अर्थ निकल कर आते है, रफ़ी जी के गाये हर गीत को बार बार सुनने पर हर बार नया आनंद प्राप्त होता है.

आज सुबह साडे़ छः बजे जब विविध भारती पर भूले बिसरे गीत में एक गीत सुना तो लगा जैसे रफ़ी साहब के लिये आज कुदरत भी सुबह सुबह तैय्यार हो कर सलाम करने आ गयी है.

नाचे मन मोरा मगन तिकता धीगी धीगी.....

मैं रोज़ जहां सुबह घूमने जाता हूं (अमोघ का स्कूल - डेली कॊलेज , इंदौर...) ,उसके रास्ते में ये गीत सुना.और संयोग ये कि हल्की हल्की बूंदा बांदी हो चुकी थी, और फ़िज़ा में वही एम्बियेंस घुल रहा था .उस माहौल को मैने कॆमेरे में कैद कर लिया, जहां बदरा गिर आये थे भीगी भीगी रुत में . मोर भी अपनी प्रियतमा के लिये नहीं आज खास तौर पर स्वयं रफ़ी जी के लिये ही अपने मोरपंखों को फ़ैलाये नृत्य कर रहा था.

आईये , आप भी उस भीगे मौसम में भीगे मन से सराबोर होने आ जायें ,रफ़ी साहब की पुरकशिश आवाज़ में ये गीत भी सुनें और सुकून हासिल करें.

अगर इसे देखनें में असुविधा हो रही हो तो नीचे प्लेयर में देखें..



यकीन मानिये, इस फ़िल्म में कोई स्टॊक सीन नहीं है, बस आज प्रकृती नें भी रफ़ी जी के लिये अपना इज़हारे अकीदत पेश किया है.मानो रफ़ी जी के ही लिये ये पूरा महौल खास आज के लिये निर्मित किया गया हो.

आज से हम हर तीसरे दिन मुहम्मद रफ़ी जैसी शक्सि़यत पर कुछ ना कुछ लिखेंगे.कुछ दिल से दिल की बात करेंगे, और अपने अपने दिलों को सुरों के इस राह पर ले जायेंगे, जिसका रहनुमा भी रफ़ी जी हैं और मंज़िल भी रफ़ीजी . कि़यामत आती हो तो आने दो.

आईये, हम सभी श़ख्सी़ तौर पर उस पाक रूह की तस्कीन के लिये मिल कर दुआ करें, क्योंकि अब हमारे हाथ में दुआ करने के अलावा और कुछ भी नहीं जो उस श़क्स़ को नज़र कर सकें....

तेरे गीतों में बाकी़ अब तलक वो सोज़ है, लेकिन..
वो पहले फ़ूल बरसाते थे, अब दामन भिगोते हैं.......


(जावेद नसीम)

Saturday, July 25, 2009

कॊमेडी के बडे नवाब - मेहमूद

Mehmood is Dead….

आज से पांच साल पहले एक दिन सुबह हमेशा की तरह ऒफ़िस में मेल चेक करने रेडफ़मेल खोला ही था तो एक केप्शन नें ध्यान खींचा.. और दिल एकदम से बैठ गया.

मेहमूद … 

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ये नाम मेरे लिये मात्र कोंमेडीयन या फ़िल्मी एक्टर नहीं था, मगर एक पूरा व्यक्तित्व , जीवन जीने का संपूर्ण  फलसफ़ा था. ना मालूम बचपन में कब से, महमूद मेरे दिल के कोनें में एक किरायेदार की तरह रहने लग गया थ, और हर दिन हर महिने किराये के बतौर मेरे मन की खुली खिडकीयों से झांक कर मुझे खुशीयोंकी सौगात दे जाता.

बस दो ही कलाकार थे जो मेरे रोल मोडेल की तरह मेरे केरेक्टर में घुस गये थे, एक शम्मी कपूर और दूसरे मेहमूद. (य़ादहै –धडकने लगता है मेरा   दिल –फ़िल्म दिल तेरा दिवाना )

उनकी हर फ़िल्म देखना मेरे लिये एक इबादत होती थी, एक कर्मकांड. जब वे अकेले या शोभा खोटे/मुमताज़ के साथ किसी कोमेडी सीन में या रोमांटिक सीन में आते थे तो सेंस ऒफ़ ह्युमर , टाईमिंग और पंचेस की अदायगी को बडी ही बारीकी से ध्यान देता था मैं, और अनजाने में आत्मसात कर लेता. बाद में किसी भी कोमेडी नाटक या एकांकी में जब मैं किसी कॊमॆडी चरित्र को निभाता था तब,अनायास ही, बिना इरादातन, मेहमूद भाईजान मेरे  नाटक के चरित्र में काया प्रवेश कर देते थे और मुझे आसानी से भाव दिलवा जाते थे.

ये नहीं कि मैं उनकी शॊर्टकमिंग्स या कमीयों से अवगत नहीं था, या उनके द्विअर्थी संवादों और कभी कभी फ़ूहड हास्य की कलाबाज़ीयों से इत्तेफ़ाक रखता था. हास्य को वे कभी हास्यास्पद श्रेणी तक खींच जाते थे.मगर , एक प्रेमी की तरह मुझे उनमें अच्छाईयां ही दिखती थी.

औलाद , प्यार किये जा, पडोसन, गुमनाम, साधु और शैतान , वारिस, ज़िंदगी आदि बाद की फ़िल्मों तक वह कोमेडी के बेताज बादशाह थे . क्या ही संयोग था कि उनने सबसे पहले बतौर विलन से अपनी उपथिती दर्ज़ कराई, १९५३ की फ़िल्म सी आई डी में जो मैने मेटीनी में बार बार देखी थी. बाद में प्यासा में भी विलन थे. काफ़ी दिनों बाद शायद मेरे अपने में फ़िर से विलन बने थे.

मुझे याद है, कि मैंने स्कूल में सिर्फ़ उनके ही गाने याद किये- गोरी तोरी बांकी हाय हाय हाय,  और दुनिया बनाने वाले सुन ले मेरी कहानी , जो कभी भी हमारे केमिस्ट्री के सर को बोरीयत होती थी तो मुझे पकड के क्लास के सामने खडा करवा के गवाते थे.

फ़िर चला दौर मजाहिया भूमिकाओं का छोटे नवाब,दिल तेरा दिवाना, ससुराल, बेटी बेटे , ज़िंदगी भूत बंगला,जोहर मेहमूद इन गोआ ,आदि, जिसमें उन्होने नायक या सहनायक के महत्व पूर्ण रोल किये.…
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बाद में उनके ऊपर फ़िल्माया गया एक गीत मैंने इतनी बार इतनी बार गाया इन ३० सालों में कि शायद २००० बार से अधिक. हर प्रोग्राम में, फ़ंक्शन में या पार्टी में मुझसे यही गवाने की ज़िद लगी रहती थी, जो मैं अपने मित्र योगेंद्र सिंग कीमती के साथ गाता था, बाकायदा एक्टिंग के साथ!!!

वे वो दिन थे  जब पुरुष ड्युएट्स को अक्सर गाया नहीं जाता था  , मगर हमने हमारी एमेच्योर्स संगीत समूह –मेच्युअर एमेच्यर्स में ये गाना बहुत  गाया,जिसमें हम जैसे इन्जिनीयर्स, डोक्टर्स, ज्वेलर्स, और ऎडवर्टाईज़मेंट क्षेत्र के लडके और लडकीयां थीं और बडे ठसकेसे   बिना पारिश्रमिक लिये  कार्यक्रम किया करते थे.(ताउ,अब तो  याद आया?)

एक चतुर नार , करके सिंगार….


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ये चित्र प्रारंभिक दिनोंका  है. 

(ये गीत गा गा कर इतना बोर हो गया था कि मैने ये कसम ही ले ली है, कि अब कभी नही गाऊंगा. और तो और, मन्ना डॆ पर दिये कार्यक्रम में भी लोगोंके आग्रह के बावजूद मैने ये गीत नहीं गाया. 

हां, ये ज़रूर है, कि मैने फ़िल्म प्यार किये जा का वह गीत उस गंभीर गीत संध्या में गाया था जिसमॆं अधिकतर गाने  शास्त्रीय रंग के थे. क्योंकि जब उसके एक साल पहले मैं मन्ना दा से उदयपुर में मिला था तो उन्होने भी इस गीत की पसंदगी को कबूल किया था.

मगर आज मैं वह गीत सुनवाता हूं या दिखवाता हूं जो इसी कार्यक्रम में मैने गाया था, जो मना दा नें मेहमूद के लिये फ़िल्म भूत बंगला के लिये गाया था:

आओ ट्विस्ट करे….


मेरे सामने एक युवा लडके और लड़की ने मन्ना डे जी से पूछा था कि क्या आपने सिर्फ़ क्लासिकल गीत ही गाये हैं, आज तक, क्या कोई डांस नंबर? तो मन्ना दा नें हंसकर कहा , बहुत गाये हैं, और चलो आज शाम के प्रोग्राम में भी ले लेते हैं. और यही गीत  गाया था उन्होने.

यहां का़बिले गौ़र है, कि मेहमूद स्वयं कोमेडियन के अलावा एक अच्छे भावप्रवीण अदाकार थे ही और साथ में एक आला दर्जे के डांसर भी थे.

प्यार किये जा से याद आया उस फ़िल्म का वह मशहूर कोमेडी सीन, जिसमें मेहमूद ओमप्रकाश को भूतों वाले कहानी सुनाते है, और ओम प्रकाश की घिग्घी बंध जाती है.

आप देखिये, कि क्या कोमेडी की टाईमिंग है, और पूरे सवा चार मिनीट के ब्लोक में सिर्फ़ तीन ही कट्स या सीन है. ओमप्रकाश के चेहरे के बदलते भाव और मेहमूद के संवादों की अदायगी मॆं कहीं भी बेताला या बेसुरा नही हुआ है यह सीन, एक सुरीले और ठेके वाले गाने की तरह!! मेहमूद के अदाकारी में मुद्राऒ कीअऔर ओमप्रकाश के चेहरे पर बदलते भावों की जुगलबंदी का कितना बढिय सिंक्रोनाईज़ेशन है, जो बहुत कम कोमेडी सीन में दिखाई देता है. इसलिये यह कालातीत सीन शायद फ़िल्मी इतिहास में ऒल टाईम बेस्ट कॊमेडी सीन है, मेरी समझ से.


आज मेहमूद को श्रद्धांजली देने के लिये भरे दिल से उदास होकर आंसू बहाऊं या यही सीन देख देख कर गम हल्का करूं , आप ही बतायॆं……
परसो गीता  दत्त पर एक और पोस्ट लिखनें का मन बना ही लिया था ,मगर समय अभाव के कारण टल गया. गुरुदत्तजी  के साथ के कूछ अंतरंग क्षणों को  भी याद करते.मगर वह अब फ़िर कभी …

और अगर समय हो  तो ये  भी देखते जाईये ….

Tuesday, July 21, 2009

मेरा सुंदर सपना बीत गया… गीता दत्त के जीवन का यथार्थ

 

गीता दत्त , या गीता रॊय…

 

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एक अधूरी सी कविता , या बीच में रुक गयी फ़िल्म , जो अपने मंज़िल तक नहीं पहुंच पायी.

क्या क्या बेहतरीन गीत गायें थे ..

 

दर्द भरे भाव, संवेदना भरे स्वर को अपनी मखमली मदहोश करने वाली आवाज़ के ज़रिये.

गीता दत्त रॉय, पहले प्रेमिका, बाद में पत्नी.सुख और दुःख की साथी और प्रणेता ..

अशांत, अधूरे कलाकार गुरुदत्त की हमसफ़र..

 

क्या क्या नहीं कहा जा चुका है, गीता दत्त के बारे में.

उनका एक गीत तो कालातीत है, अमर है. उस गीत नें इतिहास रच डाला.

अपने भाव भरे बोल , कलेजे को चीर देने वाली धुन, विश्व स्तरीय निर्देशन और चित्रांकन, सिनेमेटोग्राफी की टेक्स्ट बुक में दर्ज़

 

वक्त नें किया क्या हसीं सितम, तुम रहे ना तुम , हम रहे ना हम….

 

गुरुदत्त पर संगीत को समर्पित शीर्ष ब्लोग हिन्दयुग्म के आवाज़ पर नश्र किये गये इस पोस्ट को अगर पढें ….

(गुरुदत्त इस क्लाईमेक्स की सीन में कुछ अलग नाटकीयता और रील लाईफ़ और रियल लाईफ का विरोधाभास प्रकाश व्यवस्था की माध्यम से व्यक्त करना चाहते थे. ब्लेक एंड व्हाईट रंगों से नायक और नायिका की मन की मोनोटोनी ,रिक्तता , यश और वैभव की क्षणभंगुरता के अहसास को बड़े जुदा अंदाज़ में फिल्माना चाहते थे…Contd…)

इस गीत के बारे में विस्तार से …

गुरुदत्त- एक शांत अधूरा कलाकार  !   --- वक्त नें किया ,क्या हसीं सितम... देखें और पढें..

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http://podcast.hindyugm.com/2008/10/remembering-gurudutt-genius-film-maker.html

स्वयं लताजी नें भी इस खरगोशी आवाज़ के बारें , और उस गीता दत्त के मन के एहसासात के बारे में एक हमसफ़र के तौर पर जो भी महसूस किया वह यहां बखूबी सुना जा सकता है.उनकी खुद की रूहानी आवाज़ में…

 



एक और नयी बात पता चली. एक बहुत ही शानदार साईट उपलब्ध है गीता जी के चाहने वालों के लिये, जहां इस गुणी कलाकार के जीवन के हर अनछुए पहलु से रू ब रू कराया गया है.गीतों की फ़ेरहिस्त, जीवनी, सुहाने चित्र और जो  दिल को सुकून दे ऐसे गाने…

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आज गीता जी का एक और नया गीत सुनने को मिला. गीत के बोल हैं -

एक बात सुनाती हूं, किसी से ना कहना…


इस गीत की खासियत ये है, कि इसे पाकिस्तान के मशहूर लिजेंडरी संगीतकार बाबा जी. ए चिश्ती ने स्वरबद्ध किया है ,जिन्हे पाकिस्तानी फ़िल्मी संगीत जगत के जनक माना जाता है. सन १९५६ की एक फ़िल्म के लिये इसे रिकोर्ड किया गया था पाकिस्तानी फ़िल्म  मिस ५६ के लिये, मगर बाद में इसी गीत को अंततः पाकिस्तानी गायिका नाहीद नयज़ी नें गाया.


(शायद पहले ये फ़िल्म यहां बनने वाली थी. लारा लप्पा गर्ल मीना शोरी के पति रूप के शोरी इसे यहां बनाने वाले थे. मगर बाद में ये तय हुआ कि इसे पाकिस्तान में बनाया जायेगा. इसीलिये फ़िर इन्ही गानों को वहां फ़िर से गवाया गया) . वैसे कुल मिला कर चार गाने गाये गये थे इस फ़िल्म के लिये हिंदुस्तानी कलाकारों ने, जिसमें एक गीता जी नें और गाया था -

ऐरे गै़रे नत्थु खैरे, घबरा गये…,और दो ड्युएट – जिन्हे बाद में सुरों के शहंशाह जनाब मेहंदी हसन जी नें गाया.(ये ७८ rpm पर उपलब्ध है)

 

तो सुनिये यह गीत….



 



मैं तो जब भी गीताजी के गाये गानों की लिस्ट पढता हूं, उनके सबसे पहले प्रसिद्ध हुए गाने में उनके जीवन का फलसफा पाता हूं…..जो फ़िल्म दो भाई के लिये सचिन देव बर्मन दा के लिये सन १९४६ में गाया था;

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मेरा सुंदर सपना बीत गया,

मैं प्रेम में सब कुछ हार गयी, बदर्द ज़माना जीत गया, मेरा सुंदर सपना बीत गया….





क्या उनके भविष्य के प्रेम कहानी के खत्म होने का, जीवन के  संगीत के जाने  का यह पूर्वाभास था?…

(चित्र साभार – गीतादत्त डॊट कॊम)

Wednesday, July 15, 2009

सुरों के शहेंशाह मदन मोहन- पुण्यतिथी…

    सुरों के शहेंशाह मदन मोहन की आज ३४ वी पुण्यतिथी है. अपने सुरीले और मन मोहने वाली धुनों के खज़ाने लिये यह शहेंशाह हमसे मात्र अपने ५१ वे वर्ष में रुखसत हो गया.

मगर कई संगीतकारों की तुलना में कम फ़िल्मों को संगीत देने वाले इस स्वर महर्षि नें फ़िल्मी गीतों की दुनिया में अपनी एक नई जगह बनाई , जो यादों की अमिट छाप छोड गयी है हमारे जहेन में.  
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मदन मोहन के लिये आज बहुत कुछ लिखा जा चुका है. हम तो सिर्फ़ उन्हे याद करें किसी ऐसे गीत से जो मेरे मन में बचपन से बसा हुआ है:

नैना बरसे रिमझिम…

यह गीत मेरी मां को बेहद पसंद था , और चूंकि वह अच्छा गा नही सकती थी, वे मेरे पिताजी से हमेशा इस गीत को गाने का अनुरोध किया करती थी.

आप और हम जिन गीतों को ओढते हैं , मन के अंतरंग मे बिछाते हैं उन गीतों के लिये इन गुणी संगीतकारों नें कितने परिश्रम किये होते हैं,ये हमें कभी पता नही चलता. सुना है, कि इस गीत की धुन को बनाते समय मदन जी के भाई की अकाल मृत्यु हो गयी थी, और उस जहनी हालात में उनके दिल की गहराई से पीडा और दर्द की इंतेहां के रूप में इस गाने की धुन उपजी.


वैसे इस गीत में मदनजी नें रहस्यमयी धुन जो बनाई है, उसके साथ पूरा न्याय किया है लताजी के मधुर , कोमल स्वरोनें. उनके बिना इस गीत की कल्पना भी नही की जा सकती.

संत ग्यानेश्वर जी नें भगवान के स्मरण के संदर्भ में क्या खूब कहा है -जिस तरह से मोगरे के फ़ूल कभी भी पेड से पक कर नहीं टपकते, उन्हे तोडना पडता है. तोडते हुए ये गुच्छों के रूप में हमारे हाथ में खिले हुए रहते है, और अपनी सुगंध से हमारे तन और मन को महकाते है.

उसी प्रकार मदन मोहन जी की रचनायें हमारे रूह तक को मेहका रही हैं.

   


इन दिनों बारिशों का मौसम है, बाहर भी फ़ुहारें , भीगे भीगे मन के भीतर भी.

अब पता नहीं  आपके हमारे नसीब में ये बात हो ना हो? मन नही मान रहा है. इसे भी सुन लिजिये…



    बूंदों से बना हुआ छोटा सा समंदर,
लहरों से भीगी हुई छोटी सी बस्ती,
चलो ढूंढे़ बारिश में बचपन की यादें,
हाथ में लेकर एक कागज़ की कश्ती…….

(Anonymous)

Wednesday, June 24, 2009

उस्ताद अली अकबर खां – विनम्र श्रद्धांजली

Akbar पिछले दिनों संगीत के इस जाजम पर कुछ नही लिख पाया. यही कहूंगा कि संगीत पर लिखना या किसी बात पर भी अपनी राय देना तभी संभव है, जब आप मन से उसमे रमे हुए हो.  यह ब्लोग मैं अपने दिल की कलम से लिखता हूं, और पिछले दिनों उसकी स्याही जैसे सूख ही गयी थी.

खैर, २० जून को विश्व संगीत दिवस था, और Father’s Day भी. पता नही ये दिन कौन तय करता है, और एक ही दिन ये दो दो खास विधायें… गज़ब……

खैर, दुख की यह बात है कि प्रख्यात सरोद वादक पद्मभूषण, पद्मविभूषण उस्ताद अली अकबर खां साहब इन्तेकाल फ़रमा गये. जैसे कि पं.रविशंकर का नाम सितार का पर्यायवाची है, वैसे ही आपका नाम सरोद से. क्या ही संयोग है कि आपके पिता संगीत के भीष्म पितामह उस्ताद अलाउद्दिन खां साहब से आपने तीन वर्ष की उम्र से ही संगीत सीखना शुरु किया और अपने गुरु भाईयों पं.रविशंकर, बांसुरी वादक पन्नालाल घोष,हरिशंकर चौरसिया , तबला वाद्क निखिल घोष ,  और बहन अन्नपूर्णा देवी की तरह संगीत की दुनिया में शीर्ष स्थान पाया.आपके शिष्यों में सुरीले संगीतकार जयदेव जी का भी नाम है.

भगवान उनकी आत्मा को शांती प्रदान करे .

vlcsnap-220979  मन्ना दा के गानों पर हुए  “ दिल का हाल सुने दिल वाला “ कार्यक्रम के बारे में मैने अपने पिछले पोस्ट  में लिखा था और आपको उस प्रोग्राम के प्रारंभ का गीत – तू प्यार का सागर है – सुनवाया था. तो आज प्रस्तुत है, उसके आगे की कडी –सिलसिलेवार क्रम से.

जैसा कि आप को विदित है, ये कार्यक्रम इंदौर में हुआ था संगीत को समर्पित एक मुख्त़लिफ़ सी संस्था “श्रोता बिरादरी “ के बेनर तले. बिना कोई बडे़ बडे़ तामझा़म किये हुए इस संस्था ने जमीन से जुड कर सच्चे संगीत प्रेमी के लिये अपनी सेवायें दी है, बिल्कुल बिना किसी परिश्रम के.पता है ,प्रस्तुत कार्यक्रम में किसी भी कलाकार नें एक भी पैसा पारिश्रमिक नही लिया है और ना ही कार्यक्रम का कोई शुल्क रखा गया था.

तो आज से हम उस कार्यक्रम को आपके सामने एक एक कडी़ के रूप में  प्रस्तुत करेंगे और आप को सुरों की इस दावत में अगर मज़ा आया तो हमें खुशी होगी.

यकीन मानिये, यहां आपको किसी व्यावसायिक प्रोग्राम की तरह लटके झटके या हंगामा नही मिलेगा. ये श्रोता वाकई में संगीत के सही पारखी और शौकिन है, और समाज के हर तबके से आते है.
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कार्यक्रम की शुरुआत हमने एक भजन से की , और फ़िर हमारे रिवाज के अनुसार कार्यक्रम के सूत्रधार श्री संजय पटेल नें  मन्ना दा को सशरीर हमारे बीच में आहूत किया, उनके स्वयं के उद्गार और मूल गीत लेकर. इसमें किसी को कोई संशय नही है, (गायक को तो कतई नही) कि यहां जो भी सुनवाया जायेगा वह इन मूर्धन्य गायको के गुणों और जलाल के सामने कुछ भी नही. फ़िर भी हम उन्हे याद करें और दिली सुकून पायें यही कोशिश.

भय भंजना , वंदना सुन हमारी.



इसके बाद गीतकार प्रदीप के वाणी से मन्ना दा के बारे में सुनिये  और उनका लिखा हुआ बेहद लोकप्रिय हुअ ये गीत

उपर गगन विशाल, नीचे गहरा पाताल ….


और बाद में पूरा गीत अलग से.



अगली कडी़ में मन्ना दा के गाये गीतों के अलग अलग रंगों से वाकिफ़ करायेंगे …. 

Thursday, May 28, 2009

दिल का हाल सुने दिल वाला.. मन्ना दा के गीतों पर कार्यक्रम

मेरे आवाज़ की दुनिया के मित्रों,

आज तक आप मेरे साथ यहां तक आये, संगीत के सुरों के शीतल बयार में हमने अपनी दिल की प्यास बुझायी उन सदाबहार हिंदी फ़िल्मी गीतों से. साथ ही आप हमखयाल हुए उन गीतों से जुडे हुए सृजनकार स्वर ऋषियों की जीवनी से, मेथडोलोजी और अलग अलग विधाओंके पहलुओं से. हम रू ब रू हुए कई गायक और गायिका कलाकारों से , जिनके अथक परिश्रम से हम पा पाये ऐसे नायाब गीत जिन्हे हमने अपने सुरीले जीवन का एक हिस्सा बना रखा है.

जीवन की आपाधापी में, विशेषकर इन दिनों जब मैं अपने इजिप्ट के प्रोजेक्ट के सिलसिले में काफ़ी बाहर हूं, और आप सभी की मुझसे जो अपेक्षायें है, (यदि हैं),जो मैं पूरा नहीं कर पा रहा हूं. वैसे अपने इस प्रोजेक्ट के केस में सृजन की पराकाष्ठा को छू रहा हूं, फ़िर भी इन गीतों का सहारा मिल ही जाता है, कभी बीच में ड्राईंग बनाते बनाते हुए कुछ सुरीला सुन लिया, और दिली सूकून हासिल कर लिया.

मगर अब ये ब्लोग जगत भी दिली सूकून देने लग गया है. मन भागता रहता है पोस्ट करने को. मगर हालात होती है उस बल्लेबाज़ की तरह जो आऊट ओफ़ फ़ोर्म रहता है. कुछ भी लिख पाना समयाभाव की वजह से और वो भी लिखने पढने लायक,बडी़ ही टेडी़ खीर है.Hats Off to all those fellow Bloggers who manage this Herculean Task!! Indeed !!!

तो जैसा कि आपको पिछली बार लिखा था , मैं आज से वह शृंखला शुरु करने की अनुमती लेना चाहता हूं जिसमें मैं बीच बीच में अपने प्रोग्राम की विडियो या ऒडियो क्लिपिंग दिखाऊंगा. कार्यक्रम का नाम था दिल का हाल सुने दिल वाला - जिसमें मन्ना डे के गीतों को पेश किया गया था.

कुछ दो तीन सालों पहले हुए ये कार्यक्रम हुआ था इंदौर में, जो मेरे एक स्वनामधन्य मित्र की प्रयोगधर्मी संस्था श्रोता बिरादरी के बेनर तले हुआ था, जिसके सदस्य होते हैं वे सभी श्रोता जो अच्छे और सुरीले संगीत की गहरी पकड रखते हैं विशेष कर पुरानी फ़िल्मों का संगीत . ये समाज के सभी तबकों से चुन चुन कर स्वयं मेनिफ़ेस्ट होते है और इनके सामने सोच समझ कर ही गाया जा सकता है. ना कोई फ़ीस ना कोई सदस्यता की फ़ोर्मेलीटी, बस महिने के किसी एक शनिवार को शाम को ठीक छः बज कर पचपन मिनीट पर पुराने संगीत पर कोई अनोखे फ़ोर्मेट में, किसी अनोखी थीम पर मात्र देड घण्टे का प्रोग्राम होता था.कभी दुर्लभ गानों के रिकोर्ड या केसेट को सुनवाया जाता था,तो कभी किसी गायक गायिका या संगीतकार की जन्मदिन या पुण्यतिथी पर उसके चुने हुए गीत गाये जाते थे मधुर स्वरों के गायक और गायिकाओं से.

अमूमन सभी कार्यक्रमों की एंकरींग का ज़िम्मा वहन करते थे हमारे प्रदेश के प्रख्यात संस्कृतिकर्मी मेरे अनुज मित्र श्री संजय पटेल , जो अपनी वरेण्य वाणी के सन्मोहन से सभी श्रोताओं के दिलों को एक सूत्र में पिरोने का महत कार्य बखूबी किया करते थे, (अब भी करते है). हर गीत से पहले उसकी पृष्ठभूमी को , उसकी तकनीकी बारिकीयों को यूं पेश करते थे कि श्रोता उस गीत के रंग में खुद ब खुद रंग जाता था कि कलाकार का काम आसान हो जाता था.

साथ ही साथ ,उनके स्पष्ट ,धीर गंभीर आवाज़ का जादू श्रोताओं के साथ खुद कार्यक्रम पेश करने वाले कलाकारों पर भी खूब तारी होता था, और उनके हौसला अफ़ज़ाई की वजह से कलाकार अपने हुनर को कमाल की हद तक जाकर पर्फ़ेक्शनिस्ट की तरह पेश करता था.और क्या चाहिये एक सफ़ल और मुकम्मल प्रोग्राम के लिये.कई सालों से हम दोनों स्टेज पर एक साथ अपने अपने हुनर की सुरभी बिखेरते आ रहे है, और इंशा अल्लाह , आगे भी करते रहेंगे.

इस कार्यक्रम में सभी गीत गाने का सौभाग्य मुझे मिला था और मेरा साथ युगल गीतॊम के लिये दिया था सुश्री शीला वर्मा, और सुश्री प्रियाणी वाणी.

कार्यक्रम का प्रारंभ किया एक भक्ति गीत से -

तू प्यार का सागर है...

जो फ़िल्म सीमा के लिये शैलेंद्र जी ने सरल भावपूर्ण शब्दों मे लिखा है, और संगीत बद्ध किया है शंकर जयकिशन जी नें.

सुनिये और आनंद लिजिये...

Sunday, May 10, 2009

तलत महमूद.. एक कोमल एहसास... दर्द की श्वेत श्याम तसवीर..


तलत महमूद,

जब भी तलत मेहमूद ये नाम हमारे ज़ेहन में आता है, तो हमारे यादों की खिडकीयों पर दस्तक देते हैं उनकी मखमली आवाज़ के मोरपंखी एहसासात.हमारा प्यासा मन खुद ब खुद, सुरों की इन हसीन वादीयों से टकरा कर गूंजते हुए दर्द भरे नगमों के समंदर में डूब जाता है.

अभी परसों तो उनकी बरसी थी.एक मित्र नें मेहफ़िल जमाई और देर रात तक उनके सभी गीत प्यार भरे, दर्द भरे सुनते रहे और फ़िर भी अतृप्त ही रहे.

आज कुछ और नहीं सिर्फ़ दिल की एक तमन्ना. इस महान गायक का एक गीत सुनाउं. गीत है फ़िल्म जहांआरा का

तेरी आंख के आंसू पी जाऊं....


मैं अब तक संकोच में ही था, कि क्या करूंगा अपने ही गीत सुना कर . फ़िर आप ही मित्रों में से एक सुरीले साथी नें सारथ्य किया और मेरे मन की दुविधा दूर कर दी. कहा, हम सभी अपने अपने हुनर को पेश करते हैं, जैसे कि कविता, लेख, कार्टून, चित्र आदि. फ़िर आप गाना अपने ही आवाज़ में क्यों नहीं. मगर मुझे ये भी पता है, कि जितने बुलंद और मधुर इन सभी गायकों के गीत होते है, हम सभी के ज़ेहन में गहरे बाबस्ता है, और कोई कुछ भी कर ले , यह अंतर पाटना किसी भी खां साहब के बस की बात नही, जब कि मैं एक अदना सा पार्ट टाईम गायक ,बिना किसी तालीम के. इस उत्तुंग हिमालय को लांघ सकने की सोच ही नही सकता. हां , इंजिनीयर हूं तो उसका ड्राईंग बनाए का प्रयास ज़रूर कर सकता हूं.

इसलिये ये कोशिश रहेगी कि सुरमई गीत भी चल निकले, गले से, दिल से, और हम सभी इस बात का खयाल ना रखें कि आवाज़ की कितनी सही कॊपी की गयी है. ये कतई कोई मिमिक्री नही है. यकीन मानिये, वह बहुत मुश्किल नहीं .मगर ज़रूर मेहसूस करें उस गीत की और महान गायक की मूल आत्मा और संगीतकार की सृजनता को, और स्वानंद की प्राप्ति करें.

तेरी आंख के आंसू पी जाऊं....




अभी एक और गीत सुना रफ़ी जी की कलेजे को भिड जाने वाली आवाज़ में..

चल उड जा रे पंछी .....

पहले ही आलाप में आर्तता की पराकाष्ठा ...

फ़िर सुना यही गीत तलत मेहमूद जी की कांपती हुई , दर्द की गहराई से निकलती हुई कोमल आवाज़ में. दोनों ही महान,मगर अंदाज़े बयां जुदा जुदा... साथ ही तलत जी का मुरकीयां लेने का एक विशिष्ट तरीका..

मैं तो लुट ही गया.

कंगाली के इस खूबसूरत आलम में दिल नें चाहा कि सिर्फ़ गुनगुनाऊं इन दोनों गीतों को तरन्नुम में, और गाने के शब्दों के उन भावों को , भावनाओं को नज़दीक से स्पर्श करूं.दोनों ही स्वर एक ही गीत के एक ही अंतरे में... मूल गीत आपने सुने ही होंगे, आज मुझे मौका दें..

चल उड जा रे पंछी...



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